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Thursday, September 20, 2007

हिंद युग्म साप्ताहिक समीक्षा-९ (सितंबर २१, २००७)


हिंद-युग्म साप्ताहिक समीक्षा : 9
(10 सितम्बर 2007 से 16 सितम्बर 2007 तक की कविताओं की समीक्षा)


मित्रो!

इस बार शैलेश जी ने १३ कविताएँ भेजी हैं, इनमे गीत भी हैं और गजलें भी, प्यार भी है और गुस्सा भी, घर भी है और बाहर भी, क्षण भी है और युग भी, कला भी है और सादगी भी, गुण भी हैं और दोष भी। पर इन सबकी गिनती में क्या रखा है? हमें तो कविताओं का आस्वादन करना है। करें!

१. 'न देखो सच है वो' (राजीव रंजन प्रसाद) समसामयिक यथार्थ को प्रस्तुत करने वाला गीत है। निठारी काण्ड की वीभत्स अमानुषिक घटना इसे पढ़ते हुए याद आती है। वृद्ध माता-पिता के प्रति दुर्व्यवहार ने सचमुच हर घर को रावण का घर बाना दिया है (पर क्या रावण ने कभी अपने पिता को लात मारी थी या माँ को पोते की आया बनाया था? मातृ पितृ द्रोही संतानें रावण से भी भयानक हैं।)। अन्तिम बन्ध में आह्वान की मुद्रा अच्छी बन पड़ी है लेकिन 'खेत ही खेत को चाहिए साथियों पर्बत ढहने' में गति भंग ने प्रभाव को कम कर दिया है।

२. 'कोई मेरे साथ तो है' (मोहिंदर कुमार) के पहले तीन अंश परस्पर सम्बंधित हैं और किसी के मिलने या साथ होने के सुख को व्यक्त करते हैं। तीसरे अंश में मशक्कत और तकदीर का द्वंद्व अच्छा है। अन्तिम अंश में 'ही' ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया।

३. 'अंतर्द्वंद्व' (सीमा कुमार) के पहले दो अंश तीसरे अंश के साथ सहज संबद्ध नहीं लगते। कविताओं को स्फीति से बचना चाहिए-वैसे भी यह ज़माना स्लिम एंड ट्रिम का है। मिथकों का प्रयोग अच्छा बन पड़ा है। प्रश्न रचनाकार के उद्वेग को संप्रेषित कर सके हैं।

४. 'काश मेरे नसीब में' (अनुपमा चौहान) प्रेम की दशाओं को चित्र बद्ध करने वाली ग़ज़ल है। उर्दू की पारम्परिक शब्दावली कोई नयापन पैदा नहीं कर पाई है। चौथे अंश में रदीफ़ 'हो' के बजाय 'हों' हो गया है। और हाँ, यह 'जन्नातें शुरुआत' क्या चीज़ है समझना होगा।

५. 'प्यास में थी मुक्तियाँ(गौरव सोलंकी) की शीर्ष पंक्तियाँ काफ़ी कमजोर हैं इसी तरह तीसरा अंश शेष रचना से उन्नीस पड़ रहा है। यदि इन्हें सुधार लें तो बहुत मज़बूत ग़ज़ल बन जाएगी। सभी अंशों के आरम्भ में एक गुरु या दो लघु मात्राएँ हैं परन्तु छठे अंश में 'जुबां' में लघु-गुरु होने से रचना का प्रवाह खंडित हुआ है। चौथे अंश में वैचित्र्य और सातवें अंश में करूणा ने ग़ज़ल को उठान देने का सफल प्रयास किया है।

६. 'कुछ यूँ ही..भाग २' (रंजाना भाटिया) में दैनिक घरेलू जीवन के चित्र अच्छे हैं। ' प्यार' में उत्प्रेक्षा का प्रयोग आकर्षक है। क्षणिका ४,७,८ में प्रेम के आवेग को अभिव्यक्ति मिली है। 'पगली' की अन्तिम दो पंक्तियाँ अनावश्यक हैं। क्षणिका ११, १२ में संकट ग्रस्त सम्बन्ध और अनिश्चित भविष्य से उपजी असुरक्षा द्रष्टव्य है।

७. 'फूलों की बात' (सजीव सारथी) में संजोग की स्मृतियाँ संजोई गई हैं। 'कभी फाड़ डालूं' का श्रव्य प्रभाव कुछ अच्छा सा नहीं पड़ रहा।

८.'गलत वो हो नहीं सकता ' (अजय यादव) शीर्ष पंक्तियों के अलावा प्रभावशाली ग़ज़ल है। यदि शीर्ष पंक्तियाँ नए सिरे से लिख ली जाएँ तो अच्छा रहेगा।

९. 'होता कभी यूं भी' (मनीष वंदेमातरम्) में मनोरम संभावनाएँ पिरोई गई हैं। अन्तिम अंश निष्कर्ष जैसा है तथा आज के आदमी की निजी ऊब को व्यक्त करता है।

१०. 'शौक' (तुषार जोशी) के पहले दो अंश प्रतीक के कारण काव्यात्मक बन गए हैं इनकी तुलना में तीसरा अंश सपाट होने के कारण कमज़ोर है।

११. 'एक और बुधिया' (विपुल) में 'वो तोड़ती पत्थर' की तरह 'मैं' और 'वह' को आमने-सामने रखा गया है। कथात्मकता और उत्सुकता का निर्वाह तो है लेकिन सघनता की कमी है। शहीद की विधवा वाले अंश में पैना व्यंग्य है।

१२. 'अनंग-सी वो कांता' (विश्वदीपक 'तनहा') में नायिका के रूप को अंकित करने के लिए अनेक उपमानों को एकत्र किया गया है। यह चमत्कारी तो प्रतीत होता है लेकिन रसानुभूति कराने में समर्थ नहीं है.. उपमानों का एकत्रीकरण सौंदर्य सृजन का पर्याय नहीं होता। 'गरल पान भी मधुप है' असाधारण प्रयोग प्रतीत होता है.(मधुप=मधु पीने वाला=भ्रमर)

१३. 'नफरत' (गिरिराज जोशी) में शब्द क्रीड़ा के सहारे उत्तर आधुनिक ग्लोबल दुनिया की त्रासदी का चित्रण किया गया है।

इस बार बहुत संक्षेप में बातें कह दी गयी हैं-अन्यत्र व्यस्तता के कारण। पर कभी कभी कम बोलना भी अच्छा लगता है। इसलिए थोड़े लिखे को ज़्यादा समझें और स्तंभकार के प्रति आत्मीयता बनाए रखें।

आज इतना ही.
'इति विदा पुनर्मिलनाय.'

-ऋषभ देव शर्मा

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदर्णीय ऋषभ देव शर्मा जी,

आभार कि आपने रचना को पसंद किया।

अपनी रचना " न देखो सच है वो..." पर अंतिम बंध "खेत ही खेत को चाहिए साथियों पर्बत ढहने" में सचमुच गति भंग ने प्रभाव को कम कर दिया है। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि एक कवि के तौर पर मैं इन त्रुटियों से कैसे बच सकता हूँ। यह गीत लिखते हुए मैं जिस मनोभावों से गुजर रहा था, उन्होंने एक लय थमा दी थी जिसका सिरा थाम कर यह गीत लिख गया किंतु स्वयं पढते हुए चूंकि मन पर अपनी ही धुन हावी होती है अत: कवि गतिभंग की त्रुटियाँ शीघ्र नहीं पकड पाता...

मैं किस तरह अपनी इन गलतियों को सुधार सकता हूँ।

*** राजीव रंजन प्रसाद

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

नमस्कार ऋषभ देव जी,

क्षमा चाहता हूं पिछले कुछ दिनों से नेट पर बहुत कम आ पाया और अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे पाया. आपके अमुल्य समय के लिये हिन्द-युग्म आप का अभारी है और आप का मार्गदर्शन हमें अपनी त्रुटियों का बोध करा कर और अच्छा लिखने के लिये प्रेरित करता हैं...

रंजू का कहना है कि -

हमेशा की तरह इस बार भी आपकी समीक्षा अच्छी लगी पगली की वही दो पंक्तियां मेरे दिल के बहुत क़रीब हैं :) आपकी बात पर जरुर गौर करुँगी
बहुत बहुत शुक्रिया आपका इतने दिल से इनको पढने के लिए !!
अगली समीक्षा का इंतज़ार रहेगा !!

अजय यादव का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव शर्मा जी!

एक बार फिर प्रभावी समीक्षा के लिये आभार! इसी प्रकार हमारा मार्गदर्शन करते रहें.

RAVI KANT का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,
सम्यक समीक्षा के माध्यम से कविताओं को समझने में सहयोगी होने के लिए धन्यवाद।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

इसे संक्षेप समीक्षा तो कहा जा सकता है, मगर जल्दीबाजी वाला नहीं कहा जा सकता। सटीक समालोचना की है आपने। फिर से शुक्रिया।

सजीव सारथी का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,
इस बार आपकी समीक्षाएं संक्षिप्त अवश्य हैं पर वजनदार भी, बहुत अच्छा लगा

RDS का कहना है कि -

आप सब की सदाशयता पूर्ण टिप्पणियों के लिए मैं आभारी हूँ.

राजीव जी , आप उस पंक्ति को 'खेत ही खेत को साथी चाहिए ये शिखर ढहने' करके देख लें. इससे गति भंग दूर हो जाएगा.आपने १८ मात्राओं के जिस छन्द का चुनाव किया है उसमे ७ मात्राओं के एक सप्तक को ४ बार दुहराया गया है . इस दुहराव में हेर-फेर होने से लय टूट जाती है. इसलिए जहाँ कहीँ गति भंग प्रतीत हो वहाँ मूल धुन को बार बार गुन-गुना कर संदिग्ध पंक्ति की लय सुधारी जा सकती है-
ड डन डन डन / ड डन डन डन / ड डन डन डन / ड डन डन डन
अथवा
ल ला ला ला / ल ला ला ला / ल ला ला ला / ल ला ला ला


रंजू जी, 'पगली' की आपकी प्रिय पंक्ति सच मुच प्यारी है लेकिन जब शीर्षक पगली है तो यह पंक्ति श्कनिका के लिहाज से शीर्षक द्वारा स्वयं ही व्यंजित हो गई है. फिर भी, प्रिय का मोह सहज है इसलिए आप इन् पंक्तियों को ज्यों के त्यों रख सकती हैं.


धन्यवाद सहित
आपका,
ऋषभ देव शर्मा

cmpershad का कहना है कि -

प्रो. शर्माजी की व्यस्तता का अम्दाजा़ तो लगाया ही जा सकता है और अपनी इस व्यस्तता के बावजूद वे समय निकाल कर समीक्षा में कुछ एसे गुर बत्ताते हैं कि समझने और सीखने के लिये पाठ्कों और कवियों को बहुत कुछ मिल जाता है. हम आशा करते है कि प्रो. शर्मा जी आगे बहुत कुछ कहेंगे और बहुत कुछ सिखायेंगे।

tanha kavi का कहना है कि -

आदरणीय ॠषभ देव जी,
आपकी अमूल्य टिप्पणी के लिए आपको हृदय से धन्यवाद। आपने हमारी कविताओं के लिए समय निकाला इसके लिए हम आभारी हैं। आगे भी आप यूँ मार्गदर्शन करते रहें, इसी आस में-

विश्व दीपक 'तन्हा'

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