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Friday, December 14, 2007

क्षणिकाएं


उस दिन

उस दिन,जहाँ
अपने हाथो मे थाम के
हाथ तुम्हारा
मैने कही थी
अपने दिल की बात
और, तुमने
पैर के अँगूठे से मिट्टी कुरेंद कर
दबा दी थी
एक,शर्माती सी मुस्कान
आज
वहाँ देखता हूँ
उस, नर्म सब्ज़ जमीन पर
एक रिशता उग आया है

बेवफ़ा
तुम जो बेवफ़ा हुई
मुझे हैरत नहीं
लिखा था,जिस दिन नाम मेरा
तुमने अपनी हथेली पर
मुझे,
तभी से शक था।


भूख का मतलब

आधी रात, अचानक
'झबरा,' चिल्ला उठा
मेरी हैरत पर बाबूजी ने टोका-
सो जा ! दो दिन से भूखा है,उसने
सपने में रोटी देखी होगी

बाबूजी को भूख का मतलब मालूम है


साजिश
चिरागों की साजिश थी
एक किताब जल के खाक़ हुई
हर्फ़-हर्फ़ जल मरा
उसी की शिनाख़्त पे
शोलों की तासीर जान पाया हूँ

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17 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

उस, नर्म सब्ज़ जमीन पर
एक रिशता उग आया है

गुलजार जी की याद आ गई इन्हे पढ़ के :)अच्छी लगी बाकी भी .मनीष जी !!

Anish का कहना है कि -

भूख का मातलब-
सबसे उत्तम लगा |
और सब बहुत अच्छा बना है |

अवनीश तिवारी

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

वाह... क्या शानदार क्षणिकायें लिखी है..

पैर के अँगूठे से मिट्टी कुरेंद कर
दबा दी थी
एक,शर्माती सी मुस्कान

लिखा था,जिस दिन नाम मेरा
तुमने अपनी हथेली पर
मुझे,
तभी से शक था।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

मनीष जी,

क्षणिकायें तो सभी अच्छी हैं किंतु नीचे उद्धरित दोनोट ही क्षणिकायें न केवल स्तब्ध करती हैं अपितु आपके भीतर के बेहतरीन कवि को सामने भी लाती हैं।


भूख का मतलब
--------------
आधी रात, अचानक
'झबरा,' चिल्ला उठा
मेरी हैरत पर बाबूजी ने टोका-
सो जा ! दो दिन से भूखा है,उसने
सपने में रोटी देखी होगी

बाबूजी को भूख का मतलब मालूम है


साजिश
---------

चिरागों की साजिश थी
एक किताब जल के खाक़ हुई
हर्फ़-हर्फ़ जल मरा
उसी की शिनाख़्त पे
शोलों की तासीर जान पाया हूँ

बधाई स्वीकारें..

*** राजीव रंजन प्रसाद

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

मनीष जी !

चिरागों की साजिश थी
एक किताब जल के खाक़ हुई
हर्फ़-हर्फ़ जल मरा
उसी की शिनाख़्त पे
शोलों की तासीर जान पाया हूँ

अच्छी लगी

shobha का कहना है कि -

मनीष जी
बहुत ही बढ़िया लिखा है.
तुम जो बेवफ़ा हुई
मुझे हैरत नहीं
लिखा था,जिस दिन नाम मेरा
तुमने अपनी हथेली पर
मुझे,
तभी से शक था।
बधाई.

सजीव सारथी का कहना है कि -

मनीष जी सुंदर क्षणिकाएँ हैं, खासकर बेवफा बहुत उत्कृष्ट है,....

sahil का कहना है कि -

मनीष जी कमाल की क्षणिकाएँ हैं,
मन मयूर झूम उठा, बधाई हो
आलोक सिंह "साहिल"

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

मनीष जी, पहली क्षणिका तो बहुत लम्बी हो गई है और क्षणिका नहीं रही। वैसे लगा कि गुलज़ार साहब के भाव दोहराए गए हैं।
सतर्क रहिए, अनजाने में भी यह होना एक रचनाकार के लिए नुक्सानदेह है।
आखिरी 2 मुझे अच्छी लगीं। नयापन भी है।
साजिश बहुत अच्छी है।

विपुल का कहना है कि -

वाह मनीष जी क्या ख़ूब लिखा है आपने..
आपसे ऐसी ही आशा रहती है..
पहली क्षणिका लंबी थी पर अंत शानदार रहा और बाद वालीं क्षणिकाओं ने तो दिल छू लिया....

लिखा था,जिस दिन नाम मेरा
तुमने अपनी हथेली पर
मुझे,
तभी से शक था।

आधी रात, अचानक
'झबरा,' चिल्ला उठा
मेरी हैरत पर बाबूजी ने टोका-
सो जा ! दो दिन से भूखा है,उसने
सपने में रोटी देखी होगी

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

मनीष जी,
आपकी पहली क्षणिका "उस दिन" के बारे मै ये कहुगा
१) बहुत अच्छी संकल्पना है
२) सरल शब्दों का प्रयोग किया है
३) शीर्षक पर सटीक है
४) लम्बी है पर इतनी भी नहीं है
५)विराम चिहानो का बहुत अच्छा ख्याल रखा है
बेवफ़ा
१) मुझे कम समझ आई - "हाथ पर तुमने मेरा नाम लिखा और मुझे पता चला की तुम बेवफा हो?"
२) विराम चिहानो का ठीक से उपयोग यहाँ नहीं हुआ
" तुम जो बेवफ़ा हुई
मुझे हैरत नहीं
लिखा था"
भूख का मतलब
१) अच्छा विषय चुना है
२) कम शब्दों मै बहुत अच्छी बात कही है
साजिश
१) इसमे आपने उर्दू काफी प्र्यक्त की है कोई ख़ास वजह?
२) कम प्रचलित शब्दों के अर्थ दिया करी जैसे "तासीर " - (मेरे जैसे पाठको को जल्दी समझ आएगा :-) )
३) कठिन शब्दों के चलते नहीं समझ पाया मै इसको जयादा!!!!
सादर
शैलेश

Sunny Chanchlani का कहना है कि -

तुम जो बेवफ़ा हुई
मुझे हैरत नहीं
लिखा था,जिस दिन नाम मेरा
तुमने अपनी हथेली पर
मुझे,
तभी से शक था।
पंक्तिया है या दिल का टुकडा तारीफ के काबिल

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मनीष जी,

आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है। यदि पहले से कुछ वैसा ही लिखा जा चुका है (और वो भी स्थापित कलमकार द्वारा), जैसी आपकी अभिव्यक्ति है तो उसे डायरी की पन्नों तक रखिए क्योंकि आप हिन्द-युग्म के प्रारम्भिक कवियों में से हैं आपकी जिम्मेदारी ज्यादा है (आपकी पहली क्षणिका गुलज़ार की एक क्षणिका से मिलती-जुलती है, वहाँ सिगरेट का प्लॉट है यहाँ जमीन का)। वैसे क्षणिका फ़िर भी प्रसंशा की हक़दार है।

'बेवफ़ा' क्षणिका मुझे कलात्मक ज्यादा लगी वास्तविक कम।

'भूख का मतलब' और 'साजिश' बहुत पसंद आईं।

Alpana Verma का कहना है कि -

मनीष जी,
आप की क्षणिकाएं अच्छी लगीं-
१-उस दिन-
इस में आप ने क्या कल्पना की है!वाह!
-कविता ख़ुद एक रिश्ते सी नाज़ुक हो गयी है.
२-बेवफा-
यह मुझे अचंभित कर गयी-मैंने भी पढ़ते ही यही पूछा था कि यह क्या कहना हुआ???जैसा कि जम्लोकी जी भी समझ नहीं पा रहे हैं.
मेरी अपनी समझ से मुझे जो जवाब मिला शायद मुनि जी को भी वही जवाब सही लगे नही तो कवि वर ही जवाब देंगे-
जवाब यह था कि जब कोई अचानक बहुत ज्यादा प्यार दिखाने लगे तो इस तरह के शक की गुन्जायिश हो जाती है-
३-भूख का मतलब
भावुक और ठहरी सी लगी.
४-साजिश
बहुत ही बढिया है-
''हर्फ़-हर्फ़ जल मरा''
बहुत खूब!
बधाई!

anuradha srivastav का कहना है कि -

मनीष कविताऒं के उदगम मूल भाव तो एक से ही है ना ।यदि किसी स्थापित कवि द्वारा लिखी रचना से मिलती-जुलती हो भी गई तो क्या हुआ। वैसे सभी क्षणिकायें प्रभावी हैं।

RAVI KANT का कहना है कि -

मनीष जी, बेवफा को छोड़कर शेष सभी पसंद आई। बेवफा सतह पर ही रह गई है, भीतर नही उतर सकी।

tanha kavi का कहना है कि -

मनीष जी,
मन कर रहा है कि आपकी लेखनी चुरा लाऊँ। ऎसी दमदार क्षणिकाएँ, दिल दहलकर रह गया। बेवफ़ा समझने में वक्त लगा लेकिन जब समझ गया तो आपका सबसे बड़ा फैन बन गया। भूख और साजिश के क्या कहने! कुल मिलाकर आपका हस्ताक्षर बड़े-बड़ों को पानी पिलाने लायक है।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

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