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Saturday, October 20, 2007

घर तो सजा लिया


नीलाम जब तुम्हारा इमान हुआ तो
करना गुरुर क्या फ़िर सम्मान हुआ तो

सीधे सरल औ सच्चे हो मानते हैं लेकिन
कल गर तुम्हे इसीका अभिमान हुआ तो

मन्दिर की मस्जिदों की चौखट हो चूमते
इंसानियत का फ़िर भी ना ज्ञान हुआ तो

इन्सान पर भरोसा इनता ना आप कीजे
समझे जिसे खुदा वों शैतान हुआ तो

तुमने ये तम्बू गहरे क्यों गाड़ लिए हैं
चलने का गर अचानक फरमान हुआ तो

यारों बड़े जतन से घर तो सजा लिया
किस्मत मैं रहना बनके मेहमान हुआ तो

सच बोलने की हिम्मत करना तू सोच "नीरज"
जिनका रसूख उनका अपमान हुआ तो

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

shobha का कहना है कि -

आपने एकदम सच कहा नीरज जी । हम आन्तरिक गुणों को भूल भौतिक सुखों की ओर दौड़े जा रहे है ।
किन्तु कविता में काव्यानन्द का होना भी बहुत जरूरी है वरना वह महज़ एक उपदेश बन जाता है ।
निम्न पंक्तियाँ सुन्दर हैं -
तुमने ये तम्बू गहरे क्यों गाड़ लिए हैं
चलने का गर अचानक फरमान हुआ तो
सस्नेह

Avanish Gautam का कहना है कि -

तो क्या! कुछ और कविताएं लिख लिजियेगा! :)

कुछ पंक्तियां पसन्द आईं!

सजीव सारथी का कहना है कि -

इन्सान पर भरोसा इनता ना आप कीजे
समझे जिसे खुदा वों शैतान हुआ तो

waah bahut achhe -
नीलाम जब तुम्हारा इमान हुआ तो
करना गुरुर क्या फ़िर सम्मान हुआ तो

सीधे सरल औ सच्चे हो मानते हैं लेकिन
कल गर तुम्हे इसीका अभिमान हुआ तो
hindi shabdon ka istemaal kar bahut achhi ghazal likhi hai aape neeraj ji

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

नीरज जी

मन्दिर की मस्जिदों की चौखट हो चूमते
इंसानियत का फ़िर भी ना ज्ञान हुआ तो

इन्सान पर भरोसा इनता ना आप कीजे
समझे जिसे खुदा वों शैतान हुआ तो


आपको दुबारा पढ़ना बहुत अच्छा लगा

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

नीरज जी,
बहुत ही गहरी बात कही है आपने अपनी कविता के माद्यम से...
मन्दिर की मस्जिदों की चौखट हो चूमते
इंसानियत का फ़िर भी ना ज्ञान हुआ तो
तुमने ये तम्बू गहरे क्यों गाड़ लिए हैं
चलने का गर अचानक फरमान हुआ तो
यारों बड़े जतन से घर तो सजा लिया
किस्मत मैं रहना बनके मेहमान हुआ

Gita pandit का कहना है कि -

नीरज जी

तुमने ये तम्बू गहरे क्यों गाड़ लिए हैं
चलने का गर अचानक फरमान हुआ तो


बहुत गहरी बात ....

सस्नेह

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

इन्सान पर भरोसा इनता ना आप कीजे
समझे जिसे खुदा वों शैतान हुआ तो

यारों बड़े जतन से घर तो सजा लिया
किस्मत मैं रहना बनके मेहमान हुआ तो

नीरज आपकी कलम का पैनापन स्तुत्य है। बहुत अच्छी रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

RAVI KANT का कहना है कि -

नीरज जी,
सही कहा आपने-
सीधे सरल औ सच्चे हो मानते हैं लेकिन
कल गर तुम्हे इसीका अभिमान हुआ तो
*****
तुमने ये तम्बू गहरे क्यों गाड़ लिए हैं
चलने का गर अचानक फरमान हुआ तो

मन को छू गये ये शेर।

पंकज का कहना है कि -

हर एक शे़र लाजवाब है।
क्या बात है।
नीरज की, कहना ही होगा कि गज़ल विधा पर आप की अच्छी पकड़ है।

Anish का कहना है कि -

निरज जी,
बहुत सुन्दर बतया हॆ भावी संभावना को .

शेर अच्छे बन पडे हैं


सस्नेह
अवनीश तिवरी

Soni का कहना है कि -

नीरज जी,
सादर नमस्कार. आपकी रचना बहुत अच्छी लगी. समय के अनुसार भी.
मै वर्तमान में जर्मनी में पदस्थ हूँ और इस ग्लोबल रेसेसन के समय, जब कभी भी भारत बुलावा आ सकता है, आपकी ये पंक्तियाँ बहुत सटीक लगती है
" तुमने ये तम्बू गहरे क्यों गाड़ लिए हैं
चलने का गर अचानक फरमान हुआ तो "

- सोनी, जर्मनी से

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