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Sunday, December 23, 2007

अभिशप्त


मैं अपनी ही काया की
अन्तर वीणा के
विछिन्न तार का
शेष स्वर.......
अभिशप्त कलाकार
मूंदे मानस चक्षु का .....

मैं
जीवन पथ का
एक पथिक
पथहीन मरुप्रांत के बीचों -बीच
अभिशप्त परिदर्शक
असहाय
समग्र ह्रदय देश का ......

सुनीता यादव
२३-१२-२००७

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

shobha का कहना है कि -

सुनीता जी
सुंदर शब्दावली और प्रभावी रचना .

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

वाह .. ! सुनीता जी वाह .. !!

बिम्बों के परिदृश्य को आत्सात करते ही काव्य में एक अलौकिक अनुभूति होती है स्नेह

sahil का कहना है कि -

सुनीता जी फ़िर आपने अपनी प्रतिभा का सही सही उपयोग किया.
बहुत ही अच्छी प्रस्तुति.
शुभकामनाओं समेत
आलोक सिंह "साहिल"

रंजू का कहना है कि -

सुंदर रचना है सुनीता जी ....

Avaneesh tiwari का कहना है कि -

कुछ सप्ताह पहले भी आपने इसेतारह kee रचना लिकी थी |

शायद ये उसी श्रेणी की हो |
सुंदर
बधाई

अवनीश तिवारी

Alpana Verma का कहना है कि -

सुनीता जी बधाई!
शिल्प और शैली दोनों मनभावन लगीं.
अच्छी प्रस्तुति.

Rishi का कहना है कि -

Sunitaji ...I appreciate your imagination. I believe that art forms like poetry and music are a reflection of your thoughts and I'm afraid your thoughts are negative :).

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

सुनिता जी,

बंधक बना दिया आपके रचना पाश ने
काफी देर तक हिलने नहीं दिया..

सच में बंधा रह गया..
बहुत ही सुन्दर लिखा है..
बहुत बहुत साधूवाद

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह क्या कहूँ, कहाँ से चुन कर लाती हो ऐसे शब्द, लगता है की तुम्हारा सारा साहित्य पढ़ना पड़ेगा

anuradha srivastav का कहना है कि -

बहुत ही गहरी...... सुन्दर रचना...

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आज की कविता इन बिम्बों, उपमाओं से बहुत आगे निकल आई है। यह कविता कम मुझे सुंदर शब्दों का जाल ज्यादा लगी।

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