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Thursday, July 26, 2007

कुछ क्षणिकाएँ


दर्द
आज इस दर्द को भी
अपने मन का कर लेने दो,
कल कोई ये न कहे
कि कोई
मेरे घर से निराश लौटा था।

पाना
तुझे पाना तो
बहुत मुश्किल न था,
बस मैंने ही ज़िद कर ली
कि पाना नहीं,
साथ चलना है।

टूटता तारा
एक तारा टूटकर
सीधा मेरी खुली आँख में गिरा
और उस टूटते तारे को देखकर
अनगिनत बन्द आँखों ने जो मुरादें माँगी थीं,
तब से उन सबकी प्यास में
मैं ही जल रहा हूँ।

सपने
वह
अपने पिता के सपने पूरे करने को जिया,
उसके पिता
अपने पिता के सपने पूरे करने को जिये थे,
सबके अपने सपने,
बस सपने ही रह गए।

वक़्त
चल,
आसमान को चीर कर देखें,
बरसों से वक़्त ही नहीं कटता।

मासूम
जाओ,
लौट के मत आना,
कहीं डूब मरना
पर अपनी शक्ल मत दिखाना,
ये कहते हुए
तुम कितनी मासूम लग रही थी,
सच में मन किया था
कि डूब मरूँ।

भूख और नींद-1
एक बड़ी सी बात
अख़बार में छोटी सी जगह पा गई थी,
रोटी माँगने गई एक बच्ची
रोटी के बदले इज्जत गँवा गई थी,
अगर याद हो तो सच बताना,
उस रात तुम सबको नींद कैसे आ गई थी?

भूख और नींद-2
मैं एक आह भरता हूं
तो मेरी माँ रात भर सो नहीं पाती,
उसके करोड़ों बच्चे
हर रात भूखे सोते हैं,
तुम्हारा भगवान
क्या नींद की गोलियाँ लेता है?

चन्द्र-ग्रहण
कल कोई चाँद के गले लगकर
रात भर रोता रहा,
झूठ क्यों कहते हो
कि कल ग्रहण था।

ज़िन्दा लाश
उसे अपने शव को कन्धा देने का
शौक रहा होगा,
जो अपनी लाश को
ज़िन्दगी भर ढोता रहा,
वरना अब तो
उदास भी होने का रिवाज नहीं है।

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

73 कविताप्रेमियों का कहना है :

lgs का कहना है कि -

i liked the sapne one very much....lets change this trend...

Anonymous का कहना है कि -

sundar kshnikaye.

par padhne par lag raha hai ki kahi par kuch kami rah gayi hai.

जाओ,
लौट के मत आना,
कहीं डूब मरना
पर अपनी शक्ल मत दिखाना,
ये कहते हुए
तुम कितनी मासूम लग रही थी,
सच में मन किया था
कि डूब मरूँ।

yah panktiya nischit rop se achchhi hai kintu yah thik prayog me nahi layi gayi hai. ek premika hi in shabdo ke dvara masoom lag sakti hai, jabki poori pankti padhne ke baad yah maa ke liya gaya hai. aisa pratit hota hai. yah vakya nishchit roop se krodhit hone par nikalte hai.

ऋषिकेश खोङके "रुह" का कहना है कि -

सुभानअल्लाह , बहोत ही खुबसुरत क्षणिकाएँ है, आनंद आ गया | क्या और किस पर टिप्पणी करु प्रत्येक क्षणिका भावविहोर करने वाली है और मन को छू लेने की ताकत रखती है | आपको अनेकाअनेक बधाईयां एवं धन्यवाद की आपने हमको ऐसा सुंदर काव्य उपलब्ध करवाया |

Gaurav Shukla का कहना है कि -

बहुत ही उत्कृष्ट हमेशा की तरह

क्षमा कीजियेगा गौरव जी, सभी क्षणिकायें बहुत ही सुन्दर और अति गंभीर भावों से सजी हुयी हैं
सो किसी एक अथवा दो को चुनने का अपराध मुझसे नहीं होगा
मैं पहले भी कह चुका हूँ आपकी सोच विशाल है
बहुत सुन्दर काव्य पढने को मिलता है आपसे

आभार सहित
गौरव शुक्ल

avanish का कहना है कि -

अच्छी कविताए है. खास बात है कि आप मे कविता का बोध है.

Anonymous का कहना है कि -

Gaurav u are an excellent poet too good!!ur work is amazing..... simple words but meaning tons and the depth unfathomable plz keep up the good work

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

जिन्दगी से जुडे हुये सटीक दर्शन हैं जिन्हे आप ने क्षणिकाओं में सुन्दर रूप से ढाला है

tanha kavi का कहना है कि -

कल कोई ये न कहे
कि कोई
मेरे घर से निराश लौटा था।

अनगिनत बन्द आँखों ने जो मुरादें माँगी थीं,
तब से उन सबकी प्यास में
मैं ही जल रहा हूँ।

सबके अपने सपने,
बस सपने ही रह गए।

तुम कितनी मासूम लग रही थी,
सच में मन किया था
कि डूब मरूँ।

तुम्हारा भगवान
क्या नींद की गोलियाँ लेता है?

कल कोई चाँद के गले लगकर
रात भर रोता रहा,
झूठ क्यों कहते हो
कि कल ग्रहण था।

वरना अब तो
उदास भी होने का रिवाज नहीं है।

उपरोक्त पंक्तियाँ मुझे विशेषकर पसंद आईं। हर भाव आपने खूबसूरती से टांका है। खुशी-गम का सामंजस्य लिए आपकी क्षणिकाएँ आपको इस विधा में भी पारंगत बनाती हैं।
आपकी अगली रचना का इंतजार रहेगा।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

smartarpit का कहना है कि -

good concept

BUT

why I can not see proper hindi script implementation. I'll talk to u abt this matter...

Anupama Chauhan का कहना है कि -

Gauravji...Bahut sundar Kshanikaayen hai...kaun si chunkar kahu ki yeh mujhe pasand aai samajh nahi aa raha hai....har kshanika apneaap me poorna hai sampoorna hai...Khuda aapki kalam ko phoolon ki syaahi de....

Always
Anu

Gita pandit का कहना है कि -

bahut sundar...

ek achha soch aapke
maadhyam se padne ko mila

saaree hee bahut uttam hain..

aabhaar
gita pandit

sajeev sarathie का कहना है कि -

टूटता तारा
एक तारा टूटकर
सीधा मेरी खुली आँख में गिरा
और उस टूटते तारे को देखकर
अनगिनत बन्द आँखों ने जो मुरादें माँगी थीं,
तब से उन सबकी प्यास में
मैं ही जल रहा हूँ।

waah gaurav... aati sunder

Addy का कहना है कि -

Pranaam pyaare dost,
bahut hi accha likha hai aapne....saari baate....nice thinking.....go ahead wid great poetry.....

रंजू का कहना है कि -

तुझे पाना तो
बहुत मुश्किल न था,
बस मैंने ही ज़िद कर ली
कि पाना नहीं,
साथ चलना है।

बहुत ही सुंदर लिखते हैं आप ग़ौरव

piyush का कहना है कि -

अब क्या कहें???????????
14 कॉमेंट्स....
शब्द अब बचे ही नही....
जो कुछ कहूँगा बस टिईपनियों की पुनरावृत्ती ही होगी...
सो बस यही कहता हूँ की क्षनिकाएँ .....बोले तो मस्त थी..
भावों से ओतप्रोत...
बधाइयाँ

Anonymous का कहना है कि -

एक बड़ी सी बात
अख़बार में छोटी सी जगह पा गई थी,
रोटी माँगने गई एक बच्ची
रोटी के बदले इज्जत गँवा गई थी,
अगर याद हो तो सच बताना,
उस रात तुम सबको नींद कैसे आ गई थी?

kya ab sb kuch bol nahi diya gaya ... in saari kshanikaaon me? outstanding

alok shankar

अजय यादव का कहना है कि -

गौरव जी,
देरी से टिप्पणी के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ. सभी क्षणिकायें बहुत सुंदर हैं. यूँ ही लिखते रहें.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

क्षणिकाएँ कम शब्दों में कितना कुछ कह देती हैं। कविता की यह बहुत बढ़िया विधा है। जो स्थान कहानियों में लघुकथा है, वही स्थान कविताओं में क्षणिका का है।

और इस कला में शायद आप बेहतरीन हैं। मैं समझता हूँ इनमें से भी कुछ शब्द हटाकर इन्हें और खूबसूरत बनाया जा सकता है।

सारी बहुत बढ़िया हैं, लेकिन इसमें बहुत अधिक नयापन है०
कल कोई चाँद के गले लगकर
रात भर रोता रहा,
झूठ क्यों कहते हो
कि कल ग्रहण था।

shobha का कहना है कि -

गौरव
तुम्हारी कल्पना बहुत सुन्दर है ।किन्तु अभी तुम्हारी सोच में परिक्वता लानी होगी ।
खुदा नींद की गोलियाँ नहीं खाता । वह तो न्याय कर्ता है । दयालु है । उस पर आक्षेप
अथवा आक्रोष करना ठीक नहीं । उस पर पूरा विश्वास रखो । आशीर्वाद सहित

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

जीवन दर्शन है। हृदय के भीतर जा कर शब्द चित्रॊं का निर्माण किया गया है। बहुत सुन्दर।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

स्नेह के लिए आप सबका बहुत धन्यवाद।
आदरणीया शोभा जी,
आपके आशीष के लिए आपको नमन। आपने कहा कि मुझे सोच में परिपक्वता लानी चाहिए, मैं मानता हूं कि अभी मैं बहुत अपरिपक्व हूँ। लेकिन साथ ही आपसे यह प्रश्न भी करना चाहता हूँ कि क्या अन्ध श्रद्धा और तर्कहीनता ही परिपक्वता का परिचायक रह गया है? मुझे मालूम है कि जब मैं ख़ुदा पर आक्षेप करता हूँ तो बहुत से आस्थावान मित्रों के हृदयों को चोट पहुंचती है और हर बार यही सुनने को मिलता है कि भगवान बहुत दयालु है, उस पर प्रश्न मत खड़े करो। आपने भी यही लिखा लेकिन इसके पक्ष में एक भी तर्क नहीं दिया, जिससे मैं समझ सकूं कि वो है और बहुत दयालु है। मैंने जब भी किसी कविता में भगवान पर आक्रोश जताया है, साथ में कारण अवश्य जताया है। प्रबुद्ध मित्रों एवं आप बड़ों से आग्रह है कि आप भी जब अपना पक्ष रखें, कारण दें। हो सकता है कि मुझमें कुछ परिवर्तन आए और कुछ नया दर्शन सीखने को मिले।
साथ ही यह निवेदन करना चाहूंगा कि प्रश्न पूछना विकास के लिए आवश्यक है, इसे अपरिपक्वता न कहें।
आशा है, आगे भी आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

chhavi का कहना है कि -

tutta tara and sapne behad khubsurat lagi bahut achchhi lagi sapne me aapne bahut achchhe se bata diya ki har koi apne sapne dusro par thopta hai vaise abhi kafi badlav aa gaye hai bachcho ki ichchchhayo ka bhi pura pura dhyan rakha jata hai

shobha का कहना है कि -

गौरव
मैं अन्धहीनता की बात नहीं करती । किन्तु सोचो - इतनी बड़ी सृष्टि को चलाने वाला
क्या ऐसी उपेक्षा कर सकता है ? तुम धर्म-कर्म की बात को भूल जाओ । केवल इतना
सोचो कि इतनी बड़ी दुनिया क्या अन्याय करने वाला चला सकता है ? अगर तुम उसे
माँ का पवित्र स्थान देते हो तो विश्वास भी रखो । कभी- कभी माँ से भी बालकों को
दंड मिलता है । जब बालक की माँ उसकी उपेक्षा करे तो निश्चित रूप से बालक ही
दोषी होगा ।
ईश्वर न्याय कारी है और न्याय करने वाला व्यक्तिगत हित नहीं देखता , निश्चित रूप
से वह हम सबको अपनी सन्तान मानता है किन्तु जीव कर्म का फल अवश्य ही पाता
है । यदि किसी को दुखी देखो तो उसकी सहायता अवश्य करो । वह तुमसे खुश होगा
किन्तु कर्म- फल से कोई नहीं बच सकता । जो बोया है वह तो काटना ही पडेगा ।
यदि मैं कहूँ - मेरे आँगन में ,कुछ नागफनियाँ उग आई हैं
और माली ये कसम खाता है कि उसने गुलाब बोये थे ।
तो तुम क्या उत्तर दोगे ? क्या ऐसा सम्भव है । आशा है कुछ बात स्पष्ट हुई होगी ।
बहुत भावुक कवि हो और मै तुम्हारी प्रशंसक । मेरा अनुरोध है कि थोड़ा अपने
धर्म एवं संस्कृति का भी अध्ययन करो । आशा है मेरी बात को अन्यथा नहीं लोगे ।
आशीर्वाद सहित

Rajesh का कहना है कि -

एक बड़ी सी बात
अख़बार में छोटी सी जगह पा गई थी,
रोटी माँगने गई एक बच्ची
रोटी के बदले इज्जत गँवा गई थी,
अगर याद हो तो सच बताना,
उस रात तुम सबको नींद कैसे आ गई थी?

Gaurav ji, its really amazing, u have put the reality before the people so nicely in such a few words. its really amazing. Aaj ke waqt mein yah burai itni fail chuki hai, bus bhagwan hi bachaye aisi harkaton se. Yaar ab aisa mat kahna ki bhagwan kahan hai? kahin per to wo hai hi, ise aap jutla nahi sakte, ab kaisa hai, yah ek kalpana ka vishay hai, lekin hai jaroor. Haan shayad oos waqt wah is se bhi koi jaroori kaam kar raha hoga.
I am sorry but since I do not have the hindi version, I have given the comments in English.

तुझे पाना तो
बहुत मुश्किल न था,
बस मैंने ही ज़िद कर ली
कि पाना नहीं, साथ चलना है।
Kya jid hai aap ki, aur isi mein aap ki jeet bhi hai, use paa kar kya hone wala tha, agar use anubhav karna hai, uska pyaar pana hai to uske saath chalna hi behtar hai,
really this is also a great thought
keep it up

Rajesh का कहना है कि -

gaurav ji, ek baat samaj nahi aayi, yah aap ki "masoom" wali lines maa ke liye hai ya masooka ke liye? kyon ki jo mijaj bataya gaya hai, wah to maan ka hi ho sakta hai. sorry, this is what I feel.

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

शोभा जी,
आप कहती हैं कि क्या इतनी बड़ी दुनिया अन्याय करने वाला चला सकता है?
मैं कहता हूँ कि चला सकता है। चला रहा है या नहीं, ये मुझे भी पता नहीं। लेकिन यदि वो इतना ही न्यायप्रिय होता तो क्या आप मुझे बता सकती हैं कि निठारी में मरे बच्चों ने पिछले जन्म में ऐसा कौनसा कर्म कर दिया होगा कि उन्हें इस जन्म में ये सजा दी गई (हिन्दू धर्म यही मानता है ना कि कर्मफल से ही सृष्टि चलती है?)
धर्म की बात मैं भी नहीं करना चाहता और आपने जो बताया है, वह मैं भी गीता में पढ़ चुका हूँ। लेकिन हम सबके पास इतनी विचार-शक्ति तो है ही कि कुछ भी लिखा हुआ तभी मानें, जब हमें उसका प्रमाण दिखे।
गुलाब बोने पर नागफनी उगने का उत्तर आप मुझसे क्यों माँगती हैं? यही तो मेरा इकलौता प्रश्न है कि यदि ईश्वर है तो गुलाब बोने पर गुलाब क्यों नहीं उगते?
ये कौनसा न्याय हुआ कि पिछले जन्म के कर्म इस जन्म का फैसला करेंगे? ऐसा ही हुआ न कि बच्चा अगर पाँचवीं कक्षा में नहीं पढ़ता तो छठी में चाहे कुछ भी कर ले, गुरूजी साल भर उसे पीटेंगे और अंतिम परीक्षा में फेल कर देंगे।
मैं हिन्दू संस्कृति का आदर करता हूँ और आपने उसका उल्लेख किया, इसीलिए मुझे अपने पक्ष में तर्क देने पड़े।
यदि माँ भी अपने निर्दोष बच्चों को कभी गुजरात के दंगों में मरवाती है, कभी कश्मीर में और कभी दुनिया के किसी और कोने में...और ये आप भी नहीं जानती कि वो माँ क्या सिखाना चाहती है इस से...तो मैं उस माँ को भी कुमाता ही कहूँगा।
जावेद अख़्तर का एक शेर याद आता है-
नेकी एक दिन काम आती है, हमको क्या बतलाते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग

इस उम्र तक जितना कोई संस्कृति का अध्ययन करता है, उतना मैंने भी किया है और जो कविताएँ आपको अपरिपक्वता या भावुकता मात्र लगीं, वे केवल वाहवाही बटोरने का तरीका नहीं थीं मेरे लिए।
आप मेरे नास्तिक होने पर मत डरिए क्योंकि भगतसिंह भी नास्तिक थे और यदि एक नास्तिक व्यक्ति भगतसिंह हो सकता है तो मेरी कामना है कि पूरी दुनिया नास्तिक हो जाए।
आपके स्नेह के लिए फिर से आभारी हूँ।
आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।

राजेश जी,
आप जानना चाह्ते हैं कि वे पंक्तियाँ किसके लिए थीं तो मैं यही कहना चाहूँगा कि यह पाठक की इच्छा है कि वे इसका क्या अर्थ लगाएँ। वैसे मैंने प्रेमिका के लिए ही लिखा था। मुझे नहीं लगता कि कोई माँ अपने बच्चे को ऐसा कहेगी।
धन्यवाद।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मुझे लगता है कि शोभा जी और गौरव दोनों एक दूसरे की बातों को अलग अर्थों में ले रहे हैं।

गौरव का कहना यह है कि जो अस्तित्ववादी ईश्वर के भक्त अपने आराध्य को महादयालु कहते हैं वो ज़रूरी पड़ने नींद की गोलियाँ लेकर सो जाता है क्या?

यह भी एक तरह का दर्शन है। ईश्वर का महिमामंडन करने वाले दार्शनिकों पर चोट, और ज़रूरी भी। कविताओं के माध्यम से इस तरह के स्वर निकलने चाहिए कि ईश्वर किसी भी चीज़ के लिए उत्तरदाई नहीं है। जो होता है, वही सत्य है, बाकी कल्पनाएँ हैं। होने और न होने की लौकिक और अलौकिक दो स्थितियाँ है, मगर स्थूल हो या अदृश्य, अस्तित्व ही विश्वास है।

दुनिया की हर चीज़ धर्म नियंत्रित है (यहाँ धर्म शब्द का आशय प्रकृति के नियमों से है)। फ़िर ईश्वर भी इससे बँधा है ( अस्तित्व वादियों के लिए कह रहा हूँ)। उसके ऊपर भी गणित के साधारण नियम लगते हैं। इसलिए साधक के मन में संशय होना स्वभाविक है।

shobha का कहना है कि -

प्रिय गौरव
तुम्हारी प्रतिक्रिया पढ़ी । तुमने बहुत सुन्दर तर्क दिए । इन सारी घटनाओं के बारे में मुझे भी जानकारी है
किन्तु मुझे ये ईश्वर की कठोरता नहीं लगती । ये उसकी न्याय प्रियता है । निठौरी के बच्चों को लेकर तुम
प्रश्न पूछ रहे हो । तुम इन्हें बच्चा रूप मे देख रहे हो । ये वो जीव हैं जिन्होने किसी जन्म में अवश्य कोई
पाप कर्म किए होंगे । उम्र शरीर की होती है आत्मा की नहीं । यह संसार कर्म फल पर ही चलता है ।
उस परमेश्वर ने हमको कर्म करने में स्वाधीन रखा । फल तो स्वतः ही मिलता है ।
कभी भी गुलाब से नागफनी नहीं निकलती । यह अकाट्य है । तुम चाहो तो कभी बोकर देखना ।
जगत में जो तुम देखते हो वह तुम्हे ऐसा इसलिए लगता है कि तुम्हारी दृष्टि सुदूर अतीत को नहीं
देख पाती । हम जितना जानते हैं उतना ही मानते हैं ।
बच्चे की पढ़ाई और जीव के जीवन में फर्क है । जिसे तुम बच्चा मान रहे हो ना जाने कितने
जन्मों से जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसा हो ।
कोई माँ अपने निर्दोष बच्चे को नहीं मरवाती । फिर वह तो परम माँ है ? कोई दोषी है या निर्दोष
इसका फैसला हम कैसे कर सकते हैं ?
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता ।
जावेद अखतर जी का शेर अच्छा है किन्तु इसमें संवेदनशीलता का पुट अधिक है ।
तुमने कहा तुम नास्तिक हो - मै नही मानती । तुम जीवन मूल्यों में विश्वास रखते हो । उसके
बनाए बन्दों के लिए जिसके दिल में दर्द है वह उसका सबसे प्यारा बेटा है ।
ईश्वर से प्रार्थना करूँगी कि वो तुम्हे कभी नास्तिक ना होने दे । तुम्हारा विश्वास उसकी
रचना और उसकी कार्य प्रणाली में हो । शुभकामनाओं एवं बहुत-बहुत आशीर्वाद सहित

कुमार आशीष का कहना है कि -

भई वाह..यहां एक बहुत सुन्‍दर चर्चा चल रही है। गौरव जी, आपने बहुत सुन्‍दर क्षणिका लिखी है। दरअसल भूख वह चकरी है जिस पर पूरी दुनिया नाचती है.. और इसलिए वह आधुनिक कविताओं के केन्‍द्र् में है। वर्तमान परिवेश में हमारी समूची दृष्टि देहाध्‍यासपरक है तो कविताओं में उसका प्रतिबिम्‍ब अस्‍वाभाविक नहीं है।
यहां प्रश्‍न कुछ विशेष उत्‍पन्‍न हुआ है जिसके सम्‍बन्‍ध में थोड़ी चर्चा करना चाहूंगा। एक प्रश्‍न गौरव जी आपसे.. कि 'आज के गौरव तो आप बहुत बाद में हुए'.. मगर पहली बार जब आपने इस धरा पर अपनी उस देह के साथ पदार्पण किया था जिसे आप दर्पण में देख कर 'गौरव' के रूप में पहचानते हैं.. आपकी उसी देह की भूख मिटाने के लिए जिसने आपकी मां के स्‍तनों में दूध पैदा किया वो कौन था। तब का तो आपको होश भी नहीं होगा या कि है थोड़ा होश। ऐसा ही हम सबके साथ है।
खैर, ईश्‍वर है अथवा नहीं.. आप हैं अथवा नहीं.. अगर है तो दयालु है या कि कठोर.. ये सब सवाल थोड़ा उलझे हुए तो हैं ही..
कबीर का तो छक्‍का ही छूट गया..
हेरत हेरत रे सखी गया कबीर हेराय
बूंद समानी समद में सो कत हेरी जाय।
मगर आपकी बातें थोड़ी अटपटी सी जरूर लगीं..
इतनी बड़ी दुनिया अन्‍याय से चल सकती है.. ये बात सोच कर मैं सचमुच सोच में पड़ गया।

Rajesh का कहना है कि -

Gaurav ji, thnx for reply. jab maa gusse me hoti hai to pyaar se bachhe ko aisa kahte kabhi suna hai, lekin masooka ke moonh se to kabhi nahi suna. anyways, I had put my words, that this is what I felt, aap ne kis ke liye likha hai, pata nahi tha. Aur dear aapki baki kavita yen bahot hi adbhoot hai, really hum aap ki soch ki kadra karte hai. just keep it up. all the best.

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

शोभा जी, नमस्कार।
बहुत पहले किसी कवि ने कहा है और मुझे अक्षरश:याद भी नहीं है, लेकिन यहाँ उसका सार कहना चाहूँगा-
मैं जो करूंगा, मैं ही भरूँगा
तो मैं ही करतार, तू करतार काहे का?
मुझे खेद है कि आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर मेरी एक भी शंका का समाधान नहीं हो पाया। हो सकता है कि ये इसलिए हो कि हम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग सोच रहे हैं और दूसरे की मानसिकता समझ नहीं पा रहे हैं।
आपने यह भी उत्तर नहीं दिया कि कृपया मुझे उदाहरण दें कि निठारी के बच्चों ने ऐसा कौनसा पापकर्म कर दिया होगा, जिसका यह फल है।
खैर, उन्हें छोड़िए.. आप कह रही हैं कि-
कोई दोषी है या निर्दोष
इसका फैसला हम कैसे कर सकते हैं ?
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
यह तो वैसा ही हुआ ना कि हमने या हमारे पुरखों ने एक सुन्दर सी कल्पना कर ली और ये भी कह दिया कि इसे समझना हमारे बस की बात नहीं है। इसलिए उसे समझने का प्रयास भी नहीं किया जाए और कुछ अतार्किक या अन्यायपूर्ण लगे तो यह कह दिया जाए कि यह हमारे स्तर की बात नहीं है। जीव कई जन्म से इसी चक्र में फंसा हुआ है, लेकिन क्यों? और ईश्वर है तो उसने अपने आप को इतना दुरूह और रहस्यमयी क्यों बनाया हुआ है कि उसकी संतानें भी उसे कभी जान न सकें?
ईश्वर की अवधारणा शायद इसलिए लाई गई थी कि समाज को नियमों में बाँधा जा सके,कोई शक्ति सोची जा सके जो सब अच्छे-बुरे के लिए जिम्मेदार हो, जिससे डरा जा सके, जिसपे विश्वास किया जा सके, जो काम हमारी समझ से परे हो, उसके लिये उसे उत्तरदायी कहा जा सके और पाप-पुण्य इसलिए बनाए गए, ताकि कोई किसी का अहित करता हुआ डरे।
मुझे अच्छा लगा, जब आपने जीवन मूल्यों की बात की। तो यदि किसी के पास सब जीवन-मूल्य हैं और वो किसी का अहित नहीं करता, हर काम ईमानदारी से करता है तो क्या वह इसलिए दोषी हो सकता है कि वह ईश्वर को मानने के लिए हर जगह न्याय माँगता है।
बाकी मैं अपने पक्ष में तर्क दे ही चुका हूँ। निवेदन है कि आपने पूरी अवधारणा तो बताई, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली या न्याय-व्यवस्था का कोई उदाहरण नहीं दिया।

आशीष जी, नमस्कार।
आप चर्चा में आए, बहुत अच्छा लगा।
आपको मेरी बातें अटपटी लगीं, मैं जानता हूँ। आप कह रहे हैं कि इतनी बड़ी दुनिया अन्याय से चल सकती है क्या? मैंने कहा, हाँ, चल तो सकती है पर पता नहीं कि चल रही है या नहीं।
अंग्रेज़ों ने पूरी दुनिया पर इतने बरस अन्याय से शासन किया तो यदि ईश्वर जैसी शक्तिशाली कोई सत्ता है तो वह तो बड़े आराम से दुनिया में कुछ भी कर सकती है। लेकिन मैं नहीं कहता कि ऐसा है।
ये बहुत मनमोहक और दिल को सुकून देने वाली कल्पना है कि ईश्वर बहुत दयालु है, हर काम मे कुछ अच्छा होता है और वह हमारे साथ है।
उल्टा नास्तिक होना तो बहुत मुश्किल है। हर बार हारने पर स्वयं को ही कोसना पड़ता है, क्योंकि तब किस्मत नहीं होती कोसने के लिए। तो क्या ऐसा नहीं है कि हमने अपनी सुविधा के लिए और एक सहारा तलाशने के लिए उसकी कल्पना की। ये तो आप भी मानेंगे कि उसने आकर कभी नहीं कहा कि मैं हूँ। जब आदिमानव से हम विकसित मानव तक पहुँचे तो बीच में कभी हमने ही ऐसा सोचा। यह अवधारणा अच्छी लगी तो अपना ली गई।
बात माँ के स्तनों के दूध की है तो उसके लिए प्रकृति का मैं आभारी हूँ। यदि आप कहें कि प्रकृति ही ईश्वर है तो मान भी लूं। परंतु किसी और सत्ता का अस्तित्व मानना मेरे लिए तो अन्ध-विश्वास जैसा ही है। अन्धविश्वास की यही तो परिभाषा है कि बिना सबूत के कुछ मानना। यह सब एक सिस्टम है जो चल रहा है। कभी मेरी तरह से भी सोचकर देखिए, शायद कुछ नया अनुभव हाथ लगे।

राजेश जी,
आपको मेरी क्षणिकाएं पसन्द आई, एक बार फिर धन्यवाद।

कुमार आशीष का कहना है कि -

गौरव जी,
अगर इतनी बात है कि दुनिया अन्‍याय से चल सकती है तब तो जरूर चल रही होगी। अब देखिये ना अर्थशास्‍त्र का नियम है खोटे सिक्‍के बाजार में अच्‍छे सिक्‍कों को चलन से बाहर कर देते है। पक्‍की बात है कि संसार में अन्‍याय चल रहा है, जो प्रत्‍यक्ष है उससे कौन इनकार करेगा।
आपने कहा..अंग्रेज़ों ने पूरी दुनिया पर इतने बरस अन्याय से शासन किया, भई वो 'इतने में' ही क्‍यों निपट गये..ये भी तो सोचा होता। बहुत आश्‍चर्य इस बात से कि आपने कृपा करके ईश्‍वर को बरी कर दिया वरना इस तर्क से मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुंचता कि जरूर ईश्‍वर भी इसलिए निपट गया क्‍योंकि वह अत्‍याचारी था।
चलिए, मुझे जानकारी हुई कि आप नास्तिक हैं जो कि बहुत मुश्किल और जीवट का काम है। मगर फिर आप हारते क्‍यों हैं जब आपमें इतना जीवट है। और बाद में खुद को कोसते क्‍यों हैं.. भई..ये तो और भी बुरी बात है।
भाई गौरव, यह सब मैं आपकी तरह से इसलिए सोच रहा हूं जिससे कुछ नया अनुभव हाथ लगे.. वरना जो देखा सुना वो तो यह कि अपने आपको जीत लेना दुनिया की सबसे बड़ी जंग है।
मित्र किसी का शेर है-
बारहा मिलते रहे राह में गैरों से मगर
उम्र भर हमसे हमारी न मुलाकात हुई।
हां.. प्रकृति को ईश्‍वर समझने की भूल मत कर बैठियेगा। उसके नियम बहुत कठोर होते हैं। हां..ईश्‍वर जरूर दयालु है। और वह खयालों में नहीं है, खयालों से परे है। इतना दयालु कि उसके सहयोग से खुद को जीत कर मनुष्‍य कहलाया जा सकता है।
भाई गौरव, किसी भी सिस्‍टम का परीक्षण सिस्‍टम से अलग होने पर ही आप कर सकते हैं। बिना पैरेन्‍ट डायरेक्‍टरी में गये किसी डायरेक्‍टरी को डिलीट किया जा सकता है क्‍या। और एक बात चलते चलते.. सबूत कौन इकट्ठा करता है आपकी इन्द्रियां.... कभी उन पर शक किया आपने। मालिक को कभी कभी नौकरों पर शक भी करना चाहिए।

shobha का कहना है कि -

गौरव
मैं समझ गई हूँ कि इस चर्चा को आगे बढ़ाने से कोई लाभ नहीं । शायद मैं अपनी बात
तुम्हे समझा नही पाई । अस्तु । उस पर विश्वास वह स्वयं पैदा करेगा । तुम इस सम्बंन्ध में जो भी
सोचते हो वह ठीक ही होगा । हर एक के चिन्तन का आधार उसका अपना अनुभव होता है ।
शायद किसी मोड़ पर तुम्हारे विचार बदल जाएँ । ना भी बदलें तो कुछ बुरा नहीं । तुम आस्तिक रहो या
नास्तिक कोई फर्क नहीं पड़ता । तुम एक अच्छे इन्साना हो यही काफी है ।
फरिश्ते से बेहतर है इन्सान बनना
मगर उसमें पड़ती है मेहनत ज़रा ज्यादा ।
तुम अपने आस- पास के लोगों का दर्द समझते हो यही बहुत बड़ी बात है ।
इसी तरह अपनी कलम चलाते रहो । आशीर्वाद सहित

आलोक शंकर का कहना है कि -

अच्छी चर्चा चल रही है।
ईश्वर का अस्तित्व है भी या नहीं यह कहना मुश्किल है।हम जो भी निर्णय करते हैं वह अपने अनुभवों की वजह से लेते हैं ,जो देखते हैं, वह मानते हैं अगर गौरव ईश्वर के अस्तित्त्व के ऊपर कोई प्रश्न खड़ा करते हैं तो वह इसलिये कि वो अब तक की सुनी हुई बातों का प्रमाण नहीं पाते हैं और जिस न्याय करने वाले और दयालु ईश्वर के बारे में सुना है उसके होने का कोई संकेत उन्हें नहीं मिलता । वह इस बात से भी नाराज़ हैं कि अगर ईश्वर है तो इतना अन्याय क्यों ?
दूसरी तरफ़ शोभा जी धर्म में विश्वास करतीं हैं और कहती हैं कि हमारी संस्कृति और धर्म में जो बातें चली आ रहीं हैं कि दुनिया का एक सर्वेसर्वा है और उसके इशारे पर ही सब कुछ हो रहा है।
दोनों पक्ष अपनी जगह सही हैं । इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि हम एक चक्र का हिस्सा हैं हम आप , सारे मनुष्य ॥ सबका अस्तित्त्व क्या है ? हमारे होने का अर्थ क्या है।… मेरे विचार में मानव एक ईंट के समान है जो वही काम करता है जो ईंट करती है, घर बनाने में सहयता करना। मानव जीवन विकास या ईवाल्यूशन की प्रक्रिया का एक हिस्सा भर है। हर जीव इस प्रक्रिया का हिस्सा है। अब इस प्रक्रिया को कौन चला रहा है, ईश्वर ? या यह प्रक्रिया ही ईश्वर है ? यह पृथ्वी पर रह रहे मानवों के लिये बहुत कठिन है । हम पृथ्वी को ही सृष्टि क्यों मान बैठे हैं? हम तो आकाशगंगा में मौजूद करोड़ों ग्रहों के बीच एक कण की भी हैसियत शायद ही रखते हों और ऐसी कई आकाशगंगाएँ ब्रह्माण्ड में हैं यह भी निश्चित नहीं कि कितनीं। ऐसे में यह कहना कि हम मानते हैं कि ईश्वर है या नहीं है और हम ही सही हैं यह तो कूपमण्डूकों वाली बात हो गयी । यह तो तय है कि जिस तरह की कहानियाँ हम उपनिषदों में सुनते आये हैं वह आज के वैग्यानिक युग में शक की नजर से देखी जा सकतीं हैं पर यह बात भी है कि जब आज के युग में हमारी बात दो लोगों तक पहुँच कर इतनी बदल जाती है कि हम ही चौंक जाते हैं । हो सकता है कि पौराणिक कथायें और सही न लगने वाली धर्म की ये बातें जैसे कि जन्म और पूर्व्जन्म इत्यादि में मिलावट हुई हो और वे बातें वह न रह गयीं हों जैसी वे कहीं गयीं थीं । पर यहाँ ये बात भी नकारी नहीं जा सकती कि ये बातें सदियों से चली आ रहीं हैं और हम आप जैसे तर्कसंगत लोग हमेशा रहे होंगें और यदि इस प्रक्रिया में ये विवाद पहले भी उठे होंगें । यदि आज गीता हमारे बीच मौजूद है तो उसमें कुछ तो सच्चाई होगी । अगर भगत सिंह नास्तिक थे तो उनके जीवन में उनकी इस धारणा को जन्म देने वाले कारण थे । पर उनकी उम्र ही क्या थी कि उन्हें विश्व और ब्रह्मांड में ईश्वर के अस्तित्त्व का निर्णायक मान लिया जाये। वहीं गाँधी भी थे जिन्हों ने ईश्वर में विश्वास किया और धर्म के नाम पर समाज की कुरीतियों को हटाने का प्रयास किया । धर्म और सारे रिवाज इंसान की बनायी हुई चीजें , भगवान की नहीं । हमारी और गौरव जी की उम्र भगत सिंह वाली है और युवा वर्ग को हमेशा भगत सिंह एक आदर्श ही दिखे हैं और समाज और ईश्वर के प्रति उनके प्रश्न जायज लगे हैं । पर हम 20 -22 साल के युवा पूरे ब्रह्मांड और विश्व में ईश्वर के अस्तित्त्व पर निर्णय नहीं ले सकते । जैसे जैसे हमारा अनुभव बढ़ेगा हमारी सोच और परिपक्वता भी बढेगी । किसी के कहने पर कोई भी अपनी धारणा नहीं बदल देता हाँ हमारी सोच को एक नया आयाम जरूर मिलता है । माननीय श्री अब्दुल कलाम बड़े वैग्यानिक हैं और बहुत सारे वैग्यानिक रहस्यों को जानने के बावजूद ईश्वर की सत्ता मानते हैं । हमारी उम्र ही क्या है ? पर यह बात हमें सवाल खड़े करने से नहीं रोकती या रोक सकती ।
गौरव और शोभा जी दोनों अपनी अपनी सोच रखते हैं और किसी की सोच किसी पर भी थोपी नहीं जा सकती , हाँ , सोचने की एक और दिशा जरूर दी जा सकती है । आप दोनों अपने अपने तर्कों में दूसरे की बात को गंभीरता से लें और स्वय देखें । यह एक चिरंतन प्रश्न है , शायद हम अपने जीवनकाल में यह निर्णय ले भी न पायें । एक और बात । ईश्वर , अगर है तो वह किसी को कुछ करने से नहीं रोकता पर चुनाव हमेशा मनुष्य के हाथ में होता है । अपने भाग्य या भविष्य का निर्णय मनुष्य का चुनाव ही करता है निठारी के बच्चों का पूर्व्जन्म क्या था वह मैं नही जानता पर उनका उस कातिल के पास जाने का चुनाव और उस कातिल का यह दुर्दांत कृत्य करने का चुनाव था जो ऐसा हुआ । इसमें गलती ईश्वर की थी या मानव की यह मैं नहीं बता सकता और यह भी नहीं बता सकता कि इसका निर्णय कौन करे । मैं तो बस इतना जानता हूँ कि एक इंसान होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम भरसक ऐसा कुकृत्य न होने दें , ऐसा तभी होता है जब कोई मानव ऐसा करने का चुनाव करता है । इसमें ईश्वर का क्या दोष ? हम तो यह भी नहीं कह सकते कि मानव ने ईश्वर को बनाया या ईश्वर ने मानव को या दोंनों को किसी और ने । यह अपनी अपनी आस्था और धारणा की बात है ।

सस्नेह
आलोक शंकर

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

आशीष जी,
आपके स्वर में क्रोध और व्यंग्य झलक आया है, जिससे चर्चा किसी निष्कर्ष की ओर बढ़ती तो जान नहीं पड़ रही है। वैसे मैं आपको इतना बता देना चाहता हूं कि मैं नास्तिक नहीं हूं, agnostic हूँ-सन्देहवादी। बस उसके होने और न होने, दोनों पर सवाल पूछ रहा हूँ।
यदि ईश्वर होगा तो वो भी खुश हो रहा होगा कि हम उसके होने पर तर्क कर रहे हैं।

शोभा जी, धन्यवाद कि आपने मेरे एक अच्छा इंसान होने पर विश्वास किया। आप सही कह रही हैं कि चर्चा का कोई निष्कर्ष नहीं दिख रहा सो कोई लाभ भी नहीं है।
आशीर्वाद के लिए फिर से आपको नमन।

आलोक जी, आप जरा देर से आए लेकिन आपने बातें बहुत तर्कपूर्ण की और यह भी सही है कि इस बहस में पड़ने से बेहतर है कि हम बुराई को रोकने का प्रयत्न करें।
आशा है कि हम सभी को इस बहस से कुछ न कुछ सीखने को मिला होगा।

सस्नेह
गौरव सोलंकी

तपन शर्मा का कहना है कि -

चर्चा काफ़ी अच्छी हो रही है।

गौरव् जी से कुछ सवालों के जवाब जनना चाहूँगा..उसी के बाद मैं अपना पक्ष रख पाऊँगा।
सृष्टि की रचना कैसे हुई.. बचपन में पढ़ा था बिग् बैंग थ्योरी.. पर इस पर वैज्ञानिक लोग भी उलझ पड़े..क्या आप बता सकते हैं? बिग बैंग के मुताबिक एक बड़ा विस्फ़ोट हुआ..मान लेते हैं
पर जिस गोले से विस्फ़ोट हुआ..वो गोला कैसे बना? किसने बनाया.. यही सवाल आठवीं कक्षा में मैने अपने शिक्षक से करने की भूल करी थी.. चुपचाप बिठा दिया गया मुझे..
आप इस सवाल का जवाब दे सकें तो अच्छा.. या आपके पास कोई और तथ्य हो जिससे यह पता चल सके कि दुनिया की रचना कैसे हुई?
आपने गीता को पढ़ा है..अच्छी बात है.. पर क्या कभी किसी व्यक्ति से आपने समझने की कोशिश करी, उस ग्रंथ में क्या लिखा है? अगर आप ये समझते हैं कि पढ़ेंगे और आपको समझ आ जायेगा तो मेरे मुताबिक आप गलत हैं। जिस तरह से स्कूल में शिक्षक की ज़रूरत पड़ती है ठीक उसी तरह से इस महान ग्रंथ को आप अपने आप नहीं समझ सकते..

खैर..जैसा कि कृष्ण जी ने, या फ़िर गुरुनानक देव जी ने..या किसी भी महान व्यक्तियों ने..चाहें कबीर हों या तुलसी..सभी ये मानते हैं कि ईश्वर है.. हम सभी में है.. हर जगह् व्याप्त है..चाहें छोटी से छोटी वस्तु हो या बड़ी से बड़ी.. इन सभी के विचारों को पढ़ें.. और समझने की कोशिश करें..ईश्वर को किताबों से नहीं जाना जा सकत.. हो सके तो गुरू बनायें..
आपका सवाल था निठारी के बच्चों के लिये..कि कौन सा अपराध किया था उन्होंने..ये तो शायद मैं नहीं बता सकता..क्योंकि इसका लेखा जोखा मेरे पास नहीं है..परन्तु एक कहानी बताना चाहूँगा..
भीष्म शरशय्या पर लेटे हुए थे.. उन्होंने कृष्णजी से अपनी हालत पर सवाल किया कि उन्होंने कौनसा जुर्म किया था.. कृष्ण बोले..काफ़ी जन्म पहले जब वे रथ पर जा रहे थे तो उनके आगे एक साँप आया..उन्होंने तीर से उठाया और दूर फ़ेंक दिया.. वो सर्प काँटों की झाड़ में जा फ़ँसा.. ठीक उसी तरह से भीष्म ने भी सजा भुगती.. और दशरथा की कहानी भी यही सीख देती है.. और हाल ही में जो संजय दत के साथ हुआ..हर कर्म का हिसाब रखा जाता.. अच्छे के लिये अच्छा.. बुरे के लिये बुरा.. इसी लिये कहते हैं हर कर्म अच्छा करो.. एक भी बुरे कर्म का हिसाब तो आपको देना ही पड़ेगा..
अगर आप सिरे से ईश्वर के अस्तित्व को नकार देंगे तो आप अपने साथ अन्याय करेंगे...सच्ची कोशिश तो करिये..
ईश्वर के पास जाने का प्रयास कीजिये.. वो आपके पास खुद आयेगा..
धन्यवाद
तपन शर्मा

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

तपन जी,
आपकी बातें अच्छी लगीं। आपने मेरा विचार जानना चाहा है। वैसे पहले आपको यह बता देना चाहता हूँ कि मैं जो भी कहना चाह रहा हूँ, वह दुनिया से परेशान किसी आत्मा की बकवास नहीं है, मैंने थोड़े समय तक दर्शन को पाठ्यक्रम में भी पढ़ा है और बहुत से दार्शनिकों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ईश्वर है..कुछ उन्हें भी पढ़ा है।
तो सवाल धरती की उत्पत्ति का है तो एक दार्शनिक थ्योरी देते हैं कि हर घटना, वस्तु और स्थिति का कोई कारण होता है और ईश्वर ऐसा कारण है, जिसका कोई कारण नहीं है। अर्थात ईश्वर self caused cause कहा गया है। यानी ब्रहांड ईश्वर ने ही बनाया...
मेरा सवाल- तो ये किसने कहा कि यह श्रंखला ईश्वर पे ही खत्म होती है। हो सकता है कि ब्रहांड ही self caused cause हो, जैसा कि ईश्वर को परिभाषित किया गया है। और साथ ही यदि ईश्वर को इस परिभाषा के अनुसार मान भी लें तो यह भी तो हो सकता है कि सृष्टि बनने के बाद सब कुछ नियंत्रण प्रकृति के पास ही छोड़ दिया गया हो।
आपने कहा- इस महान ग्रंथ को आप अपने आप नहीं समझ सकते..
तो मैं नहीं मानता कि कोई ग्रंथ महान है, यदि उसे अपने आप नहीं समझा जा सकता। कोई ऐसा व्यक्ति ही बता दें जिसने समझ रखा हो और जिसे गुरु बनाया जाए। व्याख्याएँ तो सब अपनी अलग-अलग ही देते हैं और हम यहाँ उस दर्शन के अध्ययन की बात नहीं कर रहे..ईश्वर के अस्तित्व की बात कर रहे हैं, जो उस से परे है।
हो सकता है कि पाँच हज़ार साल बाद कहा जाए कि गाँधी विष्णु के अवतार थे और 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' के दर्शन को भी गीता जैसा ही कुछ माना जाए।
और आपने कहा-
ईश्वर के पास जाने का प्रयास कीजिये.. वो आपके पास खुद आयेगा..
मैं इन सवालों से यही तो कोशिश कर रहा हूँ और यदि आप चाहते हैं कि यह कोशिश मन्दिरों में हाथ जोड़कर की जाए तो वो मैं नहीं कर सकता। मैं सिरे से उसे नकार नहीं रहा, बस थ्योरी नहीं, कुछ प्रत्यक्ष माँग रहा हूँ।
संजय दत्त का उदाहरण देते हैं तो आप खुद हज़ारों ऐसे उदाहरण देख सकते हैं, जो पाप करते हुए ऐश से जिये और ऐश से मरे। उनका क्या होता है?
क्या आपको नहीं लगता कि हम एक ऐसी न्याय-व्यवस्था के भरोसे जी रहे हैं, जिसका न सिर है न पैर..हम में से किसी ने उसके संचालक को नहीं देखा है, बस हमें बताया गया है और हम ज़िन्दगी भर उस भरोसे बैठे रहते हैं कि मरने के बाद इंसाफ मिलेगा।
पता नहीं इंसाफ मिलता है या नहीं। लेकिन मानना पड़ेगा कि हम विश्वास तो बहुत करते हैं!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

ईश्वर की अवधारणा शायद इसलिए लाई गई थी कि समाज को नियमों में बाँधा जा सके,कोई शक्ति सोची जा सके जो सब अच्छे-बुरे के लिए जिम्मेदार हो, जिससे डरा जा सके, जिसपे विश्वास किया जा सके, जो काम हमारी समझ से परे हो, उसके लिये उसे उत्तरदायी कहा जा सके और पाप-पुण्य इसलिए बनाए गए, ताकि कोई किसी का अहित करता हुआ डरे।


गौरव जी,
आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं, भारत का इतिहास इसी का प्रमाण प्रस्तुत करता है। मगर अफ़सोस, इन संकल्पनाओं का केवल दुरुपयोग हुआ। हित बहुत कम हुए हैं।

जहाँ तक उसके होने और न होने की संकल्पना है तो उसके भी कई प्रकार हैं (हालाँकि यह गौरव को बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्होंने दर्शन को पढ़ा है और खुशी की बात है कि मैंने भी भारतीय दर्शन को बहुत पढ़ा है, यहाँ कुछ अपना ज्ञान बाँटना चाहूँगा)-
१॰ ईश्वरवादी- ऐसे लोग जो ईश्वर की लौकिक या पारलौकिक संकल्पना में विश्वास करते हैं। ऐसों का भक्ति ही कारक तत्व है क्योंकि चाहे साकार संकल्पना हो या निराकार दोनों को केवल आस्था (कहीं कहीं डर) ही संचालन करती है।
२॰ अईश्वरवादी- जिन्हें ईश्वर के किसी भी तरह के अस्तित्व पर विश्वास नहीं होता। गौरव इसी श्रेणी में आते हैं। पूरे विश्व में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम रही है , यहाँ तर्क की संभावना ज्यादा होती है और तर्क हमेशा प्रमाण माँगता है।
३॰ संदेहवादी- जो इस संशय में पड़े हैं कि ईश्वर है या नहीं।

भारत के वर्तमान बाबाओं ने भी ईश्वरवादिता के मकड़जाल को और घना और मज़बूत कर दिया है। मैंने अब तक इन विषयों पर सैकड़ों लोगों के बात की है और आश्चर्यजनक परिणाम सामने आये हैं कि १ प्रतिशत लोग भी भारतीय दर्शन का ज्ञान नहीं रखते। जो माँ-बाप से परम्परा में पाये हैं (वो भी दूषित रूप में), उसे भी नई पीढ़ी को हस्तांतरित करते रहते हैं। ऐसे में गौरव ज़रूर उम्मीद के सूरज हैं।
२॰

Anonymous का कहना है कि -

Bahut hee achchi rachnayen hai.
Bahut achche bhav hai. Badhai.
santosh Kumar Singh

piyush का कहना है कि -

सभी चर्चा कर्ताओं को प्रणाम.......
मै अभी इस स्तर के लायक ना ही परिपक्व हूँ, ना मेरी उम्र है.. और ना ही मैने शैलेश जी अथवा ग़ौरव जी कि भाँति दर्शन का अध्ययन किया है....
मै अभी तक इस पूरी चर्चा को एक दर्शक कि और से पूर्ण तथस्तता के साथ देखता आया हूँ ......और मै भी अब कुछ कहाँ चाहूँगा
पहली बात यह है कि मै भी आ ईश्वरवादी या कहें ग़ौरव जी कि भाँति संदेहवादी हूँ....
समझ मे आता है कि शोभा जी अपनी बात को समझा नही पा रही है संभवत: इसलिए क्यूँकी वे केवल गीतादी पुरनो को आधार मानकर तर्क देतीं आ रही है ...
अभी तक तर्क सबसे अधिक पुश्ट लगे वो है ग़ौरव जी ,आलोक जी और शैलेश जी
मै भी चूँकि संदेहवादी हूँ सो ग़ौरव जी कि बातों को समझ सकता हूँ
मेरे अंदर भी बहुत से प्रश्न है कि मै कहाँ से आया ....ये दुनिया क्या है..........समय क्या है ...........ईश्वर क्या है.....ये सब क्या हो रहा है....... पूर्ण रूप से भ्रमित... .......
नितरी पर सभी अपनी राय दें चुनके है सो मेरी कोई भूमिका नही बनती यहाँ और अगर बनती भी तो शायद मै उसका निराकरण नही कर पाता ..........
बिग बेंग कि बात है तो कभी कभी मै उसकी तुलना पुरनों मे दी गयी जानकारी से करता हूँ कि.......शुरु मे जब सृष्टि नही थी तब सिर्फ़ ऊर्जा थी[अभी इस ऊर्जा को ईश्वर की तरह माने] फिर उसने स्वयम को फैलाना आरंभ किया[बिग बेंग] और फिर त्रिदेव बने और फिर सृष्टि ......सो पुरानो मे कुछ सत्यता जान पड़ती है......
ग़ौरव जी की एक बात यह भी थी की यदि ईश्वर है तो वो फिर हमे उसके बारे मे जानने क्यूं नही देता क्यूं हमे सदा ही भ्रमित कर रखा है.......तो उसके बारे मे मै यह कहना चाहूँगा की वो यदि है तो पूरानो के अनुसार वा हमे जानने के पूर्ण अवसर देता है परंतु हम ही इस काबिल नही है कि उसे जान पाएँ....
मै नही जानता कि ईश्वर है कि नही परंतु यह जानता हूँ कि सभी कि ग़लतियों कि सज़ा उन्हे तुरंत ही मिलना चाहिए ....देर साबेर नही......
यहाँ यह मुहावरा भी मुझे ग़लत प्रतीत होता है कि ईश्वर के यहाँ देर है अंधेर नही....... अरे भाई देर भी क्यूं है...?यहाँ नितरी से संबंधित आलोक जी का तर्क मुझे बुद्धिमत्तापूर्ण लगा मै यहाँ आलोक जी का और ग़ौरव जी दोनो का ही समर्थन करता हूँ और आदरणिया शोभा जी से कहूँगा कि सिर्फ़ उपनिषदों पर निर्भर रहना ही ठीक नही है यह अंध श्रद्धा है..... हम मनुष्य है तर्क हमारी विशेषता है.
भारतवासी जी को तथस्तता के लिए साधुवाद देना चाहूँगा....
धन्यवाद

shobha का कहना है कि -

पीयूश
तुम भी गौरव की भाँति तर्क कर रहे हो । सुनो एक कहानी सुनाती हूँ ।
एक बार ४ अन्धे कहीं जा रहे थे । उन्होने कभी भी हाथी को नहीं देखा था ।
अचानक किसी की आवाज़ आई- हाथी-हाथी । चारों सचेत हो गए । हाथी को
देखने की इच्छा हुई । अतः पास जाकर हर एक ने हाथी को छुआ । फिर
निष्कर्ष निकाला । पहले ने हाथी का कान छुआ था । उसने कहा- हाथी पंखे
जैसा होता है । दूसरे ने हाथी का पाँव छुआ था । वह बोला - हाथी खम्बे जैसा
होता है । तीसरे ने हाथी की पीठ को छू कर बताया- हाथी दिवार जैसा होता है ।
चौथे ने हाथी के दाँत को हाथ लगाया और कहा- हाथी हाथी पत्थर जैसा होता है ।
ये चारों ही सत्य बोल रहे थे । अपने- अपने अनुभव के आधार पर सबने ईश्वर का
वर्णन किया । इनके ग्यान का आधार इनका अनुभव था ।
ईश्वर के सम्बन्ध में भी यही बात सही है । हम सब अपने अनुभव और ग्यान के आधर
पर उसकी व्याख्या करते है और दूसरे को गलत मानते हैं । किन्तु सत्य किसी एक के अनुभव
का मोहताज़ नहीं होता ।
मैने तुमसे अधिक पढ़ा है किन्तु मेरे अनुभव ने बहुत बार मुझे ईश्वर की अनुभूति कराई है ।
मैने अपने जीवन में कभी भी उसे किसी के साथ अन्याय करते नहीं देखा ।
मेरे ग्यान का आधार मेरा अनुभव है फिर भी मै मानती हूँ कि आज दुनिया में ऐसा बहुत कुछ हो रहा
है जो दिल मे सन्देह पैदा करता है । तुमने दुनिया मे लोगों को दुखी होते देखा है किन्तु
मैने लोगो को पाप कर्म करते भी देखा है । जितने दुख-दर्द हैं उतने पाप कर्म भी तो हैं ।
फिर कौन किस पाप का क्या दन्ड पा रहा है हम नहीं जानते और शंका करते हैं ।
बिना जाने ईश्वर को दोषी मानना क्या उचित है ?
इतने तर्कों से मुझे यह लगा कि शायद तुम लोग समय आने पर स्वयॅ समझ जाओगे ।
अभी तो इतना ही काफी है कि अपने आस-पास के लोगों का जीवन आसान बना दो ।
किसी दिन ईश्वर की स्वयं कृपा होगी ।

shobha का कहना है कि -

ईश्वर और उसकी दंड व्यवस्था - वही जाने । हमारे साधु-सन्तों ने भी कभी इस पर सन्देह
नहीं किया । सहज स्वीकारा है । हमारा अग्यान हमें यह अनुमति नहीं देता कि हम ईश्वर
की बनाई रचना और उसकी व्यवस्था में कमियाँ निकालें । यदि कोई सन्देह है तो अध्ययन
करो । विवेकानन्द की तरह खोजी बनो । किसी की आस्था और विश्वास को चुनौती देकर
कोई प्रयोजन पूरा नहीं होगा । आशीर्वाद सहित

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

बिग बेंग कि बात है तो कभी कभी मै उसकी तुलना पुरनों मे दी गयी जानकारी से करता हूँ कि.......शुरु मे जब सृष्टि नही थी तब सिर्फ़ ऊर्जा थी[अभी इस ऊर्जा को ईश्वर की तरह माने] फिर उसने स्वयम को फैलाना आरंभ किया[बिग बेंग] और फिर त्रिदेव बने और फिर सृष्टि ......सो पुरानो मे कुछ सत्यता जान पड़ती है......

पीयूष जी,

आपकी बात बिलकुल सत्य है। दुनिया में ईश्वर की व्याख्या करने वालों के भी तीन प्रकार हैं-

पहला जो ईश्वर और उसकी सृष्टि को विलग निकाय मानते हैं। मतलब ब्रह्मांड के बाहर ईश्वर का अस्तित्व है। इसे बहुत तार्किक संकल्पना नहीं मानी जाती। (यह आमतौर पर ईसाइयों और मुस्लिमों के शास्त्रों में देखी जाती है)

दूसरा जो कि ईश्वर और उसकी सृष्टि को भिन्न करके नहीं देखते। मतलब उसका अस्तित्व उसकी प्रकृति में ही निहित है। मतलब पदार्थ भी वही है और प्रकृति भी वही।

तीसरा जिसे वैदिक संकल्पना भी कहा जा सकता है। वो पदार्थ और प्रकृति को अलग मानता है, मगर एक दूसरे का पूरक। एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है। जैसे शिव और शक्ति (वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्या करें तो गतिकी और स्थैतिकी, ज्योति और दीपक, जैसे स्थातित्व पाने की कोशिश गति का कारण है, उसी प्रकार गति पाना भी स्थातित्व का कारण है, उदाहरण के लिए इलेक्ट्रान के नाभिक के चारो ओर चक्कर लगाना, पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना)। इस सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सृष्टि एक ऊर्जा का स्रोत थी, वो इसका एकवचन कहा जाता है, जिसे वेद ईश्वर भी कहते है, ब्रह्मांड चूँकि फैलते रहने, बढ़ते रहने का नाम है, अतः ब्रह्मंड एकवचन का बढ़ता हुआ रूप है, उसका बढ़ते रहना उसकी प्रकृति है, एक के बिना दूसरा नहीं है। कालांतर में संचालन के लिए शक्तिओं का निर्माण या उदय एकवचन का बहुवचन में परिवर्तित होना भी कहलाता है और चूँकि पृथक अस्तित्व नहीं है, इसलिए आगे इसे अद्वेतवाद भी कहा जाता है।

इन सारी मीमांसाओं का बस इतना ही सार है कि ये मात्र संकल्पनाएँ हैं, कुछ अवैज्ञानिक और कुछ आंशिक वैज्ञानिक (या विज्ञान की वर्तमान क्षमता के बाहर)। हर कोई ईश्वर के संबंध में अपनी मान्यताएँ बनाने को स्वतंत्र है। लेकिन बुजुर्गों का स्वयम् अपने शास्त्रों का ज्ञान न होना , चिंता का विषय है।

प्रक्रिया-परिणाम ईश्वर नियंत्रित हैं (यदि ईश्वर को प्रकृति माना जाय)। लेकिन किसी भी अच्छाई-बुराई के लिए वो जिम्मेदार नहीं है। हाँ ये मान्यताएँ ज़रूर कटघरे में खड़ी होती हैं।

piyush का कहना है कि -

शोभा जी को सादर प्रणाम
आर्रे शोभा जी ....आपने मेरी टिप्पणी को नही पढ़ा ठीक से.............
मैने भी आपकी बात का समर्थन ही किया था....

"बिग बेंग कि बात है तो कभी कभी मै उसकी तुलना पुरनों मे दी गयी जानकारी से करता हूँ कि.......शुरु मे जब सृष्टि नही थी तब सिर्फ़ ऊर्जा थी[अभी इस ऊर्जा को ईश्वर की तरह माने] फिर उसने स्वयम को फैलाना आरंभ किया[बिग बेंग] और फिर त्रिदेव बने और फिर सृष्टि ......सो पुरानो मे कुछ सत्यता जान पड़ती है......
ग़ौरव जी की एक बात यह भी थी की यदि ईश्वर है तो वो फिर हमे उसके बारे मे जानने क्यूं नही देता क्यूं हमे सदा ही भ्रमित कर रखा है.......तो उसके बारे मे मै यह कहना चाहूँगा की वो यदि है तो पूरानो के अनुसार वा हमे जानने के पूर्ण अवसर देता है परंतु हम ही इस काबिल नही है कि उसे जान पाएँ....
मै नही जानता कि ईश्वर है कि नही परंतु यह जानता हूँ कि सभी कि ग़लतियों कि सज़ा उन्हे तुरंत ही मिलना चाहिए ....देर साबेर नही...... "

"
मै आप की बात से सहमत हूँ ....पर आप अपनी बात को समझाने के लिए ग़लत आधार का चयन कर रही है....... आप अगर यह कहें की हम सक्षम नही है ईश्वर को जानने के लिए वो बात सही है...परन्तु चूँकि साधु संत यही करते आ रहे है इसलिए इस बात को स्वीकार कर लेना यह बात तर्क विहीन है......
आप मुझे अपना विरोधी अथवा ग़ौरव जी मुझे अपना साथी ना माने तो बेहतर होगा मै भी शैलेश जी की भाँति अपने विचार रख रहा था और कुछ भी नही....
हो सकता है आप मुझे ग़ौरव जी के साथ माँ ले क्यूं कि पूर्ण स्वाभाविकता के साथ मै भी संदेहवादी हूँ और अनायास है हो सकता है कि मै ग़ौरव जी का समर्थन कर बैठून पर ऐसा कुछ भी नही है
मेरे माता पिता भी बहुत अधिक धार्मिक थे सो वा बात मुझे भी विरासत मे मिली है....
मै अभी भी नवरात्रि का उपवास रखता हूँ पर माँ काली को प्रसन्न करने के लिए नही वरन् उपवास के बहुत से फ़ायदे है .....
आशा है कि आप मेरी बात समझ सकेन्गि...एक और बार प्रणाम

piyush का कहना है कि -

शोभा जी
आप मेरे लिए अंत्यंत ही आदरणियाँ है....
अगर भूल से भी आपके विरुद्ध मेरी तरफ़ से कोई दुससाहसिक शब्द निकल गाये हो तो उन्हे अन्यता ना ले....
मै आपकी आस्था पर उंगली नही उठा रहा....
अगर मै आप पर उंगली उठता हूँ तो मै किसी का अनदार कारू या ना करून्न सर्व प्राथम मै अपने माता पिता का अनदार करूँगा...
सो क्षमा करें पर बस मै आपके समक्ष अपने विचार ही रख रहा था
बस अपने प्रश्नो के जवाब ही माँग रहा था
मैने विचारा कि हो सकता है मै यहाँ , इन ग्यानीयों के बीच मे अपने भ्रम को मिटा पाऊं पर यह संभव ना हो सका....
आप लोग मेरी बातों को नही समझ पा रहे है....
मै आप से एक प्रश्न करना चाहूँगा कि-
बिल गेट्स और हिमालय मे एकांत मे साधना करने वेल साधु मै से कौन बेहतर स्थती मे है?
दोनो ही सुखी है....... दोनो ने ही किसी का अहित नही किया...
एक सम्मान पा रहा यशस्वी है तो दूसरा अपने मे ही मस्त है....
संसार से दूर रहना भाल है कि उस मे घुल जाना?
जबकि दोनो मे ही सुख है????????????
एक बार और क्षमा माँगता हूँ और आशीर्वाद का याचक हूँ
धन्यवाद

piyush का कहना है कि -

vastav me mai jo kahna chah raha tha vo shailesh ji ne bakhoobi samajha diya hai........
shailesh ji se mai harf-ba-harf sahmat hoon...
ek ek akshr jo maine kahna chaha th so bol diya gay...
is hetu shilesh ji ko dhnywad
mai ab aur kuch nahi khoonga

dats it............

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

पीयूष जी,
आप अपनी बात कहने के पश्चात इतना डरें नहीं क्योंकि तर्क-वितर्क में किसी का अपमान या अनादर नहीं होता। हम सब यहाँ एक स्वस्थ चर्चा के लिए हैं।
वैसे आप भी मेरी तरह सन्देहवादी हैं तो आपके किसी प्रश्न का मैं उत्तर नहीं दे पाऊँगा। आपने पुराणों का हवाला दिया लेकिन साथ ही आप स्वयं उनसे संतुष्ट नहीं हैं, तो मेरा अब कुछ कहना आवश्यक नहीं है।
शैलेश जी ने आपकी बात की पूरी व्याख्या करके उसे और अधिक स्पष्ट कर ही दिया है।
शोभा जी,
आपसे कहना चाहूंगा कि आप खुद मेरे पक्ष में बोली हैं-
हम सब अपने अनुभव और ज्ञान के आधर
पर उसकी व्याख्या करते है और दूसरे को गलत मानते हैं । किन्तु सत्य किसी एक के अनुभव
का मोहताज़ नहीं होता।
यही तो मैं कह रहा हूं कि सब ईश्वर की अलग अलग व्याख्या करते हैं, लेकिन केवल सिद्धांतों से ही कोई चीज सच नहीं हो जाती। हो सकता है कि कभी किसी भले इंसान ने आपके साथ भला किया, विपत्ति में काम आया और आपने श्रेय दिया ईश्वर को। आपने कहा कि ईश्वर ने ही उसे माध्यम बनाकर भेजा।
ऐसा इसलिए क्योंकि आपने जो पढ़ा और सुना, उसी के अनुसार अपना जीवन-दर्शन बनाया। मेरे साथ कोई भला करता है तो मैं उस व्यक्ति को भला मानता हूं, न कि यह मानता हूं कि यदि कोई अच्छा है तो वह ईश्वर-प्रेरित होने की वजह से है।
आप कह रही हैं-
हमारे साधु-सन्तों ने भी कभी इस पर सन्देह
नहीं किया । सहज स्वीकारा है । हमारा अज्ञान हमें यह अनुमति नहीं देता कि हम ईश्वर की बनाई रचना और उसकी व्यवस्था में कमियाँ निकालें।

आपने जो बात कही, इसका कुछ अधिक कठोर रूप मैंने कल कुरान में पढ़ा था। उसमें लिखा था कि यदि कोई ईश्वर के होने का प्रमाण माँगना चाहेगा तो उसे क़त्ल कर दिया जाएगा।
इस बात पर विश्वास कीजिए कि हम ऐसे युग में हैं जहां सवाल पूछना जुर्म नहीं माना जाता। और खुद को अज्ञानी कहना तो बहुत निरर्थक है क्योंकि फिर आप किसे और कैसे तलाश पाएँगे? आप तो इस तरह से कह रही हैं, जैसे हम सब उसके दास हैं और बग़ावत करना अपराध। अगर भगवान कहीं है भी तो आपके अनुसार तो वो तानाशाह की तरह है।
वैसे भी एक बात कहूँ...जो बहुत पहले से कहना चाह रहा था।
जिन्हें अपने भीतर की शक्ति पर भरोसा नहीं होता, वही सहारे के लिए बाहर कोई शक्ति तलाशते हैं।

तपन शर्मा का कहना है कि -

पीयूष जी भी चर्चा में शामिल हो गये हैं..अच्छी बात है.
सही गलत के बारे में तो मैं नहीं जानता परंतु जो मैं मानता हूँ, वो आप लोगों के साथ बाँटना चाहूँगा।
हम सभी ने दसवीं तक तो विज्ञान पढ़ा ही है। हम सभी जानते हैं कि हर वस्तु का सबसे छोटा हिस्सा अणु (ऐटम)कहलाता है।
किसी भी वस्तु के टुकड़े करते चले जायेंगे तो हम एटम तक पहुँच जायेंगे... इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे कुर्सी की लकड़ी एटम से बनी है... उसी एटम से जिससे हमारा शरीर बना है..हमारा दिल बना है हमारा दिमाग, फ़ेफ़ड़े, गुर्दे, टाँगें, हाथ, शरीर का एक एक अंग उसी से बना है..
फ़िर हमें और कुर्सी को ऐसी कौन सी चीज़ है जो अलग करती है.. क्यों है हम में जान? क्यों नहीं फ़ूँक सकते हम मुर्दा जिस्म में जान? क्यों होती है मृत्यु? ऐसा क्या है हमारे शरीर में जो अलग करता है हमें और हमारी कुर्सी को? मुर्दे और जिंदा इंसान में फ़र्क क्या है?
अभी तक इन सभी सवालों के जवाब विज्ञान के पास नहीं हैं..शायद मिल भी न पायें..विज्ञान तर्क बहुत करता है.. ः-)

इन सभी सवालों के जवाब हमें गीता आदि प्राचीन ग्रंथों में मिल जाते हैं.. (मैंने गीता नहीं पढ़ी.. केवल कुछ श्लोक, दसवीं में संस्कृत की किताब से..और गीता सार पढ़ा है..)
गीता को यदि सच मानें तो पायेंगे कि हर शरीर में आत्मा होती है.. वो न मरती है..न जन्म लेती है..केवल शरीर बदलती है...
सृष्टि ऊर्जा से बनी है..हम सभी में ऊर्जा है..
और एक ऐसी शक्ति है..जो हम सब को (जीव अथवा निर्जीव) जोड़ कर रखती है.. यूँ कहें तो, वो माला जिसके मोती इतने करीब हैं कि उस माला का धागा दिखाई नहीं देता..
ज़रा सोच कर बताइयेगा, विज्ञान मुर्दा जिस्म में जान और उसमें इमोशंस कैसे ला सकता है.. प्रयोग चल रहे हैं..चलते रहेंगे..

एक और बात.. क्य आपको मालूम है आप जब साँस निकालते हैं तो उसके साथ कितने एटम बाहर निकालते हैं.. अर्बों खरबों की संख्या में.. और जब साँस लेते हैं तब उतनी संख्या में एटम अंदर लेते हैं..
इसका मतलब साफ़ है.. विज्ञान की मानें तो आप एक साल में अपना तीन चौथाई शरीर बदल चुके हैं.. और हर दो साल के बाद आप वो नहीं रहते जो आप दो साल पहले थे!!!
आपका शरीर कितनी बार पूरी तरह से बदल चुका है इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं.. इसका मतलब ये हुआ कि हम सब अपने अंदर के एटमों का आदान प्रदान करते रहते हैं.. ये सब बातें मेरी नहीं विज्ञान की हैं..
एटमों से बने इस शरीर में जान कैसे.. सवाल बहुत हैं..जवाब फ़िलहाल एक..

आत्मा से ही शब्द बना.. परम् + आत्मा (परमात्मा) जो हम ईश्वर के लिये प्रयोग करते हैं..आत्मा को मानते हैं..तो प्रमात्मा को भी..

आपने स्कूल, कॉलेजों में परीक्षायें तो दी होंगी.. क्या आप परीक्षा देने के तुरंत बाद अपने सही अंक बता सकते थे.. (मैं तो बस अंदाज लगा सकता था).. पर रिज़ल्ट उसी समय नहीं आता था..समय तो लगता ही था..ईश्वर भी सही समय का इंतज़ार करता है..

एक कांस्टेबल से एक आदमी ने पूछा..कि भाई तुम सिपाही हो?
उसने कह "उससे भी ऊपर"..आदमी ने फ़िर पूछा..इंस्पेक्टर?
जवाब मिला.."उससे भी ऊपर"...फ़िर पूछा डी आई जी हो? "उससे भी ऊपर"..इसी तरह करते करते आदमी ने पूछा राष्ट्रपति हो..
जवाब वही "उससे भी ऊपर"...
तब वो आदमी झल्ला के बोला..तो फ़िर भगवान वो..जवाब फ़िर मिला "उससे भी ऊपर"
आदमी ने कहा.. तुम झूठ बोलते हो..उसके ऊपर कुछ नहीं होता...
कांस्टेबल बोला... तुम ने सही कहा.. मैं "कुछ नहीं हूँ"..
जो है केवल ईश्वर है...और बाकि सब कुछ नहीं..रामचरितमन्स में लिखा है..ये संसार ऐसी माया है..जिससे अच्छे अच्छे फ़ँस जाते हैं...

मैं जानता हूँ कि बड़ा मुश्किल है विज्ञान और ईश्वर का मिलन..
एक तर्क पर चलता है..एक भावना और विश्वास पर..
(हालाँकि आजकल लोग बेकार की बातों से इतने परेशान हैं कि विश्वास की जगह् अंधविश्वास करना शुरु कर दिया.. मूर्तियों का रोना, फ़ूलमाला के फ़ूल बढ़ना, मूर्तियों का दूध पीना आदि)
परंतु कुछ सवालों के आगे विज्ञान ने मुँह की खाई है..जिसके बारे में हमारे ग्रंथ कहते आये हैं..

अभी के लिये इतना ही...
धन्यवाद..
तपन शर्मा

कुमार आशीष का कहना है कि -

शैलेश जी.. यहां तो बहुत गुलगपाड़ा चल रहा है। भाई, मेरी टिप्‍पणी के बाद गौरव जी सन्‍देहवादी हो गये थे तो लगा कि चलो ठीक है..हालांकि पहले उन्‍हें नास्तिकता तप:साध्‍य प्रतीत हो रही थी.. और आपने आगे आते आते फिर से उन्‍हें 'अईश्‍वरवादी' बना दिया। खैर, यहां उलझाव इसलिए बन रहा है क्‍योंकि सीधे 'परमात्‍मा' पर चर्चा शुरू कर दी गयी है.. और ये तो ऐसे ही हुआ कि कौवा कान लेकर गया तो कौवे के पीछे दौड़ पड़े। पहले यह तय करो कि 'आत्‍मा' है अथवा नहीं। बाद में जिसने जाना उसने कहा- अयं आत्‍मा ब्रह्म'- वो अलग की बात है। उसके आगे भी पहुंचो.. मेरी शुभकामना है। गौरव जी, आपका सांख्‍यवादी दृष्टिकोण 'सृष्टि बनने के बाद सब कुछ नियंत्रण प्रकृति के पास ही छोड़ दिया गया हो।' अत्‍यन्‍त स्‍वाभाविक है। हमारा सृष्टि-चक्र वर्तमान में वस्‍तुत: सांख्‍योन्‍मुख ही है जहां प्रकृति ही सर्वेसर्वा है और पुरुष छायामात्र..और जो आपने कहा 'क्या आपको नहीं लगता कि हम एक ऐसी न्याय-व्यवस्था के भरोसे जी रहे हैं, जिसका न सिर है न पैर..हम में से किसी ने उसके संचालक को नहीं देखा है, उसको कृष्‍ण बिहारी नूर ने बड़ी खूबसूरती से कहा है- जिन्‍दगी से बड़ी सजा ही नहीं। और क्‍या जुर्म है पता ही नहीं। मगर पीयूष भाई थोड़ा जल्‍दी में हैं..तुरन्‍त का तुरन्‍त। इसमें इतनी जल्‍दी हो पायेगी। होगा, तुरन्‍त का तुरन्‍त भी.. मगर वह तो कर्म सिद्धान्‍तानुसार 'साम्‍यावस्‍था' की स्थिति है। तुरन्‍त का तुरन्‍त होने लगे फिर खटका काहे का। अभी तो शैलेश भाई के लिए 'भय ही भगवान' है। शोभा जी, आपने 'हाथी' की कहानी अच्‍छी सुनाई। वास्‍तव जैसा पूर्व टिप्‍पणी में मैंने इंगित किया था किसी भी सिस्‍टम का अचूक परीक्षण वही कर सकता है जो सिस्‍टम के बाहर गया हो..फिर सिस्‍टम में लौटा हो। सिस्‍टम के भीतर तो सबको कुछ न कुछ गढ़ना है। गालिब का एक शेर याद आया, सुनियेगा-
है परे सरहदे इदराक से अपना मसजूद
किब्‍ला को अहले नजर किब्‍लानुमा जानते हैं
उपनिषद कहता है जहां से मन और वाणी बिना उसको पाये हुए लौट आते हैं, उसके पार उसका क्षेत्र शुरू है। मगर, ये सब सुन कर पेट में दर्द क्‍यों शुरू हो जाये.. यहां सन्‍देहवाद ठीक है.. ना आस्तिक..ना नास्तिक.. बल्कि सन्‍देहवाद भी उचित नहीं.. उचित तो है वैज्ञानिक दृष्टिकोण। जैसा पूर्व टिप्‍पणी में मैंने कहा 'मालिक को कभी कभी नौकरों की भी खबर लेनी चाहिए'..बस यहीं से बात शुरू हो सकती है..इन्द्रियों के प्रमाण पर ही नजर मत डालिए.. उनकी प्रामाणिकता पर भी प्रश्‍नचिन्‍ह लगाइये। पीयूष भाई, फिजूल के व्रत छोड़ दीजिए.. तेरी एक निगाह की बात है..मेरी जिन्‍दगी का सवाल है.. ऐसे जुट जाइये। जिन्‍दगी प्‍याज के छिलकों की तरह खुलती है।
कठोपनिषद कहता है...
नायं आत्‍मा प्रवचनेन लभ्‍य न मेधया न बहुश्रुतेन..
आगे का याद नहीं.. मगर कहा गया है कि जिस पर यह खुद रीझ जाता है.. उस पर खुद को खोलता है।
अब सवाल ये है.. जिसे तू कुबूल कर ले वो अदा कहां से लाऊं..
और गौरव जी.. जैसा आपने कहा 'कुछ प्रत्यक्ष' तो जान लीजिए ईश्‍वर को सर्वथा भ्रम-भंजक कहा गया है।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

आशीष जी,
आपने एक साथ जाने कहाँ से ढूंढ़् कर बहुत सी बातें कह दीं, जो एक बात कहती तो मालूम नहीं पड़ रहीं। खैर, लग रहा है कि आप इस बार पूरी तैयारी के साथ उपनिषद और पुराण साथ लाए हैं।
वैसे फिलहाल तो ग़ालिब का ही एक शेर अर्ज़ करूंगा, क्योंकि आपने उनका भी हवाला दिया है।

ख़्वाहिश को अहमकों ने परस्तिश दिया करार
क्या पूजता हूँ उस बुत-ए-बेदादगर को मैं?

परस्तिश-पूजा, बुत-मूर्ति, बेदादगर- निर्दयी

शेष फिर कभी..तब तक और लोग भी अपनी बात रखें।

piyush का कहना है कि -

सभी चर्चा कर्ताओं को प्रणाम............
ग़ौरव जी.... मै तर्क करने के पश्चात डर नही रहा हूँ मुझे लगा की शोभा जी की आस्थाओं को हमारे द्वारा चोट पहुँचाई गयी सो मैने तर्क रखने के पश्चात ही माफ़ी माँगी.......
अभी यदि शोभा जी मुझसे या आपसे नाराज़ है भी तो वें मुझे मारने भोपाल तो नही आ सकती है...{हा हा हा}

और जैसा की मै उपर कह ही चुका हूँ , और पुरनो का हवाला देने के पश्चात मैने स्वयम ही उनका विरोध किया था तो इससे यह सुस्पष्ट है कि मै भ्रमित हूँ.....
यथार्थ मे मुझे धर्म की कुछ बातें अच्छी लगती है और कुछ बुरी....
ऐसा सभी के साथ होता होगा.....
जिन्हे मै तर्क के साथ , या अपनी मनो शांति हेतु हल कर सकता हूं वो अच्छी है परंतु जो तर्क रहित है वो मुझे पसंद नही बस यही बात है....

मै मानता हूँ कि..............जो भगवान को नही मानते या कहें कि यह माने कि ईश्वर का अस्तित्व नही है तब भी .....उन्हे बिना किसी तर्क के उसे स्वीकार कर लेना चाहिए क्यूँकी ..... मुश्किलो के समय मे जब कोई सहारा नही होटर तो भी यह सोचकर हमे संबल मिलता है कि हमसे उपर ईश्वर है और वह हमारी मदद करेगा.......
यह तर्क विहीन बात है परंतु इस मान्यता से सिर्फ़ लाभ ही है नुक़सान कुछ भी नही.......

शोभा जी अंत्यंत ही धार्मिक है अथवा कहें कि धर्मान्ध है अत: उन्हे धर्म के समक्ष कुछ भी नही दिखाई दे रहा.... इसमे उनकी ग़लती नही है भारतीय परिवेश मे भी धर्म को सर्वोत्तम और सबसे उपर बताया गया है.................

ग़ौरव जी कि वो आत्म शक्ति वाली बात से मै आंशिक रूप से असहमत हूँ................
बच्चा जब छोटा होता है तो वह भी जहाँ तक हो सके मुश्किलो को स्वयं ही हल करने कि सोचता है पैर उसके सामर्थ्य से बाहर कि समस्याओं के हल के लिए वो माता पिता का सहारा लेता है//..........
है कि नही..........
वैसे ही जब कोई ट्रॅजिडी हो जाए हमारे साथ जो हमारे हंतो मे हो ही ना तो......तब आप अपना शक्ति प्रदर्शन किस पैर करेंगे ग़ौरव जी?
मई अपने माता पिता खो चुका हूँ सो मई इसे अपनी कमज़ोरी मानू कि मई समर्थ नही था सो वे चले गये या आप कहें कि मई कुछ कर सकता था????????
ख़ैर मुझे यह सब आप लोगों से नही कहना चाहिए...


तपन जी क्या कहना छह रहे है मै समझ नही पय...कि वे क्या कहना छह रहे है क्यूँकी कहीं वे स्वयं ही तर्क देते है और बाद मे विगयन का विरोध करते है....
यहाँ तक कि उनके तर्क भी .... अजीब और आंशिक रूप से ग़लत है...
ख़ैर हम यहाँ विगयन पैर चर्चा नही कर रहे हैं


आशीष जी कि बातें अच्छी लगी ....उन्होने धर्म कि या ईश्वर कि पैरवि...बिन किसी लग लपेट के कि है..
बस मै यह ही कहना चाहूँगा कि आशीष जी आप उल्टा कह गये.......
यदि तुरंत का तुरंत नही हुआ तो....लोग समझ ही ना पाएँगे कि ग़लती कहाँ थी...
आप ने आज कोई ग़लती कि और 10 साल बाद आप को कोई ठप्पड़ मार दे
तो आप भी दो जूते उसे लगाएँगे और पूछेंगे कि क्यूं मारा.......
और संभवत: यही आ ईश्वारवादियों कि नस्तिकता का आधार और हेतु है.......
क्या कहते है आप?
और रही व्रत कि बात........तो शायद आपने मेरी टिप्पणी अच्छे से नही पढ़ी क्यूँकी व्रत तो महात्मा गाँधी भी करते थे वो भी व्यर्थ ही नही अर्थ के साथ .....सो वही कारण मेरा भी है..........

ग़ौरव जी मुझसे कुछ ज़्यादा ही नास्तिक है........वे तो संदेहवादी भी नही थहरते.......... क्यूँकी स्पष्ट रूप से वो ईश्वर या किसी अन्य ऊर्जा (जो भी है संसार मे) को ही नकार रहे है
पैर तब भी मई उनका कुछ कुछ समर्थन करता हूँ क्यूँकी उनके पास तर्क है और किसी के पास नही...... ना ही आशीष जी के पास ना ही तपन जी के पास..

piyush का कहना है कि -

sory for gramatical mistakes done in above written para..........
i ws un hurry and the keyboard is nt working properly............

hopely u all wud understand wat i want to say.........

thanx

कुमार आशीष का कहना है कि -

पीयूष जी, आपकी बात पूरी समझ में आ गयी और बहुत अच्‍छी लगी क्‍योंकि आप दिल से सोचते हैं।
पीयूष जी मैंने कहा जो कहा कि- 'होगा, तुरन्‍त का तुरन्‍त भी.. मगर वह तो कर्म सिद्धान्‍तानुसार 'साम्‍यावस्‍था' की स्थिति है।'- वह बस इ‍सलिए कहा कि आपको अधीर देखा। जो संत की कोटि में आते हैं उनको तुरन्‍त का तुरन्‍त फल मिलने लगता है..सबको नहीं। बाकी सब तो थप्‍पड़ खाकर मुक्‍का तानते है.. पता नहीं सच या झूठ मगर कोई सुना रहा था कि बुद्ध को अंगुलिमाल ने घने जंगल में डांटा- 'ठहर।'- बुद्ध ने कहा मैं तो ठहर गया तू कब ठहरेगा। अब भाई, सच हो या झूठ..मगर मतलब तो छुपा ही है।
आपने लिखा था- 'मै अभी भी नवरात्रि का उपवास रखता हूँ पर माँ काली को प्रसन्न करने के लिए नही वरन् उपवास के बहुत से फ़ायदे है .....'
मुझे लगा कि आप 'शरीर' के फायदे में जुटे हैं- बस इसी से चुहल सूझी। क्षमा कीजिएगा। वही भूख के रूप में प्रकट होता है..वही भोजन के रूप में।
जिस दिन भगवान भोजन न जुटाये उस दिन एकादशी मना लीजिए.. वरना भरपेट मगन होकर खाइये-खिलाइये। जोर-जबरदस्‍ती की क्‍या जरूरत है।
हां, एक बात और.. यहां कोई ठीक से तर्क नहीं कर रहा है.. वरना 'ईश्‍वर नहीं है'- यह सिद्ध करना तो चु‍टकियों का काम है।

shobha का कहना है कि -

पीयूष जी
आपको केवल यह बताना चाहती हूँ कि मैं धर्मान्ध कदापि नहीं । आशीष जी ने बिल्कुल सही
कहा है कि चर्चा कहीं की कहीं पहुँच रही है । शायद हम सब ही एक दूसरे को अपनी बात
समझा नहीं पा रहे हैं । हाँ इतना अवश्य है कि हम सब बहस करने का आनन्द ले रहे हैं ।
अच्छा होगा कि हम सब एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए यह स्वीकार कर लें कि
अपना धर्म हर प्राणी को स्वयं निर्णय का अधिकार देता है । यहाँ कोई भी मुझे नास्तिक प्रतीत
नहीं हुआ । हाँ आस्था के अपने- अपने आयाम हैं । ईश्वर में और उसके न्याय में आस्था तब ही
होगी जब वह स्वयं चाहेगा । मैं तो बस इतना ही कहूँगी - सबसे प्रेम करो और सब पर दया करो ।
शुभकामनाओं सहित

विपुल का कहना है कि -

यह नहीं कहूँगा की मज़ा आ रहा है ! बिल्कुल नहीं आ रहा है. ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह ! ग़ौरवजी की बातें और पीयुषज्ी की भी मुझे अचरज़ में डालती हैं |
वैसे एक बात कहना चाहूँगा जिस विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं इस पर बात करते करते किसी को अपनी बात से डिगा पाना आकाश कुसूम तोड़ना है ! और मैं इसकी कोशिश भी नही कर रहा जैसा की मेरा व्यक्तिगत अनुभव है मैं 14-15 साल तक ईश्वर जैसी किसी भी चीज़ को नहीं मानता था पर ना जाने उसके बाद ऐसा क्या हुआ की मेरी विचारधारा मैं अचानक से इतना परिवर्तन आया की मैं घनघोर ईश्वर वादी हो गया |
मुझे याद है मेरी माँ ज्योतिश पर बड़ा विश्वास करती थीं और मैं नफ़रत |मुझे यह सब बस एक नाटक एक ढकोसला लगता था | माँ कहती थी की बेटा सुंदर कांड का पाठ किया कर और मैं एक ना सुनता था मुझे लगता था की यह भी एक कहानी है इसे बार बार रट्ने से क्या फ़ायदा ? इससे क्या होगा ? मैं नहीं जानता की क्या होता है पर यह जानता हूँ की होता है |
विग्यान की कसौटी पर देखें तो हैर एक धर्म की मान्यताएँ वैग्यानिक तथ्यों पर आधारित हैं हम ही उन्हे नही समझ पाते | जब बारिश शुरू होती है तो हम कहते हैं की "देव सो गये " ! अब आप बताएँ क्या सृष्टी का नियंता कभी सो सकता है ? मेरे मत से तो नही ! वास्तव में पुराने ज़माने मैं आवा गमन के साधन ना होने के कारण बारिश मे लोग संपर्क नहीं कर पाते थे सो शादी ब्याह जैसे कार्य इस समय में नही हो पाते थे ! बस इसीलिए कह दिया गया की भैया "देव सो गये है " | अब अगर कोई भारी बारिश में यात्रा करे जंगल नदी नाले पार करे और कोई कीड़ा मकौडा काट ले तो बोल दिया जाता है था की वो ईश्वर के विरोध मैं काम कर रहा था इसी लिए ऐसा हुआ
अब आप कहेंगे की मैं अपनी ही बातों को काट रहा हूँ मैने ऊपर कहा की मैं घनघोर ईश्वर वादी हूँ | मैं यह सब बस इसीलिए कहरहा हूँ कीं मेरे मित्र जो ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहे हैं काम से काम इस बहाने तो कुछ समझें |
मैं नही कहता की आप मंदिर जाओ या पूजा पाठ करो निदा फ़ाज़ली जी कहते हैं
घर से मस्ज़िद है बहुत दूर ,चलो किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए !{शेर में ग़लती हो सकती है }
भाई आप जो कर रहे हो उसी को पूरी मेहनत और ईमानदारी से करो बस यही ईश्वर आराधना है ! आप कहते हैं की आप संदेहवादी हैं | नहीं आप नही हैं ! संदेह मतलब की हाँ भी हो सकती है और ना भी | परंतु मुझे तो चर्चा से ग्यात हुआ की यहाँ तो कमर ही कस ली गयी है ईश्वर के विरोध में | ईश्वर अँधा है बहरा है अशक्त है रोगी है {नींद की गोलियाँ } ना जाने कितने आक्षेप लगाए गये हैं ! आपको पता है ईश्वर को नींद की गोलियाँ क्यों लेनी पड़ती हैं? इसीलिए नही की वो संवेदनहीन है बल्की इसीलिए की वह अत्यधिक संवेदन शील है जब वो ऊपर से बैठकर निठारी की तरफ़ देखता है तो सोचता है की अब क्या करूँ? मैने इन्हे गीता दी है रामायण दी है क़ुरान दिया है गुरु ग्रंथ साहिब दिया है और यह साले क्या कर रहे हैं ? वो भी माँ है ,पिता है तो हम बच्चों की करनी को देख कर अपना माथा ठोंक लेता है और नींद की गोलियाँ खा कर सो जाता है कहता है की लो बेटा जो कर रहे हो वही भुगतोगे कुच्छ साल बाद जब अगला निठारी होगा तब मैं तुमको बच्चा बनाऊंगा !
मुझे पता है की अब क्या सवाल उठेंगे आप कहेंगे की ईश्वर हमे उसको समझने क्यों नही देता ? यह शायद ऊपर कहीं पर कहा भी जा चुका है |
तो बंधु ! जब हम ईश्वर के अस्तित्व पर चर्चा कर सकते हैं तो क्या उसे समझने का गंभीर प्रयास नहीं ! मैं यह नहीं कह रहा हूँ की पढ़ाई लिखाई छोड़ कर निकल जाना चाहिए हिमालय की कन्दराओ में अपितु अपने में संलग्न रहते हुए भी उसकी सत्ता को महसूस किया जा सकता है बस उसके प्रति राग विराग़ छोड़कर एक बार दिल से प्रयास करने की ज़रूरत है मुझे पता है की मैने जो भी कहा बहुत से लोगो को बचकानी बात लगेगी परंतु मैने जो महसूस किया वही लिखा
वैसे भी यह विषय ऐसा है की कोई भी किसी को अंत तक अपनी बात नही मनवा पाएगा
बस इतना ही कहूँगा की अगर आप यह जानना चाहते की सेब का स्वाद कैसा होता है तो जाइए और उसे खाइए | ईश्वर भी स्वयम महसूस करने की चीज़ है इन वाद-विवादों से परे और एक शाश्वत सत्य !

Rajesh का कहना है कि -

Ishwar hai ya nahi hai, bahot dinon se bahot logon ne is per charcha kar lee hai. Shobhaji aur Vipulji se main sahmat hoon. lekin ek baat batana chahunga ki gaurav ji jo abhi shayad kafi young age main hai, kisi din jab unki age badhegi shayad woh yah samaj paye ki ishwar hai. aur phir ishwar hai ya nahi, ise proove karne ki jaroorat kyon hai? jo mante hai ishwar hai we mante rahe ki ishwar hai aur nahi mante unke saath jabardasti kyon? ab main khud bhi ishwar ke hajir hone per vishwas karta hoon. main ekdam majbooti se maanta hoon ki woh hai aur kai baar kuchh samay aisa laga bhi hai, jab sab taraf se ulaj jate hai, ki koi hamara yah kaam kar de, jo shayad hi ho paye, kahin koi shakti ne poora kar diya hai. aur main nat mastak us shakti ko manonan vandan karta hoon. tab main maanta hoon ki ishwar hai. ab koi meri manta ko jhootla de to main use jabaran kyon manva loon ki bhai maine kah diya hai to ishwar hai hi. shayad kabhi kisi din gaurav ji apne aap main yah baat mahsoos kare tab tak ke liye sab intejar kar lijiye. aur gaurav ji, ek baat aur, duniya mein sabhi dharam ke log, hindu, muslim, isai, shikh - 90% log buddhu to nahi hi hai jo maante hai ki ishwar hai. lekin haan hamare dharma ke kuchh ban baithe thekedar kabhi kabhi hume gumrah kar dete hai. bus hame gumraah nahi hona aur aise dhongiyon ko khula karna hai jo ishwar ke naam per logon ko murkh banate hai, apna business karte hai.

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

मैं एक आह भरता हूं
तो मेरी माँ रात भर सो नहीं पाती,
उसके करोड़ों बच्चे
हर रात भूखे सोते हैं,
तुम्हारा भगवान
क्या नींद की गोलियाँ लेता है?

ओह, बेचारी क्षणिका...आज पता नहीं क्यों, इन कुछ पंक्तियों पर बहुत तरस आ रहा है। आखिरी दो पंक्तियों की तो बहुत चीर-फाड़ की जा चुकी है और नतीज़ा..वही ढाक के तीन पात।
खैर, मैं पिछली दफा कुछ लिख नहीं पाया, उसका कारण यह नहीं था कि मेरे पास कुछ कहने को नहीं था। मैं केवल आप सबकी राय जानना चाहता था।

पीयूष जी, मैं आपसे लगभग हर जगह सहमत हूं और आपको धन्यवाद देता हूँ कि किसी ने तो मेरे साथ मिलकर कुछ तर्क दिए। नहीं तो ऐसा लगने लगा था कि कहीं कुछ समय बाद मेरे साथ भी वही न किया जाए, जो तस्लीमा नसरीन के साथ किया गया (वैसे मुझे खतरा नहीं है क्योंकि मैं तो छोटा मोटा आदमी हूं)। हाँ, मैं अपने देशवासियों को सहिष्णु होने के लिए धन्यवाद जरूर देता हूं।

आशीष जी, आपने कहा-
यहां कोई ठीक से तर्क नहीं कर रहा है.. वरना 'ईश्‍वर नहीं है'- यह सिद्ध करना तो चु‍टकियों का काम है।
अगर आप ऐसे तर्कों की बात कर रहे हैं, जैसे मेरे पड़ोस के सरदार जी देते थे तो मैं एक मिनट में सिद्ध कर सकता हूं कि ईश्वर नहीं है।
जब मैं छोटा था, तब इतना सोचता नहीं था और ईश्वर के अस्तित्व पर मैं भी सवाल नहीं खड़े करता था।( यहाँ मैं उस बात का भी उत्तर दे रहा हूं, जब राजेश जी कह रहे हैं कि मैं अल्पायु होने की वजह से ईश्वर को नहीं मान रहा। ये बताइये कि उम्र में कम व्यक्ति तो वही मानता है जो उसकी पारिवारिक मान्यताएँ हैं, जैसा मैं पहले मानता था। फिर मेरे बारे में यह बात उल्टी क्यों हो रही है?)
हाँ, तो बात सरदार जी की हो रही थी। वे एक बार मुझसे बोले कि भगवान नहीं होता। मैंने कहा कि होता है। वे काँच का एक गिलास लेकर आए और बोले कि मैं इसे गिराता हूं और यदि तुम्हारा भगवान है तो इसे टूटने से बचा ले। उसे बुलाओ।
ऐसे ही सौ तर्क अभी देकर ईश्वर का अस्तित्व झुठलाया जा सकता है। लेकिन मुझे भी यह पता है कि यदि ईश्वर है तो यह जरूरी तो नहीं कि वह काँच के गिलास के लिए आए। इसलिए मैंने ऐसा कोई बकवास तर्क अब तक नहीं दिया।
राजेश जी, मैं पहले भी कह चुका हूँ कि जरूरी तो नहीं कि जब आप उलझे हुए थे, अँधेरे में थे, तब ईश्वर ने आपको रास्ता दिखाया। वे कुछ लोग थे, जिन्हे आपने ईश्वर प्रेरित बताया।
हम संज्ञाओं की महानता स्वीकार नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें सर्वनाम बनाकर ईश्वर का नाम दे देते हैं।
और राजेश जी, 90% लोगों के मानने से या 100% लोगों के मानने से कुछ सच नहीं हो जाता।
कुछ सदियों पहले लगभग 100% लोग यही मानते थे कि सूरज धरती के चारों ओर घूमता है।
और विपुल जी, आप तो कहीं दूर ही चले गए। आप अंधविश्वासों के पीछे के कारणों पर चर्चा करने लगे कि देव का सोना क्यों कहा जाता है। आपके तर्कों ने मुझे पूरी चर्चा में पहली बार धर्मगुरुओं की याद दिला दी। आसाराम बापू का प्रवचन सुनियेगा, उनके तर्क बिल्कुल आप जैसे ही होते हैं।
अब सोच रहा हूं कि पहले भगवान की लगभग सर्वमान्य परिभाषा दी जाए और उस पर बहस की जाए। क्योंकि नहीं तो कोई भी उसे कुछ भी मानकर कुछ भी कहने लगता है।
भगवान को सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, सर्व विद्यमान, अजर, अमर, सबका भला करने वाला, सर्वदा न्यायकारी, सृष्टि नियंत्रक तथा सृष्टि जनक माना गया है। कुछ गुण छूट गए हों, तो आप जोड़ दें। ये गुणधर्म लगभग हर धर्म मानता है।
अब यदि वह सृष्टि नियंत्रक है और फिर भी दुनिया में पाप है तो उसे सर्वदा न्यायकारी और भला करने वाला नहीं कहा जा सकता और यदि वह भला करने वाला है और उसका सृष्टि पर नियंत्रण नहीं है कि पाप रोक सके तो वह भगवान नहीं कहा जा सकता। इनमें से किसी भी गुण के न होने पर वह perfect नहीं रहता, जो ईश्वर होने का आवश्यक गुण है।
विपुल जी, आप पता नहीं क्या सोचकर ऐसा कह रहे हैं कि-

ईश्वर अँधा है बहरा है अशक्त है रोगी है {नींद की गोलियाँ } ना जाने कितने आक्षेप लगाए गये हैं ! आपको पता है ईश्वर को नींद की गोलियाँ क्यों लेनी पड़ती हैं? इसीलिए नही की वो संवेदनहीन है बल्की इसीलिए की वह अत्यधिक संवेदन शील है जब वो ऊपर से बैठकर निठारी की तरफ़ देखता है तो सोचता है की अब क्या करूँ? मैने इन्हे गीता दी है रामायण दी है क़ुरान दिया है गुरु ग्रंथ साहिब दिया है और यह साले क्या कर रहे हैं ? वो भी माँ है ,पिता है तो हम बच्चों की करनी को देख कर अपना माथा ठोंक लेता है और नींद की गोलियाँ खा कर सो जाता है कहता है की लो बेटा जो कर रहे हो वही भुगतोगे कुच्छ साल बाद जब अगला निठारी होगा तब मैं तुमको बच्चा बनाऊंगा !

उसे यह देखकर रोने या नींद में जाने की क्या जरूरत है, यदि वह भगवान है। वह तो ये सब रोक सकता है। इस तरह अपना माथा ठोक कर सो जाना तो किसी मजबूर इंसान का ही काम हो सकता है।
आप ईश्वर की परिभाषा फिर से पढ़ें और तब बताएँ कि पाप क्यों है?
अभी इतना ही...

piyush का कहना है कि -

अब यह चर्चा कॉमेडी का स्वरूप लेती जा रह है.........
मै सोचता हूंकि टिप्पणी ना करूँ पर फिर कोई ऐसी बात कह जाता है की कहना पड़ता है.......
शोभा जी की बातें मुझे सटीक लगीं....................
ग़ौरव जी भी सही कह रहे है पर कुछ अधिक मुखर होकर.........वे कुछ लोगों की भावनाओ को चोट पहुँचा रहे है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
यहाँ हम सब अपने विचार रखने आएँ है परस्पर छींता काशी करने नही.....
जो, जो भी सोचता है स्वयम सोचता है उसे दूसरों पर लादने की आवश्यकता नही..........
विपुल जी की बातों पर ग़ौरव जी की टिप्पणियाँ मनोरंजक थी ,,,,,,,,,,मुझसे हँसे बिना नही रहा गया..........
ग़ौरव जी तर्क बहुत शक्तिशाली देते है यही उनकी विशेषता है..........
विपुल जी को भला ना आ रहा हो परंतु मै इसे बहुत आनंद के साथ पढ़ रहा हूँ क्यूँकी यह मेरे सश्यों का निवारण ही कर रही है............
आशीष जी की बात भी अब सही लग रही है..............
बाक़ी विपुल जी की एक बात सही लगी है वो यह की जो व्यक्ति जो भी कर रहा है पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी के साथ करे तो ये आस्तिको के लिए ईश्वर पूजा और नास्तिको के लिए कर्म का रूप धारण कर लेगी..........
किसी को भी अपनी सोच से डिगा पाना सरल नही है जबकि वह स्वयं भी वही ना सोचे............
मै समझता हूँ की विपुल जी के देव सोने की कहानी के पीछे धर्म - विगयन का मेल कारण चाह रहे थे...
सही है ना विपुल जी..............
ग़ौरव जी थोड़ा कड़वा बोलते है. पर उनके तर्क बड़े मज़ेदार होते है...........
यहाँ शैलेश जी की टिप्पणी की अनुपस्थिति खाल रही है..............
वो मुझसे भी अधिक तटस्थता के साथ टिप्पणी करते है.
चर्चा अनवरत रहे ...........(चाहे तो किसी और विषय पर ही सही)........क्यूँकी यह हमरे तर्क शक्ति को ही बढ़ती है............
इस ही आशा के साथ.............
शुभकामनाएँ

Rajesh का कहना है कि -

Sabhi ko ek baar phir namaskar. Main Piyush ji ki ek baat se ekdam sahmat hoon ki Gaurav ji jo bhi tark dete hai, kafi achhe hote hai, thos hote hai. Maine bhi wahi kaha hai ki ab ishwar hai ya nahi, kisi ke uper apni kyon jabaran thonk deni chahiye? Maine age bhi kaha tha ki jo manta hai ishwar hai unhe maan lene dijiye ki ishwar hai aur jo nahi manta unke uper jabardasti kyon karni chahiye? Aur Gauravji, rahi baat aap ke tark ki main glass tod raha hoon, aap apne bhagwan ko bula lijiye ki wah use bacha le. dear wah itna to free nahi hota ki aap jaan booj kar glass tod rahe hai aur fir USE bula rahe ho bachane ke liye, yah to koi tark nahi hua dost. aur ek chij se main sahmat hoon ki yahan per kuchh charcha ho rahi hai, isi liye kisi ke vichar ko kise ko apne sir per nahi le lena chahiye. yah sabki apni apni raay hoti hai.

आलोक शंकर का कहना है कि -

लगता है कि आप सब यह तय करके ही बैठेंगें कि ईश्वर है कि नहीं । पर इससे पहले यह तो तय कर लें कि ईश्वर है क्या ?
:)

आलोक शंकर का कहना है कि -

अर्थात आप सब यह तो कह ही रहे हैं कि ईश्वर है या नहीं पर यह भी तो बताते जाइये कि आप ईश्वर से क्या समझते हैं ? ईश्वर का आपके लिये क्या अर्थ है? आप जिस चीज को ईश्वर समझते हैं वह क्या वही है जिसके बारे में सामने वाला बात कर रहा है?
"दो बंदे आपस में झगड़ रहे थे , दोनों कहते थे कि मेरे हाथ वाला फ़ल आम है एक के हाथ अमरूद था ,और दूसरे के हाथ सेव ! दोनों में से किसी ने आम कभी देखा ही नहीं था "
अब ये बात अलग है कि यहाँ झगड़ा इस बात पर है कि "तुम्हारे हाथ का फ़ल आम नहीं है और आम नाम की कोई चीज़ नहीं होती "

सस्नेह
आलोक

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

पीयूष जी, यदि मैं अनजाने में किसी की भावनाओं को चोट पहुंचा रहा हूं तो क्षमा चाहता हूँ।
आपने मेरे तर्कों का सम्मान किया, उसके लिए धन्यवाद।
राजेश जी, आप शायद वह नहीं समझे, जो मैं कहना चाहता था। यही तो मैंने कहा कि गिलास टूटने जैसे तर्क मुझे भी तर्क नहीं लगते, इसीलिए मैं उन्हें नहीं दे रहा।
आलोक जी, आप सही कह रहे हैं और आपके सवाल का जवाब मैंने दिया है- मैंने पूरी दुनिया में मान्य ईश्वर की एक परिभाषा देने का प्रयास किया है, ताकि सही बहस हो सके।
शोभा जी, आशीष जी, तपन जी और शैलेश जी शायद हमारी चर्चा को भूल गए हैं।
प्रतीक्षा में,
गौरव सोलंकी

कुमार आशीष का कहना है कि -

गौरव जी, बड़ा मुश्किल है.. आप तो पड़ोस में झांकने लगे। खैर, हम तो फिर भी आपके पड़ोस के सरदार जी का पक्ष ही लेंगे। अगर ईश्‍वर है तो उसे कांच के गिलास को टूटने से बचाना होगा। अब 'कांच के गिलास' के प्रति आपकी 'सहानुभूति' चूंकि पक्‍की थी इसलिए बात तय होते होते रह गयी। वह तो ठहरे सरदार जी, सोचा होगा कि हिरण्‍यकशिपु और प्रह्लाद वाली घटना को फिर से चरितार्थ किया जाये। बाकी फिर कभी.. पहले तय हो जाये कि आप नास्तिक हैं..या सन्‍देहवादी।

कुमार आशीष का कहना है कि -

आलोक जी, मेरी पूर्व टिप्‍पणी का अवलोकन करें-
'यहां उलझाव इसलिए बन रहा है क्‍योंकि सीधे 'परमात्‍मा' पर चर्चा शुरू कर दी गयी है.. और ये तो ऐसे ही हुआ कि कौवा कान लेकर गया तो कौवे के पीछे दौड़ पड़े। पहले यह तय करो कि 'आत्‍मा' है अथवा नहीं। बाद में जिसने जाना उसने कहा- अयं आत्‍मा ब्रह्म'- वो अलग की बात है। उसके आगे भी पहुंचो.. मेरी शुभकामना है।'
आलोक जी.. खयालों में हम-आप कुछ भी गढ़ लें और उसको बहस का मुद्दा बना लें.. मगर जो सर्वमान्‍य अभ्‍यास है वह यह कि- जिसे 'ईश्‍वर' कहा गया है.. उस तक पहुंचने का रास्‍ता आप अर्थात 'आत्‍मा' से होकर गुजरता है। पहली तजवीज 'आत्‍मा' के सम्‍बन्‍ध में होनी चाहिए.. वरना अंधों की तकरार चलती रहेगी।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

आशीष जी,
चर्चा मेरी मान्यताओं के विषय में नहीं हो रही है, जिसमें इस बात से फ़र्क पड़े कि मैं नास्तिक हूँ या सन्देहवादी।
वैसे आपने फिर से इस बात को उठा ही दिया है तो मैं भी फ़िर से कह ही देता हूँ कि मैं सन्देहवादी हूं...नास्तिकता की ओर कुछ ज्यादा झुका हुआ।
और साथ ही मैं आत्मा का अस्तित्व मानता हूँ क्योंकि हाड़-माँस के शरीर में आत्मा ही है, जो जीवन के लिए उत्तरदायी है। यहाँ 'आत्मा' शब्द पर मत जाएँ क्योंकि मुझे डर है कि ऐसा कहने पर आप सीधा कहेंगे कि आत्मा है तो परमात्मा भी।
मेरा अभिप्राय प्राण एवं चेतना से है।
वैसे भी आत्मा है अर्थात मेरे अभिप्राय में हर जीव में जीवन है तो यह आवश्यक नहीं कि कोई उन सबका नियंत्रक हो। यदि होता तो दुनिया में आज इतना गड्ड मड्ड ना मचा होता।
शेष फिर कभी...वैसे मुझे अब भी लग रहा है कि आप मेरे आत्मा को मानने पर इसे अपने पक्ष में तर्क समझेंगे।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

वैसे आप सरदार जी का पक्ष ले रहे हैं तो आपके अनुसार तो भगवान को गिलास टूटने से बचाना चाहिए था।
इसी प्रतीक्षा में मैं न जाने कितनी चीजें तोड़ चुका हूं।
अब आप ये मत कहिएगा कि उन चीजों को टूटना ही था क्योंकि यही भगवान ने उनके लिए तय किया हुआ था।

piyush का कहना है कि -

हा हा हा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
अब मुझे लग रहा है की हम सभी व्यर्थ ही शास्त्रार्थ कर रहे है..................
जिसे जो मानना है वो माने क्यूँकी हम उसे कभी ना माना पाएँगे ............
वैसे एक बात कहूँ ग़ौरव जी ........... यदि आप जीव के अंदर जीवन की बात करते है तो यहाँ रहसयवाद आप ही आ जाता है और एक अनजानी धार्मिकता से हम लिप्त हो जाते है ..........
क्यूँकी अब तक मानव का स्वाभाव रहा है जिसे ना जान पाओ उसे पूजो ............
है ना विपुल जी ,शोभा जी और आशीष जी????????
मई ग़ौरव जी का साथ नही दे रहा वरण यह ही कहा रहा हून यदि कोई उन्हे सही राह पैर लाना चाहता है तो उनके तर्को को संतुष्ट कर दे,,,,,,,,,,,,,
मई अब तक तटस्थ रह कर यह करने का प्रयास करता आया हून.....................
रही आलोक जी की बात तो वे एकदम सही कह रहे है............
हम जिसे जानते नही उअसके अस्तित्व पैर चर्चा करना व्यर्थ है......... सो आश्चर्य नही की ग़ौरव जी ईश्वर को ना माने..........

ईश्वर मेरी नज़रों मे: वह सिर्फ़ ऊर्जा है,जिसमे संभवत: विवेक हो सबको नियंत्रण मे रखने का...................
अलग अलग देवता कुछ नही उस ही ऊर्जा के भाग मात्र है........जैसे सूर्य अग्नि आदि भी ऊर्जा ही है........
और रही पूरानो की बात तो उनमे भी कभी गणेश को तो कभी विष्णु को तो कभी शिव को और तो कभी शक्ति को परम देव माना गया है हाँ इन सब मे यह बात समान है की ब्रह्मांड उत्पत्ति के समय सभिको ऊर्जा ही बताया गया है............
और पूरणो की बात सही भी लगती है की हैर वस्तु मे ऊर्जा व्याप्त है सो ईश्वर व्याप्त है..............
विगयन की उन्नति के अनुसार सबसे छोटा कन मीसों भी शुढ़ ऊर्जा ही है............ यहाँ तक की ए=म*सी*सी भी यह ही सीधध करता है की द्रव्य शुढ्ध ऊर्जा ही है ,......................
और अगर मई यह भी कहूँ की यदि हमे ईश्वर को जानना है तो हमे भी प्रकाश की गति से यात्रा करनी होगी.............
ख़ैर यह तो किसी फतंस्य फ़िल्म की तरह लगता है,,,,,,,,,,,,
बहुत संभव है आप लोगो को मेरी बाते काफ़ी बचकानी लग रही हो परंतु मई तर्क की ही बात सुनता हून और जब मई ईश्वर को महसूस करता हून तो उसके पीछे तर्क देना चाहता हून.............
बिग बेंग,ए=म*सी*सी,लगातार चक्कर लगते एलेक्ट्रान और उनसे भी छ्होटे मीसों कन क्या यह सब आरंभ से ही स्वाट: नियंत्रित है?
क्या एलेक्ट्रान और प्रोटॉन्स के विपरीत आवेश्ों की शक्ति अपने आप ही आ गयी?
क्या एलेक्ट्रान यूँ ही घूमता रहता है?
प्रथ्वि........यहन तक की पूरी आकाश गंगा ब्रमांड मे स्वयम ही घूम रही है.........?
............................................
पुरातन कल मे जब यातायात के कोई साधन नही थे तब भी बिना मिले ही प्रतवी के इतनी सारी सभ्यताओं के धरमो और मान्यताओं के बीच इतनी सारी समानताएँ क्यूं है?(यूनान ,ग्रीक,मेसोपोटामिया,मिस्र,हड़प्पा)
क्या यह किसी एक सत्ता की ओर संकेत नही करता?
याहाँा तक की यूनान ग्रीक,मिस्र और भारतीय सभ्यताओं के मध्य की समानताएँ अचंभीत करती है..........
उनके देवता ,संस्कार भी हम जैसे ही थे.....
खेर इस बारे मे मई बहुत देर तक बोल सकता हून पैर इतना समय और स्थान का अभ्व है और फिर आप भी इतनी बड़ी टिप्पणी ना पढ़ेगे तो फ़ायदा ही क्या है...........
बस ग़ौरव जी से यह निवेदन हैकी भले ही तर्को के मध्यम से ही ईश्वर को स्वीकरें और बाक़ी लोगों से कहूँगा की धर्म को तर्क के साथ ही स्वीकरें........
धन्यवाद और शुभकामनाएँ

piyush का कहना है कि -

sory for gramatical mistakes ........
hopely u all wud get wat i want to say.......

हिमांशु का कहना है कि -

अद्वितीय अद्‌भुत
गौरव जी यह मेरा सौभाग्य ही था कि, यहाँ तक आ सका और आपको पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ.
नि:संदेह कई भावो का प्रकटीकरण और कई विचारों को आवाज मिली. साधौ-साधौ
शुभमस्तु
हिमांशु

दिवाकर मणि का कहना है कि -

सर्वेभ्यो नमः !!
गौरव जी की क्षणिकाओं पर आदरणीया शोभाजी ने जो चर्चा प्रारंभ किया, उसके लिए साधुवाद. आदि से अन्तिम ६९वें टिप्पणी तक को स्वासन्दिका से च्युत हुए बिना पूरा पढ़ गया, स्वस्थ चर्चा हेतु सबको साधुवाद. गौरवजी के प्रोत्साहन से मैं भी इस तार्किक महासमर में स्वाल्प-तर्काश्रितबुद्धि के साथ कूद पड़ा हूँ, धृष्टता हेतु क्षमाप्रार्थी...

संस्कृत में एक उक्ति है- "यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेदि नेतरः" अर्थात् जो तर्क से अनुसन्धित हो, वही धर्म है अन्य नहीं. चर्चा "ईश्वर" के अस्तित्वानस्तित्व पर है, आपमें से कतिपय पक्ष में भी है और कतिपय विपक्ष में भी. उपरोक्त चर्चा में सबसे उद्विग्नकारी उपनिषद्-पुराणों का घालमेल लगा. मेरी समझ से इसका एकमेव कारण इसके प्रति सम्यग्ज्ञानाभाव है. अस्तु, इस चर्चा में मैं भारतीय दर्शनों में "ईश्वर" के विषय में क्या कहा गया है को प्रकाशित करना चाहूँगा, शेष बातें आपके विचारार्थ....

सांख्य दर्शन- इस दर्शन के कुछ टीकाकारों ने ईश्वर की सत्ता का निषेध किया है. उनका तर्क है- ईश्वर चेतन है, अतः इस जड़ जगत् का कारण नहीं हो सकता. पुनः ईश्वर की सत्ता किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं हो सकती. या तो ईश्वर स्वतन्त्र और सर्वशक्तिमान् नहीं है, या फिर वह उदार और दयालु नहीं है, अन्यथा दुःख, शोक, वैषम्यादि से युक्त इस जगत् को क्यों उत्पन्न करता? यदि ईश्वर कर्म-सिद्धान्त से नियन्त्रित है, तो स्वतन्त्र नहीं है, और कर्मसिद्धान्त को न मानने पर सृष्टिवैचित्र्य सिद्ध नहीं हो सकता. पुरुष और प्रकृति के अतिरिक्त किसी ईश्वर की कल्पना करना युक्तियुक्त नहीं है.

योग दर्शन- हालाँकि सांख्य और योग दोनों पूरक दर्शन हैं किन्तु योगदर्शन ईश्वर की सत्ता स्वीकार करता है. पतञ्जलि ने ईश्वर का लक्षण बताया है- "क्लेशकर्मविपाकाराशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः" अर्थात् क्लेश, कर्म, विपाक(कर्मफल) और आशय(कर्म-संस्कार) से सर्वथा अस्पृष्ट पुरुष-विशेष ईश्वर है. यह योग-प्रतिपादित ईश्वर एक विशेष पुरुष है; वह जगत् का कर्ता, धर्ता, संहर्ता, नियन्ता नहीं है. असंख्य नित्य पुरुष तथा नित्य अचेतन प्रकृति स्वतन्त्र तत्त्वों के रूप में ईश्वर के साथ-साथ विद्यमान हैं. साक्षात् रूप में ईश्वर का प्रकृति से या पुरुष के बन्धन और मोक्ष से कोई लेना-देना नहीं है.

वैशेषिक दर्शन- कणाद कृत वैशेषिकसूत्रों में ईश्वर का स्पष्टोल्लेख नहीं हुआ है. "तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्" अर्थात् तद्वचन होने से वेद का प्रामाण्य है. इस वैशेषिकसूत्र में "तद्वचन" का अर्थ कुछ विद्वानों ने "ईश्वरवचन" किया है. किन्तु तद्वचन का अर्थ ऋषिवचन भी हो सकता है. तथापि प्रशस्तपाद से लेकर बाद के ग्रन्थकारों ने ईश्वर की सत्ता स्वीकारी है एवं कुछ ने उसकी सिद्धि के लिए प्रमाण भी प्रस्तुत किए है. इनके अनुसार ईश्वर नित्य, सर्वज्ञ और पूर्ण हैं. ईश्वर अचेतन, अदृष्ट के संचालक हैं. ईश्वर इस जगत् के निमित्तकारण और परमाणु उपादानकारण हैं. अनेक परमाणु और अनेक आत्मद्रव्य नित्य एवं स्वतन्त्र द्रव्यों के रूप में ईश्वर के साथ विराजमान हैं; ईश्वर इनको उत्पन्न नहीं करते क्योंकि नित्य होने से ये उत्पत्ति-विनाश-रहित हैं तथा ईश्वर के साथ आत्मद्रव्यों का भी कोई घनिष्ठ संबंध नहीं है. ईश्वर का कार्य, सर्ग के समय, अदृष्ट से गति लेकर परमाणुओं में आद्यस्पन्दन के रूप में सञ्चरित कर देना; और प्रलय के समय, इस गति का अवरोध करके वापस अदृष्ट में संक्रमित कर देना है.

न्याय दर्शन- नैयायिक उदयनाचार्य ने अपनी न्यायकुसुमाञ्जलि में ईश्वर-सिद्धि हेतु निम्न युक्तियाँ दी हैं- (क) कार्यात्- यह जगत् कार्य है अतः इसका निमित्त कारण अवश्य होना चाहिए. जगत् में सामंजस्य एवं समन्वय इसके चेतन कर्ता से आता है. अतः सर्वज्ञ चेतन ईश्वर इस जगत् के निमित्त कारण एवं प्रायोजक कर्ता हैं. (ख) आयोजनात्- जड़ होने से परमाणुओं में आद्य स्पन्दन नहीं हो सकता और बिना स्पंदन के परमाणु द्वयणुक आदि नहीं बना सकते. जड़ होने से अदृष्ट भी स्वयं परमाणुओं में गतिसंचार नहीं कर सकता. अतः परमाणुओं में आद्यस्पन्दन का संचार करने के लिए तथा उन्हें द्वयणुकादि बनाने के लिए चेतन ईश्वर की आवश्यकता है. (ग) धृत्यादेः - जिस प्रकार इस जगत् की सृष्टि के लिए चेतन सृष्टिकर्ता आवश्यक है, उसी प्रकार इस जगत् को धारण करने के लिए एवं इसका प्रलय में संहार करने के लिए चेतन धर्ता एवं संहर्ता की आवश्यकता है. और यह कर्ता-धर्ता-संहर्ता ईश्वर है. (घ) पदात्- पदों में अपने अर्थों को अभिव्यक्त करने की शक्ति ईश्वर से आती है. "इस पद से यह अर्थ बोद्धव्य है", यह ईश्वर-संकेत पद-शक्ति है. (ङ) संख्याविशेषात्- नैयायिकों के अनुसार द्वयणुक का परिणाम उसके घटक दो अणुओं के परिमाण्डल्य से उत्पन्न नहीं होता, अपितु दो अणुओं की संख्या से उत्पन्न होता है. संख्या का प्रत्यय चेतन द्रष्टा से सम्बद्ध है, सृष्टि के समय जीवात्मायें जड़ द्रव्य रूप में स्थित हैं एवं अदृष्ट, परमाणु, काल, दिक्, मन आदि सब जड़ हैं. अतः दो की संख्या के प्रत्यय के लिए चेतन ईश्वर की सत्ता आवश्यक है. (च) अदृष्टात्- अदृष्ट जीवों के शुभाशुभ कर्मसंस्कारों का आगार है. ये संचित संस्कार फलोन्मुख होकर जीवों को कर्मफल भोग कराने के प्रयोजन से सृष्टि के हेतु बनते हैं. किन्तु अदृष्ट जड़ है, अतः उसे सर्वज्ञ ईश्वर के निर्देशन तथा संचालन की आवश्यकता है. अतः अदृष्ट के संचालक के रूप में सर्वज्ञ ईश्वर की सत्ता सिद्ध होती है.("कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः । वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः॥" - न्यायकुसुमाञ्जलि. ५.१)

वेदान्तियों के अनुसार ईश्वर की सत्ता तर्क से सिद्ध नहीं की जा सकती. ईश्वर के पक्ष में जितने प्रबल तर्क दिये जा सकते हैं उतने ही प्रबल तर्क उनके विपक्ष में भी दिये जा सकते हैं. तथा, बुद्धि पक्ष-विपक्ष के तुल्य-बल तर्कों से ईश्वर की सिद्धि या असिद्धि नहीं कर सकती. वेदान्तियों के अनुसार ईश्वर केवल श्रुति-प्रमाण से सिद्ध होता है; अनुमान की गति ईश्वर तक नहीं है.

इस विषय पर वार्ता का कोई अन्त नहीं है. भारतीय दर्शनों में भी इस विषय पर मतैक्य नहीं है, यह आप देख ही रहे हैं. बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ किन्तु सर्वप्रथम इतनी हीं बातें आपके चिन्तनार्थ...यदि अवसर मिला तो जो थोड़ी बातें और मस्तिष्क में उमड़ रही हैं, प्रस्तुत करना चाहूँगा. चलते-चलते अपनी ओर से केवल दो बातें कहना चाहूँगा- प्रथम तो यह कि ईश्वर परंपरा एवं परिवार से आगत एक आस्थामात्र है. दूसरी कि मैं संस्कृत का छात्र हूँ अतः उसी पर आश्रित होकर अपनी बात कही है, अतः हो सकता है कि मेरी बात में आप सबों को क्लिष्टता परिलक्षित हो. उसके लिए क्षमा प्रार्थनीय.........
आपके चिन्तन के भाषिक-स्वरूप की प्रतीक्षा रहेगी....

vibhore का कहना है कि -

solanki ji bahut hi adbhut hain aapki rachnayen aur aapka lekhan.

vibhore mishra

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vibhore mishra

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vibhore mishra

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