फटाफट (25 नई पोस्ट):

Monday, August 13, 2007

मुहिम


एक अकथ कहानी
मेरी जुबानी
कथ्य तुम्हारे ही हैं
किन्तु तथ्य तो मेरे ही हैं-
लपटों के घेरे में नारी को देखा है
दाँव पर लगते भी नारी को देखा है
अग्नि परीक्षा भी तो नारी की ही होती है
कभी तुमने सोचा है? गौर किया है ?
सदियों से ऐसा होता है ,
तो ऐसा होता क्यों है ?
जिन ममत्व से भरपूर सीने से लग कर
निश्चिंत हो ली थी पहली अंगड़ाई
क्यों उसको विस्मृत कर
लांछित किया नारी को
राम की आदर्शवादिता
क्यों सीता पर ही केन्द्रित थी
दुर्योधन की कुटिल चालें
क्यों द्रोपदी पर ही केन्द्रित थी
दहेज लोलुपता के जाल में
क्यों नारी ही फँसती है
पुरुष सोचा कभी ?
कितना पुरुषोचित ये कार्य किया?
सृजनहारी को अबला बना कर
असहाय करार किया
कुछ भी हो,
लेकिन तुम ये सोच नहीं पाओगे
तुम्हारी सोच का दायरा अवलम्बित है-
तुम्हारे झूठे स्वाभिमान पर ,
दम्भ पर और तुम्हारे ही द्वारारचित,
सम्पादित, प्रतिपादित
नारी विरोधी मुहिम पर ।

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

18 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अनुराधा जी,

सर्व प्रथम तो हिन्द युग्म पर आपका स्वागत है।
आपके प्रश्न बहुत गंभीर हैं और पुरुष के दंभ पर वह चोट करनें में सक्षम हैं जिसकी पृष्ठभूमि में आपने यह रचना लिखी है।

राम की आदर्शवादिता
क्यों सीता पर ही केन्द्रित थी
दुर्योघन की कुटिल चालें
क्यों द्रोपदी पर ही केन्द्रीत थी
दहेज लोलुपता के जाल में
क्यों नारी ही फँसती है
पुरुष सोचा कभी ?

कविता के अंत से भी मेरी सहमति है:-

लेकिन तुम ये सोच नहीं पाऒगे
तुम्हारी सोच का दायरा अवलम्बित है-
तुम्हारे झूटे स्वाभिमान पर ,
दम्भ पर ऒर तुम्हारे ही द्वारारचित,
सम्पादित, प्रतिपादित
नारी विरोधी मुहिम पर ।

तथापि मैं आपके तेवरों से प्रभावित हो कर यह जोडना चाहता हूँ कि कथ्य और बिम्बों के पुराने होने से यह तो अवश्य सिद्ध हुआ कि समस्या पुरातन है किंतु आज के तर्क को भी एक बिम्ब स्थापित करता तो आप अपनी बात को दोनों कालों से भली प्रकार जोड पातीं। केवल दहेज से सारे प्रश्न नहीं आये बजाये इसके कोई एसा बिम्ब जो कई बातों को एक ही जगह कह सके...

*** राजीव रंजन प्रसाद

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

अनुराधा जी,
हिन्द-युग्म परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है.
सारगर्भित रचना है आपकी.. पुरातन परिवेश में तो एक दम सटीक बैठती है.. परन्तु समय बदल रहा है, विचार बदल रहे हैं... नारी परिवेश बदल रहा है.. अब अधिकतर पुरूष पत्नीब्रता हो गये हैं बहुत सी माताओं का यही विचार है.. नारी हर क्षेत्र में पुरुषों से कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही है...साथ ही शायद पुरूष नारी के इतने दुशमन नही जितनी नारी ही नारी दुशमन है..
विचार कीजियेगा... शतप्रतिशत नही तो कुछ सच्चाई जरूर मिलेगी मेरे तथ्यों में

रचना सागर का कहना है कि -

सशक्त कविता है। आपके युग्म पर आनें से नारी विचारों को हिन्दयुग्म पर आयाम मिलेगा।

रंजू का कहना है कि -

हिन्द युग्म पर आपका स्वागत है अनुराधा जी,
बहुत ही सवालों और सोचने पर विवश करती है आपकी यह रचना .....

लेकिन तुम ये सोच नहीं पाऒगे
तुम्हारी सोच का दायरा अवलम्बित है-
तुम्हारे झूटे स्वाभिमान पर ,
दम्भ पर ऒर तुम्हारे ही द्वारारचित,

यह पंक्तियाँ बहुत कुछ कह गयी...

Sanjeet Tripathi का कहना है कि -

ह्म्म, सोचने पर मजबूर करती हुई रचना!!!
पर दिक्कत यह है कि जब तक हम एक पुरुष के या स्त्री के नज़रिए से इस समस्या को देखेंगे तब तक इस का हल मिल पाना मुश्किल है, क्योंकि इसका जवाब सिर्फ़ और सिर्फ़ "हम" मे छिपा हुआ है लेकिन पुरुषोचित अहं और नारीवादी अहं यह दोनो मिलकर हम बनने ही कहां देते हैं!!

Anupama Chauhan का कहना है कि -

aachi hai kavitaa

shobha का कहना है कि -

अनुराधा जी
आपने एक ऐसा विषय लिया है जिस पर बरसों से लिखा जा रहा है ,
सोचा जा रहा है किन्तु किया कुछ नहीं जा रहा । वर्ष में दो बार देवी का
आह्वान करने वाले इस देश की विचारधारा में परिवर्तन नहीं आया ।
काश समाज की आँखे खुलें और नारी अपना वही स्थान पाए जिसकी
वह अधिकारिणी है । एक प्रश्न परोसने के लिए बधाई ।

अजय यादव का कहना है कि -

अनुराधा जी!
युग्म पर आपका स्वागत है. इस रचना में आपने बहुत गंभीर प्रश्न उठाया है. आज भी स्त्री कोवह सम्मान नहीं मिल पाया है, जिसकी कि वह वास्तव में अधिकारिणी है. परंतु इसके लिये केवल कोई व्यक्ति या वर्ग विशेष ज़िम्मेदार नहीं है, अपितु हमारे समाज में व्याप्त पुरुषवादी सोच ही इसके मूल में है. और यह सोच सिर्फ पुरुषों में ही नहीं वरन अधिकाँश महिलाओं में भी बहुत गहरे तक बैठी हुई है. शायद यही कारण है कि आज भी महिलाओं की प्रतारणा में महिलाओं का भी हाथ पाया जाता है.
कविता अपने उद्देश्य में सफल है.

ग़रिमा का कहना है कि -

लेकिन तुम ये सोच नहीं पाओगे
तुम्हारी सोच का दायरा अवलम्बित है-
तुम्हारे झूठे स्वाभिमान पर ,
दम्भ पर और तुम्हारे ही द्वारा रचित,
सम्पादित, प्रतिपादित
नारी विरोधी मुहिम पर ।

जी यह बात सही कही आपने... हम आप कितना भी कह लें पर हमारी बात इनके समझ मे ही नही आयेंगी... ।
कविता तीखी और बढिया बनी है... बधाई।

RAVI KANT का कहना है कि -

अनुराधा जी,
सोच को एक दिशा देने के लिए साधुवाद लेकिन क्षमाप्रार्थी हुँ कि कहीं-कहीं पर कविता मे मुझे पूर्वाग्रह पीड़ा की झलक मिलती है जैसे-
"लेकिन तुम ये सोच नहीं पाओगे
तुम्हारी सोच का दायरा अवलम्बित है-
तुम्हारे झूठे स्वाभिमान पर ,
दम्भ पर और तुम्हारे ही द्वारारचित,
सम्पादित, प्रतिपादित
नारी विरोधी मुहिम पर ।"

वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में ये पंक्तियाँ पूरी तरह सही नहीं लगतीं।

विपुल का कहना है कि -

अनुराधा जी आपका स्वागत है हिंद-युग्म पर |
कविता अच्छी है |आपके भाव, आपका लक्ष्य,शब्द चयन और बाक़ी सभी कुछ बहुत ही अच्छा है | परंतु ना जाने क्यों ऐसा लग रहा है की बहुत ही ज़्यादा भावुकता में यह कविता लिखी गयी है|
राजीवजी और मोहिंदर कुमार जी की बात से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ | कुछ नये बिंब और नया प्रस्तुतीकरण होता तो कविता ज़्यादा मारक हो जाती |
वैसे एक बात और है जिस पर ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा ...
आपकी कविता मैं एक पंक्ति है :--

"राम की आदर्शवादिता
क्यों सीता पर ही केन्द्रित थी"
इस पंक्ति से मेरी घोर असहमति है | आप भी यदि ध्यान से सोचे तो पता चलेगा की राम की आदर्शवादिता सिर्फ़ सीता के लिए नही थी मेरे विचार से इस बात पर ज़्यादा तर्क देने की ज़रूरत नही |
मेरे विचार मैं कवि को सजग होना चाहिए अपने बिंबों और उपमाओं के लिए ख़ासकर यदि वो किसी पौराणिक पात्र से संबंध रखती हो तो कुछ ज़्यादा ही |

वैसे आपका कविता सोचने को विवश करती है , सार्थक कविता के लिए बधाई !

Anonymous का कहना है कि -

आपका स्वागत है

हा ! वही पुराना घिसा पिटा पुराना .. बस कुछ नये शब्दों का तड़का लगा परोस दिया गया। कब तक लोग वही पुराने डोल पीटते रहेंगे।

लेखन में कुछ नूतन विचार लायें।

मंगलकामनायें।

Anonymous का कहना है कि -

"राम की आदर्शवादिता
क्यों सीता पर ही केन्द्रित थी"

१. विपुल ने ठीक कहा है, ज़रा उनकी बात पर गौर करें।

२. राम का चरित्र ठीक से पढ़ें। वे अगर कहीं आपको आदर्शवादि दिखेंगे तो सब के लिये, और अगर उनका चरित्र संदेहजनक या अस्पष्ठ भी हो तो वह सब के लिये। उससे पुरुष, स्त्रि दोनो ही प्रभावित हैं।

३. राम का चरित्र मात्र एक चरित्र ही है किसी राजा रानी की कहानी का। और उसही कहानी में एक और चरित्र है ’कैकेयी’। जो कि पूरी कहानी का आधार है।

४. देखा यह गया है, ऐसे विषयों पर महिलायें आगे बड़ बड़कर तालिया बजाती हैं और पुरुष सदा विरोध करते हैं। वे दावा करती हैं "ये लोग कभी नहीं समझेंगे" और वे कहते हैं "काल, परिस्तिथियों पर ध्यान दें, तभी कुछ कहें"।

और मेरे खयाल से ’सैक्स बायेज़ड़’ ना हो कर अगर आप मनव को मानव के रूप में देखें तो वही उचित है। यह सब व्यर्थ की बातें हैं पर आप फिर भी लिखनें को स्वतंत्र है जो कि आपका अधिकार भी है एक मानव होने के ही करण। किन्तु लेखन का धेय्य क्या है यह कवि को स्पष्ट होना चाहिये। अगर वह धेय्य नारी का कल्याण है तो उतसाह वर्धक लिखें।

piyush का कहना है कि -

कविता तो मुझे अच्छी ही लगी पटा नही क्यूं पर कुछ सीमा तक मै भी राजीव जी और मोहिंदर जी की बातों से सहमत हून.........पर पूर्णत: नही...........
और जहाँ तक राम की बात है तो वे उस काल मे सही थे........
पर आज के कल मे नही सो आपने कोई ग़लत कार्य नही किया
आप के भाव भी परिपक्व है तथा शिल्प भी श्रेष्ठ है
आनंदित हुआ पढ़ कर............
धन्यवाद

anuradha srivastav का कहना है कि -

सबसे पहले मैं आप सभी की आभारी हूं जिन्होंने अपनी अमूलय राय दी ।
राजीव जी मैं आपकी बात से सहमत हूं कि नवीन संदर्भ में नया कुछ नहीं है
सिवाय दहेज के । पर दूसरी तरफ मानसिकता ,स्रियों की दशा व समस्यायें मूलतः
वहीं हैं । हाँ-थोडा दिखावा होने लगा है समान अधिकार ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
के नाम पर । पर कितना कुछ बदला है ये सब जानते है ।
मोहिन्दर जी महानगरीय जीवनशैली की बात छोड दीजिये तो पायेगें कि
निम्न मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय सबसे ज्यादा कुल परम्परा और मर्यादा के नाम पर
के नाम पर नारियों का शोषण करते हैं । यहां परिवर्तन अपेक्षित हैं ।
संजीत जी 'नारी'नाम है समर्पण का । जब परुषोचित अहम दरकिनार करेंगें तब ही तो
'हम ' बन पायेगा ना ।
रविकान्त जी यदि इसे पूर्वाग्रह का नाम देते हैं तो भी गलत नहीं होगा । बचपन से
आज तक समाज में व्याप्त विसंगतियों और नारी के लिये दोयम दर्जे की मानसिकता कचिटती
रही है ।
विपुल जी सही कहा -भावुकता ही वो शक्ति है जो लिखने को प्रेरित करती है ।
ध्येय नारी की वस्तुस्तिथि से अवगत कराना मात्र है ।शायद मानसिकता में
कुछ परिवर्तन आ पाये । रही बात पौराणिक संदर्भों की तो भविष्य में सावचेत रहुंगी ।
धन्यवाद ।

आलोक शंकर का कहना है कि -

राम की आदर्शवादिता
क्यों सीता पर ही केन्द्रित थी
दुर्योघन की कुटिल चालें
क्यों द्रोपदी पर ही केन्द्रीत थी
दहेज लोलुपता के जाल में
क्यों नारी ही फँसती है
पुरुष सोचा कभी ?
हिन्द युग्म पर आपका स्वागत है । कविता का विषय और सवाल बहुत गंभीर हैं ।पर आपको नहीं लगता कि कविता को मात्रायें हटा कर लिख दिया जाये तो वह सिर्फ़ कथ्य लगेगी ? पर आपने बहुत अच्छ लिखा है , प्रस्तुति पर थोड़ा ध्यान दें तो रंग जम जाये ।
यह सिर्फ़ मेरा सुझाव है , कृपया अन्यथा न लें

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

आपके आगमन की कविता बहुत गंभीर है। आरंभ तो बहुत ही अच्छा किया है।
एक अकथ कहानी
मेरी जुबानी
कथ्य तुम्हारे ही हैं
किन्तु तथ्य तो मेरे ही हैं-

हाँ, आगे कहीं कहीं कविता हल्की सी कमजोर भी हो जाती है और पुरुषों को ही सब बुराइयों का जिम्मेदार कहने लगती है। वैसे यह बहुत हद तक सच भी है, लेकिन पूरा नहीं।
अंत भी आरंभ जितना ही सुन्दर है।
तुम्हारी सोच का दायरा अवलम्बित है-
तुम्हारे झूठे स्वाभिमान पर ,
दम्भ पर और तुम्हारे ही द्वारारचित,
सम्पादित, प्रतिपादित
नारी विरोधी मुहिम पर ।
अगली रचना की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।
साथ ही क्य आपको नहीं लगता कि हम सब नारी विमर्श पर आजकल ज्यादा ही काम कर रहे हैं?
अच्छे शगुन हैं...

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

देखिए,

कविता के कथ्य में नयापन न हो, लेकिन जो बात कही जा रही है उसकी इतनी भूमिका हो कि पल भर के लिए ही सही पढ़ने वाला सहमत हो जाये। इससे बड़ी-बड़ी चर्चा तो स्कूल-कॉलेज के बच्चे बात-बात में करते हैं।

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)