फटाफट (25 नई पोस्ट):

Thursday, January 03, 2008

एक भाषा हुआ करती है.....


उदय प्रकाश जी इस माह के सम्मानित अतिथि कवि हैं, इसकी घोषणा हम पहले ही कर चुके हैं.उनकी कविताओं से हम आपको पूरे माह रु-ब-रु करवाते रहेंगे....समकालीन कविताओं में भाषा की दुर्दशा को लेकर सबसे सटीक कवितायें उदय जी ने लिखी हैं...भाषा श्रृंखला में हम आज उनकी पहली कविता प्रकाशित कर रहे हैं....चूंकि, भाषा को तकनीक के साथ जोड़ना और बदलते वक्त के साथ जीवित रखना हिन्दयुग्म का भी लक्ष्य है, सो यह कविता हमारे लिए अति प्रेरणादायी है....यह भी बताते चलें कि करीब एक साल पहले अफलातून के चिट्ठे पर यह कविता शायद सबसे पहले प्रकाशित हुई थी...उदय जी के साहित्य का कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है.


एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूं `आंसू´ से मिलता जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार

एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद् और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएं और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं

बहुत अधिक बोली - लिखी , सुनी - पढ़ी जाती,
गाती - बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और सबसे खूंख्वार,
सबसे काहिल और सबसे थके - लुटे लोगों की भाषा,
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और ग़रीब लफंगों की जनसंख्या की भाषा,
वह भाषा जिसे वक़्त ज़रूरत तस्कर, हत्यारे, नेता, दलाल, अफसर, भंड़ुए, रंडियां और कुछ जुनूनी नौजवान भी बोला करते हैं

वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएं
`ईश्वर´ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध

जिसमें पान की पीक है, बीड़ी का धुआं, तम्बाकू का झार,
जिसमें सबसे ज्यादा छपते हैं दो कौड़ी के मंहगे लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखबार
सिफत मगर यह कि इसी में चलता है कैडबरीज, सांडे का तेल, सुजूकी, पिजा, आटा-दाल और स्वामी जी और हाई साहित्य और सिनेमा और राजनीति का सारा बाज़ार

एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीने वाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के
आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बांटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिटि्ठयां

वह भाषा जिसमें नौकरी की तलाश में भटकते हैं भूखे दरवेश
और एक किसी दिन चोरी या दंगे के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं
जिसकी लिपियां स्वीकार करने से इंकार करता है इस दुनिया का समूचा सूचना संजाल
आत्मा के सबसे उत्पीिड़त और विकल हिस्से में जहां जन्म लेते हैं शब्द
और किसी मलिन बस्ती के अथाह गूंगे कुएं में डूब जाते हैं चुपचाप
अतीत की किसी कंदरा से एक अज्ञात सूक्ति को अपनी व्याकुल थरथराहट में थामे लौटता है कोई जीनियस
और घोषित हो जाता है सार्वजनिक तौर पर पागल
नष्ट हो जाती है किसी विलक्षण गणितज्ञ की स्मृति
नक्षत्रों को शतािब्दयों से निहारता कोई महान खगोलविद भविष्य भर के लिए अंधा हो जाता है
सिर्फ हमारी नींद में सुनाई देती रहती है उसकी अनंत बड़बड़ाहट...मंगल..शुक्र.. वृहस्पति...सप्तिर्ष..अरुंधति...ध्रुव..
हम स्वप्न में डरे हुए देखते हैं टूटते उल्का पिंडों की तरह
उस भाषा के अंतरिक्ष से
लुप्त होते चले जाते हैं एक एक कर सारे नक्षत्र

भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को
अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दण्डनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां
वर्जित हैं विचार

वह भाषा जिसमें की गयी प्रार्थना तक
घोषित कर दी जाती है सांप्रदायिक
वही भाषा जिसमें किसी जिद में अब भी करता है तप कभी-कभी कोई शम्बूक
और उसे निशाने की जद में ले आती है हर तरह की सत्ता की ब्राह्मण बंदूक

भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शाल ओढ़ते हैं मसखरे, चाकर टांगते हैं तमगे
जिस भाषा के अंधकार में चमकते हैं किसी अफसर या हुक्काम या किसी पंडे के सफेद दांत और
तमाम मठों पर नियुक्त होते जाते हैं बर्बर बुलडॉग

अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिन भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि

यह वही भाषा है जिसको इस मुल्क में हरबार कोई शरणार्थी, कोई तिजारती, कोई फिरंग
अटपटे लहजे में बोलता और जिसके व्याकरण को रौंदता
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दाखिल होता है इतिहास में
और बाहर सुनाई देता रहता है वर्षो तक आर्तनाद

सुनो दायोनीसियस, कान खोल कर सुनो
यह सच है कि तुम विजेता हो फिलहाल, एक अपराजेय हत्यारे
हर छठे मिनट पर तुम काट देते हो इस भाषा को बोलने वाली एक और जीभ
तुम फिलहाल मालिक हो कटी हुई जीभों, गूंगे गुलामों और दोगले एजेंटों के
विराट् संग्रहालय के
तुम स्वामी हो अंतरिक्ष में तैरते कृत्रिम उपग्रहों, ध्वनि तरंगों,
संस्कृतियों और सूचनाओं
हथियारों और सरकारों के

यह सच है

लेकिन देखो,
हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी

और
कहता है - `मां ´ !

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

14 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -

झकझोर कर रख दिया इस कविता ने !

एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद् और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएं और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं
...
लेकिन देखो,
हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी

सच्चाई को खोल कर रख दिया !!

sahil का कहना है कि -

उदय जी हिला कर रख दिया आपकी कविता ने,
आगे कुछ भी कह पाना अब सम्भव नहीं है.
साधुवाद सहित
आलोक सिंह "साहिल"

Avanish Gautam का कहना है कि -

मेरी पसंदीदा कविता कविताओं में से एक.

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

उदय जी,

आपकी रचना सोच के अनेको आयाम देती है। बेहद अच्छी कविता।

***राजीव रंजन प्रसाद

Alpana Verma का कहना है कि -

इस कविता ने बिल्कुल शब्दहीन कर दिया है.दिमाग के तारों को हिला कर रख दिया हो जैसे.
वास्तविकता का बखूबी चित्रण किया है.समाज के हर हिस्से की सोच कविता में मिली जिसने एक ऐसा सच खोल कर रख दिया है जिस को जान कर बहुत दुःख होता है.

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत ही पैने शब्द एक दम निःशब्द कर देने वाले..
बहुत ही गहरी सोच की रचना..

साधूवाद
-राघव्

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

इस कविता को जितनी बार पढता हूँ, अलग-अलग ढंग से प्रभाव छोड़ती है....जितनी सहजता से कवि ने भाषा की दुर्दशा और हो रही साजिशों पर महीन मार की है, काबिल-ए-तारीफ़ है...
ये कविता भीतर से आंदोलित कर देती है....जितनी सच, उतनी ही कड़वी....उदय जी की कलम को सलाम....हिन्दयुग्म आपकी कविताओं के कंटेंट और शिल्प दोनों से बहुत कुछ सीख रहा है, ऐसा मेरा मानना है....

रंजू का कहना है कि -

वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएं
बहुत ही सुंदर और गहरी रचना लगी आपकी उदय जी ...

पंकज का कहना है कि -

बिल्कुल सटीक वर्णन है, हिन्दी की दशा का।
लेकिन बहुत दिनों तक ये नहीं चलेगा, अगर हम ठान लें तो।

tanha kavi का कहना है कि -

राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिन भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि

उदय जी,
आपकी इस रचना ने अंदर तक उद्वेलित करके रख दिया है। भाषा की दुर्दशा का चित्रण ऎसा है मानो सब कुछ आँखों के सामने उबल रहा हो। आपकी लेखनी को प्रणाम करता हूँ।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

सजीव सारथी का कहना है कि -

हर ५ सेकंड में पैदा होने वाले बच्चे की भाषा को मिल रही उपेक्षा को बहुत दर्द भरे शब्द दिए हैं आपने, उदय जी आपका युग्म में स्वागत, साल के पहले माह में आपकी कविताओं से रूबरू होना बेहद सुखद रहेगा...

sunita (shanoo) का कहना है कि -

उदय जी आजके नव कवियों में से सर्वश्रेष्ठ है यह हम जानते है,आपका आना हिन्द-युग्म के लिये गौरव की बात है...अपनापन बनाये रखिये...आपकी क्षत्रछाया में हमे बहुत कुछ सीखना है...नव वर्ष मंगलमय हो...

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

.............

निशब्द!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

इस कविता को मैंने बहुत बार पढ़ा है। और बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ।

तथ्यों के रास्ते पर दौड़ती उदय प्रकाश की कविता हिन्दी की दशा-दुर्दशा की गहन विवेचना प्रस्तुत करती है, यद्यपि कवि ने अंत में कविता को भावनात्मक धरातल पर ला खड़ा किया है। फ़िर भी इसे एक कालजयी कविता माना जा सकता है।

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)