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Saturday, October 20, 2007

छत और मैं


आधी रात के बाद
मैं छत पर जाता हूँ
पाँचवीं मंज़िल,
दूर तक दिखाई देता है
सब कुछ शांत,
शिथिल,नीरव!
सुनसान सड़क पर
क़तार में खड़े,
मौन और उदास
स्ट्रीट लाइट..
मानों जल रहे हों
मेरी ही तरह !

कुत्ते भोंकते हैं,
दूर बहुत दूर
मोबाइल के टॉवर दिखते है,
जैसे कहते हों
ऊँचा उठो..
यह फ़िज़ूल की बातें हैं!
बगल का घर,
एक लता लिपटी है
दीवार से
आह!
आँसू निकलता है आँखों से
टप..
पास ही उसका घर
नवरात्र है,
पास ही माँ की मूर्ति बैठी है
मुँह उसके घर की तरफ़
और पीठ मेरी ओर
वो भी..!
आकाश में तारे,
दूर हैं शायद किसी से!
मैं देखता हूँ,
अपनी पलकों को बंद करके
आँसू छुपाते हैं
मेरी छोटी बहन अक्सर पूछती है
भैया..
ये तारे क्यों झिलमिलाते हैं?
पवन चलती है,
हृदय सुलगता है
यादों के अंगारे भड़क जाते हैं
धुआँ उठता है,
अचानक बादल छा जाते हैं!

अब बस..
मैं नीचे आता हूँ
कुछ लिखता हूँ,
अपना लिखा पढ़ता हूँ
बार-बार ख़ुश होता हूँ!
लोग कहते हैं
वाह!नया बिंब है
पर पता है..
यह छत,स्ट्रीट लाइट,टॉवर
इमारतें,दीवारे,कुत्ते,
तारे,आसमान
सब मुझे धिक्कारते हैं,
तू स्वार्थी है,
निरा स्वार्थी!
तू कवि है?
या प्रेमी..
नहीं,तू कुछ भी नहीं..
तू धोखेबाज़ है!
उसकी यादों से दगा करता है,
अश्कों को काग़ज़ पर टपकाता है
शब्दों में ढाल कर सबको बताता है!
रोता है
आँसू बहाता है
नये बिंब और उपमान
गढ़ने के लिए..
अपनी इस नाकारा पीर का
व्यापार करने के लिए!

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

बुधिया के बाद आज ""छत और मैं ''..भी उतनी ही कमाल का लिखा है तुमने विपुल ..बहुत ही भाव पूर्ण और दिल को छूता हुआ ..जो दर्द इस के लिखने में उभर के आया है वह सच में बहुत ही सुंदर है ..

आँसू निकलता है आँखों से
टप..
पास ही उसका घर
नवरात्र है,
पास ही माँ की मूर्ति बैठी है
मुँह उसके घर की तरफ़
और पीठ मेरी ओर
वो भी..!

वो भी!! .....बहुत कुछ कह दिया तुमने इन पंक्तियों में !!

नये बिंब और उपमान
गढ़ने के लिए..
अपनी इस नाकारा पीर का
व्यापार करने के लिए!

जिस तरह तुमने अपनी सोच को इन पंक्तियों में लिखा है वह बहुत अच्छा लगा... नमन है तुम्हारी सोच को ..
बहुत बहुत शुभकामना और बधाई

सस्नेह

रंजू

abhi का कहना है कि -

chaat ar budhiya accha laga padkr
its amazing ki tu kis tarah choti choti chizo ko involve kr lata ha apni kavitao ma...........
last ki kuch laina kafi acchi ar sochna layak ha.............

राहुल पाठक का कहना है कि -

vipul ji bahut hi achhi rachna hai.....budhiya ke bad 1 aur saskt rachna haiआँसू निकलता है आँखों से
टप..
पास ही उसका घर
नवरात्र है,
पास ही माँ की मूर्ति बैठी है
मुँह उसके घर की तरफ़
और पीठ मेरी ओर
वो भी..!


is "vo bhi" ke 2 shabdo se 200 shabdo ki bat kar di aapne


badhaiya....

Gita pandit का कहना है कि -

एक लता लिपटी है
दीवार से
आह!
आँसू निकलता है आँखों से
टप..


वाह.... ...

क्या बात है....बहुत अच्छे......

बहुत सशक्त भाव पूर्ण रचना .....आपकी रचना की एक विशेषता ....पाठक
को बाँध कर रखती है प्रारम्भ से अंत तक ......ऐसे ही आपकी लेखनी चलती रहे.........

शुभ - कामनाएं.

हाँ.... एक लय - बद्ध कविता...आपकी लेखनी से.....??

बधाई

सस्नेह
गीता पंडित

piyush का कहना है कि -

jab mai yah kavita padh raha tha tab mujhe ummid thi ki ye gourav ji ne likhi hogi ........
ab kya bolu...
ye tumhari doosari sabse achchi kavita hai......
congrates dear

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

प्रिय विपुल जी

आपकी कविता पर मैं टिप्पणी करने से अधिक उसमें
अभिव्यक्त वेदना पर कहना चाहूंगा यह जो आपको लगता है यही आत्मा की पुकार है इस आयु में कुछ कर गुजारने की स्वयं से पुकार है इससइ पहले कि यह पुकार जीवन की आपा धापी में खो जाये युवाओं के युगधर्म का परिपालन जो कर गया
वह नया इतिहास रच गया

काव्य धर्म के साथ साथ युवधर्म और युगधर्म का भी संतुलित निर्वाह हो यही विचार तो विगत में अमर शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल .... जैसे कोटि कोटि आत्माओं को ...... और आगे शब्द छोटे हैं कुछ नहीं कह सकता आप जैसे युवाओं की आज बहुत आवशयकता है.

अपनी आत्मा की मइस पुकार को सदैव जाग्रत रखें कविता लिखना एक दीपक से दूसरे दीपक को ज्जवलित करना ही है

सस्नेह

सजीव सारथी का कहना है कि -

uf vipul, kya hai tumhari kalam me jo is tarah man ko chu jaati hai, budhia se pare bhi tum utne hi saksham ho, har ravivaar tumhari nayi kavita ka intezaar rahta hai mujhe

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

विपुल जी,
सुन्दर लिखा है आपने.
एक बात कहूं... कविता है तो ठीक है अगर सचमुच में ऐसा हो रहा है तो गडबड है... मुझे तो छत पर और कुछ नजर आता है पता नहीं आप क्या देखते हैं. :)

shobha का कहना है कि -

विपुल जी
मन की अनुभूतियों को बहुत सुंदर व्यक्त किया है. तुमको यदि सच मैं ऐसा लगता है फ़िर निश्चय ही तुम बहुत संवेदन शील कवि हो . अपनी इस संवेदन शीलता को बनाये रखो. देश को और मानवता को इसकी बहुत जरुरत है. आशीर्वाद सहित

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

क़तार में खड़े,
मौन और उदास
स्ट्रीट लाइट..
मानों जल रहे हों
मेरी ही तरह !

भैया..
ये तारे क्यों झिलमिलाते हैं?
पवन चलती है,
हृदय सुलगता है
यादों के अंगारे भड़क जाते हैं
धुआँ उठता है,
अचानक बादल छा जाते हैं!

अश्कों को काग़ज़ पर टपकाता है
शब्दों में ढाल कर सबको बताता है!
रोता है
आँसू बहाता है
नये बिंब और उपमान
गढ़ने के लिए..
अपनी इस नाकारा पीर का
व्यापार करने के लिए!

विपुल इन दिनों जिस कवि नें युग्म पर सर्वाधिक प्रभावित किया है तो वह तुम हो। तुम्हारी संवेदना जिन शब्दों में बह रही है वह पाठक के मन में भी विप्लव पैदा करती है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Avanish Gautam का कहना है कि -

ठीक है. पंक्तियाँ कविता की दिशा में जा रही हैं

Avanish Gautam का कहना है कि -

ठीक कविता है.

दिवाकर मणि का कहना है कि -

विपुल जी,
कविता की प्रत्येक पंक्ति ने हृदय को छू लिया. बधाई......

RAVI KANT का कहना है कि -

तू धोखेबाज़ है!
उसकी यादों से दगा करता है,
अश्कों को काग़ज़ पर टपकाता है
शब्दों में ढाल कर सबको बताता है!
रोता है
आँसू बहाता है
नये बिंब और उपमान
गढ़ने के लिए..
अपनी इस नाकारा पीर का
व्यापार करने के लिए!

वाह विपुल जी! कविता के अंत ने सर्वाधिक प्रभावित किया।

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