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Saturday, November 03, 2007

त्योहारों का मौसम




लो आगया फिर से
त्योहारों का मौसम
उनके लूटने का
हमारे लुट जाने का मौसम
बाजारों में रौशनी
चकाचौंध करने लगी है
अकिंचनो की पीड़ा
फिर बढ़ने लगी है
धनी का उत्साह
और निर्धन की आह
सभी ढूँढ़ रहे हैं
खुशियों की राह
व्यापारी की आँखों में
हज़ारों सपने हैं
ग्राहकों को लूटने के
सबके ढंग अपने हैं
कोई सेल के नाम पर
कोई उपहार के नाम पर
कोई धर्म के नाम पर
आकर्षण जाल बिछा रहा है
और बेचारा मध्यम वर्ग
उसमें कसमसा रहा है
उसका धर्म और आस्था
खर्च करने को उकसाते हैं
किन्तु जेब में हाथ डालें तो
आसूँ निकल आते हैं ।
सजी हुई दुकानें
और जगमगाते मकान
उसे मुँह चिढ़ाते हैं
सोचने लगती हूँ मैं
ये त्योहार क्यूँ आते हैं ?

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

शोभा जी

लो आगया फिर से
त्योहारों का मौसम


धनी का उत्साह
और निर्धन की आह

सजी हुई दुकानें
और जगमगाते मकान
उसे मुँह चिढ़ाते हैं

सोचने लगती हूँ मैं
ये त्योहार क्यूँ आते हैं ?


आपकी प्रथम औपचारिक रचना का स्वागत

शुभकामनायें

सजीव सारथी का कहना है कि -

अरे शोभा जी इतने उदास क्यों होती हैं आप, खुशी का मौसम है, गरीब हो या अमीर, त्यौहार तो सभी को भाते हैं, फ़िर ये गम क्यों

रंजू का कहना है कि -

शोभा जी ,यह त्योहार भी आयेंगे और यूं ही मध्यम वर्ग के लोग जैसे तैसे इसको मनायेंगे :)
क्यूंकि यह कुछ त्योहार ही है जो इसी वर्ग में कुछ बदलाव ले आते हैं :) वैसे आपकी रचना में
आज कि महंगाई और सेल की बात बखूबी कही गई है ....बधाई आपको इस रचना की और आने वाले सुंदर त्योहार की :)
शुभकामना के साथ
रंजू

Gita pandit का कहना है कि -

शोभा जी,

मन की संवेदना का स्वागत है......

लेकिन ये त्यौहार ही हैं....जो एकरसता को मिटाकर फिर से जीने के नए आयाम देते हैं.....और थोड़े समय के लिये ही सही....अधरों पर मुस्कान ले आते हैं......


शुभकामनायें

RAVI KANT का कहना है कि -

शोभा जी,
ऐसी आग जो थोड़ी देर रौशनी देकर घर को जला दे...कुछ ऐसा ही नाता मध्यम वर्ग और त्योहारों के बीच दीख रहा है...

सोचने लगती हूँ मैं
ये त्योहार क्यूँ आते हैं ?

इस सोच का उभरना हमारे लचर सामाजिक व्यवस्था की ओर इशारा करता है।

मनीष वंदेमातरम् का कहना है कि -

शोभा जी
मँहगाई से निराश ना होईये
चलिए मेरी तरफ सर आपको इस दीवाली पर
एक मौसम आतिशबाजी का, एक पेड़ पटाखों का,एक नदी मिठास की
सप्रेम भेंट

कविता के लिए बधाई

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

शोभा जी,

मैंने भी त्योहारों की वर्तमान स्थिति की समीक्षा की थी। मैं भी आपही की तरह दुखी हुआ था। पर इस जज्बे के साथ मनाता हूँ कि मूल गुणधर्म कहीं इतिहास न रह जाय।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

इस सच को मैंने भी बहुत बार महसूस किया है शोभा जी।

Rajesh का कहना है कि -

और बेचारा मध्यम वर्ग
उसमें कसमसा रहा है
उसका धर्म और आस्था
खर्च करने को उकसाते हैं
किन्तु जेब में हाथ डालें तो
आसूँ निकल आते हैं ।
सजी हुई दुकानें
और जगमगाते मकान
उसे मुँह चिढ़ाते हैं
सोचने लगती हूँ मैं
ये त्योहार क्यूँ आते हैं ?
Bahot hi chot purna hai yah panktiyan aap ki, aur fir bhi sach yahi hai aur yahi rahega. Ise koi jhuthla nahi payega. Bahot khushi ki baat yah hai ki in tyoharon ke daur mein bhale hi kuchh pal ke liye hi sahi per garib, madhaym aur tavangar sabhi log apne gum bhool paate hai. kal chahe jo ho, aaj oon dukanon mein jaa kar, sale ke board padh kar, apne aap ko loota ne per bhi kuchh der tak to khushiya paa hi lete hai. aur yah sab yunhi chalne wala hai, udas mat hoiye, aap bhi deepavali ka avagaman karne mein lag jaiye, sab kuchh bhool kar........
happy deepavali

tanha kavi का कहना है कि -

शोभा जी,
खूबसूरत रचना है। आपकी चिंता जायज है। लेकिन इससे डरकर हम त्योहारों की मूल भावना को मिटने नहीं दे सकते ना।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

शोभा जी,

विलंब से टिप्पणी करने के लिये क्षमा प्रार्थी हूँ|बस्तर में हूं और नेट बमुश्किल ही उपलब्ध हुआ है किंतु हिन्द-युग्म पर रचनायें पढने के लिये कवायद ही सही|

बाजारों में रौशनी

धनी का उत्साह
और निर्धन की आह
सभी ढूँढ़ रहे हैं
खुशियों की राह

उसका धर्म और आस्था
खर्च करने को उकसाते हैं
किन्तु जेब में हाथ डालें तो
आसूँ निकल आते हैं ।

मध्यम वर्ग की पीडा को बहुत सशक्त स्वर दिये हैं आपनें| इस तेवर में रचना प्रस्तुत हुई है कि एक बार रुक कर सोचना ही होगा कि "त्योहारों का क्या औचित्य है?"

*** राजीव रंजन प्रसाद

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

शोभा जी,

आपका सोचना की मध्यम वर्ग पर इसका प्रभाव पड़्ता है और चाह कर भी त्योहार अनुरूप खर्चा नहीं कर पाते .. ठीक है परंतु कोई भी त्योहार को मनाने की रीति रिवाज स्वमं इंसान ने बनाई है..

हम उसे किसी कि देखा देखी न करके स्वम अपने हिसाब से मना आनन्द ले सकते है.

जहाँ चाह वहाँ राह..

क्या मन् के अन्दर फूटते प्रसन्नता के पटाखों के आगे ये स्थूल मुर्गा चाप / टरकी ब्रान्ड / शिवाकाशी फायर वर्क्स इत्यादि के पटाखे क्या ज्यदा आवाज करते है. सिवाय प्रदूषण के.

क्या लक्ष्मी छाप मोमबत्तियों का प्रकाश आपसी प्रेम सोहार्दय व स्नेह के प्रकाश से अधिक होता है

क्या जगमगाती लडियां मित्रता की क़डियों से अधिक सशक्त और चिरायु होती है..

कौन सी मिठाई है जो मीठी बोली से मीठी है..

उपर से ये सब फ्री में तो काहे कि निराशा जी..

बोलो श्री राम चन्द्र भगवान की जय..

शुभ-दीपावली..

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

शोभा जी,

सुन्दर चित्रण किया है आपने त्योहारों के मौसम का.........क्यों न हो सबको मौका मिलना चाहिये न...अपनी अपनी चलाने का....

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