Friday, November 02, 2007

दोहराव

दो साल पहले, दिवाली से करीब एक हफ्ते पहले, कुछ लोग जो घर से बाज़ार को निकले, वो लौट कर कभी वापिस नही आये, कुछ के तो नामो-निशाँ ही मिट गए चंद पलों में, वो खरीदने गए थे कुछ मीठे पल अपने स्वजनों के लिए पर दे गए उन्हें आंसुओं की ऐसी सौगात जो उन्हें उम्र भर रुलाएगा, शायद ही किसी दिवाली पर उनके घर चिरागों से रोशन होंगे, हादसे से ठीक एक दिन पहले मैं भी था उसी बाज़ार में, खबर सुन कर जाए बिना रहा नही गया , पर जो दृश्य इन आंखों ने देखा वो इतना ह्रदय विदारक था कि कई रातों तक सो नही पाया, जब विषाद सहा नही गया तो कविता की गोद में आसरा लिया, एक मामूली कवि और कर भी क्या सकता था....



चिथड़े से उड़ते हैं हवाओं में,

जिस्म टुकड़ों में रुंधे पड़े हैं,

लाशों की बू आ रही है,

फिज़ा के चेहरे पर मुर्दनी तारी है,

फलक पर कहीं कोई तारा नहीं,

अंधेरी चादर छिदी पड़ी है,

और टपक रही है लहू की बूंदे,

धरती का दामन सुर्ख हुआ जाता है ,

फिर आदम ने खुल्द में,

किसी जुर्म को अंजाम दिया है,

अब के बार,

खून खुदा का बहा है, शायद -

सातवें अर्श पर ।

12 टिप्पणी:

Anish said...

सुंदर बना है.
बधाई.
अवनीश तिवारी

Avanish Gautam said...

सजीव भाई. बधाई लिखना कविता की मूल भावना के साथ खिलवाड करना होगा ..मै बस इस दुख में शरीक हूँ.

रंजू said...

यह एक बहुत ही मार्मिक विषय है .उस दिन का हादसा भूले नही भूलता ...
आपकी रचना में यह दर्द उभर के आया है ...

राजीव रंजन प्रसाद said...

सजीव जी,

आह!!

फिर आदम ने खुल्द में,
किसी जुर्म को अंजाम दिया है,
अब के बार,
खून खुदा का बहा है, शायद -

बहुत ही उत्कृष्ट रचना है, और इस बरबर असभ्य वर्तमान का यही तो सच है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

shobha said...

सजीव जी
बहुत ही मार्मिक एवं सत्य बोध कराती कविता लिखी है ।

गौरव सोलंकी said...

उन लाशों पर किए गए मातम के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं...

Gita pandit said...

फिर आदम ने खुल्द में,
किसी जुर्म को अंजाम दिया है,
अब के बार,
खून खुदा का बहा है, शायद -


सजीव जी,

बहुत मार्मिक है |

RAVI KANT said...

सजीव जी,
बेहद मार्मिक प्रस्तुति!!

फिर आदम ने खुल्द में,

किसी जुर्म को अंजाम दिया है,

अब के बार,

खून खुदा का बहा है, शायद -

आँखें नम हुई जाती हैं।

मनीष वंदेमातरम् said...

सजीव जी!

आपने अपने नामानुसार ही कविता को सजीव कर दिया है।
सूखते ज़ख्म हरे हो गये

शैलेश भारतवासी said...

फिर आदम ने खुल्द में,
किसी जुर्म को अंजाम दिया है,
अब के बार,
खून खुदा का बहा है, शायद -
सातवें अर्श पर ।

अच्छी लगीं। लेकिन मैं संतुष्ट नहीं हुआ। और बेहतर आप स्वयम् रच सकते हैं।

anitakumar said...

बहुत ही मार्मिक रचना है सजीव जी कैसे इतना सुंदर लिख लेते हैं बधाई

विपुल said...

बहुत ही मार्मिक रचना ! एक भी शब्द फाल्तू नहीं है| कम शब्दों में कैसे बात को कहा जाता है यह आपसे सीखने को मिलता है |
आपने जो चन्द पंक्तियों में कह दिया उसे लिखने में तो मुझे कई पन्ने लग जाते ...
वाह.. सुंदर रचना के लिए बधाई !