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Thursday, February 28, 2008

काव्य-पल्लवन वार्षिकांक (विषय- मृगतृष्णा)







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - मृगतृष्णा

विषय-चयन - महक

अंक - बारह (वार्षिकांक)

माह - फ़रवरी 2008





फ़रवरी माह के काव्य पल्लवन अंक के लिये केवल चार विषय प्राप्त हुए.. "मृगतृष्णा, वसंत, प्रेरणा, बेरोज़गारी" जिसमें से "महक जी" के भेजे हुए विषय "मृगतृष्णा" का चयन किया गया. यह भी एक संयोग ही कहा जायेगा कि "मृगतृष्णा" और "प्यास" (जिस पर पहले काव्य-पल्लवन आयोजित हो चुका है) समानार्थक शब्द हैं फिर भी हमें इस बार 24 रचनायें प्राप्त हुई. इन रचनाओं में एक रचना के साथ हमें कुछ चित्र भी प्राप्त हुये जो रचना के बीच-बीच में थे परन्तु उनको हम प्रकाशित नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उन चित्रों के कारण पेज काफ़ी देर से लोड हो रहा था. यदि "मृगतृष्णा" शब्द का ठेंठ रूपान्तरण किया जाये तो इसका अर्थ होगा "रेगिस्तान में प्यासे व्यक्ति को रेत की जगह पानी होने का आभास" जो शायद एक आवश्यकता पूर्ति के लिये दिमाग की अपनी उपज हो सकती है. जीवन में भी हम सब किसी न किसी आभास या मृगतृष्णा के पीछे भागते रहते हैं.. कुछ को पा जाते हैं और कुछ के लिये शोकाकुल भी होते हैं... परन्तु जीवन तो जीवन है समय के साथ चलता रहता है...शायद समय की भी कोई मजबूरी होगी... या हो सकता है वो भी किसी मृगतृष्णा के पीछे भाग रहा हो..

*** प्रतिभागी ***
आलोक सिंह साहिल | देवेन्द्र कुमार मिश्रासीमा सचदेव | अवनीश तिवारीआशा जोगलेकर |
कृण्ण लाल | ममता गुप्ता | गरिमा सिंह | बी॰ राघव | रंजना भाटिया
विवेक रंजन श्रीवास्तव | प्रो सी बी श्रीवास्तव | सीमा गुप्ता | विपिन चौधरी | महक |
विवेक कुमार पाण्डेय | शोभा महेन्द्रू | मोहिन्दर कुमार | सुरिन्दर रत्ती | साधना दुग्गड़ |
डॉ॰ अनिल चड्डा | गीता पंडित (शमा) | जीतेश नौगरैया | विनय के जोशी |
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~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~




मैं कहना चाहता था गजल
बड़े बुजुर्गों ने समझाया
पहले इश्क करो ...
फ़िर गजल भी कर लेंगे,
मयखाने में बैठकर
कुछ फजर(फज्र) भी कर लेंगे,
मयखाना ....मयखाना क्यों?
फरमाया उन्होंने कि
टूटे बगैर दिल से ...
कभी आह नहीं उठती
और उठती नहीं जो आह तो फ़िर
गज़ल नहीं बनती,

बन्दा चला इश्क को,
देखा लड़की थी कंवारी,
थी वो भी इश्क की मारी,
सोचा चलो इश्क करते हैं,
इश्क भी कर लिए दो पेंगे भी भर लिए,
पर आह नहीं निकली,
पर ये क्या आह नहीं निकली?
बड़े बुजुर्ग ग़लत नहीं हो सकते,
कि बुजुर्गों की बात ग़लत हो नहीं सकती,
कि सूर्य से किरणें दगा कर नहीं सकतीं,

तो लड़की थी कंवारी, थी वो भी इश्क की मारी,
जब लगी भनक भाई-बाप को तो आई तासीर की बारी,
बाप ने जूते तो भाई ने चप्पल अपनी संभाली
ले जूते ले चप्पल इस कदर मारी कि,
कमबख्त उतर गई गजल की खुमारी,
था अस्पताल में रुकते नहीं थे आंसू,
बड़े बुजुर्गों ने फ़रमाया,
बेटा!अब तू गजलकार है,लिख दे गजल धाँसू

कि ये इश्क तो वो तृष्णा है जो होती नहीं पूरी,
जैसे मृग ढूँढ़ता है जंगल में घूम घूम कस्तूरी,
तो इश्क तो दिल में है,सुन दिल की सदा,
उठा ले कलम,लिख दे एक हर्फ
कि मुहब्बत एक छलावा है,
शादीशुदा एक बेवा है,
लिख दे ये प्यास है ऐसी जो बुझती नहीं बुझा के
कि मृगतृष्णा होती नहीं पूरी मृग जंगल-जंगल नाचे,

आलोक सिंह "साहिल"




नारी शब्द बना पहेली, दुनिया समझ न पाई ।
जिस पल बेटी बनी धरा पर, खुशियाँ छाई बजी बधाई ।।
बाबुल की लाडली, बीरन की बहिना कहलाई ।
नारी शब्द बना पहेली,

चलते- फिरते गिरी भूमि पर, चोट लगी चिल्लाई ।
माँ ने लगा लिया आँचल से, थपकी दे-दे लोरी सुनाई ।।
दादाजी ने सुना कहानी, परी लोक की सैर कराई ।
नारी शब्द बना पहेली, स्कूल पढने जाना, माँ का हाथ बटाना ।
सुसंस्कार पाये जीवन में , सीखा मान बढाना ।।
सदा रहे जीवन खुशहाल माँ से विध्या पाई ।
नारी शब्द बना पहेली,

धीरे-धीरे बडे हुए , बीत गया सब बचपन ।
अपना आँगन अपने नाते, सबने दिया अपनापन ।।
हुये सयाने मात-पिता को, शादी चिन्ता आई ।
नारी शब्द बना पहेली,

नाडी गुण मिलाते- फिरते, कुंडली गुण- अवगुन।
धन लोभी दहेज माँगते, दर-दर भटक रहा मन ।।
'मृगतृष्णा' समान, अंधीं वर ढुडाई ।
नारी शब्द बना पहेली,

शहर-गांव खोजते घूमे, खाता पीता घर हो ।
कुल में मान, समाज प्रतिष्ठा, ऐसा बेटी वर हो ।।
सुसंस्कार भंडारो बाला, हो हमारा जमाई।
नारी शब्द बना पहेली,

वर -बधू के मधुर मिलन की, शुभ बेला है आई ।
दो कुटुम्ब हुये है एक, रब ने जोडी बनाई ।।
अरमानों के सपने सहेजे, गूँज उठी शहनाई।
नारी शब्द बना पहेली,

बीज से बनता पौधा, पौधा से पेड बने ।
पेड मे, लगी कली, कली से पुष्प बने ।।
पुष्प है बेटी माली बाबुल, ईश्वर ने यह रीति बनाई ।
नारी शब्द बना पहेली,

पुष्प लगे-लगे मुस्काये, बगिया रहे महकाये ।
अनजान सफ़र का राही, तोड़ इसे ले जाये ।।
बडे जतन से पाला-पोसा, ॠतु जुदाई की आई ।
नारी शब्द बना पहेली,

माली बिलखा जाये, वीरानी बगिया छाये ।
सूनी बगिया देख के माली, पल-पल नीर बहाये ।।
बेटी पराया धन है, होती सदा पराई ।
नारी शब्द बना पहेली,

जैसी बगिया बबूल महकी, बेटी बैसी महकाना ।
अपने गुणों से बशीभूत कर, खुशियाँ सदा लुटाना ।।
सास- ससुर की सेवा में, रहना सदा सहाई ।
नारी शब्द बना पहेली,

रहन-सहन घर आँगन नूतन, नूतन, रिस्तेदार ।
पुनर्जन्म होता नारी का, जीवन में कई बार ।।
अनजाने लोगों में रह कर , नीचट पैठ बनाई ।
नारी शब्द बना पहेली,

देवेन्द्र कुमार मिश्रा




एक दिन
पडी थी
माँ की कोख मे
अँधेरे मे
सिमटी सोई
चाह कर भी कभी न रोई
एक आशा
थी मन मे
कि आगे उजाला है जीवन मे
एक दिन
मिटेगा तम काला
होगा जीवन मे उजाला
मिल गई
एक दिन मंजिल
धड़का उसका भी दुनिया मे दिल
फिर हुआ
दुनिया से सामना
पडा फिर से स्वयं को थामना
तरसी
स्वादिष्ट खाने को भी
मर्जी से
इधर-उधर जाने को भी
मिला
पीने को केवल दूध
मिटाई
उसी से अपनी भूख
सोचा ,
एक दिन
वो भी दाँत दिखाएगी
और
मर्जी से खाएगी
जहाँ चाहेगी
वहीं पर जाएगी
दाँत भी आए
और पैरो पर भी हुई खडी
पर
यह दुनिया
चाबुक लेकर बढी
लडकी हो
तो समझो अपनी सीमाएँ
नही
खुली है
तुम्हारे लिए सब राहे
फिर भी
बढती गई आगे
यह सोचकर
कि भविष्य मे
रहेगी स्वयं को खोज कर
आगे भी बढी
सीढी पे सीढी भी चढी
पर
लडकी पे ही
नही होता किसी को विश्वास
पत्नी बनकर
लेगी सुख की साँस
एक दिन
बन भी गई पत्नी
किसी के हाथ
सौप दी जिन्दगी अपनी
पर
पत्नी बनकर भी
सुख तो नही पाया
जिम्मेदारियो के
बोझ ने पहरा लगाया
फिर भी
मन मे यही आया
माँ बनकर
पायेगी सम्मान
और
पूरे होंगें
उसके भी अरमान
माँ बनी
और खुद को भूली
अपनी
हर इच्छा की
दे ही दी बलि
पाली
बस एक ही
चाहत मन मे
कि बच्चे
सुख देंगें जीवन मे
बढती गई
आगे ही आगे
वक़्त
और हालात
भी साथ ही भागे
सबने
चुन लिए
अपने-अपने रास्ते
वे भी
छोड गए साथ
स्वयं को छोडा जिनके वास्ते
और अब
आ गया वह पड़ाव
जब
फिर से हुआ
स्वयं से लगाव
पूरी जिन्दगी
उम्मीद के सहारे
आगे ही आगे रही चलती
स्वयं को
खोजने की चिन्गारी
अन्दर ही अन्दर रही जलती
भागती रही
फिर भी रही प्यासी
वक़्त ने
बना दिया
हालात की दासी
मीदो से
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन मे पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी

सीमा सचदेव




अब तक के बीते जीवन मे,
जीवन के रात-दिन मे,
रात-दिन के क्षण - क्षण मे,
मैं, अतृप्त सदा भटकता रहा

कभी मोह से चकित ,
कभी भय से भ्रमित ,
कोई क्षण काम मे, वासना मे ,
कोई क्षण ईर्ष्या मे, दुर्भावना मे ,

इन्द्रिय तृप्ति के और मन संतुष्टि के ,
इस प्रयास ने बहुत कुछ छीना है

यह काल्पनिक है और आभासीय भी ,
समझा इसे यह एक प्रचंड "मृग - तृष्णा" है

आत्म - परीक्षण और ईश्वर भक्ती ही,
अहा !!! जाना जीवन और जीना क्या है

अवनीश तिवारी




जाने कैसी ये मृगतृष्णा
अखंड सुख के चाहत की

तृप्ती लेकिन ठगती जाती

इस माया ठगिनि जैसी

बस यह साध पूर्ण हो जाये

फिर सुख मै पा जाऊगी

इसके आगे और कुछ नही

कभी नही मै चाहूंगी

जैसे साध हो गई पूरी

नई साध एक उग आई

उसको पूरी करने की इच्छा

फिर मन में जाग गई

ऐसी अनंत साधें रखीं

हैं इस मन की मंजूषा में

जो फिर फिर बाहर आतीं हैं

पूरी होने की आशा में

और सुख दूर-दूर ही रहता

मरुथल के उस मृग जल सा

अंतहीन इच्छा सागर में

मन डूबा फिर भी प्यासा

आशा जोगळेकर




किसी और का कोई दोष नही, बस मेरी ही नादानी है
जाने मै कैसे भूल गया , मेरा सफर तो रेगिस्तानी है

इन रेतीली राहो में सदा , सूरज ही दहकता मिलना है
बूँदों के लिये यहाँ, आसमान को, तकना भी बेमानी है
बादल के बरसने की जाने, उम्मीद क्यों मेरे मन में जगी
यहाँ तो बदली का दिखना भी, कोई खुदा की मेहरबानी है

यहाँ रेत के दरिया बहता हैं, कोई प्यास बुझाएगा कैसे
प्यासे से पूछो मरूथल में, किस हद तक दुर्लभ पानी है
यहाँ बचा बचा के रखते हैं, सब अपने अपने पानी को
यहाँ काम वही आता है जो , अपनी बोतल का पानी है

पानी पानी चिल्लाने से, यहाँ कोई नहीं देता पानी
प्यासा ही रहना सीख अगर, तुझे अपनी जान बचानी है
मृगतृष्णा के पीछे दौड़ा , तो दौड़ दौड़ मर जायेगा
पानी तो वहाँ मिलना ही नही, बस अपनी जान गँवानी है

इसे प्यासे की मजबूरी कहो, या चाह कहो दीवाने की
वो जानता है मृगतृष्णा है, पर मानता है कि पानी है
फिर इस में तेरा दोष कहाँ , बस मेरी ही नादानी है
तुम भी तो थी मृगतृष्णा ही, मैनें समझा कि पानी है

कृण्ण लाल




मृगतृष्णा
मन की वादियों में
बसन्त का आगमन
स्मृतियों की गुनगुनी धूप
ठंडी हवाओं में फिर तेरी खुशबू का अहसास
क्या ये तेरे आने के संकेत हैं?
या मन-मृग की नाभि में
फिर कस्तूरी महक उठी है़।
और वह दौंङ पङा है,उसी दिशा में
जहाँ से तेरी सुगंध आ रही है।
तुम सचमुच हो आसपास ?
या----फिर वही मृग की प्यास?
जो अपने भीतर है,उसे बाहर पाने की तलाश
पता नही ये मृगतृष्णा कब तक छलेगी?

ममता गुप्ता




इस शहर की भागम भाग में कुछ पाना चाहते हैं,
जाने कौनसी वो मंज़िल है जहाँ पहुँच जाना चाहते हैं ,
इसे नयी उम्मीदों का सागर कहूँ या ,
टूटी हुई आशाओं का रेगिस्तान,
ज़रूरतों की धूप कभी ढलती ही नहीं और,
सामने दूर दूर तक मरीचिका का जाल है,
सब उस में फँस जाना चाहते हैं !
यह कैसी प्यास है जो बुझती नहीं,
कैसे रास्ते हैं जो ख़त्म नहीं होते !
हर मोड़ पर लगता है की मज़िल मिल गयी,
और फिर एक नयी मरीचिका सामने होती है,
कैसी मृगतृष्णा है की सफ़र पर निकल पड़ते हैं फिर से,
बिन जाने वो रेगिस्तान के उस पार मिलेगा या नहीं!
यह भी नहीं जानते की क्या पाना चाहते हैं!

हर मोड़ पर खुलते हैं नये रास्ते,
कुछ नया करने के, कुछ नया पाने के,
पर इस नये की दौड़ में पुराना सब छूट जाएगा,
यह भी भूल जाना चाहते हैं,
जिनके लिए हम हैं उनको भी,
और फिर खुद को भी भूल जाते हैं ,
जो उस मृगतृष्णा को बुझाना चाहते है!!

गरिमा सिंह




ओ मनवा मृग बावरे,
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

सुन रे! हठीले;
पंथ कंटीले;
समझे जिन्हें गुलाब रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

कोई ना अपना;
मिथ्या सपना ;
माया का भटकाव रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

कब तक दाना;
अरे! पता ना;
कब आ जाये बुलाव रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

रिश्ता नाता;
कौन निभाता;
दौलत देख लगाव रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

मेरा तेरा;
तज सब फेरा;
मिट स्वम संताप रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

हाय-माया;
क्या कुछ पाया ?
करके देख हिसाब रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

क्षणिक सी लहरें;
कब तक ठहरें;
मिटें सजह ही झाग रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

हरि सुमिरन कर;
सब अर्पन कर;
जनम सफल हो आप रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

बन मृग कृष्णा;
तज मृग तृष्णा;
मरीचिकीय लुभाव रे....
मरीचिकीय लुभाव रे....
मरीचिकीय लुभाव रे....

ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

बी राघव




बसंती ब्यार सा
खिले पुष्प सा
उस अनदेखे साए ने
भरा दिल को
प्रीत की गहराई से,

खाली सा मेरा मन
गुम हुआ हर पल उस में
और झूठे भ्रम को
सच समझता रहा ,

मृगतृष्णा बना यह जीवन
भटकता रहा न जाने किन राहों पर
ह्रदय में लिए झरना अपार स्नेह का
यूं ही निर्झर बहता रहा,

प्यास बुझ न सकी दिल की
न जाने किस थाह को
पाने की विकलता में
गहराई में उतरता रहा,

प्यासा मनवा खिचता रहा
उस और ही
जिस ओर मरीचका
पुकारती रही
पानी के छदम वेश में
किया भरोसा जिस भ्रम पर
वही जीवन को छलती रही
फ़िर भी पागल मनवा
लिए खाली पात्र अपना
प्रेम के उस अखंड सच को
सदियों तक ढूँढता रहा !! ढूँढता रहा !!

रंजना भाटिया




स्वर्ण मृग हैं विज्ञापन
जिनका पीछा कर रहे हैं हम
भौतिकता के मारीच ये
गायब हो जाते हैं पल दो पल में
छोड़ जाते हैं
मृगतृष्णा

मृग मरीचिका के
काल्पनिक जल में
खूब नहा रहे हैं हम
ओढ़ रहे हैं
साफ्टवेयर का आकाश
धरती का हार्डवेयर
बिछा रहे हैं हम
इंटरनेट के युग में
बस
मृगतृष्णा ही पा रहे हैं हम

कस्तूरी की गंध है परमात्मा
जो हम सबके अंतस में है
पर उसे पाने
कस्तूरी मृग की तरह
जीवन के जंगल में
भटकते ही जा रहे हैं हम
समझकर भी सच
मृगतृष्णा से प्यास बुझा रहे हैं हम

विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'




मृगतृष्णा के आकर्षण में विवश विश्व फँसता जाता है !
बच पाने की इच्छा रख भी नहीं मोह से बच पाता है!!

रंग रूप के चटख दिखावे मन में सहज ललक उकसाते
सुन्दर मनमोहक सपनों का प्रिय वितान एक सज जाता है!!

तर्क वितर्को की उलझन में बुद्धि न कुछ निर्णय कर पाती !
जहाँ देखती उसी दिशा में भ्रम में फँस बढ़ती चकराती !!

वास्तविकता पर परदा डाले भ्रम छलता बन मायावी !
अभिलाषा को नये रंग दे नयनों में बसता जाता है !!

सारा जग यह रंग भूमि है मनोभाव परदे रतनारे !
व्यक्ति पात्र, जीवन नाटक है सुख दुख उजियारे अँधियारे !!

काल चक्र का परिवर्तन करता अभिनय रचता घटनायें !
प्यार बढ़ाती मृग मरीचिका तृप्ति नहीं कोई पाता है !!

ऊपर से संतोष दिखा भी हर अन्तर हरदम प्यासा है !
हरएक आज के साथ जन्मती कल की कोई सुन्दर आशा है !!

मृगतृष्णा दे झूठा लालच मन को नित भरमाती जाती !
मानव मृग सा आतुर प्यासा भागा भागा पछताता है !!

आकुल व्याकुल मानव का मन स्थिर न कभी भी रह पाता है !
सपनों की मादक रुनझुन में सारा जीवन कट जाता है !!

कभी खुमारी कभी वेदना कभी लिये अलसाई चेतना !
मृगतृष्णा में पागल मानव मनचाहा कब कर पाता है

मृगतृष्णा के बड़े जाल में विवश फँसा मन घबराता है !
बच पाने की इच्छा रख भी कहाँ कभी भी बच पाता है

प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध




कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
ढूँढ़ा तुमको तकदीरों में
चन्दा की सब तहरीरों में
हाथों की धुँधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम
इन आखों की तस्वीरों में
कैसी ये ......................

अम्बर के झिलमिल तारों में
सावन में रिमझिम फुहारों में
लहरो के उजले किनारों में
तुमको पाया तुमको पाया
प्रेम-विरह अश्रुधारों मे
कैसी ये

ढूँढ़ा तुमको दिन रातो में
ख्वाबों ख्यालों जज्बातों में
उलझे से कुछ सवालातों में
बसते हो तुम बसते हो तुम
साँसों की लय में बातों में
कैसी ये

ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम
हर्फ बने जब उठी दुआऐं
कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
कैसी ये

सीमा गुप्ता




मृगतृष्णा और इंसान में
उतना ही अंतर है
जितना अंतर प्रेम और प्यास में
जीवन और आस में है
आशाओं के छोटे-बडे टापुओं को लाँघते हुये हम
वहीं पहुँच पाते हैं केवल,
जहाँ दूर तक फैला हुआ पानी है
और लगातार लम्बी होती घनी परछाईयाँ हैं

तमाम उम परछाईयों के पीछें भागते
पानी से प्यास बुझानें की असफलता में
डूबे- ऊबें हम
आस पर टेक लगायें दूर तक
देखने के आदि हो चले हम
एक छलावे से निपटने के बाद
दूसरे छलावे के लिये तैयार हम

कभी रुकते ही नहीं
मानों छलावा ही हमारी नियति है
किसी दुसरी मृगतृष्णा के मुहाने पर
हम तैयार हो बैठे जाते है
दोनो आँखे खुली रखे
और दोनो मुट्ठियों को बंद रखे हुये।

विपिन चौधरी




कभी ख़त्म ना होनेवाला रेगिस्तान हो जैसे
अक्सर हमे जीवन के पल प्रतीत होते है ऐसे
उँचे तूफ़ानो के बवंडर ,दिल को झेले ना जाए
पराकाष्ठा हो प्रयत्नो की,पर वो थम ना पाए

रेत के नन्हे से कन हवाओ में उड़ते रहते है
हाथों पर ,पैरो पर,गालों पर ,होठों और नयनो पे
एक जुट होकर,सिमटकर, चिपक के बैठे रहते है
कोलाहल,अंतरंग शोर, मचा देते है छोटे से मन में

मन के पूरे बल से तूफ़ानो का सामना करना
अपनी दिशा कौनसी,किस और ये ग्यात करना
रेत के टीलो को बनाकर सहारा कभी लेना आराम
नयी उमीद की किरण दिखला जाए जरा सा विराम

चलते रहना हमेशा उस चमकीली ज़मीन की और
मृगतृष्णा हरा चाहे हो धोखा मगर जगाता एक आस
बरसात होगी तपती रेत पर , स्वप्न नज़र आए साथ
मंज़िल तक पहुँच जाएँगे,बुझेगी तकलीफ़ों की प्यास

महक




मृग की मधुरता का
उसके आकर्षण का प्रतिकार है मृगतृष्णा ......
मृग को आलोकित करता और उसको दिव्यमान बनाने वाला
श्रृंगार है मृगतृष्णा ......
मृग की आशा ऑउर विश्वाश का
एक मात्र उदगार है मृगतृष्णा

विवेक कुमार पाण्डेय




सारा जीवन
चमकती हुई रेत
मुझे बुलाती रही
और मैं…
रस की आशा में
बेसुध हो
व्याकुल दौड़ लगाती रही
कितनी ही बार
धूल-धूसरित हो
लड़खड़ाई
फिर भी…….
हर सिकता कण से
पानी की उम्मीद लगाई
किन्तु….
सुकून की प्यास
कभी कम ना हो पाई
जाने क्या अप्राप्य था
जिसकी कामना ने
इस कदर भटकाया
अपना पागलपन
कभी समझ ना आया
पुनः-पुनः….
पराजित होती हूँ
और फिर…..
वही राह ले लेती हूँ
यह मृगतृष्णा ….
कब तक छलेगी
जीवन कस्तूरी
क्या कभी मिलेगी ?

शोभा महेन्द्रू




पोखर में सीप तलाश रहा
तू क्या पायेगा
तृष्णा तेरी मृगतृष्णा है
पछतायेगा

स्वप्नमयी इस दुनिया में
क्यों तू सपनो से खेले
टूट सुनहला कोई स्वप्न
पलकों में चुभ जायेगा

किसका क्या अर्थ है
और सब कुछ क्यों व्यर्थ है
इसकी गहरायी में न जा
सिर्फ शून्य पायेगा

पोखर में सीप तलाश रहा
तू क्या पायेगा
तृष्णा तेरी मृगतृष्णा है
पछतायेगा

मोहिन्दर कुमार




होड़ पड़ी धरा पर
समेट ले़ जग को
अपनें आँचल में
हाथ तो निरन्तर लगे रहे
चौबीसों घण्टों कुछ पाने को
लक्ष्य को सामनें रख
लम्बी गलियों में चलते रहे
काश कि गगन को छू लेते
लेकिन वो सपना ही साबित होगा
लालसा भी इतनी के
पानी से प्यास तो बुझे पर
ये मृगतृष्णा टस से मस नहीं होती
आखिरी साँस तक पीछा नहीं छोड़ती
ये मृगतृष्णा है, लालसा है, क्या है
शायद भ्रम हो गया है
एक ऐसी धुन्धली परछाई
जिसमें मानव भटक जाता है
सब भूल जाता है
बिखर जाता है

सुरिन्दर रत्ती




शरीर इक दिन मन से कहता है
क्यूँ तेरा मन स्थिर नहीं रहता है
हर वक्त सोचता ही रहता है
खुद तो चिन्ता में रहता है
मुझ्को भी इसमें घसीटता है
तेरी बेकाबू होती लगाम से
आज मेरी हालत कितनी बिगड गई है
अनेक व्याधियों से ग्रसित हो कर
आज मैं जिस हाल में पहुंच गया हूं
उसका जिम्मेदार और कोई नहीं
बस इक तू ही है
मन कहता है उस से अरे पगले
व्यर्थ ही मुझको दोषी कहता है
मेरा तो बस काम यही है
जो मुझको काबू में कर लेता है
वही औरों से अलग होता है
वही विश्व विजेता होता है
उसी को कामयाबी हासिल होती है
बाकी सब की हालत तो
मृगतृष्णा सी ही होती है
सारी उम्र गुजर जाती है
हासिल कुछ नहीं होता है

साधना दुग्गड




कितने करीब जिंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख्स को अपनी ही पड़ी है !
चंद लम्हों की साँसों ने है तूफान उठाया,
हर बात पर बेकार बड़ा शोर मचाया,
हुई चलने की बेला तो खामोश घड़ी है !
तेरी-मेरी करता रहा तमाम उम्र भर,
भरता रहा तिजोरी तमाम उम्र भर,
अंत समय झोली पर खाली ही पड़ी है !
नंगी जलाई लाशें, कफनों का करके सौदा,
अपना है या पराया, कुछ भी न तूने सोचा,
तू भी बनेगा मट्टी, अंजाम यही है !
मालूम है सभी को, इक रोज़ सब को जाना,
दो दिन का दाना-पानी, चंद रोज़ का ठिकाना,
कोई नहीं ये समझा, सच तो यही है !
कितने करीब जिंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख्स को अपनी ही पड़ी है

डॉ. अनिल चड्डा




अंधेरों की बढे, चाहे, कितनी भी आजादी.....,
ना बुझ पाये, अंतर्मन ने जो जलायी बाती.,.
डिगें ना प्रण से, कहतीं वेद - रिचाएं सारी..,
हिल जाये देव - लोक भी,देख हिम्मत हमारी

धारे देखो, निस्वार्थ - भाव से नदी बहाती..,
तरु - वर की सौगातें, नित ही हमें लुभातीं.,
सूरज की थाती बिन मोल कैसे बिक जाती,
थक जाने पर, लोरी गाने क्यूँ रजनी आती....

बदलती ॠतुएँ , गुण जीने के सिखला जातीं..,
आस का बिगुल बजाकर भोर किरण मदमाती,
ओढ अम्बर की चादर बदली झूम कर गाती,
अवनि भी बूंदों संग, ताल से ताल मिलाती....

हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी....,
पग-पग पर वो, अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी.,
जग मिथ्या,केवल जनम-मरण की एक निशानी,
माटी का तन, हर पल लिखे एक नयी कहानी

योगी-यति,मुनि,ग्यान-वान साधक और ध्यानी,
पाते अंतर में उस को, जो है सबका मानी...,
मोह - पिपासा में खो जाती ,अंतर की वाणी...,
आसक्ति नृत्य करती, मन - उपवन में दीवानी

गीता पंडित (शमा)




भूख की मार, पेट की आग
शब्दों की चुभन, करीबियों की जलन
से निजात दिला सकते हैं दो
एक सपना दूसरा मृगतृष्णा
ठेले वाले को पाँच लाख की लॉटरी
मजदूर के बेटे को डॉक्टर की डिग्री
सपना है,
सामान्य कोटे से सरकारी नौकरी
भूखे के लिए छप्पन भोग
नंगे को मखमली अचकन
मृगतृष्णा है,
साधारण आदमी को
तिरुपति में तत्काल दर्शन
फुटपाथ पर सोने वाले को
कड़ाके की सर्दी में
मुलायम बिस्तर और नई रजाई
मृगतृष्णा है,
रद्दी बीनने वाले बच्चों को
पंद्रह अगस्त पर छुट्टी
और स्कूली बच्चों सी मिठाई
पर जो
होकर भी नहीं होता, वही क्षणिक सुख देता
जब सिर्फ़ पानी पी पीकर लेना हो डकार
या काजू समझ चबाना हो मूंगफली दो चार
जब कान्वेंट की ड्रेस में किसी बच्चे को देखकर
अपने भी बच्चे को टाई में देखना हो बारबार
या शब्दों की चुभन भुला चेहरे पर पसारनी हो मुस्कान
तब मृगतृष्णा बनती है औषधि और सपने बनते आधार

जीतेश नौगरैया




हे कृष्णा........
ये कैसी मृगतृष्णा

दस रचनायें
रखी सामने
एक नई तैयार
मौलिकता अब
बाजार में बिकती
सृजन बना व्यापार
हे कृष्णा.....
ये कैसी मृगतृष्णा

तारीफों के
टोकरे बटोरे
ख़रीदे पुरस्कार
झट गर्दन
घुसा लेते
जहाँ भी देखे हार
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

लखपति
करोड़ चाहता
करोड़पति अनंत
मुद्रा पिपासु
सतत चलता
इसका आदि ना अंत
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

बड़ी बहन
असुंदर कह कर
छोटी को अपना ली
अब बड़ी
विशिष्ट लगाती
साधारण घरवाली
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

मची भगदड़
पंडितों मध्य
श्राध्दोत्सव के काज
यकृत हृदय
फेफड़े किडनी
उदर बन गए आज
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

चंगों से नफरत
और दर्दी से
करते प्रेम
स्तेथोस्कोप को
कार्ड समझते
पेशेंट ए टी एम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

जन्म से ही
दौड़ शुरू और
मृत्यु अन्तिम धाम
मन सीपी का
मोती उपेक्षित
प्यारा लगता चाम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत ढील दे दी तू ने
अब तो कुछ कसना
हे कृष्णा ...

राह थकन
पग छाले भूला
ले दर्शन की आस
उचक-उचक कर
नख-शिख देखूँ
फिर भी ना बुझती प्यास
हे कृष्णा ....
जीवन ज्योत
भले ही बुझ जाय
बनी रहे यह तृष्णा
हे कृष्णा .....

विनय के जोशी



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41 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

" मृगतृष्णा के इतने रूप और इसकी इतनी गहरी व्याख्या , कमाल हो गया , सबने जैसे दिल से लिखी हो और इस विषय पर जान डाल दी हो " अभी तो पड़ना शुरू किया है , सभी कवी मित्रों को बहुत बहुत बधाई "
REGARDS

manish का कहना है कि -

किसी और का कोई दोष नही, बस मेरी ही नादानी है
जाने मै कैसे भूल गया , मेरा सफर तो रेगिस्तानी है

इन रेतीली राहो में सदा , सूरज ही दहकता मिलना है
बूँदों के लिये यहाँ, आसमान को, तकना भी बेमानी है
बादल के बरसने की जाने, उम्मीद क्यों मेरे मन में जगी
यहाँ तो बदली का दिखना भी, कोई खुदा की मेहरबानी है

kya baat hai

mehek का कहना है कि -

1.साहिल जी बहुत बधाई,क्या बात कही है,प्यार ही मृग तृष्ण है
लिख दे ये प्यास है ऐसी जो बुझती नहीं बुझा के
कि मृगतृष्णा होती नहीं पूरी मृग जंगल-जंगल नाचे,
बहुत खूबसूरत.

2. देवेंद्रा जी बहुत भा गयी आपकी कविता,नारी का पहेली से भरा जीवन
वर्णन बहुत सुंदर हुआ है.
रहन-सहन घर आँगन नूतन, नूतन, रिस्तेदार ।
पुनर्जन्म होता नारी का, जीवन में कई बार ।।
अनजाने लोगों में रह कर , नीचट पैठ बनाई ।
बहुत सुंदर

3. सीमा जी बहुत बधाई,नारी के जीवन का अविभाज पहलू प्रस्तुत्स किया है आपने
सब के लिए रिसती है वो,मगर उसका मन कोई नही समझता
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन मे पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी
बहुत सुंदर

4.अविनाश जी बहुत बधाई,बहुत सही चित्रण मन की लालसा भी तृष्णा है
आत्म - परीक्षण और ईश्वर भक्ती ही,
अहा !!! जाना जीवन और जीना क्या है
बहुत सही बात प्रभु चिंतन में लगे मन
बहुत सुंदर

5. आशाजी बहुत बधाई ,बहुत सच्ची बात मन की मंजूषा उभर कर आती रहती है,सुख दूर ही रहता है बाहुत सुंदर

मरुथल के उस मृग जल सा

अंतहीन इच्छा सागर में

मन डूबा फिर भी प्यासा ,




6. कृष्णा लाल जी बहुत बधाई,बहुत सही अपने बोतल का पानी ही काम में आता है,आज कल कौन किसको
बिना अपने स्वार्थ के एक बूँद भी देता है .बहुत सुंदर.
मृगतृष्णा के पीछे दौड़ा , तो दौड़ दौड़ मर जायेगा
पानी तो वहाँ मिलना ही नही, बस अपनी जान गँवानी है

7. ममता जी बहुत बधाई,मन नभ की कस्तूरी मिलती ही नही,एक छलावा सा

तुम सचमुच हो आसपास ?
या----फिर वही मृग की प्यास?
जो अपने भीतर है,उसे बाहर पाने की तलाश
पता नही ये मृगतृष्णा कब तक छलेगी?
बहुत सुंदर पंक्तिया लगी

8.गरिमा जी बहुत बधाई,लिटना सही कहा,धूप सी ज़िंदगी में छाव की प्यास होती है
तृष्णा के सफ़र पर लिकल पढ़ते है बिना जाने रेगिस्तान के पार वो मिलगा या नही.
पर इस नये की दौड़ में पुराना सब छूट जाएगा,
यह भी भूल जाना चाहते हैं,
जिनके लिए हम हैं उनको भी,
और फिर खुद को भी भूल जाते हैं ,
जो उस मृगतृष्णा को बुझाना चाहते है!! ,bahut hi sundar

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

मृगतृष्णा पर बेहतरीन प्रस्तुतियाँ। सभी प्रतिभागियों को बधाई।

चित्रों की कमी खल रही है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

mehek का कहना है कि -

9.राघव जी,बहुत बधाई,आती सुंदर लगी कविता,मन मृग बावारे
जिसके भी पीछे जाए,प्यासा ही रह जाए मन,
कोई ना अपना;
मिथ्या सपना ;
माया का भटकाव रे....बहुत सुंदर

10.रंजना जी बहुत बधाई,आपकी हर कविता कुछ अलग कहती है,सारी बहुत सुंदर होती है,
सही मन जिस पर भरोसा करे,वो भ्रम ही छलते है जीवन में.
फ़िर भी पागल मनवा
लिए खाली पात्र अपना
प्रेम के उस अखंड सच को
सदियों तक ढूँढता रहा !! ढूँढता रहा !!
बहुत सुंदर

11.विवेक रंजन जी,बहुत अल्ग बहुत सुंदर कविता,बधाई,आज के युग का मृग और तृष्ण के पीछे भागता उसका साया
साफ्टवेयर का आकाश
धरती का हार्डवेयर
बिछा रहे हैं हम
इंटरनेट के युग में
बस
मृगतृष्णा ही पा रहे हैं हम
बहुत बढ़िया लगी.

12.श्रीवास्तव जी बहुत बधाई,कितना सत्य प्रदर्शन करती कविता है बहुत बढ़िया,तृष्णा के जाल में फसा मानव
चाह कर भी कुछ नही कर सकता.
कभी खुमारी कभी वेदना कभी लिये अलसाई चेतना !
मृगतृष्णा में पागल मानव मनचाहा कब कर पाता है
बहुत सुंदर

13.सीमा गुप्ता जी बहुत बधाई,मन जिसे बेइंतहा चाहे उसी को चारो और देखे है
ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम
हर्फ बने जब उठी दुआऐं
कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
बहुत ही सुंदर भाव से सजे सुंदर कविता

14.विपिन जी बहुत बधाई,मानव और तृष्णा के बीच का अंतर र सही बताया है,बहुत सुंदर
कभी रुकते ही नहीं
मानों छलावा ही हमारी नियति है
किसी दुसरी मृगतृष्णा के मुहाने पर
हम तैयार हो बैठे जाते है
बहुत सच हम नये तृष्ण को खोजते है

mehek का कहना है कि -

15.विवेक कुमार जी,मृग तृष्ण की बहुत सुंदर परिभाषा है एस में,आपको बहुत बधाई
मृग की आशा ऑउर विश्वाश का
एक मात्र उदगार है मृगतृष्णा
बहुत सुंदर

16.शोभा जी बहुत बधाई,कोशिश से कस्तूरी भी मिलेगी शायद एक दिन,बहुत सहा कहा
पराजित होने पर भी हम चलते है,जीत की और एक उमीद लेकर
पुनः-पुनः….
पराजित होती हूँ
और फिर…..
वही राह ले लेती हूँ
यह मृगतृष्णा ….
कब तक छलेगी
जीवन कस्तूरी
क्या कभी मिलेगी ? बहुत सुंदर

17.मोहिंदर जी बहुत बधाई,बहुत सहिज्यदा गहराई में जाना भी ठीक नही शून्य हाट आता है

किसका क्या अर्थ है
और सब कुछ क्यों व्यर्थ है
इसकी गहरायी में न जा
सिर्फ शून्य पायेगा bahut sundar

18. सुरिंदर जी बहुत बधाई,कुछ पाने की लालसा में ही मन भटक ता है
शायद भ्रम हो गया है
एक ऐसी धुन्धली परछाई
जिसमें मानव भटक जाता है
सब भूल जाता है
बिखर जाता है
बहुत सुंदर


19.साधना जी बहुत बधाई,सौफ़ आनने सच बात,जो मन को वश में का ले वो जाग जीत लिया
मेरा तो बस काम यही है
जो मुझको काबू में कर लेता है
वही औरों से अलग होता है
वही विश्व विजेता होता है
उसी को कामयाबी हासिल होती है
बाकी सब की हालत तो
मृगतृष्णा सी ही होती है
सारी उम्र गुजर जाती है
हासिल कुछ नहीं होता है
बहुत सुंदर आशावादी कविता लगी.

mehek का कहना है कि -

20.ड़ा,अनिल जी बहुत बधाई ,छोटेसे जीवन की प्यास बुझती ही नही है,सब को अपने
सुख की पड़ी है यहाँ
मालूम है सभी को, इक रोज़ सब को जाना,
दो दिन का दाना-पानी, चंद रोज़ का ठिकाना,
कोई नहीं ये समझा, सच तो यही है !
बहुत सुंदर

21.गीता जी बहुत बधाई क्या काहु,शब्दों के अलंकरो से सजी,मन भाव से रचती अप्रतिम कविता है
योगी-यति,मुनि,ग्यान-वान साधक और ध्यानी,
पाते अंतर में उस को, जो है सबका मानी...,
मोह - पिपासा में खो जाती ,अंतर की वाणी...,
आसक्ति नृत्य करती, मन - उपवन में दीवानी
बहुत ही सुंदर

22.जितेश जी बहुत बधाई लाख पाते की बात सुनाई अपने,एक सपना और दूजा मृग तृष्ण ही जीवन के जलन की
प्यास बुझा सकते है

या काजू समझ चबाना हो मूंगफली दो चार
जब कान्वेंट की ड्रेस में किसी बच्चे को देखकर
अपने भी बच्चे को टाई में देखना हो बारबार
या शब्दों की चुभन भुला चेहरे पर पसारनी हो मुस्कान
तब मृगतृष्णा बनती है औषधि और सपने बनते आधार ,

बहुत बहवपूर्ण पंक्तिया,बहुत सुंदर

23.विनय जी बहुत बधाई,तृष्ण के कई रूप बताए वा,एक मुस्कान दौड़ गयी लाबो पर
मगर ये आज का सत्या भी है सब को नाम,दाम,की तृष्णा है.
तारीफों के
टोकरे बटोरे
ख़रीदे पुरस्कार
झट गर्दन
घुसा लेते
जहाँ भी देखे हार
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत सुंदर

sahil का कहना है कि -

मृगतृष्णा...........
बहुत खूब अब मुझे लगने लगा की इंसानी सोच बहुत कुछ मेरी तरह ही होती है,खैर,२८ कवितायेँ,विषय एक,क्या बात है!एक स्वर से सभी साथियों को बहुत बहुत शुभकामनाएं
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

सचदेव जी, एक बार सारी कविताओं को पढने के बाद अब मैं कह सकता हूँ कि अभी तक मुझे आपकी कविता सबसे प्यारी लगी,किसी एक शब्द या पंक्ति कि बात नहीं करूँगा क्योंकि पूरी कविता प्रभावशाली है,बहुत बहुत शुभकामनाएं
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

सचदेव जी, एक बार सारी कविताओं को पढने के बाद अब मैं कह सकता हूँ कि अभी तक मुझे आपकी कविता सबसे प्यारी लगी,किसी एक शब्द या पंक्ति कि बात नहीं करूँगा क्योंकि पूरी कविता प्रभावशाली है,बहुत बहुत शुभकामनाएं
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

रहन-सहन घर आँगन नूतन, नूतन, रिस्तेदार ।
पुनर्जन्म होता नारी का, जीवन में कई बार ।।
अनजाने लोगों में रह कर , नीचट पैठ बनाई ।
नारी शब्द बना पहेली,
देवेन्द्र जी प्यारी बात कह डाली आपने,बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

आत्म - परीक्षण और ईश्वर भक्ती ही,
अहा !!! जाना जीवन और जीना क्या है
बहुत खूब अवनीश जी,अलग ही डिश में लेते आए,
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

अंतहीन इच्छा सागर में

मन डूबा फिर भी प्यासा
asha ji bahut hi karamati panktiyan hain ye,mrigtrishna ko puri tarah paribhashit karne ke liye ye do panktiyan hi paryapt hain
bahut bahut shubhkamnayein
alok singh "sahil"

sahil का कहना है कि -

किसी और का कोई दोष नही, बस मेरी ही नादानी है
जाने मै कैसे भूल गया , मेरा सफर तो रेगिस्तानी है
मस्त भावों कि मस्ताने अंदाज में अभिव्यक्ति,कृष्णलाल जी बधाई के पात्र हैं आप
आलोक सिंह "साहिल"

SURINDER RATTI का कहना है कि -

मैं सब कवि मित्रों को बधाई देता हूँ, बहुत ही सुंदर विचार, जबकि विषय एक ही था, कवि तो कल्पना के धनि होते हैं अपनी रचनाओं से ही सबको खुश कर देते हैं - सुरिंदर रत्ती

sahil का कहना है कि -

ठंडी हवाओं में फिर तेरी खुशबू का अहसास
क्या ये तेरे आने के संकेत हैं?
या मन-मृग की नाभि में
फिर कस्तूरी महक उठी है़।
वाह वाह! बहुत खूब ममता जी मजा आ गया,बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

neelkanth का कहना है कि -

anupam prabhu darshan ke bhavo
ke liye kya sateek shabd chune hai
thanks for expose my heart.
राह थकन
पग छाले भूला
ले दर्शन की आस
उचक-उचक कर
नख-शिख देखूँ
फिर भी ना बुझती प्यास

vinodbissa का कहना है कि -

गीता पंडित जी आपने बहुत ही उच्चस्तरीय रचना पाठकों को समर्पित की है। आशाऒं की किरण मन में जगा जाती है। उक्त रचना की एक-एक पंक्ति व्याख्या करने योग्य है॰॰॰॰॰॰
''हिल जाये देव - लोक भी, देख हिम्मत हमारी''
सही बात है एक हिम्मत ही तो है जो जीवन को गीत बनाती है॰॰मधुर बनाती है
बहुत खूब गीता जी एक बार पुनः आपको इतनी दमदार रचना के लिये बधाई॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ एवं ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰शुभकामनायें॰॰

सजीव सारथी का कहना है कि -

बहुत बढ़िया विषय, और इतने सारे कवियों की अलग अलग कल्पनाएँ, कव्यपल्लावन की वार्षिकी के लिए ढेरों बधाईयाँ , सभी प्रतिभागियों को हार्दिक शुभकामनाएं, यह प्रयास यूहीं चलता रहे फलता रहे यही कामना है

Dr. RAMJI GIRI का कहना है कि -

GEETA JI..
"हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी....,
पग-पग पर वो, अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी.,
जग मिथ्या,केवल जनम-मरण की एक निशानी,
माटी का तन, हर पल लिखे एक नयी कहानी "

सगुण-निर्गुण के कैनवास पर उभरी प्रेरक पंक्तियाँ..
जीव-मोह पर भारी मृगतृष्णा की खालिश सच्चाई दिखाती है आपकी रचना ......

Kavi Kulwant का कहना है कि -

इतनी सारी रचनाएं एक साथ पढ़ने में दिक्क्त तो आती है... शमा जी की रचना बेहद अच्छी लगी..
कवि कुलवंत

रंजू का कहना है कि -

इस बार का विषय बहुत ही सुंदर था .और ज़िंदगी के बहुत करीब मृगतृष्णा जो इंसान को कभी कभी न भट्काती जरुर है सबका लिखा बहुत पसंद आया..मन से जुड़ी कई भावनाएं हर रचना में अपनी अपने दिल की बात कहती नज़र आई ..काव्य पल्वन का यह अंक भी अपनी तरह का एक अनूठा अंक बन गया ...हर रचना में जो पंक्तियाँ अच्छी लगी वो ..

आलोक साहिल की

लिख दे ये प्यास है ऐसी जो बुझती नहीं बुझा के
कि मृगतृष्णा होती नहीं पूरी मृग जंगल-जंगल नाचे,

देवेंदर जी की

नारी शब्द बना पहेली,

सीमा जी की...

कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन मे पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी

अवनीश जी का यह जीवन दर्शन बहुत भाया

इन्द्रिय तृप्ति के और मन संतुष्टि के ,
इस प्रयास ने बहुत कुछ छीना है

आशा जी की सच कहती यह पंक्तियाँ...

मरुथल के उस मृग जल सा
अंतहीन इच्छा सागर में
मन डूबा फिर भी प्यासा



कृष्णलाल जी ने बिल्कुल सच लिखा

मृगतृष्णा के पीछे दौड़ा , तो दौड़ दौड़ मर जायेगा
पानी तो वहाँ मिलना ही नही, बस अपनी जान गँवानी है


ममता जी अपने से बाहर की खोज ही हमे जीवन भर भट्काती है .


जो अपने भीतर है,उसे बाहर पाने की तलाश
पता नही ये मृगतृष्णा कब तक छलेगी?

गरिमा जी ..यही शायद मानव जीवन है ..बहुत सुंदर लगी यह पंक्तियाँ


हर मोड़ पर लगता है की मज़िल मिल गयी,
और फिर एक नयी मरीचिका सामने होती है,
कैसी मृगतृष्णा है की सफ़र पर निकल पड़ते हैं फिर से,

राघव जी की रचना में मन की चंचलता और वराग भाव अच्छा उभर के आया है यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी

क्षणिक सी लहरें;
कब तक ठहरें;
मिटें सजह ही झाग रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

रंजू का कहना है कि -

विवेक जी ने आज का सच लिखा है बहुत सुंदर

मृग मरीचिका के
काल्पनिक जल में
खूब नहा रहे हैं हम
ओढ़ रहे हैं
साफ्टवेयर का आकाश
धरती का हार्डवेयर
बिछा रहे हैं हम
इंटरनेट के युग में
बस
मृगतृष्णा ही पा रहे हैं हम

प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध जी ने सही कहा

मृगतृष्णा दे झूठा लालच मन को नित भरमाती जाती !
मानव मृग सा आतुर प्यासा भागा भागा पछताता है !!

सीमा जी की आपकी लिखी यह पंक्तियाँ विशेष रूप से पसंद आई
ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम
हर्फ बने जब उठी दुआऐं
कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
कैसी ये
मानव मृग सा आतुर प्यासा भागा भागा पछताता है !!

विपिन चौधरी जी बहुत सुंदर लिखा है आपने

तमाम उम परछाईयों के पीछें भागते
पानी से प्यास बुझानें की असफलता में
डूबे- ऊबें हम
आस पर टेक लगायें दूर तक
देखने के आदि हो चले हम
एक छलावे से निपटने के बाद
दूसरे छलावे के लिये तैयार हम

रंजू का कहना है कि -

महक आपकी यह पंक्तियाँ दिल में नई आशा जगा गई बहुत सुंदर

चलते रहना हमेशा उस चमकीली ज़मीन की और
मृगतृष्णा हरा चाहे हो धोखा मगर जगाता एक आस
बरसात होगी तपती रेत पर , स्वप्न नज़र आए साथ
मंज़िल तक पहुँच जाएँगे,बुझेगी तकलीफ़ों की प्यास


विवेक जी यहाँ शायद मृग की आशा की जगह मन की आशा और विश्वास आता तो मेरे ख्याल से ज्यादा सही लगता...


श्रृंगार है मृगतृष्णा ......
मृग की आशा और विश्वाश का


शोभा जी बहुत खूब कहा आपने ..इसी आशा में यह जीवन कट जायेगा शायद
और फिर…..
वही राह ले लेती हूँ
यह मृगतृष्णा ….
कब तक छलेगी
जीवन कस्तूरी
क्या कभी मिलेगी ?

मोहिन्दर जी चाहे सपने चुभे पलकों में फ़िर भी अच्छे लगते हैं बहुत खूब कहा आपने भी
स्वप्नमयी इस दुनिया में
क्यों तू सपनो से खेले
टूट सुनहला कोई स्वप्न
पलकों में चुभ जायेगा


सुरिन्दर रत्ती सही अर्थ बताया आपने इस रचना में
ये मृगतृष्णा है, लालसा है, क्या है
शायद भ्रम हो गया है
एक ऐसी धुन्धली परछाई
जिसमें मानव भटक जाता है

सही कहा आपने साधना जी

मन कहता है उस से अरे पगले
व्यर्थ ही मुझको दोषी कहता है
मेरा तो बस काम यही है
जो मुझको काबू में कर लेता है
वही औरों से अलग होता है
वही विश्व विजेता होता है

अनिल जी सच बात ..
तेरी-मेरी करता रहा तमाम उम्र भर,
भरता रहा तिजोरी तमाम उम्र भर,
अंत समय झोली पर खाली ही पड़ी है !

गीता जी आपकी रचना की यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी
बदलती ॠतुएँ , गुण जीने के सिखला जातीं..,
आस का बिगुल बजाकर भोर किरण मदमाती,
ओढ अम्बर की चादर बदली झूम कर गाती,
अवनि भी बूंदों संग, ताल से ताल मिलाती....

बहुत खूब जीतेश जी

साधारण आदमी को
तिरुपति में तत्काल दर्शन
फुटपाथ पर सोने वाले को
कड़ाके की सर्दी में
मुलायम बिस्तर और नई राजी

विनय जी बहुत सुंदर लिखा आपने यह
राह थकन
पग छाले भूला
ले दर्शन की आस
उचक-उचक कर
नख-शिख देखूँ
फिर भी ना बुझती प्यास
हे कृष्णा ....
जीवन ज्योत
भले ही बुझ जाय
बनी रहे यह तृष्णा
हे कृष्णा .....
मृगतृष्णा है,
--

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

मृगतृष्णा की कविताओं पढ़ने बैठा आज
मृगतृष्णा का सहज ही होने लगा आगाज
शब्द-शब्द पर हो रहे अनवाचक एहसास
जैसे जैसे पहुँच रहा अंक-अंत के पास
वैसे वैसे बढ़ रही अपने अन्दर प्यास
टिप्पणयों के लिंक को लख मारा यू टर्न
फिर से दोहराया वही पढ़ने का प्रकरन
अब तक मैने पढ़ लिया जाने कितनी बार
फिर भी मन मे प्यास ले पढ़ने को तैयार
प्रिय अनुजों अग्रजों कवियों का आभार
मृगतृष्णा के अंक में लग गये चन्दा चार
आओ, होली आ गयी ले रंगों की बौछार
तन मन भीगे प्यार के रंगो से इस बार
गुजिया की खुशबू मिले संग पिचकारी की धार
जीवन में रंग भर दे प्यारा होली का त्योहार
-
मेरे प्यारे कवियों की टोली
अग्रिम शुभकामनाये..
शुभ होली शुभ होली शुभ होली

seema sachdeva का कहना है कि -

sabhi partibhaagiyon ko bahut -bahut badhaai. Hind-yugam par kavita likhane ka mera yah pahalaa anubhav tha ,bahut khushi ho rahi hai jab ek hi vishay par itane saare vichaar padhane ko mile .

"YAH PYAAS HAI KI BUJHATI NAHI
AUR KALAM HAI KI RUKATI NAHI"

yah pyaas hamesha badhati rahe aur kalam sadaiv chalati rahe ,yahi shubhkaamanaa hai.

SAHIL ji mujhe yah jaankar ati prasanata hui ki aapko meri kavita pasand aai bahut -bahut dhanyavaad,
aur MAHAK ji aapke sunder se comments ke liye bahut bahut dhanyavaad .Asha karati hoo ki ham log aage bhi milate rahege .HIND YUGAM PAR Is pahale anubhav ko mai kabhi n bhool paaoongi . THANK U HIND-YUGAM.....seema sachdev

Garima का कहना है कि -

मैं कवितायें तो 10 वर्ष की आयु से लिख रही हूँ, किंतु यह पहला अवसर था की मेरी कोई भी रचना किसी भी रूप में प्रकाशित हुई. यह कितना अच्छा लग रहा है मैं बता भी नहीं सकती. सोने पे सुहागा है महक जी और रंजू जी के प्रोत्साहन वाले शब्द.
हालाँकि अन्य रचनायें पढ़कर मुझे अपनी कविता बचकानी लग रही हैं, पर इतनी सुंदर रचनाओं के बीच मेरी एक छोटी सी कविता देखकर अच्छा लग रहा है. सभी कवितायें बहुत ही सुंदर हैं.. मैं एक एक करके पढ़ रही हूँ. प्रेरणा और उत्साह दोनों ही का अनुभव हो रहा है मुझे.

धन्यवाद हिन्दयुगम और मेरे सभी कवि मित्र.
गरिमा सिंह

Gita pandit का कहना है कि -

बहुत सुंदर रचनाएं सभी की....
मेर नमन सभी की लेखनी को...

और उस मन को भी ...नमन.......
जो सोच पाता है हर बार....
एक नये अनूठे तरीके से
एक ही विषय पर इतनी विभिन्नता से...नमन......

आभार.... उन सभी मित्रों का....
जिन्होंने मेरी कविता पढी....

आभार उनका भी....जिन्होंने नहीं पढी.....

आभार.. उन कवि-मित्रों का..जिन्होंने.....
प्रेरणा के शब्दों से मेरे लेखन का.....
आगामी - मार्ग प्रशस्त किया...।

आभार ...हिन्द-युगम।


फिर मिलेंगे...एक नये विषय के
नये-नये आयामों से ओत-प्रोत कविताओं के साथ...

हाँ...होली के रंग तो लगवाइये...


पल दो पल के इस मेले में,
सदियों की हम बात करें,
रंग नेह का तुम्हें लगा कर,
अंतर्मन से अब हास करें,

आभार ।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

एक साथ २४ कविताओं को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है।

आलोक जी,

आपने शैल चतुर्वेदी स्टाइल में हास्य लिखने की कोशिश तो की है, लेकिन एक-एक शब्द नाप-तौल कर नहीं रख पाये हैं। वैसे आपको ५०% सफल तो कहा ही जा सकता है। अंतिम छंद की आखिरी कुछ वाक्य हटा दिये जाते तब भी काम चल जाता। आपका शिल्प बहुत कमज़ोर है, आपने शायद सोचा की तुकांत लोगों को प्रभावित करेगा, जबकि शब्द-विन्यास कविता में अधिक महत्व रखते हैं।

देवेन्द्र जी,

माफ कीजिएगा इसे मैं एक बोझिल कविता कहूँगा। कविता में चमत्कारिक तत्व का सर्वथा अभाव नहीं होना चाहिए। आपने तो बहुत साधारण , सुनी-सुनाई बातों को छंदबद्ध कर दिया है। मज़ा नहीं आया।

सीमा जी,

आपकी कविता विषयानुकूल है और प्रभावित भी करती है। यद्यपि कविता की शुरूआत में ही पाठक को इसका उपसंहार पता चल जाता है, फिर आपकी कविता का प्रवाह पूरा पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

अवनीश जी,

बिलकुल भी मज़ा नहीं आया। प्रयास ज़ारी रखें।

आशा जी,

कथ्य का रिपीटिशन है। पता नहीं कितनी सभी ने इस बातों को प्रवचनों में सुना होगा। प्रवचन कभी अच्छी कविताएँ नहीं होते।

कृण्ण लाल जी,

यह तो कविता कम रेगिस्तान की गाथा ज्यादा है। आप हर पैरा में एक ही बात को घुमा फिराकर कहा है।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

पता नही ये मृगतृष्णा कब तक छलेगी?

ममता जी,

इन पंक्तियों को पढ़ते ही हूक सी उठती है। आप इस कविता को थोड़ा विस्तार देतीं तो बेहतर बनती।

गरिमा जी,

अवनीश और आशा जी की कविता में जो कमियाँ थीं, वो आपकी कविता में नहीं है। कम से कम बिम्ब मन को सुकून देते हैं। आपसे अपेक्षाएँ बढ़ गई हैं।

भूपेन्द्र जी,

सुधक्कड़ी शैली में लिखी गई गेय कविता। कम शब्द, अधिक गहरी बातें। बहुत खूब।

रंजना जी,

बिलकुल भी प्रभावित नहीं करती आपकी रचना। मन के कोनों में भावों का प्रकाश नहीं पहुँचा पाती।

विवेक जी,

१-२ बातें तो गौर करने लायक हैं। आपको नहीं लगता कि आपकी यह कविता विस्तार माँगती है और साथ ही साथ अभ्यास भी?

विदग्ध जी,

आपकी कविता में ४-५ पंक्तियाँ रहतीं, तब भी बात पूरी हो जाती। कथ्य को महत्वपूर्ण मानकर रचनाकर्म करें।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

सीमा जी,

आपकी कविता में मधुर गीत के संकेत हैं।

महक जी,

आपमें तुक का मोह है, इसलिए आप कविता में उसी को खोजती दिखती हैं।

विवेक जी,

थोड़ा 'मृग' और इसकी 'तृष्णा' से आगे निकलते तो बात बनती।

शोभा जी की कविता में भी अवनीश, आशा और गरिमा जी की बातों, समस्याओं की पुनरावृत्ति है। प्रवाह अच्छा है। परन्तु कविता पढ़कर कुछ मिल नहीं पाता है।

मोहिन्दर जी,

आप एक अच्छी कविता की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन आपने अंदर छिपा उपदेश देने वाला बाबा तुरंत शरारत करने लगता है। उसे लगने लगता है कि 'जग एक छलावा है, यहाँ के कीड़ों-मकोड़ों को बहुत समझा चुका'। पाठकों को इतना नासमझ भी न समझें।

सुरिन्दर रत्ती जी,

आपकी कविता में भी कुछ नहीं है।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

विपिन नी,

माफी चाहूँगा, आपकी कविता बिना पढ़े ही आगे बढ़ गया।
आपकी कविता में भी कथ्य रिपीटिशन का शिकार है, हाँ शिल्प बढ़िया है।

साधना जी,

आप भी घुमा फिराकर वही बात कह रही हैं।

डॉ॰ साहब॰॰॰॰
क्या बात है इस बार तो दार्शनिक कविताओं का दौर चल निकला है!

गीता जी,
लगता है इस बार सभी कवि पाठकों को मोक्ष दिलाकर ही छोड़ेंगे।

जीतेश जी,

मैं भी अभी तक मृगतृष्णा में था। असली कविता के तो दर्शन अब हुए। यानी बाकी कवियों का मुझे मोक्ष दिलाने का प्रयास रंग लाया। बुत बढ़िया कविता।

हे विनय!

अच्छा व्यंग्य लिखा है आपने। शेष कवियों से कम से कम अलग तो है। बधाई।

RAVI KANT का कहना है कि -

वाह! सब कुछ सुन्दर! विषय भी, संकलन भी,भाव भी।
१. साहिल जी,
टूटे बगैर दिल से ...
कभी आह नहीं उठती
और उठती नहीं जो आह तो फ़िर
गज़ल नहीं बनती,

अहा! क्या बात है! अच्छी रचना।

२.देवेन्द्र जी, ये लाईन अच्छी लगी-

रहन-सहन घर आँगन नूतन, नूतन, रिस्तेदार ।
पुनर्जन्म होता नारी का, जीवन में कई बार ।।

३.सीमा सचदेव जी, बहुत प्रभावी है आपकी रचना। मानव मन प्रतिपल स्वयं को उम्मीदों से छलता रहता है यह तथ्य सुन्दरता के साथ प्रस्तुत हुआ है।
यही चाहत
मन मे पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी

४.अवनीश जी, सच कहा आपने-

इन्द्रिय तृप्ति के और मन संतुष्टि के ,
इस प्रयास ने बहुत कुछ छीना है

काश कि यह समझ जीवन का अंग बने।

५.आशा जी,
मन डूबा फिर भी प्यासा

मन की प्यास भला कभी किसी की मिटि है!!!

६.कृण्ण लाल जी,

किसी और का कोई दोष नही, बस मेरी ही नादानी है
जाने मै कैसे भूल गया , मेरा सफर तो रेगिस्तानी है

माना कि सफ़र रेगिस्तानी है पर इस रेगिस्तान में भी फूल खिलाए जा सकते हैं। जरूरत है तो थोड़े प्रयास और संबल की।

RAVI KANT का कहना है कि -

७. ममता जी, बहुत सुन्दर रचना-
ठंडी हवाओं में फिर तेरी खुशबू का अहसास
क्या ये तेरे आने के संकेत हैं?
या मन-मृग की नाभि में
फिर कस्तूरी महक उठी है़।
बहुत खूब!

८.गरिमा जी, सच को बखूबी पकड़ा है आपने-

यह भी नहीं जानते की क्या पाना चाहते हैं!

हाँ यह सच है।

९.राघव जी, गुनगुनाने लायक रचना।
ओ मनवा मृग बावरे,
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे.

१०.रंजना जी, कोमल भावों की सहज अभिव्यक्ति अच्छी लगी-
बसंती ब्यार सा
खिले पुष्प सा
उस अनदेखे साए ने
भरा दिल को
प्रीत की गहराई से,

११.विवेक जी, सुन्दर प्रयोग किया है आपने-

साफ्टवेयर का आकाश
धरती का हार्डवेयर
बिछा रहे हैं हम
इंटरनेट के युग में
बस
मृगतृष्णा ही पा रहे हैं हम

१२. प्रो सी बी श्रीवास्तव जी, प्यारी रचना!
काल चक्र का परिवर्तन करता अभिनय रचता घटनायें !
प्यार बढ़ाती मृग मरीचिका तृप्ति नहीं कोई पाता है !!

RAVI KANT का कहना है कि -

१३. सीमा जी, बहुत सुन्दर प्रस्तुति। सहज ही गाने का मन हो उठता है-
कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
ढूँढ़ा तुमको तकदीरों में
चन्दा की सब तहरीरों में
हाथों की धुँधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम
इन आखों की तस्वीरों में
कैसी ये ......................

१४.विपिन जी, ये पंक्तियाँ भा गईं-
तमाम उम परछाईयों के पीछें भागते
पानी से प्यास बुझानें की असफलता में
डूबे- ऊबें हम
आस पर टेक लगायें दूर तक
देखने के आदि हो चले हम
एक छलावे से निपटने के बाद
दूसरे छलावे के लिये तैयार हम

१५.महक जी, गंभीर बातें कही हैं आपने-
मन के पूरे बल से तूफ़ानो का सामना करना
अपनी दिशा कौनसी,किस और ये ग्यात करना
रेत के टीलो को बनाकर सहारा कभी लेना आराम
नयी उमीद की किरण दिखला जाए जरा सा विराम

१६.विवेक जी, मैं पूरी तरह से भाव ग्रहण न कर पाया।

१७.शोभा जी, देर सबेर सबके मन में यह प्रश्न उठता है-
यह मृगतृष्णा ….
कब तक छलेगी
जीवन कस्तूरी
क्या कभी मिलेगी ?

१८.मोहिन्दर जी, अच्छा उपदेश दिया है आपने!!
पोखर में सीप तलाश रहा
तू क्या पायेगा
तृष्णा तेरी मृगतृष्णा है
पछतायेगा

RAVI KANT का कहना है कि -

१९. सुरिन्दर जी,

काश कि गगन को छू लेते
लेकिन वो सपना ही साबित होगा

पहले से ही यह ये पूर्वाग्रह पीड़ा क्यों?? हाँ अनुभव समर्थन करे तो और बात है।

२०.साधना जी, शरीर और मन के संवाद को और सरस बनाती तो अच्छा होता।

२१. अनिल जी,
कितने करीब जिंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख्स को अपनी ही पड़ी है

अब जिसके सर पर मौत खड़ी हो उसे किसी और का ख्याल आ भी कैसे सकता है??

२२.गीता जी, प्यारी रचना-
हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी....,
पग-पग पर वो, अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी.,

२३.जीतेश जी , बहुत बढ़िया लिखा है आपने-
जब सिर्फ़ पानी पी पीकर लेना हो डकार
या काजू समझ चबाना हो मूंगफली दो चार
जब कान्वेंट की ड्रेस में किसी बच्चे को देखकर
अपने भी बच्चे को टाई में देखना हो बारबार
या शब्दों की चुभन भुला चेहरे पर पसारनी हो मुस्कान
तब मृगतृष्णा बनती है औषधि और सपने बनते आधार

२४. विनय जी, आपके कहने का ढंग पसंद आया।

जीतेश का कहना है कि -

मृगतृष्णा पर बेहतरीन कोल्लेक्शन | बार-बार रचनाओ को पड़ा और लगा की इतने सारे भाव और इतने रंग होली तो यही हो गई |
सभी प्रतिभागियों को बधाई।

sunita yadav का कहना है कि -

टूटे बगैर दिल से ...
कभी आह नहीं उठती
और उठती नहीं जो आह तो फ़िर
गज़ल नहीं बनती,
......
कि ये इश्क तो वो तृष्णा है जो होती नहीं पूरी,
जैसे मृग ढूँढ़ता है जंगल में घूम घूम कस्तूरी,

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इन्द्रिय तृप्ति के और मन संतुष्टि के ,
इस प्रयास ने बहुत कुछ छीना है

यह काल्पनिक है और आभासीय भी ,
समझा इसे यह एक प्रचंड "मृग - तृष्णा" है

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मरुथल के उस मृग जल सा

अंतहीन इच्छा सागर में

मन डूबा फिर भी प्यासा
-----------------------------------------------------------
इसे प्यासे की मजबूरी कहो, या चाह कहो दीवाने की
वो जानता है मृगतृष्णा है, पर मानता है कि पानी है
फिर इस में तेरा दोष कहाँ , बस मेरी ही नादानी है
तुम भी तो थी मृगतृष्णा ही, मैनें समझा कि पानी है
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तुम सचमुच हो आसपास ?
या----फिर वही मृग की प्यास?
--------------------------------------------
यह कैसी प्यास है जो बुझती नहीं,
कैसे रास्ते हैं जो ख़त्म नहीं होते !
हर मोड़ पर लगता है की मज़िल मिल गयी,
-----------------------------------------------------
क्षणिक सी लहरें;
कब तक ठहरें;
मिटें सजह ही झाग रे....
ओ मनवा मृग बावरे....
ओ मनवा मृग बावरे....

--------------------------------------
प्यासा मनवा खिचता रहा
उस और ही
जिस ओर मरीचका
पुकारती रही
पानी के छदम वेश में
किया भरोसा जिस भ्रम पर
वही जीवन को छलती रही
फ़िर भी पागल मनवा
लिए खाली पात्र अपना
प्रेम के उस अखंड सच को
सदियों तक ढूँढता रहा !! ढूँढता रहा !!
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समझकर भी सच
मृगतृष्णा से प्यास बुझा रहे हैं हम
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कभी खुमारी कभी वेदना कभी लिये अलसाई चेतना !
मृगतृष्णा में पागल मानव मनचाहा कब कर पाता है

मृगतृष्णा के बड़े जाल में विवश फँसा मन घबराता है !
बच पाने की इच्छा रख भी कहाँ कभी भी बच पाता है
------------------------------
ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम
हर्फ बने जब उठी दुआएँ
कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
कैसी ये
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तमाम उम परछाईयों के पीछें भागते
पानी से प्यास बुझानें की असफलता में
डूबे- ऊबें हम
आस पर टेक लगायें दूर तक
देखने के आदि हो चले हम
एक छलावे से निपटने के बाद
दूसरे छलावे के लिये तैयार हम
-----------------------------------------
कभी ख़त्म ना होनेवाला रेगिस्तान हो जैसे
अक्सर हमे जीवन के पल प्रतीत होते है ऐसे
उँचे तूफ़ानो के बवंडर ,दिल को झेले ना जाए
पराकाष्ठा हो प्रयत्नो की,पर वो थम ना पाए
-----------------------------------------------
मृग की आशा और विश्वाश का
एक मात्र उदगार है मृगतृष्णा
--------------------------------------
रस की आशा में
बेसुध हो
व्याकुल दौड़ लगाती रही
कितनी ही बार
धूल-धूसरित हो
लड़खड़ाई
फिर भी…….
हर सिकता कण से
पानी की उम्मीद लगाई
किन्तु….
सुकून की प्यास
कभी कम ना हो पाई
जाने क्या अप्राप्य था
जिसकी कामना ने
इस कदर भटकाया
अपना पागलपन
कभी समझ ना आया
...............
कब तक छालेगी
जीवन कस्तूरी
-----------------------------
पोखर में सीप तलाश रहा
तू क्या पायेगा
तृष्णा तेरी मृगतृष्णा है
पछतायेगा
------------------------------------
पानी से प्यास तो बुझे पर
ये मृगतृष्णा टस से मस नहीं होती
आखिरी साँस तक पीछा नहीं छोड़ती
ये मृगतृष्णा है, लालसा है, क्या है
शायद भ्रम हो गया है
एक ऐसी धुन्धली परछाई
जिसमें मानव भटक जाता है
--------------------------------------------
वही विश्व विजेता होता है
उसी को कामयाबी हासिल होती है
बाकी सब की हालत तो
मृगतृष्णा सी ही होती है
सारी उम्र गुजर जाती है
हासिल कुछ नहीं होता है
--------------------------------
मालूम है सभी को, इक रोज़ सब को जाना,
दो दिन का दाना-पानी, चंद रोज़ का ठिकाना,
कोई नहीं ये समझा, सच तो यही है !
कितने करीब जिंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख्स को अपनी ही पड़ी है
--------------------------------------
योगी-यति,मुनि,ग्यान-वान साधक और ध्यानी,
पाते अंतर में उस को, जो है सबका मानी...,
मोह - पिपासा में खो जाती ,अंतर की वाणी...,
आसक्ति नृत्य करती, मन - उपवन में दीवानी
------------------------------------
भूख की मार, पेट की आग
शब्दों की चुभन, करीबियों की जलन
से निजात दिला सकते हैं दो
एक सपना दूसरा मृगतृष्णा
----------------------------
जन्म से ही
दौड़ शुरू और
मृत्यु अन्तिम धाम
मन सीपी का
मोती उपेक्षित
प्यारा लगता चाम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत ढील दे दी तू ने
अब तो कुछ कसना
हे कृष्णा ...
----------------------------------





क्या कभी मिलेगी ?
--------------------------------------------------
माली बिलखा जाये, वीरानी बगिया छाये ।
सूनी बगिया देख के माली, पल-पल नीर बहाये ।।
बेटी पराया धन है, होती सदा पराई ।
नारी शब्द बना पहेली,
------------------------------------
स्वयं को
खोजने की चिन्गारी
अन्दर ही अन्दर रही जलती
भागती रही
फिर भी रही प्यासी
वक़्त ने
बना दिया
हालात की दासी
मीदो से
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन मे पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी
---------------------------------
भा गयीं मन को ये पंक्तियाँ ....अतुलनीय
किसी एक की कविता को लेकर कुछ कह सकूं इतनी
सामर्थ्यता मुझमें नहीं है ...सभी को बधाई
सभी को होली की शुभकामनाएं ...
बहुत बहुत स्नेह के साथ ...
सुनीता यादव

अरविन्द व्यास "प्यास" का कहना है कि -

दोस्तो म्रृगतुष्णा विषय पर सब कविताओं ने प्रभावित किया
कुछ मेरी लिखी है…दो पेश है

मन अंधा आंखे भी अंधी,
अंधा हुआ जीवन का कण कण

जब "प्यास" छकाये छड़ छड़
प्रकटे म्रृगतुष्णा का प्रकरण


म्रृगतुष्णा,
प्रकुती का धोखा है

प्यास ने,
धोखा ओर झोका है


प्रीत ले कहाँ होती जीत है
तडपन देना इसकी रीत है

म्रृगतुष्णा,
गर्म हवाओं का झोका है

प्यासे मतवालो ने,
खुद को कहाँ रोका है


धन्यवाद हिन्दयुग्म


अरविन्द व्यास "प्यास"

Alpana Verma का कहना है कि -

मृगतृष्णा विषय पर लिखी कवितायें पढीं .
अच्छा विशेषांक है.
सभी कवितायें भी अच्छी हैं.
समयाभाव के कारण अलग अलग कविता पर टिपण्णी नहीं kar पा रही हूँ.
सभी प्रतिभागियों को बधाई.

देवेन्द्र कुमार मिश्रा का कहना है कि -

आशाजी भा गयी आपकी कविता बहुत बधाई ,बहुत सच्ची बात मन की मंजूषा उभर कर आती रहती है,सुख दूर ही रहता है बाहुत सुंदर
मरुथल के उस मृग जल सा
अंतहीन इच्छा सागर में
मन डूबा फिर भी प्यासा ,

कृष्णा लाल जी बहुत बधाई, भा गयी आपकी कविता बहुत सही अपने बोतल का पानी ही काम में आता है,आज कल कौन किसको
बिना अपने स्वार्थ के एक बूँद भी देता है .बहुत सुंदर.


ममता जी भा गयी आपकी कविता बहुत बधाई
मन नभ की कस्तूरी मिलती ही नही,एक छलावा सा
तुम सचमुच हो आसपास ?
या----फिर वही मृग की प्यास?
जो अपने भीतर है,उसे बाहर पाने की तलाश
पता नही ये मृगतृष्णा कब तक छलेगी?
बहुत सुंदर पंक्तिया लगी

गरिमा जी बहुत बधाई, भा गयी आपकी कविता लिटना सही कहा,धूप सी ज़िंदगी में छाव की प्यास होती है
तृष्णा के सफ़र पर लिकल पढ़ते है बिना जाने रेगिस्तान के पार वो मिलगा या नही.
पर इस नये की दौड़ में पुराना सब छूट जाएगा,
यह भी भूल जाना चाहते हैं,
जिनके लिए हम हैं उनको भी,
और फिर खुद को भी भूल जाते हैं ,
जो उस मृगतृष्णा को बुझाना चाहते है!!
बहुत सुंदर पंक्तिया लगी
राघव जी,बहुत बधाई,सुंदर लगी कविता, बहुत सुंदर पंक्तिया लगी
मन मृग बावारे
जिसके भी पीछे जाए,प्यासा ही रह जाए मन,
कोई ना अपना;
मिथ्या सपना ;
माया का भटकाव रे

रंजना जी बहुत बधाई, बहुत सुंदर पंक्तिया लगी आपकी हर कविता कुछ अलग कहती है,सारी बहुत सुंदर होती है,
सही मन जिस पर भरोसा करे,
वो भ्रम ही छलते है जीवन में.
फ़िर भी पागल मनवा
लिए खाली पात्र अपना
प्रेम के उस अखंड सच को
सदियों तक ढूँढता रहा !! ढूँढता रहा !!
बहुत सुंदर

विवेक रंजन जी,बहुत अल्ग बहुत सुंदर कविता,बधाई,आज के युग का मृग और तृष्ण के पीछे भागता उसका साया
साफ्टवेयर का आकाश
धरती का हार्डवेयर
बिछा रहे हैं हम
इंटरनेट के युग में
बस
मृगतृष्णा ही पा रहे हैं हम
बहुत बढ़िया लगी.

श्रीवास्तव जी बहुत बधाई,कितना सत्य प्रदर्शन करती कविता है बहुत बढ़िया,तृष्णा के जाल में फसा मानव
चाह कर भी कुछ नही कर सकता.
कभी खुमारी कभी वेदना कभी लिये अलसाई चेतना !
मृगतृष्णा में पागल मानव मनचाहा कब कर पाता है
बहुत सुंदर

साहिल जी बहुत भा गयी आपकी कविता,प्यार ही मृग तृष्ण है
लिख दे ये प्यास है ऐसी जो बुझती नहीं बुझा के
कि मृगतृष्णा होती नहीं पूरी मृग जंगल-जंगल नाचे,
बहुत खूब

सीमा गुप्ता जी बहुत बधाई, बहुत ही सुंदर भाव से सजे सुंदर कविता मन जिसे बेइंतहा चाहे उसी को चारो और देखे है
ढूँढी सब खमोश अदायें
गुमसुम खोयी खोयी सदायें
बोझिल साँसें गर्म हवायें
मुझे दिखे तुम मुझे दिखे तुम
हर्फ बने जब उठी दुआऐं
कैसी ये मृगतृष्णा मेरी

सीमा जी बहुत प्रभावी है आपकी रचना।
नारी के जीवन का अविभाज पहलू प्रस्तुत्स किया है आपने
सब के लिए रिसती है वो,मगर उसका मन कोई नही समझता
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
बहुत सुंदर

विपिन जी बहुत बधाई,मानव और तृष्णा के बीच का अंतर र सही बताया है,बहुत सुंदर
कभी रुकते ही नहीं
मानों छलावा ही हमारी नियति है
किसी दुसरी मृगतृष्णा के मुहाने पर
हम तैयार हो बैठे जाते है
बहुत सच हम नये तृष्ण को खोजते है
विवेक कुमार जी,मृग तृष्ण की बहुत सुंदर परिभाषा है एस में,आपको बहुत बधाई
मृग की आशा ऑउर विश्वाश का
एक मात्र उदगार है मृगतृष्णा
बहुत सुंदर

शोभा जी बहुत बधाई,कोशिश से कस्तूरी भी मिलेगी शायद एक दिन,बहुत सहा कहा
पराजित होने पर भी हम चलते है,जीत की और एक उमीद लेकर
पुनः-पुनः….
पराजित होती हूँ
और फिर…..
वही राह ले लेती हूँ
यह मृगतृष्णा ….
कब तक छलेगी
जीवन कस्तूरी
क्या कभी मिलेगी ? बहुत सुंदर

मोहिंदर जी बहुत बधाई,बहुत सहिज्यदा गहराई में जाना भी ठीक नही शून्य हाट आता है

किसका क्या अर्थ है
और सब कुछ क्यों व्यर्थ है
इसकी गहरायी में न जा
सिर्फ शून्य पायेगा

सुरिंदर जी बहुत बधाई,कुछ पाने की लालसा में ही मन भटक ता है
शायद भ्रम हो गया है
एक ऐसी धुन्धली परछाई
जिसमें मानव भटक जाता है
सब भूल जाता है
बिखर जाता है
बहुत सुंदर


साधना जी बहुत बधाई,सौफ़ आनने सच बात,जो मन को वश में का ले वो जाग जीत लिया
मेरा तो बस काम यही है
जो मुझको काबू में कर लेता है
वही औरों से अलग होता है
वही विश्व विजेता होता है
उसी को कामयाबी हासिल होती है
बाकी सब की हालत तो
मृगतृष्णा सी ही होती है
सारी उम्र गुजर जाती है
हासिल कुछ नहीं होता है
बहुत सुंदर आशावादी कविता लगी.
ड़ा,अनिल जी बहुत बधाई ,छोटेसे जीवन की प्यास बुझती ही नही है,सब को अपने
सुख की पड़ी है यहाँ
मालूम है सभी को, इक रोज़ सब को जाना,
दो दिन का दाना-पानी, चंद रोज़ का ठिकाना,
कोई नहीं ये समझा, सच तो यही है !
बहुत सुंदर

गीता जी बहुत बधाई क्या काहु,शब्दों के अलंकरो से सजी,मन भाव से रचती अप्रतिम कविता है
योगी-यति,मुनि,ग्यान-वान साधक और ध्यानी,
पाते अंतर में उस को, जो है सबका मानी...,
मोह - पिपासा में खो जाती ,अंतर की वाणी...,
आसक्ति नृत्य करती, मन - उपवन में दीवानी
बहुत ही सुंदर

जितेश जी बहुत बधाई लाख पाते की बात सुनाई अपने,एक सपना और दूजा मृग तृष्ण ही जीवन के जलन की
प्यास बुझा सकते है

या काजू समझ चबाना हो मूंगफली दो चार
जब कान्वेंट की ड्रेस में किसी बच्चे को देखकर
अपने भी बच्चे को टाई में देखना हो बारबार
या शब्दों की चुभन भुला चेहरे पर पसारनी हो मुस्कान
तब मृगतृष्णा बनती है औषधि और सपने बनते आधार ,

बहुत बहवपूर्ण पंक्तिया,बहुत सुंदर

विनय जी बहुत बधाई,तृष्ण के कई रूप बताए वा,एक मुस्कान दौड़ गयी लाबो पर
मगर ये आज का सत्या भी है सब को नाम,दाम,की तृष्णा है.
तारीफों के
टोकरे बटोरे
ख़रीदे पुरस्कार
झट गर्दन
घुसा लेते
जहाँ भी देखे हार
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत सुंदर
गीता जी, प्यारी रचना-
हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी....,
पग-पग पर वो, अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी.,
अविनाश जी बहुत बधाई,बहुत सही चित्रण मन की लालसा भी तृष्णा है
आत्म - परीक्षण और ईश्वर भक्ती ही,
अहा !!! जाना जीवन और जीना क्या है
बहुत सही बात प्रभु चिंतन में लगे मन
बहुत सुंदर

जीतेश जी , बहुत बढ़िया लिखा है आपने-
जब सिर्फ़ पानी पी पीकर लेना हो डकार
या काजू समझ चबाना हो मूंगफली दो चार
जब कान्वेंट की ड्रेस में किसी बच्चे को देखकर
अपने भी बच्चे को टाई में देखना हो बारबार
या शब्दों की चुभन भुला चेहरे पर पसारनी हो मुस्कान
तब मृगतृष्णा बनती है औषधि और सपने बनते आधार

विनय जी, आपके कहने का ढंग पसंद आया। बहुत बढ़िया लिखा

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