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Wednesday, August 22, 2007

गज़ल




सफर कटता रहा नजारे गुजरते रहे
निगाहें बोझिल हुईं हम सोचते रहे

इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में
दामन को अश्कों से निचोडते रहे

आहटें कुछ सुनी झोके वो धूल के
बाबस्ता दरीचे दिल के खोलते रहे

गुबार सन्नाटों में कहाँ निकालते
बेखुदी में एक आस खरोचते रहे

वफा ही वफा थी हर तरफ घेरे
हाथ थामने वाले ही कुचलते रहे

मैं ज़र्ब गज़ल उस शायर की जिसे
अधूरी लिख कर वो गुनगुनाते रहे

हम अपना आशियाना कहाँ बसाते
उसके घर के पते ही बदलते रहे

पानी से भरी पलकों को झुकाकर
आँखों के मिजाज़ सम्भलते रहे

वो समझे इन्तेख्वाब नहीं उनका
हम जो दिन रात उनमें ढलते रहे

जान बाकी है ज़ुम्बिश भी बदन में
लाजमी है कि थोडा यूँ मचलते रहे

इश्क़ के मारे सुकून तलाशें दरबदर
तेरी रहगुजर है मंजिल,सो चलते रहे


************अनुपमा चौहान**********

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

अनुपमा जी,
आरंभ बहुत अच्छा है और कुछ शेर बहुत भावुक कर देते हैं।
मसलन
इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में
दामन को अश्कों से निचोडते रहे

आहटें कुछ सुनी धूल के झोकों की
बाबस्ता दिल के दरीचों को खोलते रहे

वो समझे ऐतबार नहीं करते उनका
हम हैं कि दिन रात उनमें ढलते रहे

भाव तो हर शेर में ही लाजवाब हैं, लेकिन गज़ल की परिभाषा के हिसाब से देखा जाए तो शिल्प में बहुत कमियाँ हैं।
जैसे कहीं अंत सोचते से हो रहा है, कहीं कुचलते से, कहीं गुनगुनाते से।
गज़ल लिखते हुए यही मुश्किल होती है। भविष्य में कोशिश करें कि जब भी गज़ल लिखें, रदीफ़ और काफ़िये का ध्यान रखें। बाकी आप लिखती बहुत अच्छा हैं ही।

Kavi Kulwant का कहना है कि -

अच्छा लगा.. अनुपमा जी..

shobha का कहना है कि -

अनुपमा जी
गज़ल विधा एक अच्छी विधा है । इसमें भावों की अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर होती है ।
मझे इस गज़ल में कुछ खास आनन्द नहीं आया इसका कारण मेरी अल्पग्यता भी
हो सकती है ।

रंजू का कहना है कि -

जान बाकी है अभी मरने से पहले
लाजमी है कि थोडा यूँ मचलते रहे

मोहब्बत के मारे सुकून तलाशें दरबदर
तेरी रहगुजर है मंजिल, सो चलते रहे


बहुत ख़ूब लिखा है अनुपमा जी .कुछ शेर बहुत अच्छे लगे

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अनुपमा जी,
आपकी शायरी मे गहरायी बहुत होती है। आपसे हमेशा मुझे कभीर कथ्य मिला है और मैं आपकी सोच से बहुत प्रभावित हूँ। असाधारण पंक्तियाँ हैं:

इतने सन्नाटों में गुबार कहाँ निकालते
बेखुदी में इक आस को खरोचते रहे

मैं गज़ल उस शायर की जिसे
अधूरी लिख कर वो गुनगुनाते रहे

*** राजीव रंजन प्रसाद

रचना सागर का कहना है कि -

गज़ल के व्याकरण की मुझे अधिक जानकारी तो नहीं है किंतु जब आप इतने अच्छे भावों को व्यक्त कर सकती है तो यदि उसे उसके व्याकरण मे लिखेंगी तो और निखर जायेगा। आपकी गज़ल काबिल-ए-तारीफ है।

RAVI KANT का कहना है कि -

अनुपमा जी,
शिल्प की थोड़ी कमी है पर भाव इतना सुन्दर कि इसे महसूस नही होने देता।

इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में
दामन को अश्कों से निचोडते रहे

अपने आशियाने को क्या ढूँढते
उसके घर के पते ही बदलते रहे

एक-एक शेर में सागर सी गहराई है।

Avanish Gautam का कहना है कि -

..कुछ शेर अच्छे बन पडे है..थोडी मेहनत और करेंगी तो बात बन जायेगी.

Anonymous का कहना है कि -

iss baar kaafi acchaa likhaa hai,
Anupamaa.

अजय यादव का कहना है कि -

अनुपमा जी!
गज़ल के लिहाज़ से रचना में कई खामियाँ हैं. इन पर कुछ मेहनत करेंगी तो बहुत अच्छी गज़ल लिख पायेंगीं. भाव तो आपके हमेशा ही अच्छे होते हैं.

विपिन चौहान "मन" का कहना है कि -

अनुपमा जी..
गज़ल के भाव बहुत अच्छे लगे..
ये सही है कि गज़ल शिल्प की द्रष्टि से थोडी कमजोर रही है..
बाकी गज़ल की जो गहराई है वो प्रभावशाली है..
आभार

tanha kavi का कहना है कि -

खूबसूरत गज़ल( कह दूँ गज़ल ? ) है अनुपमा जी।बहुत दिनों के बाद आपकी इतनी बड़ी रचना पढने को मिली। कई सारे मिसरे दिल में उतर गए हैं, मसलन-
इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में
दामन को अश्कों से निचोडते रहे

वफा ही वफा थी हरसू घेरे बस
हाथ थामने वाले ही कुचलते रहे

वो समझे ऐतबार नहीं करते उनका
हम हैं कि दिन रात उनमें ढलते रहे

मोहब्बत के मारे सुकून तलाशें दरबदर
तेरी रहगुजर है मंजिल, सो चलते रहे

पुख्ता शेर हैं सारे। बस शिल्प पर थोड़ा और मेहनत चाहिए। रदीफ, काफिया, बहर सब छ्ट्पटा रहे हैं। उन्हें तरीके से सजाइये, खुश हो जाएँगे वो ।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

kamlesh का कहना है कि -

bahut khub likha hai apne...
ye sab samanya soch ki upaj nahin..dimaag ko bahut ekagra karna padta hai aisa likhne ke liye...kalpanik viranon mein jaake sansein leni padti hai...tab jaake..aise bhav milten hai..aur fir unko shabdon mein pirona...
bahut khub..

likhti rahiye...

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अनुपमा जी,

ग़ज़ल लिखने के बाद खुद से यह समीक्षा करनी चाहिए कि क्या ग़ज़ल के सभी शे'र बराबर वज़नी हैं? ग़ज़ल के प्रत्येक शे'र आमतौर पर अलग-अलग ही भाव संप्रेषित करते हैं, इसलिए शे'रों की संख्या को कम-अधिक करने में कोई बुराई नहीं है। तथा इस बात का ध्यान देना आवश्यक है कि ग़ज़ल समान स्वरांत हों।

कुछ शे'र जो पसंद आये-

इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में
दामन को अश्कों से निचोड़ते रहे

अपने आशियाने को क्या ढूँढते
उसके घर के पते ही बदलते रहे

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