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Thursday, October 04, 2007

यह पोस्ट हटा दी गई


यह कि रचना लेखक/कवि (लेखक इसलिये की कुछ सज्‍जन इसे कविता नही मानते है), चूकि मेरा मानना है कि रचना के साथ टिप्‍पणी की हत्‍या नही होनी चाहिऐ। इस लिये पोस्‍ट डिलिट नही की गई।

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25 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

वाह! बहुत ही बेहतरीन रचना....एक अद्भुत कविता, मूल-भूत भावनाओं को दर्शाती हुई....

सजीव सारथी का कहना है कि -

प्रमेंद्र जी लगता है अभी अभी जवानी के अंकुर फूटे हैं आप में, चलो अच्छा किया आपने जो खुले आम " सारी " बात यहाँ नही की, काव्य को और मंझिये जनाब .... अभी बहुत गुन्जयिश है

विकास मलिक का कहना है कि -

क्या बात है जी अभी अभी जवानी के दर्शन किये है क्या
वैसे काफी ठीक लिखा है नया नया मजा ऍसा ही होता है

Seema Kumar का कहना है कि -

माफ कीजिएगा, पर मुझे समझ में नहीं आया कि यह प्रेम के बारे में है, कामुकता के बारे में, या हास्य पैदा करने की कोशिश है । कृपया आप भी एक बार विचार कीजिए ।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

प्रमेन्द्र जी,


यह कविता अचरज में डालती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि कविता को समझने में भी रचनाकार भूल कर सकता है। मैं दु:ख जाहिर करने के साथ यह निवेदन भी करता हूँ कि इस प्रकार की रचनायें युग्म पर न ही प्रकाशित करें तो बेहतर। आप काव्य कर्म को ले कर गंभीर बनें यह निवेदन है।


*** राजीव रंजन प्रसाद

तपन शर्मा का कहना है कि -

महाशक्ति जी,
आपकी कविता का शीर्षक पढ़ा। पता नहीं क्यों पर मुझे लगता है कि जिस शब्द का आपने अपनी कविता के शीर्षक और अंत में इस्तेमाल किया है उसने आज की पीढ़ी का बहुत नुकसान किया है। मेरी दृष्टि में ये बेहद भद्दा शब्द है।
दूसरी बात ये है कि इस कविता से प्रेम तो झलकता ही नहीं। माफ़ी चाहूँगा मुझे कविता जमी नहीं।
धन्यवाद,
तपन शर्मा

रंजू का कहना है कि -

क्या यह कविता है ?

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

प्रमेन्द्र जी,
निश्चय ही यह रचना हिन्द-युग्म पटल पर रखने योग्य नहीं है...पहले ही काफ़ी कुछ पाठक कह चुके हैं... आप समझ सकते हैं

मनीष वंदेमातरम् का कहना है कि -

प्रमेन्द्र!
ये कविता नहीं, कविता के साथ बलात्कार है। मुझे समझ नहीं आता कि आपने ये कविता लिखी है या अपनी कुंठा निकाली है। बेशक आपको इस मंच से अपनी बात या भावना के इज़हार अख्तियार है किन्तु यूं आपको किसी भावना या भाषा की बेइज्जती का अधिकार नहीं।
मैं जितना सोच सकता था उससे कई गुना ज्यादा घटिया लिखते हैं। मेरी नज़र में अभिव्यक्ति को इस तरह नंगा करने वाला आदमी किसी भी प्रोत्साहन का नहीं भर्त्सना का अधिकारी है। और मैं आपके इस कृत्य की भर्त्सना करता हूं।
और एक बात हिंदी में लिखने से पहले हिंदी लिखना सीखिए।

महेंद्र मिश्रा का कहना है कि -

यह समझ से परे है कि आपके यहाँ इस तरह की रचना को स्थान दे दिया गया है यह साहित्य जगत का पन्ना है या सेक्स जगत का |

अजय यादव का कहना है कि -

प्रमेन्द्र जी!
आपकी यह पँक्तियाँ हिन्द-युग्म तो क्या किसी भी सार्वजनिक मंच पर रखे जाने के योग्य नहीं हो सकतीं. कविता तो खैर यह है ही नहीं! इसको यहाँ प्रकाशित करने से पूर्व क्या एक बार भी आपके ज़हन में काव्य-विधा और भाषा के सम्मान का विचार नहीं आया? यदि नहीं, तो मैं तो इसे आपकी बीमार मानसिकता का प्रतीक ही मानूँगा.

युग्म के संचालक-मंडल से भी मैं यह अनुरोध करूँगा कि इस विषय में कुछ प्रभावी कदम उठायें ताकि इस प्रकार की बेहूदा घटना की पुनरावृति न हो.

रचना सागर का कहना है कि -

प्रमेंद्र जी,
यदि आप बुरा न माने तो मै एक पाठक के हैसियत से बोलना चाहती हुँ कि ऐसी कविता आप इस मंच पर न लाये तो बेहतर क्योकि ये युग्म सभी पद्ते है और ये कविता इसके अनुकुल नही...
सो मै भी राजीव जी के "मैं दु:ख जाहिर करने के साथ यह निवेदन भी करता हूँ कि इस प्रकार की रचनायें युग्म पर न ही प्रकाशित करें तो बेहतर।" बात से इतफाक रखती हुँ।

raman का कहना है कि -

प्रेमेंद्र जी मैंने आपकी कविता पढी और साथ-साथ लोंगो के विचार भी. मुझे नही लगता आप की कविता मे कुछ भी ऐसा है जो जिसके लिए आप को इतना कुछ कहा जाना चाहिए. यद्यपि आप की भाषा की सरलता और विचारों की मौलिकता ने मुझे प्रभावित किया है.
मेरे विचार से काव्य भावो की अभिव्यक्ति ही तो है. और अगर आप काव्य को परिसीमित करना चाहते है तो आप मन की स्वन्त्रता पर अंकुश लगा रहे है. आप अपने विचारो को बंधित बना कर यदि काव्य रचना कर रहे है तो यह कविता की मौलिकता और काव्य की सहजता से खिलवाड़ है. लोंगो के द्वारा लिखे गए संदेश यही प्रदर्शित करते है की शायद हम अब भी अपनी मनोवृत्तियों को बदल पाने मे असमर्थ है. जिन चीजों को समाज ने स्वीकार लिया है उन्हें काव्य मे स्वीकारने मे क्या हिचक हो सकती है. हमारे काव्य तो श्रंगार रस से भरा पड़ा है. तो क्या केवल शब्दों के परिवर्तन से काव्य के समस्त भाव बदल जायेंगे. वैसे भी परिवर्तनशीलता हो हिन्दी भाषा का एक मूल तत्त्व है.
इस कविता को हिंद-युग्म मे प्रकाशित करने का प्रकाशकों का निर्णय ही प्रदर्शित करता है की इस कविता मे कुछ भी ऐसा नही है जिसे आशालीलता की परिभाषा दी जा सके. प्रेमेंद्र जी आप आगे कुछ भी लिखे औए किन्ही भी शब्दों का चुनाव करे आप काव्य-सृजन की मौलिकता को जीवित रखियेगा.

नियंत्रक । Admin का कहना है कि -

रमन जी,

हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होने वाली प्रत्येक कविता के लिए उसका रचनाकार स्वयम् जिम्मेदार होता है। यह हमारी नीतियों में हैं। इसलिए आपकी यह टिप्पणी कि-

इस कविता को हिंद-युग्म मे प्रकाशित करने का प्रकाशकों का निर्णय ही प्रदर्शित करता है की इस कविता मे कुछ भी ऐसा नही है जिसे आशालीलता की परिभाषा दी जा सके.

ठीक नहीं है। यह निर्णय प्रकाशकों का नहीं है। हमारा मानना है कि साहित्यकार को इतनी समझ होती है कि उसकी कलम समाज को क्या दे सकती हैं। जब कोई अदीब अपना कर्तव्य भूल जाय , उसे अदीब कहलाने का हक़ नहीं है।

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

आह!

Seema Kumar का कहना है कि -

पंकज जी, कहते हैं 'नुक्ते की हेर-फेर से खुदा जुदा हो जाता है' । और यहाँ तो आप शब्द की बात कर रहे हैं !!!
"तो क्या केवल शब्दों के परिवर्तन से काव्य के समस्त भाव बदल जायेंगे."

शब्दों के परिवर्तन से समस्त भाव बदल सकता है, प्रस्तुतिकरण बदल सकता है और पूरा अर्थ भी बदल सकता है । और कविता में तो एक एक शब्द महत्वपूर्ण होता है ।

वैसे भी बात यहाँ एक शब्द की नहीं, न ही चुने गए विषय की - प्रेम और काम जैसे विषयों पर भी उम्दा और गहन काव्य पढ़ने को मिलता है । पर बात यहाँ पूरे प्रस्तुतीकरण की और पूरा पढ़ने के बाद जो वह प्रभाव छोड़ता है, उसकी थी ।

mahashakti का कहना है कि -

यह कविता हटाते हुऐ दुख जरूर हुआ किन्‍तु, इतने दिग्‍गजों के आदेश को मै नकार नही स‍का। चूकिं काफी पाठक गण इसे पढ़ने के इच्‍छुक जरूर होगें। उन्‍होके लिये यह रचना जल्‍द ही http://pram-raj.blogspot.com पर उपलब्‍ध है।

एक बात मै स्‍पष्‍ट कर दूँ, चाहे सजीव जी हो या सीमा कुमार या रंजू जी या राजीव रंजन जी या मोहिन्‍दर जी या फिर मनीष जी जिस प्रकार मुझे गुड़गॉंव में नसीहत दी गई थी कि टिप्‍पणी को पाठक की टिप्‍पणी के रूप में देखा जाना चाहिऐ किन्‍तु काफी टिप्‍पड़ी ब्‍लाग‍ नियंत्रक की तरह निर्णय देती ही लग रही है।

चूकिं कुछ बाते मै हिन्‍द युग्‍म मेलिंग ग्रुप पर रखना चाहता था किन्‍तु पता चला कि मै 1 अक्‍टूबर से ही उस ग्रुप से हटाया जा चुका हूँ। अब हटाये जाने का क्‍या कारण है यह मै नही जानता। किन्‍तु जो बाते केवल समूह में होनी चाहिऐ थी वह मुझे अपने ब्‍लाग पर करनी पड़ेगी।

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

परमेंद्र जी,
ये क्या है भाई....स्वतंत्र लिखें मगर वाहियात न लिखें...ये तो "ज़बरदस्ती" की कविता है....आपके भाव चाहें जो भी रहे हों, शब्दों में अश्लीलता की बू आ रही है...कृपया ऐसी कविताएं अपने ब्लॉग तक ही सीमित रखें....हिंद युग्म को विचारों की स्वतंत्रता से कोई गुरेज नही है, बदमिज़ाजी से सख्त आपत्ति है....ये मेरे विचार हैं.......

आपका शुभचिंतक,
निखिल आनंद गिरि

vinita का कहना है कि -

hahahahahahah mei to kuch bhi nahi mager fir bhi mei app sab per hasna chahungi,kyoki us kavita mei to aeisa kuch bhi nahi tha jo ki use perne per majboor kerta mager app sab kei comments nei mujhe prerit kiya ki mei kahin se bhi us kavita ko dhoondh ker paroon or meine para bhi or mei is nateeje per pahuchi ki isi tarah ajj kei or humesha se bare log chote bacho ko sex kei prati savendensheel kerte aaye hei sex kei bare mei nahi perna nahi baat kerna yehee sab kehte aaye hei or bacho ko uske prati akarshit hone ko prerit kerte aaye hei,parantu mei yehee kehna chahungi wo kavita ho sakta hei app kaviyon ko bohot achi na lagi ho parantu usmei kam se kam aeisa kuch nahi tha ki app itna bhala bura kehte un mahashey ko jinki wo kavita thi...... or ager appne mera yeh comment poora para to shukriya.

vinita का कहना है कि -

wo kehte hei ki kaho tum kehne ko tum swatantra ho,
mager jab hum kehte hei kuch to wo hume rok deite hei,
wo kehte hei baro aage sara akash tum choo sakte ho,
mager jab hum chalte hei duniya ko fateh kerne to wo hume tok deite h ei.


:)

mahashakti का कहना है कि -

गिरि भाई,

मेरा काम लिखना था जो मैने किया, क्‍या सही है क्‍या गलत यह तय करके का काम लेखक या कवि का नही है, यह काम पाठको का है। हॉं यह कविता युग्‍म के योग्‍य नही थी तो मैने इसे हटा दिया है, और जैसा कि मुझे पता था कि काफी लोग जरूर पढ़ना चाहेगे कि इसमें था क्‍या ?

चुकिं मेरा उद्देश्‍य केवल युग्‍म के द्वारा आये पाठको को ही पढ़वाने का का इ‍सलिये मैने इस कविता को उस ब्‍लाग पर डाला जो किसी एग्रीगेटर पर नही है। अगर मै इसे अपने किसी एग्रीगेटर स्थित ब्‍लाग पर डालता तो परिणाम कुछ दूसरा होता। अभी तक मैने किसी को इस कविता को पढ़ने के लिये भी नही कहा है।

जिस समय मधुशाला लिखी गई थी, इस महान कृति के काफी विरोधी थे, एक आयोजन में तो इसे पढ़ने ही नही दिया जा रहा था किन्‍तु बाद में गांधी जी की अनुमति से इसे पढ़ा गया और अमर कृति बनी।

जैसा कि युग्‍म के संस्‍थापक मनीष जी मानते है कि मेरा लेखन घटिया है तो अब मुझे यहॉं रचनाऐ नही ही डालना चाहिए। युग्‍म गंगा के समान है अब पर अब वह भी इतनी दूषित हो गई है कि उसमे लोग डुबकी लगाने के बजाय नमस्‍कार करना ही उचित समझते है।

रमन जी विनिता जी मै नही जानता कि आप कौन है किन्‍तु आपको धन्‍यवाद।

Harihar का कहना है कि -

दुख हुआ जान कर कि एक निर्दोष विनोदपूर्ण
कविता के पीछे लोग पड़ गये कि
कविता हटानी पड़ी
भीड़-प्रजातन्त्र का एक ऒर नमूना।

Seema Kumar का कहना है कि -

माफ कीजिएगा, गलती से 'रमन जी' की जगह 'पंकज जी' लिख दिया ऊपर अपनी टिप्पणी में ।

परमेन्द्र जी, आप से मैं अब बस इतना ही कहना चाहूँगी कि सभी से यहाँ सभी ने अपने निजी विचार ही दिए हैं .. किसी विचार-विमर्श से नहीं । पढते ही मेरे दिमाग में जो सवाल आए, वही मैंने अपनी पहली टिप्पणी में लिखा । अगर आप अपनी इच्छा से लिखने की स्वतंत्रता को मानते हैं तो पाठकों की टिप्पणियों की स्वतंत्रता को भी मानते होंगे ।

और जैसा कि आपसे कहा गया था, मैं भी यही कहूँगी कि टिप्‍पणी को पाठक की टिप्‍पणी के रूप में देखा जाना चाहिए और साथ ही सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए । और अगर इतने पाठक एक ही दिशा में टिप्पणी कर रहे हों तो कवि / लेखक को भी एक बार विचार कर लेना चाहिए कि वो कहाँ तक सही हैं । अगर उसे फिर भी लगे कि वह सही है तो वह अपनी बात कहे । अपनी रचनाओं का सबसे बड़ा समीक्षक वह स्वयं ही हो सकता है । पर मात्र इसलिए कि पाठक या अन्य कवि उस रचना को पसंद नहीं कर रहे हैं य उसकी आलोचना कर रहे हैं, अपनी बात पर अड़े रहना या अपनी समीक्षा न करना, यह और किसी के लिए नहीं, खुद के लिए और खुद की रचनात्मक प्रक्रिया में नुकसानदेह होता है ।

आपको धन्यवाद कि आपने सबकी बात सुनकर अपने रचना यहाँ से हटा ली । हम अपने ब्लाग पर कुछ भी लिख सकते हैं पर एक सामूहिक मंच पर औरों की भावनाओं और संवेदनाओं की भी इज़्ज़त की जानी चाहिए ।

और हाँ, यह सब मैं एक पाठक की हैसियत से कह रही हूँ, पर दुख अवश्य हुआ युग्म के प्रति आपके विचार जानकर । उम्मीद करती हूँ मेरी बातों को प्रतिकूल लेने के बजाए कम से कम एक बार आप ठंढ़े दिमाग से अवश्य विचार करेंगे । आपने ऊपर मेरा नाम भी लिया है तो मैंने अपने विचारों से आपको अवगत कराना जरूरी समझा ।


विनीता जी,
मैं आपसे भी वही कहूँगी जो मैंने ऊपर लिखा था - बात यहाँ एक शब्द की नहीं, न ही चुने गए विषय की - प्रेम और काम जैसे विषयों पर भी उम्दा और गहन काव्य पढ़ने को मिलता है । पर बात यहाँ पूरे प्रस्तुतीकरण की और पूरा पढ़ने के बाद जो वह प्रभाव छोड़ता है, उसकी थी । शिल्प, विषय-वस्तु, लेखन की रोचकता, या ऐसा कुछ जो दिल को छूए या दिमाग को झकझोरे, या जैसा आप कह रही हैं 'सेक्स के प्रति संवेदन्शीलता' ऐसा कुछ भी न तो मुझे नज़र नहीं आया इसमें और न ही कई अन्य लोगों को जिन्होंने यहाँ टिप्पणी दी है - और न ही छोटे-बड़े वाली कोई बात है यहाँ जिसकी वजह से यहाँ किसी ने आलोचना की है । जैसा कि निखिल जी ने कहा है - "ज़बरदस्ती" की कविता अधिक लग रही है । अगर आपको अच्छी लग रही है, तो ठीक है, वह आपकी पसंद है । पर अगर आप मात्र इसलिए पक्ष ले रही हैं क्योंकि औरों ने आलोचना की है, तो मैं कहूँगी एक बार फिर पढ़ें और कविता की तरह समीक्षा करें... औरों की बातों को और विषय-वस्तु के विवाद को नजरंदाज करके - सिर्फ एक कविता या लेखनी की तरह और तब देखें एक कविता के रूप में आपको कैसी लग रही है ।

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

परमेंद्र जीं,
मैं दुआ करता हूँ की आपकी प्रसिद्धि हरिवंश राय बच्चन से भी ज़्यादा हो......
"मेरा लेखन घटिया है तो अब मुझे यहॉं रचनाऐ नही ही डालना चाहिए। युग्‍म गंगा के समान है अब पर अब वह भी इतनी दूषित हो गई है कि उसमे लोग डुबकी लगाने के बजाय नमस्‍कार करना ही उचित समझते है। "

ये आपकी ग़लतफ़हमी भी हो सकती है....अरे भाई, पाठकों की प्रतिक्रिया को इतना "दिल" से नही लगाते...आप बेशक अक्सर अच्छा लिखते हैं...अब कभी-कभी तो कवि रह भटक ही सकता है....आप हिंद्युग्म पर न आयें तो ये आपका अपना फ़ैसला है....हिंद्युग्म ने कभी ख़ुद को गंगा कहा है और अगर जहाँ तक मेरा सामान्य ज्ञान कहता है आप भी उन शुरूआती "भागीरथों" में से एक थे, जिन्होंने इस गंगा को सच में उतारा है....अब दूषित हुई या नहीं, ये आपका मिजाज़ जाने......हमारे लिए तो हिंद युग्म एक "मिशन" है jaha राजनीति या गुटबाजी का कोई स्थान नहीं है........

आपका शुभचिंतक,
निखिल आनंद गिरि

Chandra Prakash का कहना है कि -

is kavita ko maine pada.aisa kuch nhi paya ki itna hangama hona chahiye tha. maine kafi gaur kiya to paya ki is kavita ka virodh krane vale yahi ke log hai, yah tanasahi pravitti ko dikhata hai. aise loha ka to bhagvaan hi malik hai. mujhe dukh to is bat ka hai ki vah aadmi aaj bhi is manch par bana huaa hai jiska itna apman huaa hai.mai to kab aise logo char lat markar bhaga diya hota. mahashakti bada hi dildaar insaan hai. mahashakti ko naman.

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