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Wednesday, October 03, 2007

फिर देखती जाना तुम


क्या प्यार का मौसम था कितना तड़पे थे हम।
मेरे सीने में ग़म तेरे भी दिल में ग़म।।

क्या अश्क की बारिश थी उन चाँदनी रातों में।
तेरी पलकें भीगीं मेरी भी आँखें नम।।

जाते-जाते तेरा मुड़कर पीछे तकना।
तुम भी बिल्कुल बेबस मैं भी एकदम बेदम।।

दिल-ए-जन्नत की अब तक है हूर तू ही जानम।
अब तक तो ना हो पाया रत्ती भर प्यार ये कम।।

ग़र देखना चाहो तुम क्या चीज है दिलदारी।
इक मौका दो मुझको फिर देखती जाना तुम।।

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

पंकज जी,

मुझे उम्मीद है इस गज़ल से अभी आप संतुष्ट नहीं होगे, आपका समय इस गज़ल को चाहिये। यद्यपि संवेदनाओं के स्तत पर आपका यह प्रस्तुतिकरण अच्छा है।

क्या अश्क की बारिश थी उन चाँदनी रातों में।
तेरी पलकें भीगीं मेरी भी आँखें नम।।

*** राजीव रंजन प्रसाद

shobha का कहना है कि -

पंकज जी
गज़ल कुछ खोखली सी लगी । प्रेम पर यदि लिखना हो तो उसमें गम्भीरता लाओ । यह तो छिछोरा सा
लग रहा है । सस्नेह

shivani का कहना है कि -

पंकज जी ,मुझको आपकी ग़ज़ल बहुत पसंद आई !आपकी ग़ज़ल में तड़प है ,दर्द है ,बिछुड़ने का गम है ,प्यार पाने की एक आस भी है !
जाते जाते तेरा मुड़ कर पीछे ताकना
तुम भी बिल्कुल बेबस मैं भी एकदम बेदम !
इन २ लाइनों में बेबसी तो देखते बनती है !बधाई!

RAVI KANT का कहना है कि -

पंकज जी,
प्रवाह में कमी दिख रही है।

दिल-ए-जन्नत की अब तक है हूर तू ही जानम।
अब तक तो ना हो पाया रत्ती भर प्यार ये कम।।

ये कुछ खास नही लगा।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

पंकज जी

'जाते-जाते तेरा मुड़कर पीछे तकना।'
प्रयास चलते रहना चाहिये
शुभकामनायें

रंजू का कहना है कि -

यह शेर बहुत अच्छा लगा पंकज जी ..बाकी ठीक ठीक हैं

क्या अश्क की बारिश थी उन चाँदनी रातों में।
तेरी पलकें भीगीं मेरी भी आँखें नम।।

शुभकामनायें

अजय यादव का कहना है कि -

पंकज जी!
भाव की गहराई तो कम है ही, शिल्प भी कमज़ोर है इस बार. आशा है कि अगली बार आपकी हमेशा की तरह एक बेहतर रचना पढ़ने को मिलेगी!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

यह शे'र तो बिलकुल अवरोध उत्पन्न करता है

दिल-ए-जन्नत की अब तक है हूर तू ही जानम।
अब तक तो ना हो पाया रत्ती भर प्यार ये कम।।

शेष भी आपकी तत्कालीन स्तर को नहीं छूतीं।

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