फटाफट (25 नई पोस्ट):

Friday, October 12, 2007

हिंद युग्म साप्ताहिक समीक्षा - १२


12 अक्टूबर 2007 (शुक्रवार)

हिंद-युग्म साप्ताहिक समीक्षा : 12

(1 अक्टूबर 2007 से 7 अक्टूबर 2007 तक की कविताओं की समीक्षा)


मित्रो!

इस बार कविताओं पर विचार करने से पहले स्तंभकार तेलुगु दलित कविता के बारे में कुछ जानकारी आप लोगो के साथ शेयर करना चाहता है. दरअसल हिन्दी की भांति दक्षिण की चारों भाषाओं को भी दलित साहित्य की प्रेरणा मराठी से मिली है. यह बात अलग है कि उसके सूत्र बहुत पीछे तक खोजे जा सकते हैं और खोजे भी गए हैं. महात्मा बुद्ध, महात्मा फुले तथा बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों से इस कव्यान्दोलन को वैचारिक आधार प्राप्त हुआ. आन्ध्र प्रदेश में 'कारम्चेडू' और 'चुन्डूरु' में घटित घटनाओं और अन्यत्र दलितों पर हुए और हो रहे अत्याचार ने तेलुगु दलित कविता की विषय वस्तु को गहराई से प्रभावित किया. वास्तव में "दलित वादी कविता के माध्यम से दलित कवि अपनी उस दुनिया का जीता-जागता दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं, जहाँ वे सदियों से पीड़ित, ताडित व प्रताड़ित रह रहे हैं. इस प्रकार की कविता जो कवि लिख रहें हैं, वे सबके सब पढे लिखे मध्यम वर्ग के दलित जाति के हैं. इन दलित कवियों में जो भावधारा है और उसे अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने जिस भाषा रूप को लिया है वह प्रशंसनीय है. दलित कवियों के एक वर्ग का मानना है कि इस कविता के मूल्यांकन के लिए अलग काव्य शास्त्र का निर्माण होना चाहिए(हुआ भी है)."- (डा. विजय राघव रेड्डी, २० वीं सदी का तेलुगु साहित्य, २००६, आलेख प्रकाशन, पृष्ठ-५७) . दलित कवित्वमु - १९९१, दलित गीतालु-१९९३, चिक्कानुतुन्न पाट(गाढ़ा हो रहा गाना) - 1995 तथा पदुनेक्कुतुन्ना पाट(पैना हो रहा गाना)-१९९६ से इस आन्दोलन को विपुल प्रचार मिला. प्रमुख तेलुगु दलित कवियों में एन्द्लूरी सुधाकर, सतीश चंदर, मद्दूरी नगेश बाबु और शिखामणि के नाम विशेष चर्चित हैं. सुधाकर के अनुसार-

"हमारी मौत का दाम तय किया जाता है,
अब हमे खून से सना पैसा नही चाहिए,
जो हमारी आवश्यकता है उसे मांगने का निर्भीक गला चाहिए,
नया संविधान, नया देश, नई भूमि, नया आकाश हमे चाहिए." (दलित मनिफेस्टो)


हाँ तो पंचो!
यहाँ की बातें यहीं पे छोडो, और आगे का सुनो हवाल :

१. कानों में बारूद [ राजीव रंजन प्रसाद] में ओज गुण की छटा दर्शनीय है. द्रष्टांतों का उपयोग ऎसी कविताओं की जान होता है. मुहावरों और शब्द क्रीडा ने भी व्यंग्य पैदा किया है . मिथक और इतिहास का प्रयोग सटीक है. अन्तिम अंश आशा और संकल्प को ध्वनित करता है. पत्थर लेकर उड़ने वाले परिंदे का बिम्ब आकर्षक है .

२. दूर से हर मंज़र [मोहिंदर कुमार]में स्वानुभूति की महिमा ठीक ही गाई गई है. बेहतर होगा कि वक्ते-नाज़ुक पर फ़िर से गौर फरमा लें .

३. धूप आने दो [श्रीकांत मिश्र कान्त ]सत्ता के नाम शोषित का बयान है .अच्छा प्रवाह.है. धूप सामाजिक न्याय और मानवाधिकार की प्रतीक बन गई है . वंचित वर्ग की चेतना यहाँ प्रश्न और व्यंग्य के रूप में प्रकट हुई है .संबोधन शैली आक्रोश के अनुरूप बन पड़ी है. कौटिल्यता पर पुनर्विचार वांछित है , क्योंकि यह शब्द अन्य अर्थ भी दे रहा है जो यहाँ अप्रासंगिक है.

४. फ़िर देखती [पंकज] मुहब्बत भरी ग़ज़ल है. स्मृतियां हैं और ख़ूब हैं. एकदम बेदम होना भी ख़ूब मज़े का है. दिल ए जन्नत समास उलट लें तो अच्छा लगेगा ; जन्नते दिल =दिल की जन्नत . हम / गम के साथ तुम की तुक कुछ जमी नहीं .

५. उड़ान [सीमा कुमार ] ने कविता वाचक्नवी की 'माँ' विषयक कविता की याद दिला दी..उड़ना सिखाने के रूपक का अच्छा निर्वाह आद्यंत हुआ है . अन्तिम अंश भावुकता को कर्तव्य बोध की ओर मोड़ कर माँ- बेटी के इस वियोग की अनिवार्यता की ओर इशारा करता है . स्त्री विमर्श का यह चेहरा निश्चय ही आज की उपलब्धि है.

६. चलो भारत [ गौरव सोलंकी ] में प्रगातिविरोधी शक्तियों पर बढ़िया व्यंग्य है. अकर्मण्य बनाने वाले ईश्वर वाद और भाग्य वाद की आलोचना सभी अंशों में उभरकर आई है. दरअसल हर तरह का कठमुल्लापन विकास के लिए घातक होता है - चाहे वह मनु और तुलसी के नाम पर हो अथवा बुद्ध और अम्बेडकर के. ग्रहण और त्याग का विवेक जगाने के लिए भी व्यंग्य की ज़रूरत पडती है .

७. तोहफा [ रंजना ] दाम्पत्य सुख की सहज अभिव्यक्ति है इस सुख के साथ स्त्री जीवन का एक बहुत बड़ा दुःख जुडा है. दुःख अपने नाम , अपनी पहचान ,अपनी अस्मिता के खो जाने का . एक तेलुगु लोक कथा है कि घर लीपते -लीपते एक मक्खी अपना नाम भूल जाती है . मक्खी को तेलुगु में 'ईगा' कहते हैं. इसी शीर्षक से एक प्रमुख तेलुगु स्त्रीवादी लेखिका ने एक स्त्री की कहानी लिखी जो अपना भूला हुआ नाम खोजने ससुराल से पीहर तक ही नहीं ,बचपन के स्चूल तक हो आती है. नाम नहीं मिलता -प्रमाण पत्रों में दीमक जो लग गई थी, और पुराने रेकॉर्ड नष्ट किए जा चुके थे . वह कहानी याद दिला दी इस कविता ने. रिश्ते या अस्मिता नहीं ; आज की स्त्री दोनों को साथ लेकर चल रही है- रिश्ते भी और अस्मिता भी.

८. दहशत [सजीव सारथी] में स्त्री विमर्श का एक अन्य कोण सामने है . पुरुषों का यह संसार आज भी इतना बर्बर और क्रूर है कि स्त्री न तो शहर में सुरक्षित है न घर में. मेरे महान भारतवर्ष में स्त्री-जातक गर्भ तक में सुरक्षित नहीं है.! नवरात्रों में कन्यापूजन करनेवाले देश में २१वीँ शती में भी स्त्री की यह असुरक्षा शर्मनाक है. ........और हम कहते फिरते हैं कि यह शताब्दी लड़कियों की है !

९. प्यार की पहली किरण [अजाय यादव ] गीत मधुर है. शीर्ष पंक्तियों में यार / प्यार ने चमत्कार कर दिया है . सुरमई आँख में पहली किरण का हंसना और चमकना अन्धकार और प्रकाश के आदिम बिम्ब की याद दिलाता है . रूपकों का निर्वाह आकर्षक है. साथ ही ,पूरा गीत प्रेम के उदात्त स्वरूप की ओर भी इशारा करता है : भक्ति = परम प्रेम !

१०. रिश्ते [मनीश वंदेमातरम ] में रिश्तों की सच्ची पहचान दिखाई देती है. कवि का
लोक-मानस झांकता है इन क्षणिकाऑ में. यार से खफा होकर भी गद्दार पड़ोसी को कहाँ पहचान पाते हैं हम भारतवासी ?

११. बुधिया और भी [विपुल] में करुणा और त्रास की चरम अभिव्यक्ति चेतना को झिंझोडने वाली है. स्त्री की बेबसी और माँ की ममता के द्वंद्व ने इस अभिव्यक्ति को ऊंचाई प्रदान की है.

१२. बचपन [ आलोक शंकर ] में बाल श्रमिकों की कारुणिक दशा का विवरण देने के साथ साथ उनके मानवाधिकारों के प्रति चिन्ता प्रकट की गई है. प्रश्न -मुद्रा पाठक से उत्तर और उत्तरदायित्व की अपेक्षा करती है .

१३. अपना घर [निखिल आनंद गिरि ] खूबसूरत ग़ज़ल है . बहर, काफिया और रादीफ सब दुरुस्त ! प्रेम की उपलब्धियाँ विचित्र तो होती ही हैं . सो जानै जो पावै .

इस रविवार को ईद पड़ रही है . मुझे ईद पर चार चीज़े याद आती हैं - जुलाहिन हसमती जिसने मुझे गोद में खिलाया है , प्रेम चंद की कहानी ईदगाह जिसके कई पात्रों से कहीं न कहीं मुलाक़ात हुई है , जम्मू और कश्मीर का मेन्ढर - मनकोट इलाका जहाँ कई साल नौकरी में रहा , और चेन्नई के अपने शोध छात्र यूनस अली रज़ा की माँ जो हर ईद पर तरह तरह की स्वादिष्ट सेवईयों से हमारे परिवार को सचमुच आनंदित कर देती थीं -अरे ,जादू था उनके हाथ में!

इन्हीं मीठी स्मृतियों के साथ , आप सबको ईद की शुभ कामनाएं !!!

आज इतना ही .

इति विदा पुनर्मिलनाय !

आपका - ऋषभदेव शर्मा १२ अक्टूबर २००७.

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

10 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

ऋषभदेव जी आपको भी ईद और दुर्गा पूजा की बहुत बहुत बधाई
हमेशा की तरह अच्छा लगा इस बार भी समीक्षा पढ़ना
और अपनी कविता के संदर्भ में कहानी भी :)तेलगु दलित कविता पर लिखी आपकी जानकारी बहुत ही रोचक लगी ..

शुक्रिया

रंजू

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,

"दलित साहित्य" के तौर पर साहित्य का वर्गीकरण कितना सही है मैं नहीं समझ पाता। मुझे यह साहित्य की खेमेबाजी विचलित करती है।

"हमारी मौत का दाम तय किया जाता है,
अब हमे खून से सना पैसा नही चाहिए,
जो हमारी आवश्यकता है उसे मांगने का निर्भीक गला चाहिए,
नया संविधान, नया देश, नई भूमि, नया आकाश हमे चाहिए."

इस "आग" को तो केवल बंद मुट्ठियाँ चाहिये, खेमा अलग बना कर कोई ".... लेखक संघ" बना कर मर जायेंगे ये स्वर। ये किसकी आवाज नहीं है? इस सुर में मेरा भी सुर है पर लेबल क्यों?

"कानों में बारूद डाल विस्फोट करूंगा" रचना, आपके सुधी कलम से सराही गयी, यह मेरे किये प्रोत्साहन के सदृश्य है।

ईद की हार्दिक शुभकामनायें।

*** राजीव रंजन प्रसाद

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,

प्रत्येक बार आपसे मिलता ही है.
मैं निरन्तर आपकी समीक्षा से
सीखता रहता हूं. 'कौटिल्यता' शब्द
के उपयोग से ठीक पूर्व मेरे मष्तिष्क
में इसका अन्यार्थ भी कौंधा था.परन्तु
कुछ न कुछ अपने मन की पाठकों के
सन्मुख लाने का, प्रयोग करने का, यह हठ
वादी मष्तिष्क, मैं जिस अर्थ में लिख रहा
हूं वही पाठक को भी समझना चाहिये, सोचकर
ऐसी स्थिति बन जाती है. अस्तु आपकी समीक्षा
की हर बार दुगुणित उत्साह से प्रतीक्षा रहेगी.
विद्यार्थी का कोई प्रतिवाद नहीं. और लेखन में
तो मैं वैसे ही कबीर पंथी ही हूं

प्रणाम

Avanish Gautam का कहना है कि -

विप्रवर
एक बस एक कमी है दलित कवियों में कि वे अलग- अलग समय में और अलग-अलग जगहों में चाणक्य की तरह अपने बयान नहीं बदल पाते. और उनके चेहरे पर कोई स्थितिप्रज्ञ मुस्कान नहीं पाई जाती..

सजीव सारथी का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,

"दलित साहित्य" के तौर पर साहित्य के वर्गीकरण को मैं भी सही नही मानता, आपने ईद की सेवायियाँ क्यों याद दिला दी, अब मुझे अपने दोस्त के घर जाना ही पड़ेगा, पहले कभी पड़ोस में हुआ करता था अब बहुत दूर है, खैर आप को भी ईद बहुत बहुत मुबारक

RAVI KANT का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभदेव जी,
आपके द्वारा शेयर की गई जानकारी निस्संदेह अच्छी है पर...दलित साहित्य...वर्गीकरण...मन राजी नही होता।

RDS का कहना है कि -

दोस्तो!
१. समीक्षा अच्छी लगी पढ़ कर कभी-कभी विचित्र भी लगता है. खैर, आपने सच ही कहा होगा. वैसे समीक्षा शीर्षक के बावजूद मैं पाठकीय प्रतिक्रिया भर ही दे पाता hun.
2. बात साहित्य के वर्गीकरण की नही, अध्ययन की सुविधा और समय समय पर उभरने वाली प्रवृत्तियों को स्वीकार करने की है. इनसाईडर के तौर पर स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी साहित्यकार की अभिव्यक्ति आउटसाईडर की अपेक्षा प्रामाणिक होनी ही चाहिए.
3. मैं मित्र और पाठक भर हूँ कविता के खेत्र में न मेरा कोई गुरू है न मैं किसी का गुरू हूँ. हाँ कोई सुझाव अपको जांच जता है तो मुझे अछा लगता है. मनुष्य हूँ न.
४. अलग अलग भाषाओं के जिन दलित कवियों से मेरा परिचय है उनके पलटी न मारने के बारे में मैं आश्वस्त हूँ. पलटी मारने के लिए नेतागण काफी हैं. रही बात मेरी तो मेरी हैसियत ही क्या है.
5. जब भी कोई नया चलन आता है, तो उसकी पहचान के लिए नए अभिधान की ज़रूरत होती है..
६. राज़ी न होने का सब का अपना अपना हक है. कमसे कम कविता मैं तो इतना लोकतंत्र अभी बाकी है.
धन्यवाद.
-ऋषभ

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,

दलित साहित्य को ले कर मेरा विचार केवल इतना ही था कि मुझे यह विचार को खेमा प्रदान करने जैसा लगता है। प्रगति शील लेखक संघों के कितना मटियामेट किया है यह सर्व विदित है। हाँ, मैं सममत हूँ कि "इनसाईडर के तौर पर स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी साहित्यकार की अभिव्यक्ति आउटसाईडर की अपेक्षा प्रामाणिक होनी ही चाहिए"। हिन्द युग्म के पटल पर आपका सम्मान एक पठक, मित्र से कहीं उँचा है। आपने हम सभी कच्चे रचयिताओं को शब्द बुनना सिखाया है।

अवनीश जी,

कवियों, समीक्षकों पर आपके व्यंग्य तो खूब पढ रहा हूँ, किंतु युग्म के मंच के सदस्य होते हुए आप कलम मुख्य पृष्ठ पर क्यों नहीं चलाते? दो रचनायें ही डालीं और आलोचनाओं से विचलित हो कर सिधार गये?....और जितने खंबे मिले सारे पकड लिये? यह खुला मंच है, आपके शब्द मुखपृष्ठ पर ही तुलें तो अधिक बेहतर...विक्रमादित्य का हमें इंतजार है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

tanha kavi का कहना है कि -

ऋषभदेव जी,
हर बार की तरह इस बार भी मुझे आपकी समीक्षा का इंतजार था। मेरी कविता इस बार इस समीक्षा का हिस्सा न थी, फिर भी मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। साहित्य के भिन्न-भिन्न अवयवों से आप का परिचय कराना अच्छा लगा। आगे भी आपसे ऎसी उम्मीद रहेगी।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

Avanish Gautam का कहना है कि -

ऋषभ देव जी
अच्छा लगा आपने अपनी बात साफ कर दी. उम्मीद करता हूँ कि अब आपकी समीक्षा को इन छह बिन्दुओं की रोशनी में देखा जाएगा.

राजीव जी आपकी बातें कई बार अच्छा मनोरंजन करती हैं!

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)