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Friday, August 10, 2007

साप्ताहिक समीक्षा : 10 अगस्त 2007 (शुक्रवार)



साप्ताहिक समीक्षा - 3
(30 जुलाई 2007 से 5 अगस्त 2007 तक की कविताओं की समीक्षा)

'हिंद युग्म' के सहयोगी रचनाकारों और पाठकों के प्रति स्तंभकार आभारी है। उसे कई ऐसे भारी-भरकम प्रशंसात्मक शब्दों से नवाजा गया जिन्हें संभालना उसके लिए शायद बहुत आसान नहीं है। उसे याद है कि वह मार्गदर्शक या आलोचक नहीं है, पाठक भर है। उसकी टिप्पणियाँ आपकी रचनाओं के बहाने कहीं न कहीं आत्मालोचन भी है। यदि उसके कथन में कोई शक्ति दिखाई दे तो यह आप सबके स्नेह का ही चमत्कार होगा। अन्यथा "कबित बिबेक एक नहिं मोरें/सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें।" (तुलसी)। सच मानिएगा, प्रशंसा झेल पाना आसान नहीं है। प्रशंसा हमारे दायित्व को और बढ़ा देती है न !

'साप्ताहिक समीक्षा' के दूसरे अंक में 'विसंगति' के उल्लेख को अलग-अलग मित्रों ने अलग-अलग अर्थ में ग्रहण किया है। हमारा कहना यह है कि 'विसंगति' को आक्षेप की तरह नहीं, विशेषता की तरह रेखांकित किया गया था। स्तंभकार की धारणा है कि जब तक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार नहीं किया जाता, उनसे त्रस्त साधारण आदमी के क्रोध को सटीक अभिव्यक्ति नहीं दी जाती, तब तक आज की कविता का लक्ष्य पूरा नहीं माना जाना चाहिए। हम सब कलमकारों को अपने आपसे पूछना होगा कि इस रचनाधर्मिता का निर्वाह करने में हमारी कविता कहाँ तक समर्थ है। आज की कविता को आत्मरति और मनोरंजन का माध्यम भी नहीं बनना चाहिए। मानवविरोधी शक्तियों के विरुद्ध अलख जगाने के लिए उसे मनुष्यता के पक्ष में खुलकर खडा होना होगा। 'शिवेतरक्षतये' अर्थात अशिव की क्षति का उद्देश्य पूरा करके ही कविता लोकमंगल की साधना का पर्याय बन सकती है, अन्यथा कविता करना भी वाक्-विलास और व्यसन भर बनकर रह जाएगा। हमें स्मरण रखना होगा कि "कविता जीवन के सर्वाधिक निकट स्थापित वह प्रकाश-पुंज है, जिससे प्रत्येक मनुष्य को संचेतना मिलती है। युग जीवन को अपने में समेटना, समय के सत्य को पकड़ना, मनुष्य को बिना किसी लाग-लपेट के संबोधित करना, प्रकाश और उष्णता की संघर्षशील संस्कृति की स्थापना करना और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दायित्व-बोध का विकास करके क्रांति की भूमिका तैयार करना कविता का दायित्व है।"
(तेवरी काव्यांदोलन के घोषणापत्र से)

खैर! आइए, अब इस सप्ताह की कविताओं पर चर्चा आरंभ की जाय।
इस सप्ताह हमारे समक्ष दस कवियों की विविधवर्णी रचनाएँ प्रस्तुत हैं। सभी एक से एक ऊर्जावान और एक से एक संभावनाशील।

पहली रचना के रूप में प्रस्तुत राजीव रंजन प्रसाद की क्षणिकाएँ उनके कवि के सार्मथ्य का प्रमाण हैं। उनकी उक्तियों में व्यंग्य-शक्ति निहित है। 'पहाड़ - 5' की प्रश्न मुद्रा विचारोत्तेजक है। 'पहाड़-6' के निष्कर्ष 'इस पहाड़ में दिल रहता है' को कई प्रकार से व्याख्यायित किया जा सकता है। यही प्रतीक की ताकत है। हाँ, 'जानम' इस सारी अभिव्यक्ति के गांभीर्य पर क्षेपक सा प्रतीत होता है।

इस सप्ताह के दूसरे कवि मोहिंदर कुमार की रचना मिथ्याबोध के प्रारंभिक अंश में पर्वत-शिखर का तनना और चुलबुली सूर्य-किरण का सफेद बर्फ को टटोलना आकर्षक बिंब बनाते हैं। आगे धारा के नदियों से संगम वाला अंश भी अर्थपूर्ण है। यदि धारा को रूपक की तरह समझा जाए तो नदी का महानदी होना मातृत्व का भी बोध कराता है। लेकिन यह रूपक आगे नहीं चल पाता और कविता अभिधामूलक बनकर जलप्रदूषण की चर्चा करने लगती है। रूपक को अगर खींचें तो आधुनिकता के मोह का अर्थ इससे प्राप्त किया जा सकता है जिसके कारण उजला जल भी सियाह सा लगने लगा है। इसके बाद कवि पर उपदेशक हावी हो जाता है और वह गति का प्रत्याख्यान करने लगता है। अंतिम दो अंश नदी के अवरोह की भांति ही कविता के अवरोह को द्योतित करते हैं तथा अंतिम पंक्ति नियतिवाद की स्थापना कर विलीन हो जाती है। यदि नियतिवाद की स्थापना ही कवि का ध्येय है तो कविता सफल है!

इस बार के तीसरे कवि पंकज ने गजल लिखने की कोशिश की है - नहीं तो जान चली जाती है गजल के व्याकरण का इस रचना में तनिक भी पालन नहीं किया गया है। शीर्ष पंक्तियाँ 'पे मुझको हैसी आती है' को रदीफ तथा नादानियों / खामियों को काफिये के रूप में स्थापित करती है, परंतु आगे इनका निर्वाह नहीं किया गया है। छंद भी आरंभ से ही असंतुलित हो गया है। इतनी सी बात तो गजल लिखने के ख्वाहिशमंदों को याद रखनी ही चाहिए कि गजल की हर पंक्ति में उसी छंद को दुहराया जाता है जिसमें प्रथम शीर्ष पंक्ति रची गई हो। चलिए, अगर यह भी मान लें कि 'आती है' रदीफ और हँसी/फॅसी काफिया है, तब भी बीच में रदीफ 'जाती है' बन गई है। अब कहा जाएगा कि 'है' रदीफ है और 'आती/जाती' काफिया। शायद ऐसा ही है वरना हँसी/फँसी/सही/सुनी/चली के साथ 'नहीं' का तुक न बिठाया जाता। और हाँ, 'दिलबर-ए-बेदर्द' तो वाकई चमत्कारी सहप्रयोग है!

चौथी कविता के रूप में उपस्थित गौरव सोलंकी की रचना लड़कियाँ अच्छी बन पडी है। इस कविता में शैलीय उपादानों का सुंदर प्रयोग द्रष्टव्य है। जैसे 'लड़कियाँ' और 'लड़के' से संबंधित विविध अंशों में समांतरता है। उनकी वर्गीय विशिष्टताएँ परस्पर द्वंद्व की सृष्टि करती हैं। 'लड़कियाँ/जो लड़कों के जन्म .... छटपटाती हैं' अंश में वर्तमान काल की क्रियाओं के प्रयोग से स्त्री होने की त्रासदी की सतत वर्तमानता ध्वनित होती है। 'लड़कियाँ पेड़ हैं' से 'छोड़ दी जाती हैं' के सभी तीन-तीन पंक्तियों वाले अंश समान्तरित तो है ही, हर अंश की तीसरी पंक्ति कष्ट और पीड़ा का पाठ रचती है जिसे दूसरी पंक्ति की विवशता और अधिक सघन करती है। हर अंश की दूसरी-तीसरी पंक्ति में अर्थगत अंतर्विरोध तनाव द्वारा कविता के प्रभाव को बढ़ाता है। 'लड़कियों से कहो' से अभिव्यक्ति पद्धति में विपथन दिखाई देता है क्योंकि इससे पूर्व कविता विवरण की स्थिति में है जबकि यहाँ से उसमें उद्बोधन की गति आई है। इसके बाद की चार पंक्तियाँ नारे जैसी प्रतीत होते हुए भी व्यंजनापूर्ण काव्यपंक्तियाँ हैं। इसी प्रकार 'उन्हें सिखाओ' से आरंभ होने वाला अंतिम अंश पूरी कविता की मुद्रा का नया प्रस्थान है, जिसमें ओजगुण समाया हुआ है। अंतिम पंक्ति इस विपथन को पूर्णता प्रदान करती है जहाँ कवि 'हम' को राम बनने का आह्वान देता है। (यहाँ किसी तमिल कवि का कथन याद आ रहा है कि जैसे बिल्ली शाकाहारी नहीं होती, वैसे ही पुरुषों में भी राम नहीं मिलते!) स्त्री विमर्श को सही परिप्रेक्ष्य प्रदान करने के लिए रचनाकार को साधुवाद ।

इस सप्ताह की पांचवी कलमकार सीमा कुमार की रचना धारा में भावना और प्रीति की अनिवारता को रूपक में सफलतापूर्वक पिरोया गया है। इस कविता को यदि 'मिथ्याबोध' के साथ जोड़कर पढ़ा जाए तो एक थीसिस और दूसरी एंटी थीसिस प्रतीत होगी। दूसरी ओर अगर इसे 'लडकियाँ' के साथ जोड़कर पढ़ें तो इसकी व्याख्या आधुनिक स्त्री की मुक्तिचेतना के रूप में की जा सकती है। वैसे आरंभिक चार पंक्तियों की मुद्रा बयान जैसी है।

छठे क्रम पर रंजू की गजल है मेरा प्यार उधार रहा। शीर्ष पंक्तियों को यदि एक सीधी दीवार की आधारशिला मानें तो कहा जा सकता है कि इसमें 27 ईंटें हैं - मात्राओं के रूप में। लेकिन ऊपर उठती हुई हर कतार में ईंटों की यह संख्या कभी कम और कभी अधिक होती चली गई है। अंतिम पंक्तियों में 33 और 35 ईंटें लगा दी गई हैं। ये कहाँ टिकेंगी गजल के आसमान में ? या तो लटकते छज्जों की तरह झूलती रहेगी, या भरभराकर पाठक के ऊपर गिर पड़ेंगी! जैसा कि 'नहीं तो जान चली जाती है' के संदर्भ में कहा जा चुका है - गजल की न्यूनतम शर्त प्रथम से अंतिम पंक्ति तक एक ही छंद (बहर) के निर्वाह की है। वैसे भाव-चित्रण की दृष्टि से 'अजब सिलसिला' वाला अंश अच्छा प्रभावशाली है और रचनाकार की क्षमता का सूचक है।

सातवें कवि अजय यादव का गीत जग समझा वर्षा ऋतु आई लय, शब्द चयन और चित्रात्मकता की दृष्टि से सुंदर बन पड़ा है। प्रकृति और लोक इस सौंदर्य के मूल में अवस्थित हैं, इसमें संदेह नहीं। अगर इस गीत को भी 'लड़कियाँ' और 'प्यार मेरा उधार रहा' के साथ जोड़ कर पढा जाए तो स्त्री की आत्मगोपन वाली परंपरागत छवि दिखाई देगी। लेकिन तीनों रचनाओं का दृष्टिकोण अलग है। गौरव सोलंकी की लड़कियाँ मौन रहती हैं, छांव देती हैं और काट दी जाती हैं - पेड़ जो ठहरीं। रंजू की स्त्री दर्द के हर शब्द को अपने गीतों में छिपाकर रखती है और नहीं चाहती कि दुनिया को उसके अश्कों का आभास हो - यह स्वयं स्त्री की दृष्टि है न ! अजय यादव इस तथ्य के साक्षी हैं कि 'मेरे हर दु:ख में तुम रोई, अपनी हर तकलीफ छिपाई' - इसीलिए तो वह पूजनीय है न ! पुरुषों ने सदा स्त्री की इस आत्म गोपन वृत्ति को बहुत गौरवान्वित किया है। इससे पुरुष की मातृग्रंथि भी संतुष्ट होती है शायद!

आठवें कवि विपुल की कविता स्वर्ग में समस्याएँ निश्चय ही राजनीति पर कशाघात करती है लेकिन इस मुद्रा को अख्तियार करने से पहले वह मंचीय शैली में इतनी तरह के विद्रूपों को एकत्र करती है कि कविता कम और किसी हास्य पत्रिका का अग्रलेख अधिक लगती है। विभिन्न चैनलों के हँसोड़ कार्यक्रमों में भी प्राय: यह शैली दिखाई देती है।

नवें विवेच्य कवि आलोक शंकर की रचना प्रतिध्वनि छंद पर कवि के अधिकार की सूचना देती है। हर अंश में मुक्तकों जैसी सूक्तिपरकता हैं। दूसरे और तीसरे अंश में 'रे' ने असहाय और विवश स्थिति को गहन बनाने में सहायता की है। अंतिम अंश विचलन और विचित्रता के कारण आकर्षक बन गया है।

इस सप्ताह के दसवें विवेच्य रचनाकार हैं विश्वदीपक तन्हा। उनकी क्षणिकाएँ यथार्थ परक हैं। कवि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विसंगतियों और दुरनिसंधियों से विचलित है - भारत के साधारण नागरिक की तरह। इसीलिए ये रचनाएँ आज की स्थितियों की नुमाइंदगी करती प्रतीत होती हैं। तुम-4, दर्द, पेट-3 और पेट-4 पर्याप्त व्यंजनागर्भित हैं। 'सहरे' को 'सहरा' ही रहने दें तो शायद मूल शब्द की प्रकृति के अधिक निकट रहेगा। 'नकलची' में अच्छा प्रश्न उठाया गया है - 'मौलिकता क्या है, कहाँ है?' यदि प्रत्यक्ष जगत का अनुकरण ही कविता है तो मौलिकता की माँग की भी नहीं जानी चाहिए। लेकिन इस अनुकरण में ही तो आपकी मौलिकता निहित है। आप क्या चुनते हैं कविता के लिए - कौन सी घटना ? कौन सा भाव? कौन सी स्थिति ? कौन सा विचार ? आप इस चुने गए विषय को व्यक्त करने के लिए कौन से उपादान चुनते हैं - कैसा शब्द ? कैसा सादृश्य विधान ? कौन सा प्रतीक ? कौन सा बिंब ? कौन सा शिल्प ? तभी उस सौंदर्य की सृष्टि होती है जिससे वाक्य रसात्मक और अर्थ रमणीय हो जाता है। इससे पुरातन भी पुनर्नवा हो उठता है। अभिव्यक्ति की ताजगी और टटकेपन में मौलिकता साफ झलकती है - 'क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेवरूपं रमणीयताया:।'

अस्तु, आज इतना ही।
इति विदा पुनर्मिलनाय॥

- डॉ ऋषभदेव शर्मा

दिनांक : 10-08-2007

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय डॉ ऋषभदेव जी।

आपका युग्म आभारी है चूंकि आपके विचार प्रेरक है। एक गंभीर पाठक ही सबसे बडी कसौटी हो सकता है और आप ही के सब्दों में आप एक पाठक भर हैं। साप्ताहिक समीक्षा के इस स्तंभ की प्रतीक्षा रहने लगी है।

सहमत हूँ आपसे कि "'जानम' अभिव्यक्ति के गांभीर्य पर क्षेपक सा प्रतीत होता है।"।

मार्गदर्शित करते रहें।

*** राजीव रंजन प्रसाद

रचना सागर का कहना है कि -

साप्ताहिक समीक्षा युग्म का एक अच्छा प्रयास है। पाठकों को भी इससे प्रेरणा मिलती है कि वे अपनी कविता के प्रति समझ का मूल्यांकन कर सकें।

अजय यादव का कहना है कि -

डॉ ऋषभदेव जी!
साप्ताहिक समीक्षा हम सभी को अपनी रचनाओं के प्रति और अधिक गंभीर व समर्पित बनाने का साधन बन रही है. इस विषद समीक्षा के लिये हम आपके आभारी हैं.
आप स्वयं को एक ’पाठक भर’ कहते हैं, परंतु एक समर्थ पाठक ही रचना के गुण-धर्म को परख सकता है. रचनाकार के लिये तो उसकी हर रचना उत्तम होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे अभिभावक अपने बच्चों के दोष को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते.
पुनश्च: धन्यवाद.

विपुल का कहना है कि -

आदरणीय डॉ ऋषभदेव जी।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद, आपकी टिप्पणियाँ मुझे जैसे अनुभवहीन के लिए बड़ी ही मददगार सिद्ध हो रही हैं|आपका मूल्यांकन एक दम सटीक रहता है, इंतज़ार रहता है मुझे आपकी समीक्षा का |

वास्तव में जब मैं कुछ लिखता हूँ तो वह ख़ुद को अच्छा ही लगता है परंतु यह टिप्पणियाँ पढ़ कर पता चलता है की हम कितने पानी में हैं
और इस पानी की गहराई का सही-सही एहसास आप जैसा अनुभवी रचनाकार ही करवा सकता है |
बहुत बहुत धन्यवाद

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

ऋषभ जी,

आपकी समीक्षा शैली मुझे बहुत पसंद आती है। हर एक शब्द महत्वपूर्ण होता है। मैं समीक्षा के बाद कविताओं को दुबारा पढ़ता हूँ तो सच में आपके द्वारा बताई गईं खूबियाँ और ख़ामियाँ नज़र आती हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद आपका।

रंजू का कहना है कि -

डॉ ऋषभदेव जी।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद,मार्गदर्शित करते रहें...इससे प्रेरणा मिलती है।

RAVI KANT का कहना है कि -

आदरणीय डॉ ऋषभदेव जी,
एक्बार फिर सारगर्भित साप्ताहिक समीक्षा के लिए साधुवाद।आप्की टिप्पणियों से कफी कुछ सीखने को मिल्ता है।

piyush का कहना है कि -

ऋषभदेव जी सादर नमस्कार,
आप की शैली अदभुत है............. आपके द्वारा की गयी टिप्पणियों के पश्चात पुन: कविता पड़नी ही होती है.......
और आपकी समीक्सजाएँ ना सिर्फ़ लेखकों को वरन् अन्य पाठकों को भी प्रेरित करती है रचना के लिए....
ऐसी अर्थपूर्ण और अदभुत काव्यालोचना के लिए साधुवाद

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

ऋषभदेव जी,
फिर से समीक्षा के लिए आपका बहुत आभारी हूँ। आप सच में हमारी कविताओं के लिए बहुत मेहनत करते हैं और यह आपकी सूक्ष्म विवेचनाओं से पता चलता है।
समीक्षा पढ़ना तो मुझे अब कविता पढ़ने से भी अच्छा लगने लगा है क्योंकि कविताओं के वे आयाम आपके माध्यम से समझने को मिलते हैं, जिन्हें एक आम पाठक नहीं सोच पाता।
आपको फिर से बहुत धन्यवाद। प्रेरणा देते रहें।

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