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Monday, March 31, 2008

पत्थरों के शहर


ईंट-पत्थरों के दीवारों में भी
कई बार...
कुछ दिल-सा धड़कता है...
कुछ साँसों-सा उफनता है
तभी तो
हालात की मार से
कई बार...
बिखर जाते हैं...तिनकों-सरीखे
भू्लकर कि ....
ये आशियां भी हैं किसी के
दफन कर देते हैं
मोहताजों को
इन्हीं की रूहें
कई बार समा जाती हैं
इंसानों में
तभी तो...
कई बार...
इंसान भी...पत्थरों-सा निर्मोही हो
तज देता है...इंसानियत
बेचता है...ईमान-जज्बात
और पैदा करता है ऐसे हालात
जिनमें बिखरते हैं...पत्थरों के मकां
और उनकी रूहें
समाती रहती हैं
उन जैसे इंसानों में
ये शहर इसलिए भी
इंसानों के शहर नहीं कहलाए
हर बार ये कहे जाते हैं
पत्थरों के शहर...

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

sumit का कहना है कि -

तभी तो...
कई बार...
इंसान भी...पत््थरों-सा िनर्मोही हो
तज देता है...इंसािनयत
बेचता है...ईमान-जज््बात
और पैदा करता है ऐसे हालात
िजनमें िबखरते हैं...पत््थरों के मकां
और उनकी रूहें
समाती रहती हैं

aapne bahut sahi likha hai

regards
sumit bhardwaj

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

आपके कुछ शब्द प्राचीन सभ्यताओं ki तरह गायब हो गए हैं...दिख नहीं रहे..
कविता बहुत सटीक है,...
निखिल

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

रचना सही है |
प्रश्न आ रहा कि यह विवशता है या पतन ?

-- अवनीश तिवारी

pooja anil का कहना है कि -

तज देता है...इंसानियत
सही कहा अभिषेक जी , अच्छी कविता है
पूजा अनिल

अल्पना वर्मा का कहना है कि -

अच्छी कविता

seema gupta का कहना है कि -

इंसान भी...पत्थरों-सा निर्मोही हो
तज देता है...इंसानियत
बेचता है...ईमान-जज्बात
और पैदा करता है ऐसे हालात
जिनमें बिखरते हैं...पत्थरों के मकां
और उनकी रूहें
समाती रहती हैं
उन जैसे इंसानों में
ये शहर इसलिए भी
इंसानों के शहर नहीं कहलाए
हर बार ये कहे जाते हैं
पत्थरों के शहर...
अच्छी कविता है

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह अभिषेक भाई.... बहुत सुंदर

tanha kavi का कहना है कि -

बहुत हीं गहरी बात कह डाली है आपने, अभिषेक जी!


बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

anuradha srivastav का कहना है कि -

अभिषेक जी 'पत्थर के शहर' पसन्द आई।

anju का कहना है कि -

बहुत खूब
अति सुंदर अभिषेक जी

seema sachdeva का कहना है कि -

हाड -मास के पुतले मी निवास करते है पत्थर के दिल .......
सच कहा आपने पत्थरो के ही तो है यह....शरीर हो या शहर ....सीमा सचदेव

EKLAVYA का कहना है कि -

वाह कितना बढ़िया तरीके से आपने मनुष्य के बदलते व्यव्हार तथा उसकी प्रविरती को पत्रों से जोडा है बहुत बढिया .....

mona का कहना है कि -

Well written poem about how the humans are turning into stones....not caring for the feelings and sentiments of fellow human beings.

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