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Sunday, September 23, 2007

क्षणिकाएँ .............


१) जिन्दगी के कैनवास पर खींच दी है आड़ी-तिरछी रेखाएं,
छिड़क दिए हैं ब्रुश से कुछ रंग....
इस उम्मीद में कि तुम्हारी तस्वीर मुस्करा उठे.....
खैर.....

२) गाँव से ख़त आया है,
पिताजी के पाँव में चोट है,
माँ एक महीने से नही खाती दिन का खाना,
बेटा शहर में तलाश रहा है,
दो बूँद आंसू..........

३) पत्नी ने ऑफिस से घर आते ही ,
मांज दिए हैं सभी बरतन,
पति अभी घर में घुसा ही है,
झल्ला रहा है पत्नी पर.....

४) कल!! एक अतीत;
जैसे रेत पर लिखे कुछ शब्द,
आधे धुंधले,
जैसे साहिल से दूर जाती एक नाव;
जैसे उड़ान को निकल चुकी पतंग;
पहुंच से दूर....
........
जैसे तुम.......

५) दोस्तो से उधार लेकर चल जाते हैं महीने के आखिरी दिन,
तुमने एक हंसी उधार दी थी,
आज तलक साबुत पड़ी है
काश! जिन्दगी का आख़िरी वक़्त
जल्दी से आ धमके....

६) वो चार साल से दिल्ली में है,
बारह बजे सो कर उठता है....
मैं एक साल से दिल्ली आया हूँ,
उठ जाता हूँ अहले सुबह.....
एक ही कमरे में सूरज दोगला हो गया है....

७) सड़क पर जल उठी लाल बत्ती,
एक भूखा, मासूम हाथ काले शीशे के भीतर घुसा,
भीतर बैठे कुत्ते ने काट खाया हाथ,
कब, कैसे पेश आना है,
ख़ूब समझते हैं संभ्रांत कुत्ते...

8) जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,
फिर भी जीते हैं रोज़,
अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,
मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह....

९) खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....

निखिल आनंद गिरि
+919868062333


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17 कविताप्रेमियों का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

गाँव से ख़त आया है,
पिताजी के पाँव में चोट है,
माँ एक महीने से नही खाती दिन का खाना,
बेटा शहर में तलाश रहा है,
दो बूँद आंसू..........

सच ..
कल!! एक अतीत;
जैसे रेत पर लिखे कुछ शब्द,
आधे धुंधले,
जैसे साहिल से दूर जाती एक नाव;
जैसे उड़ान को निकल चुकी पतंग;
पहुंच से दूर....
........
जैसे तुम.......

वाह बहुत सुंदर...

जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,
फिर भी जीते हैं रोज़,
अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,
मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह....

आह काश ये मैंने लिखी होता... निखिल जी हर बार की तरह इस बार भी ... अतिसुन्दर

shobha का कहना है कि -

प्रिय निखिल
क्षणिकाएँ बहुत सफलता पूर्वक लिखीं हैं । सबसे अच्छी बात यह है कि तुम बहुत ही सहज रूप से
अपने अनुभव को वाणी देने लगे हो । विशेष रूप से निम्न पंक्तियों ने प्रभावित किया--
मैं चाहती हूँ कि ये हँसी हमेशा रहे और तुम सारा जीवन हँसते और मुस्कुराते हुए बिताओ ।
आशीर्वाद एवं शुभकामनाओं सहित

shobha का कहना है कि -

) दोस्तो से उधार लेकर चल जाते हैं महीने के आखिरी दिन,
तुमने एक हंसी उधार दी थी,
आज तलक साबुत पड़ी है
काश! जिन्दगी का आख़िरी वक़्त
जल्दी से आ धमके....

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

निखिल जी,

मैं उस क्षण को धन्यवाद देता हूँ, जब आपने क्षणिकाएँ लिखना आरंभ किया।
एक दो साधारण हैं और बाकी सब असाधारण।

जिन्दगी के कैनवास पर खींच दी है आड़ी-तिरछी रेखाएं,
छिड़क दिए हैं ब्रुश से कुछ रंग....
इस उम्मीद में कि तुम्हारी तस्वीर मुस्करा उठे.....
खैर.....

गाँव से ख़त आया है,
पिताजी के पाँव में चोट है,
माँ एक महीने से नही खाती दिन का खाना,
बेटा शहर में तलाश रहा है,
दो बूँद आंसू..........

खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....

ये विशेष पसन्द आई।
क्षणिकाओं की अगली
कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

निखिल जी,


वो चार साल से दिल्ली में है,
बारह बजे सो कर उठता है....
मैं एक साल से दिल्ली आया हूँ,
उठ जाता हूँ अहले सुबह.....
एक ही कमरे में सूरज दोगला हो गया है....
-----------------------------------
खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....
-----------------------------------
जितना आपको पढ रहा हूँ, प्रभावित होता जा रहा हूँ। बहुत स्तरीय क्षणिकायें हैं और बहुत गहरे घाव करनें में सक्षम। आपकी कलम में यही धार बनी रहे इन शुभकामनाओ के साथ...


*** राजीव रंजन प्रसाद

Gita pandit का कहना है कि -

निखिल जी,
वाह ....

जिन्दगी के कैनवास पर खींच दी है आड़ी-तिरछी रेखाएं,
छिड़क दिए हैं ब्रुश से कुछ रंग....
इस उम्मीद में कि तुम्हारी तस्वीर मुस्करा उठे.....

.......
........


कल!! एक अतीत;
जैसे रेत पर लिखे कुछ शब्द,
आधे धुंधले,
जैसे साहिल से दूर जाती एक नाव;
जैसे उड़ान को निकल चुकी पतंग;
पहुंच से दूर....
........
जैसे तुम.......
.....
.....


तुमने एक हंसी उधार दी थी,
आज तलक साबुत पड़ी है
काश! जिन्दगी का आख़िरी वक़्त
जल्दी से आ धमके....


बहुत सुंदर...


शुभकामनाओं सहित

RAVI KANT का कहना है कि -

निखिल जी,
आनंद आ गया क्षणिकाएँ पढ़कर।

जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,
फिर भी जीते हैं रोज़,
अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,
मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह....

ये बहुत पसंद आई।

tanha kavi का कहना है कि -

दोस्तो से उधार लेकर चल जाते हैं महीने के आखिरी दिन,
तुमने एक हंसी उधार दी थी,
आज तलक साबुत पड़ी है
काश! जिन्दगी का आख़िरी वक़्त
जल्दी से आ धमके....


भीतर बैठे कुत्ते ने काट खाया हाथ,
कब, कैसे पेश आना है,
ख़ूब समझते हैं संभ्रांत कुत्ते...

मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह....

खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....

बहुत हीं सुंदर क्षणिकाएँ हैं निखिल जी। सारी असाधारण हैं। जिंदगी का रहस्य घुला है इनमें। आप तो कविता के हर विधा में माहिर होते जा रहे हैं। अगली बार भी आपसे कुछ नया सुनने की आस में-

विश्व दीपक 'तन्हा'

Seema Kumar का कहना है कि -

सभी क्षणिकाएँ अच्छी हैं । सोचने पर मजबूर करती हैं ।

३) पत्नी ने ऑफिस से घर आते ही ,
मांज दिए हैं सभी बरतन,
पति अभी घर में घुसा ही है,
झल्ला रहा है पत्नी पर.....

यह विषय अच्छा है.. आज के संदर्भ में भी है । इस विषय पर और थोड़ा लिखने की कोशिश करें और कुछ अपने नए अंदाज़ में ... ।

- सीमा कुमार

कुमार आशीष का कहना है कि -

खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....
अद्भुत मगर शाश्‍वत प्रेरणास्रोत।

आलोक शंकर का कहना है कि -

निखिल ,
क्षणिकाओं में तुम्हारा प्रयास अत्यंत सफ़ल है ।
जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,
फिर भी जीते हैं रोज़,
अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,
मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह...

आगे भी इस तरह के प्रयोग करते रहें ।

विपुल का कहना है कि -

आपकी लेखनी को नमन ... सचनुच सारी की सारी क्षणिकाएँ असाधारण हैं जिन्दगी को नज़दीक से देखती और व्यक्त करतीं ...
अधिक कहने को कुछ बचा नही ऊपर संब कुछ कहा जा चुका है |
अंतिम वाली बहुत ही ज़्यादा पसंद आई !

खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....

Avanish Gautam का कहना है कि -

8) जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,
फिर भी जीते हैं रोज़,
अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,
मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह....

..अन्य क्षणिकाओं के बरक्स यह सधी संयत और अच्छी क्षणिका है.

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

निखिलजी,

सभी क्षणिकाएँ बहुत ही खूबसूरत है, मज़ा आ गया।

१) जिन्दगी के कैनवास पर खींच दी है आड़ी-तिरछी रेखाएं,
छिड़क दिए हैं ब्रुश से कुछ रंग....
इस उम्मीद में कि तुम्हारी तस्वीर मुस्करा उठे.....
खैर.....

४) कल!! एक अतीत;
जैसे रेत पर लिखे कुछ शब्द,
आधे धुंधले,
जैसे साहिल से दूर जाती एक नाव;
जैसे उड़ान को निकल चुकी पतंग;
पहुंच से दूर....
........
जैसे तुम.......

५) दोस्तो से उधार लेकर चल जाते हैं महीने के आखिरी दिन,
तुमने एक हंसी उधार दी थी,
आज तलक साबुत पड़ी है
काश! जिन्दगी का आख़िरी वक़्त
जल्दी से आ धमके....


७) सड़क पर जल उठी लाल बत्ती,
एक भूखा, मासूम हाथ काले शीशे के भीतर घुसा,
भीतर बैठे कुत्ते ने काट खाया हाथ,
कब, कैसे पेश आना है,
ख़ूब समझते हैं संभ्रांत कुत्ते...

8) जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,
फिर भी जीते हैं रोज़,
अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,
मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,
रद्दी की तरह....

९) खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....

सभी एक से बढ़कर एक, बहुत ही सुन्दर... अगले रविवार की प्रतिक्षा रहेगी निखिलजी।

Gauhar का कहना है कि -

७) सड़क पर जल उठी लाल बत्ती,
एक भूखा, मासूम हाथ काले शीशे के भीतर घुसा,
भीतर बैठे कुत्ते ने काट खाया हाथ,
कब, कैसे पेश आना है,
ख़ूब समझते हैं संभ्रांत कुत्ते...


यही एक अ नुभव है जिसकी अभिव्यक्ति भी अत्यन्त सटीक है।
मेरी बधाई स्वीकार करें
धन्यवाद

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मुझे सारी क्षणिकाएँ असाधारण लग रही है। कम धार- अधिक धार का होना एक साथ देखने की प्रक्रिया के परिणाम हो सकते हैं, लेकिन किसी भी एक क्षणिका को स्वतंत्र करके पढ़ें, महसूस करें तो असीम आनंद मिलेगा। कितना सुखद है कि हिन्द-युग्म पर ऐसी क्षणिकाएँ लिखी जा रही हैं, जैसी हिन्दी-साहित्य कम ही मिलती हैं! क्षणिकाओं को हमारे कवि और माँजें।

एक मैं भी उद्धृत करता चलूँ-

खचाखच भरी बस,
बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,
मैं सोचता हूँ-
ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है.....

अभिनव का कहना है कि -

बहुत सुंदर, आपको आगे और पढ़ने की इच्छा मन में जगी है।

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)