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Wednesday, March 19, 2008

मार्च इन मार्च फ्रोम गंज टू गंज ( बीरगंज (नेपाल) हास्य कवि सम्मेलन)



(15 मार्च, पहाड़गंज से बीरगंज का मार्च- हास्य कवि सम्मेलन पर एक विशेष रिपोर्ट )
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फ़ागुन के आगमन के साथ मिला एक नेह-निमंत्रण, फाग के राग से प्रफुल्लित मन अब नेह-निमंत्रण पा गद-गद था और यह नेह-निमंत्रण था हिन्दी के प्रचार प्रसार में दिलो जान से जुटी संस्था "नेपाल हिन्दी सहित्य परिषद", बीरगंज,नेपाल से । ने.हि.सा.प. नेपाल से एक ई-पत्र हिन्द-युग्म को प्राप्त हुआ कि ने.हि.सा.प. बीरगंज नेपाल में एक हास्य कवि सम्मेलन करने जा रही है और उन्हें हिन्द-युग्म के हास्य कवि इस हास्य कवि सम्मेलन में कविता पाठ के लिये मिल जायें तो बहुत सहयोग मिलेगा और मेरा सौभाग्य है कि हिन्द-युग्म की तरफ से मुझे इस सम्मेलन में जाने का मौका मिला, 15 मार्च को होने वाले इस कवि सम्मेलन के लिये मेरी तैयारी शुरु हुई ।
दिल्ली से रक्सोल जाने के लिये चुनाव हुआ सत्यागृह एक्स. का और 13 मार्च को मैंने अपना बिस्तर-बोरिया बाँधा और चल पड़ा स्टेशन की ओर क्यूकि लगभग 24-25 घंटे का सफर था और इतने लम्बे सफर में सफर ना करना पडे इसलिये तत्काल आराक्षण लिया ताकि सफर के सफर से बचा जा सके। और फिर

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पहाड़गंज से बीरगंज जाने को तैयार
स्टेशन पर पहुँच गये करके पटरी पार
करके पटरी पार भीड़ का अजब नजारा
हिन्दुस्तान खड़ा हो ज्यों सारे का सारा
पता नहीं सीढियों से उतरना है या चढ़ना
पानी की तरह भीड़ काटकर आगे बढ़ना
बड़ी मसक्कत बाद रेल के दर्शन पाये
लयीं इकट्ठी सांस भीड़ में जो ले ना पाये
डब्बे में घुस गये लगे फिर सीट खोजने
हालत खस्ता कर दी सर पर रखे बोझ ने
बस इतने में भीड़ कर हल्ला और अरेरा
पता नहीं कहाँ मैं और कहाँ बैग था मेरा
स्टेचू बन गया हाथ तक हिल ना पाया
जैसे तैसे धनुष बना खुद को लटकाया
थोडी देर में धक्का मुक्की लग गयी भाने
जब एक महाशय खुजली से इतने अकुलाने
टेड़ा करके हाथ खुजाना खुद का चाहा
अहो! मेरा सौभाग्य,मेरा सर लगे खुजाने
हमको लगने लगी भीड़ अब खासी चोखी
लो अब किसी ने बीड़ी सुलगा मुहुँ में ठोकी
खाँसी से बुरा हाल फँसे कुछ ऐसे भाई
जेब के थे हम चश्मदीद, जब गई उड़ाई
सोचा इससे अच्छा तो चमगादड़ होता
कम से कम तब ऐसा तो नही गड़बड़ होता
लेकिन खड़े थे फँसे हुए उलझे उलझाए
कर गया जेब हजामत हम कुछ कर ना पाये
जाने कहाँ से जेब-कटिंग की ट्रेनिग पाई
पकड़ ना लें उसे पीछा करके इसलिये भाई
जाते जाते तोड़ गया उपर से नाड़ा
ले गया भिडिया भेड़ ग्वारिया देखे ठाड़ा
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अरे भाईसाहब चिंता का कोई विषय नही हैं ऐसा कुछ नहीं हुआ पेंट शर्ट पहन कर गया था.. वास्तव में ये पंक्तियाँ तो एक दिन-दो दिन पहले ही लिख लीं थी ऐसे ही फर्जी कल्पना करके सो डोंट-वरी..

हाँ तो मैं कह रहा था कि तैयारी पूरी हुई और मैं पहुँच गया स्टेशन बिना किसी धक्का मुक्की के और रेलगाड़ी के पहियों और पटरियों के ताल मेल से निकलते मधुर संगीत में नजारों का लुत्फ लेते हुये और बीच बीच में कुछ ' चाय बोलो गर्मा गरम चाय', 'चटपटे छोले,शंकर बाम लगाने का पैसा नही किसी ने मँगाया हो तो ले जाना' सुनते हुए अगली शाम तकरीबन 6 बजे हम रक्सोल स्टेशन पर पहुँच गये जहाँ पर एक नीले रंग की कार पर अपना नाम मोटे-मोटे अक्षरों मे देख कर प्रसन्नता हुई कि चलो भटके नही और सफर बिना सफर के हो गया । कार में बैठ प्रस्थान किया रक्सोल से बीरगंज का, बैठे बैठे हाथ देख रहा था कि हाथ में विदेश रेखा तो है नहीं फिर विदेश यात्रा कैसे...

सोचते सोचते नेपाल की सीमा बहुत नजर घुमाई कि कोई फर्क-सर्क दिखाई दे नेपाल और भारत का पर असफल निगाहें बार बार लौट आतीं मेरी हथेलियों में और और मुझे डुबो देती कि " काठमान्डू है या काठ-गोदाम, बीरगंज है कि पहाड़्गंज, नेपाल है कि भोपाल एक जैसा हाव-भाव,एक जैसी बोल-चाल, एक जैसा पहनाव, उपर से हिन्दी सहित्य परिषद के मित्र-मंडल से मिला अपनापन और प्यार पता ही नही लगा कि अपनी भूमि से अलग हूँ , और होता भी कैसे, नेपाल कौन सा किसी अन्य सोर-मंडल से आया है सब कुछ वैसा ही जैसा यहाँ है वही देवी-देवताओं बजरंग बली, दुर्गा माँ, सूर्य-नरायण के मन्दिर, वैसे ही श्रद्धा -विस्वास लिये भक्तजन, हम भी ठहर गये एक मन्दिर प्रांगंण में बने एक अतिथिगृह में । हालाँकि असली प्रेमियों की कमी वहाँ नही थी; अपनी जान की परवाह किये बगैर हमारी तरफ लगातार आते प्रेमियो और हमारे बीच विलेन का रोल अदा किया मॉस्कीटो क्वाइल ने और एक और सहायक मक्छर-दानी ने जो ने.हि.सा.प. के कोशाध्यक्ष श्री निरंजन चौधरी जी ने बिना कहे उपलब्ध करा दी और फिर हमने सारे घोड़े बेच दिये..


अगले दिन 15 मार्च सुबह-सुबह अपने ट्रेक-सूट में कसे हुए श्री निरंजन जी ने दरवाजे दस्तक दी लेकिन हम सुबह 6 तक ही उठ कर स्नान आदि से निवृत होकर बैठे थे और फिर चल पड़े बीरगंज के एक रमणीय स्थल 'भगवान सूर्य-मन्दिर" की तरफ एक बड़े से जलाशय मे मध्य स्थित भगवान सूर्य सात घोड़ों पर सवार और जलाशय के परिधि के चक्कर लगाते लगाते एक पंथ दो काज , मॉरनिंग वॉक की मॉरनिंग वॉक और परिक्रमा की परिक्रमा इससे बेहतर भला क्या हो सकता है.. परिक्रमा कर वापस आये तो तो श्री निरंजन जी के घर पर चाय-नाश्ता और टी.वी. पर चलते समाचार की हाइलाइट्स (क्रिकेटर्स अब रेम्प पर) ने मुझे मेरी कविता "बोल की बोली" याद दिला दी, इसी तरह घरेलू सा वातावरण मिला और और वक्त हो चला बीरगंज,नेपाल के उद्योग वाणिज्य संघ सभागार में जाने का जहाँ पर सभी तैयारियो एवं व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने में जुटे थे ने.हि.सा.प. के सभी सदस्यगण और कार्यकर्ता।




श्रोताओं का आना प्रारम्भ हो गया, कुछ स्थानीय कवि भी सम्मेलन में शिरकत करने पधार चुके थे, सभा कक्ष अब दर्शकों से खचाखच भरा था । मुख्य अतिथि थे त्रिभुवन विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक श्री सूरज देव सिंह प्रभाकर जिन्होने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन किया तत्पश्चात स्कूली क्षात्रओं ने माँ सरस्वती वन्दना की और ने.हि.सा.प. के अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश सिकारिया द्वारा आगंतुक कवियों को माल्यार्पण कर उनका स्वागत किया गया । मंच की कमान संभाली रक्सौल के ख्याति प्राप्त हास्य कवि लटपट ब्रिजेश जी ने । बेतिया से पधारे हास्य कवि श्री गोरख मस्ताना से पहल हुई कार्यक्रम की और क्रमबद्ध तरीके से सभी ने अपनी हास्य कविताई के साथ साथ चुट्कुले व चुट्कियों से हँसी के मोती बखेरे.. विषेश बात यह रही कि इस कवि सम्मेलन में इलाहाबाद से वरिष्ठ कवि एव मुख्य हास्य कवि के रूप में श्री कृष्णअवतार 'राही' को आना था परंतु बीरगंज से करीब 200 किलोमीटर पहले ही एक शादी के चक्कर में वो फँस गये और प्रोग्राम के अंत तक उनका इन्तजार होता रहा, शादी के चक्कर में कहने का अभिप्राय यह नहीं कि 'राही' जी की राह में जिन्दगी की नई राह का कोई मुकाम आया हो, बल्कि किन्ही जज महोदय की बारात (ठीक से अवगत नहीं हूँ कि जज महोदय जी की खुद की बारात थी या उनके किसी समबन्धी की)के चक्कर में सप्तक्रांति ट्रेन को 2.5 घंटे रोककर रखा गया, पता नहीं एक घर बसाने के चक्कर में कितने लोग फिर से कुँवारे हो गये होंगे.. राम जाने.. अब राम के यहाँ दिनदेरी है अन्धेरी नही तो जैसे तैसे 'राही' जी करीब 7.30 बजे के लगभग 'राही' से 'राहत' बन गये और लोगों को राहत मिली और फिर अपनी चिरपरिचित शैली में हँसी के छोटे छोटे गुब्बारे उड़ने शुरू हो गये जो काफी देर तक चलते रहे..



मेरा व्यक्तिगत अनुभव :
1. कार्यक्रम के दौरान जो मुझे अनुभव हुआ, मैने पाया कि हास्य कवि सम्मेलन में शायद हास कि जगह परिहास मुख्य हो गया है दशक पहले के कवि सम्मेलनों में ऐसा नही देखा जाता था लोग रचानओं की गहराई समझते थे और एक स्वस्थ हास्य पैदा होता था परंतु आज-कल कविताई उतने नहीं हँसते जितने जोक्स / चुट्कुले-चुट्कियों पर ।

2. ऐसा भी पाया गया कि अगर कोई बुजुर्ग अथवा वरिष्ठ कवि कोई बात कहता है किसी चुटकले के माध्यम से तो वो ज्यदा असरकारक सिद्ध होती है वही बात किसी युवा द्वारा कही जाये तो इतनी असरकारक नहीं होती वजह जो भी हो शायद इसलिये कि उम्रदराज से ऐसी अपेक्षा नहीं होती होगी या जो भी ऐसा अनुभव हुआ

3. हास्य कवितायें ज्यदा बड़ी नही होनी चाहिये छोटी छोटी क्षणिकायें बीच बीच में चुटकुले इत्यादि जनता को बाँधते हैं

4. कई कवियों को देखा कि वो अपनी कुछ चुनी हुई रचनाओं को पूरा ना सुनाकर केवल उन रचानाओं के कुछ चुने हुये अंश सुनाते हैं जो हास्य के लिये उपयुक्त जान पड़ते हैं

5. मंच पर परिचित हमउम्र कवियों / साथियों का होना अहम भुमिका रखता है वजह एक तो हौसला अफजाही दुसरा अगर कोई कविता सुनानी हो तो उस कविता की पूर्व भूमिका अपने साथी कविमित्र पर डालकर कहता है तो श्रोताओं का कौतूहल बढ़ जाता है और ठहाकों की आवाज भी

6. ????????????????????????????????????????????????????????

अनुभव से मुझे याद आया कि इस कार्यक्रम के लिये खास तौर पर एक 'अनुभव' लिखा था, हलाँकि इस 'अनुभव' को मंच पर पाठ करने का मौका तो नहीं मिल पाया क्यूँकि इस रचना को द्वतीय चक्रण के लिये रखा था और द्वतीय चक्रण हुआ नही कविता पाठ का इसलिये यह कविता अपठित ही वापस आ गयी परंतु आप चिंता न करे अगले बुधवार आपके इंतजार में रहेगी मेरी 'अनुभव'

उप्रोक्त रचना के अतिरिक्त जो अन्य 3 रचनायें मुझे पाठ करने का सौभाग्य मिला वो थीं

चर्म रोग, होनहार पीड़ी और होनहार बिरवान

चर्म-रोग
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हफ्ता पहले, क्लीनिक पर हमारे
एक दम्पति सपरिवार पधारे
मोटा सा लड़का, पतली सी लड़की
एक बार तो धडकन रुक सी गयी
और फिर जोर जोर धड़की
हमने सोचा, गलती से क्लीनिक में घुस आये हैं
शायद बराबर वाले फिल्म स्टूडियो में
पोर्टफोलियो बनवाने लाये हैं
लडकी के होठों का लिप-लाइनर धनुष
मय प्रत्यंचा के दूर से ही दिख रहा था
ओछी सी टी-शर्ट पर कुछ अटपटा सा लिख रहा था
थोडी कोशिश की तो कुछ समझ मे आया
मगर अब लड़की को एकदम सामने पाया
बोली एक्सक्यूज मी..!!! मैं बोला "पढ़ लिया"
इतना था कि वो आटोमैटिक धनुष
फटा-फट फटा-फट चल गया
शुक्र है, एक भी अंग्रेजी तीर
भेजे में ना घुस कर सर के ऊपर से गुजर गया
इतने में लड़की की माँ चिल्लाई
डोक्टर साहब कहाँ हैं भाई
लड़की चिडचिडी सी रहती है
ना कुछ खाती है ना पीती है
चेकअप करवाना है
थोडा जल्दी कर दो अभी हमें ब्यूटी-पार्लर जाना है
फोर्म भरते भरते मैने पूँछा वजन और लम्बाई
तो 42 किलो 5 फुट 4 इंच बतलाई
मैं बोला लम्बाई के हिसाब से
वजन तो ठीक है,
मैडम जी ! फिर क्या तकलीफ है ?
शायद एक्स-रे अल्ट्रासाउंड से पकड आये
लेकिन उससे पहले एक्यूरेट वजन नाप लिया जाये
इशारे से लड़की को मशीन पर चढ़ाया
तो कांटा सीधा 45 से टकराया
मैं बोला ठीक है, एक्स -रे रूम में पधारो
लेकिन पहले ये सब आभूषण उतारो
इतना कहना था कि पता नही कहाँ कहाँ से
दर्जनों टायर - ट्यूब और संकलें उतार दीं
काम युद्ध् स्तर पर चल रहा था
फिर भी 15 मिनट गुजार दीं
अचानक कांटे पर नज़र पड़ी
होश फाख्ता हो गये हमारे
मशीन की सुई 45 से सीधा 32 हो गई खड़ी
काश चेहरे पर पुती pop भी उतारी होती
तो यकीन से कह सकता हूँ
सुई ने 32 की जगह 28 पर टक्कर मारी होती
मैने मन ही मन सैल्यूट मारा
खुद को धिक्कारा, हे भगवान !, सेना का एक जवान
मर्द होते हुए भी मात्र साढे सात किलो की
राइफल उठाने से हो जाता है परेशान
और एक ये जो 13 किलो वजन लटकाये
आसमान में उड़ने का होसला रखतीं है
हो न हो जरूर कोई दैवीय शक्ति है
माजरा समझ में आया लड़की की माँ को बुलाया
समझाया कि, दिन भर चरने कि क्रिया खराब है
मेरा मतलव दिनचर्या खराब है
इसलिये पेट में वर्म है
और ये फालतू की लीपा-पोती
अगर कम नहीं होती
तो यकीन मानिये अगला निशाना चर्म है
मैने देखा है कुछ महिलाये व बालायें
हँसने की बात पर मुस्कुराने से भी कतराती हैं
लिप्स्टिक हेयर स्टाइल मस्कारे की
कहीं सैटिंग न बिगड जाये
इसलिये आखों को गर्दन के साथ
ज़ीरो नम्बर पर चलते टेबुल फैन की तरह घुमातीं हैं
बात मानो, सिर्फ इतना जानो
यदि स्वस्थ रखना है तन-मन
तो छोड़ो ये सिंथेटिक सोन्दर्य प्रसाधन
छोड़ो कैमिकल युक्त रंग रोगन
अबीर गुलाल लगाओ खुशी मनाओ प्रेम में डूबो,
प्रेम में डुबाओ नाचो गाओ,
होली मनाओ –

*शुभ होली*

होनहार बिरवान
http://merekavimitra.blogspot.com/2007/12/blog-post_2151.html

होनहार पीड़ी
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_7828.html


कार्यक्रम के पश्चात उपस्थित कविगणों को हिन्द-युग्म का ब्रोचर व लीफलेट देकर हिन्द-युग्म के क्रिया कलापों से अवगत कराया हालाँकि ज्यदातर कवि एवं साहित्यकार उस क्षेत्र में इंटरनेट के अभाव के कारण ओनलाइन गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाते परंतु उम्मीद है जैसे जैसे तकनीकी विकास होगा और सुविधायें मुहैया होंगीं जनसम्पर्क बढ़ेगा


शनै: शनै: श्रोतागण इस कार्यक्रम की याद दिल मे संजोये और हँसी की बटोरी हुई फुलझड़ियों को अपने परिवारी जनो से बाँटने के लिये चलने शुरू हो गये और कार्यक्रम का स्थगन ने.हि.सा.प. के अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश सिकारिया जी के आभार सन्देश के साथ समपन्न हुआ।


रात्रि को ने.हि.सा.प. के आध्यक्ष श्री ओम प्रकाश सिकारिया जी के निवास पर रात्रिभोज के बाद हिन्द-युग्म के क्रिया कलापो को लेकर वरिष्ठ कवि व्यंग्यकार एवं साहित्यकार डॉ. श्री कृष्णावतार त्रिपाठी 'राही' व श्री ओम प्रकाश सिकारिया जी से विचार विमर्श हुआ ।

हिन्द-युग्म की तरफ से मैने श्री ओम प्रकाश सिकारिया जी एवं श्री कृष्णावतार त्रिपाठी 'राही' जी को हिन्द-युग्म का एल्बम 'पहला सुर' भेंट किया ।





सुबह बीरगंज, नेपाल से छपने वाले दैनिक समाचार पत्र में हिन्द-युग्म का नाम देखकर मन प्रसन्न हो उठा आप भी पढिये...

ने.हि.सा.प. बीरगंज का पुनः आभार और ऐसे ही मधुर समबन्ध हिन्द-युग्म, ने.हि.सा.प., हिन्दी और हिन्दी को समर्पित सभी नेपाल व बीरगंज के वीरो एवं भारत व दिल्ली के दिलवालों के बीच हमेशा बने रहेंगे ।

16 मार्च की सुबह वापस दिल्ली प्रस्थान की तैयारी और फिर वही लोहपथगामिनी की चक्रो से उपजता कलरव चाय पकोड़े / अखबार / आलू पूरी /चटपटे परमल जे जाइये दिल्ली तक नहीं मिलेंगे जैसी आवाजों के साथ ग्रिल लगी विंडो से रूप बदल बदल सामने आती हुई खेत-खलियानो की हरियाली लो देखते ही देखते दिल्ली आली...

बोर होने के लिये धन्यवाद
व्हाई शुड ऑनली आइ सफर विद दिस सफर
थैक्स टू बी विद मी..

जय हिन्द जय हिन्दी

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

भूपेन्द्र जी,

हिन्द युग्म का परचम इसी तरह बुलंद रहे। आपको इस कार्यक्रम में हिन्दयुग्म के प्रतिनिधि होने की हार्दिक बधाई।

*** राजीव रंजन प्रसाद

रंजू का कहना है कि -

बहुत बहुत बधाई राघव जी ....यात्रा वर्णन बहुत ही मजेदार लिखा है आपने .साथ साथ हम भी घूम लिए
हिंद युग्म यूं ही आगे बढे यही शुभकामना है .पुनः हार्दिक बधाई !!

anuradha srivastav का कहना है कि -

बधाई राघव जी, यात्र-वृतान्त तो अच्छा लिखा। पर खुद के कांपते पैर और कविता पाठ का अनुभव कब सुनायेंगें ,ये तो बता दीजिये।

seema gupta का कहना है कि -

राघव जी पहाड़गंज से बीरगंज के यात्रा का हास्य व्यंग रचना के माध्यम से जो आपने वर्णन किया है, सही मे लाजवाब है, पढते पढते आखों के सामने जैसे सारा नजारा ही घूम गया . बहुत सुंदर " हिन्दयुग्म के प्रतिनिधि होने की बहुत बहुत बधाई "

Regards

Alpana Verma का कहना है कि -
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Alpana Verma का कहना है कि -

पहले तो भूपेंदर जी आप को मुबारक कि आप नेपाल में कवि सम्मेलन में भाग ले कर आए.
जिस तरह हिंद युग्म पंखों को तौल रहा है लगता है अभी और ऊँची उडाने भरनी हैं.शुभकामनाएं .
अब बात आप के अनुभवों की-तो यह बात सोलह आने सच है-की आज की तारिख में लोग सस्ते मसाले दार 'कवितायें सुन कर खूब तालियाँ बजाते हैं.आप किस भी स्तर के आयोजन की बात कर लिजीये-आप ने सही देखा कि वरिष्ठ कवि जो कह दें-उन की सराहना अवश्य होती है.hasya सम्मेलन ही नहीं बाकि कवि सम्मेलन हों या मुशायरा श्रोता मांग करते हैं ऐसा सुनने के लिए जो हल्का फुल्का हो --एक बार यहीं एक कोम्मुनिटी में जब मैंने अपना एक गीत पोस्ट किया था-तो एक सज्जन ने आलोचना कि कि ऐसा प्यार मोहब्बत का गीत लोग क्यों लिखते हैं और समय बरबाद करते हैं-पर सच तो यही है-कि अगर आप को मंच पर टिके रहना है तो श्रोताओं कि पसंद को मर्यादा के अन्दर रह कर पूरा करना पड़ता है-मैं गंभीर कविता सुनाती जरुर हूँ क्यूँकि वह मेरी क्षुधा को शांत करती है-लेकिन यह भी सच है कि जैसे ही वह खत्म होती है-श्रोता गीत की फरमाइश कर देते हैं.--श्रोताओं की पसंद के साथ साथ अपने काम के साथ आप समझोता न करें बस--ऐसे ही आगे बढ़ना होगा.
अभी कुछ दिन हुए मैंने एक काव्य सम्मेलन के प्रसारण देखा था सोनी टीवी पर-जो --हरी वंश राय बच्चन जी के सम्मान में था.अशोक चक्रधर ji उस के संचालक थे-
jin logon ne bhi उस में एक अमिताभ के 'कौन बनेगा करोर्पति की पैरोडी टाइप हास्य कविता सुनी होगी तो जरुर दुःख हुआ होगा कि एक वरिष्ठ कवि[naam nahin likhungi] ऐसी कविता सुना रहे हैं---!--
lekin fir bhi सब ठहाके लगा रहे थे.
--तो संक्षिप्त में mera यह कहना है-कि बिना समझोता किए अगर श्रोताओं कि पसंद भी साथ रखेंगे तो पसंद किए जायेंगे--वरना गुमनामी के अंधेरे में खो जायेंगे--
-बहुत लोग मेरी बात से सहमत nahin होंगे-koi baat nahin--मेरी किसी से कोई बहस नहीं है-न मैं यहाँ किसी का जवाब दूंगी---
यह मेरा स्वतंत्र मत है.
धन्यवाद--

anju का कहना है कि -

जय भारत जय हिंद जय हिंद युग्म भई वाह भूपेंद्र जी
आप भारत की जय तो करके ही आए और हिन्दी युग्म की भी
बहुत अच्छा लगा और खुशी की बात है
आपका अनुभव पसंद आया
आशा है
सभी पाठकों को भी आया होगा
आपकी हास्य कविता बहुत अच्छी लगी
बधाई बहुत खूब

तपन शर्मा का कहना है कि -

तो भुपेंद्र जी आपकी विदेश यात्रा का वर्णन सुना, बहुत अच्छा लगा। अब तो आप "फोरेन रिटर्न" हो गये हैं। कैसा लग रहा है? पार्टी तो होनी ही चाहिये।
काफी गर्व हो रहा है कि युग्म का परचम नेपाल में बखूबी लहराया है। लोगों को हिन्द युग्म के प्रयासों के बारे में पता चल रहा है। आपको बधाई।

सजीव सारथी का कहना है कि -

आप तो सचमुच परचम लहराकर आए हैं हिंद युग्म का, बहुत बढ़िया यात्रा विवरण भी है, यहाँ भी अखबार में हिन्दी युग्म छपा है .... खैर, विदेश घूम कर आए हैं, कहिये कब घर आए आपके मिठाई खाने ....
और हाँ आपकी कवितायें सब एक से बढ़कर एक लगी... बहुत बधाई एक बार फ़िर

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

अरे भाईयो आपको कष्ट करने की जरूरत नहीं मिठाई के लिये जब आप कहेंगे मैं आ जाउँगा मिठाई खाने .. :)

और रही बात परचम की तो आपके प्यार की हवा चलती रहे तो नेपाल क्या चाँद पर हिन्द-युग्म होगा और तब "बुढिया सूत कात रही है" वाली कहानी "हिन्द-युग्म का झंडा है" बन जायेगी.

सभी का बहुत बहुत धन्यवाद

seema sachdeva का कहना है कि -

बहुत बहुत बधाई हो भूपेंद्र जी , आपके साथ - साथ हम भी नेपाल घूम लिए , और जहाँ तक परचम लहराने की बात है ,हम आपका राज जानते है की हिंद युगम के एक कवि मेरा मतलब भूपेंद्र जी ने चाँद पर प्लाट बुक करवा ही लिए है , चाँद को छोड़ कर सूर्य की बात कीजिये | ऐसे ही नई राहे नापते रहे यही शुभ कामना है ..... सीमा सचदेव

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

भूपेन्द्र जी,

मुझे वृत्तान्त लिखने का अंदाज़ पसंद आया। कई ज़गह टंकण की अशुद्धियाँ हैं, समय निकालकर ठीक कर दें।

मंचों की बुरी स्थिति हर तरह के कवि सम्मेलनों में है। इसीलिए हिन्द-युग्म का एक प्रमुख उद्देश्य मंचों तक असली साहित्य पहुँचाना भी है। और आपसे शुरूआत हो भी चुकी है। इसी तरह परचम लहराते रहें।

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

बहुत बहुत बधाई राघव जी आपकायात्रा-वृतान्त पसंद आया आप हिन्द युग्म का गौरव हैं और हिंद युग्म के गौरव को युं ही बडाते रहें बधाई

sunita yadav का कहना है कि -

भूपेंद्र जी ...बड़े ही मजेदार और अनोखे ढंग से यात्रा वर्णन की प्रस्तुति आप की मौलिकता ,सहजता , रचनाधर्मिता को उजागर करते हैं ..हाँ अल्पना जी की कथन से मैं भी सहमत हूँ .. श्रोताओं की पसंद से .समझौता करेंगे तो शिखर छू लेंगे ...वरना आहत होकर धीरे -धीरे लेखनी से ....

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