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Tuesday, October 02, 2007

दूर से हर मँजर दिलकश





जागती आँखें भी देखती हैं सपना
ख्वाबों की लम्बी फेहरिस्त से
नींद का पता नहीं चलता

लाख देखे हों किसी ने जख्म लेकिन
बिन फटे अपने पैर में बिबाई
दर्द का पता नहीं चलता

अपनों की भीड़ का क्या गुमाँ करना
वक़्ते-नाजुक जिन्दगी में आये बिना
रिश्तों का पता नहीं चलता

रोजमर्रा की जिन्दगी नहीं भाती सबको
जब तलक गम से न हो रूबरू आदमी
खुशी का पता नहीं चलता

दूर से हर मँजर दिलकश नजर आता है
बिन छुये चाँद को कभी उसकी
तपिश का पता नहीं चलता

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15 कविताप्रेमियों का कहना है :

"राज" का कहना है कि -

मोहिन्दर जी!!
बढिया लगी आपकी रचना...हकीकत बयान करती है ये नज़म......
*******************************
जागती आँखें भी देखती हैं सपना
ख्वाबों की लम्बी फेहरिस्त से
नींद का पता नहीं चलता

लाख देखे हों किसी ने जख्म लेकिन .
बिन फटे अपने पैर में बिबाई
दर्द का पता नहीं चलता

दूर से हर मँजर दिलकश नजर आता है
बिन छुये चाँद को कभी उसकी
तपिश का पता नहीं चलता
********************
शुभकामनायें!!!

Alpana Verma का कहना है कि -

अपनों की भीड़ का क्या गुमाँ करना
वक़्ते-नाजुक जिन्दगी में आये बिना
रिश्तों का पता नहीं चलता

बहुत ख़ूब लिखा है आपने
यही आज कल की सच्चाई भी है-
इसलिए हर अपना भी अक्सर बेगाना लगता है-
जाना पहचाना हर शख्स भी अनजाना लगता है-------
बधाई

नमस्कार ....रविंदर टमकोरिया(व्याकुल) का कहना है कि -

मोहिंदर जी , आपकी कविता मात्र सुंदर और रचनात्मक ही नही है ...बल्कि यह जीवन के यथार्थ को भी दर्शाती है ....साथ ही मुझे आपके द्वारा चुनी हुई तस्वीर जो आकाश तथा धरती के मेल को दर्शाती है काफी अच्छी लगी...आशा है कि आगे भी हमे इसी प्रकार की सुंदर रचनाये पड़ने को मिलेंगी .....

रंजू का कहना है कि -

दूर से हर मँजर दिलकश नजर आता है
बिन छुये चाँद को कभी उसकी
तपिश का पता नहीं चलता...

बहुत खूब मोहिंदर जी ....सुंदर है नज़्म और चित्र भी बहुत सुंदर लगा बधाई !!

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

बन्धुवर
मोहिंदर जी
बड़ी ही प्यारी नज़म है
विशेषकर ये पंक्तियां

लाख देखे हों किसी ने जख्म लेकिन
बिन फटे अपने पैर में बिबाई
दर्द का पता नहीं चलता

अपनों की भीड़ का क्या गुमाँ करना
वक़्ते-नाजुक जिन्दगी में आये बिना
रिश्तों का पता नहीं चलता

बहुत बहुत शुभकामनायें

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

गहरी है आपकी रचना इतनी

कि थाह का पता नहीं चलता
...


*** राजीव रंजन प्रसाद

RAVI KANT का कहना है कि -

मोहिन्दर जी,
बहुत सुन्दर!!बरबस मुँह से वाह-वाह निकलता है।

जागती आँखें भी देखती हैं सपना
ख्वाबों की लम्बी फेहरिस्त से
नींद का पता नहीं चलता

लाख देखे हों किसी ने जख्म लेकिन
बिन फटे अपने पैर में बिबाई
दर्द का पता नहीं चलता

अपनों की भीड़ का क्या गुमाँ करना
वक़्ते-नाजुक जिन्दगी में आये बिना
रिश्तों का पता नहीं चलता

सच को इतने सुन्दर साँचे मे ढालकर प्रस्तुत करने के लिए बधाई।

shobha का कहना है कि -

मोहिन्दर जी
पता नहीं क्यूँ मुझे काव्यानन्द प्राप्त नहीं हुआ । रचना सबको पसन्द आई है तो निश्चित ही अच्छी होगी ।

Udan Tashtari का कहना है कि -

बढ़िया ख्याल है, मोहिन्दर भाई.

अजय यादव का कहना है कि -

मोहिन्दर जी!
भाव बहुत अच्छे हैं, मगर रचना काव्य से ज़्यादा गद्य प्रतीत हुई.

Seema Kumar का कहना है कि -

रोजमर्रा की जिन्दगी नहीं भाती सबको
जब तलक गम से न हो रूबरू आदमी
खुशी का पता नहीं चलता

दूर से हर मँजर दिलकश नजर आता है
बिन छुये चाँद को कभी उसकी
तपिश का पता नहीं चलता

बहुत खूबसूरत सोच है मोहिन्दर जी और सच भी । अच्छी लगी ।

- सीमा कुमार

shivani का कहना है कि -

मोहिंदर जी आपकी रचना का चित्र बहुत दिलकश लगा !बधाई स्वीकार करें !अति संवेदनशील रचना !
अपनों की भीड़ का क्या गुमान करना
वक्त-ऐ -नाज़ुक ज़िन्दगी में आए बिना
रिश्तों का पता नहीं चलता
मार्मिक सच को दर्शाती एक अच्छी कविता !

tanha kavi का कहना है कि -

मोहिन्दर जी,
बेहतरीन भाव के आप तो स्वामी है, इसलिए इस बारे में कुछ कहना मैं लाजिमी नहीं समझता। बस एक जिज्ञासा है- अगर आपकी यह कविता "नई कविता" के अंतर्गत आती है, तब तो शिल्प की कमी का प्रश्न नहीं उठता, लेकिन अगर आपने इसे नज़्म या गज़ल बनाना चाहा था, तो यह सिर्फ गद्य बनकर रह गई है। आपसे आग्रह है कि आप इस ओर ध्यान दें।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

सजीव सारथी का कहना है कि -

मोहिंदर जी देरी के लिए माफ़ी चाहूँगा, नज़्म युग्म पर बहुत कम पढने को मिलती है, आपकी नज़्म पूरी तरह से मीटर में हैं और बहुत बहुत अच्छी भी -
लाख देखे हों किसी ने जख्म लेकिन
बिन फटे अपने पैर में बिबाई
दर्द का पता नहीं चलता
क्या बात है, मोहिंदर जी आपको पढ़कर बहुत मज़ा आया

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

यह नज़म अलग-अलग वाक्यांशों का गुच्छा कही जा सकती है। यह सब जल्दीबाज़ी के नतीज़े हैं। शब्दों की भलीभाँति काँट-छाँट होनी चाहिए।

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