Friday, July 13, 2007

निकला नभ में, भोर का तारा

चारों ओर अंधेरा छाया, जीव-जगत निस्पंद पड़ा था
रात्रि का अंतिम प्रहर था, रंग तारों का उड़ा था
सो रही थी सृष्टि सारी, स्वप्न में खोयी हुई सी
गति-चक्र मानो ज़िन्दगी का, राह में ठिठका खड़ा था
दिख पड़ा सहसा क्षितिज पर, सूर्य का सच्चा दुलारा
निकला नभ में, भोर का तारा

अस्ताचल-गामी तारों ने और तेज हो कदम बढ़ाये
जाग्रत जीवन हुआ जगत में, चिड़ियों ने डैने फैलाये
स्वप्न-लोक के दर को छोड़ा, मतवाले ग्रामीण-जनों ने
पशुओं ने हर्षित हो-होकर, घंटी और घुंघरू झनकाये
पेड़ों पर कलरव ध्वनि छायी, गुंजित आसमान था सारा
निकला नभ में, भोर का तारा

शुचि-शीतल मंद समीर बही, तन-मन में उल्लास जगाती
सद्य:प्रकाशित पूर्व-क्षितिज से, फटने लगी तिमिर की छाती
खनक उठे चूड़ी और कंगन, छाछ बिलोते मृदुल करों में
बच्चों की किलकारी गूँजी, माता के मन को हरषाती
घंटा-ध्वनि छायी मंदिर में, बहने लगी भक्ति-रस धारा
निकला नभ में, भोर का तारा

12 टिप्पणी:

Alok Shankar said...

nabh me to bhor kaa taara nikal hi raha hai .. yugm par bhi hindi kavitaa kaa taara nikal raha hai
pravaah uttam , shilp achchaa hai
bhaav ko aur thoda achchi tarah prastut kiya ja sakta tha

काकेश said...

हम तो ये कहना चाहेंगे कि कविता बढिया है.

नभ में भोर का तारा छाया हुआ है.
हमारा दिल आप पे आया हुआ है.

OMVEER CHAUHAN said...

AJAY JI AAPNE BHOR KA BOHAT HI SUNDAR VARDAN KIYA HE AAPKI KAVITA MAN KO MOHNE VALI HE PAR AAJ KAL KI IS DAUDTI BHAGTI GINDGI ME YE SAB EK SWPN BANKAR RAH GAYA HE KASH YE SUHAVNI SUBAH KA SABHI LOG AANAND UTHA PATE
AAPNE KAFI ACCHHA VARDAN KIYA HE
ASHA KARTA HU AAP AANE WALE SAMAY ME AUR BHI MANMOHAK KAVITAO KO LAYENGE
MUJHE AAPKI KAVITAO KA HAMESHA INTZAR RAHTA HE
DHANYAVAD AJAY JI

Gaurav Shukla said...

अजय जी,
तरोताजा करने वाली कविता है
भोर के आलोक का सुन्दर चित्रण है
शिल्प बहुत सुन्दर है, प्रवाह भी अच्छा है
सुन्दर

सस्नेह
गौरव शुक्ल

sanjeev said...

Ajay ji
namaskar ,
maine aap ki kai kavitao ko pada hai lakin comment pehli baar kar raha hoon. aap ki kavita kabhi kabhi satye ki anubhuti karati hai to kabhi kalpnaon ki is kavita main aapne jo satya darsaya hai woh ham saher(city) walon ke liye sirf kalpana hai.yahan aadmi der se sota aur jagta hai. (including me also).kabhi bhor hote dekhi hi nahi.mere liye yeh kalpana hai is kalpna se robroo karane ke liye aap ka shukriya.aap ka 1 niyamit pathak.

Keerti Vaidya said...

bhut achi likhi hai

पंकज said...

अजय जी, आप ने एक नया प्रयोग किया है।
प्रभात का सुन्दर वर्णन। लेकिन मीटर पर और मेहनत की ज़रूरत,
बहाव कहीं-२ अवरुद्ध हो रहा है।

शैलेश भारतवासी said...

यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट की हिन्दी गद्य की पुस्तक 'गद्य गरिमा' में मेरे समय में एक पाठ था 'महाकवि माघ का प्रभात वर्णन' । उसकी याद आ गई। खैर उससे तुलना करना भी ठीक नहीं है। लेकिन आपकी यह कविता भी मन को उसी प्रकार की ठण्डक देती है जिस प्रकार ग्राम्य प्रात की शीतल वायु।

पंकज जी की सलाह पर ध्यान देना लाभदायक होगा।

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

अजयजी,

प्रभात को बहुत ही खूबसूरत रंग दिया है आपने अपनी इस कविता में।

बधाई!!!

mahashakti said...

दिल को छूती हुई कविता,

अच्‍छा वर्णन किया है।

sajeev sarathie said...

sundar hai bhor ka tara aur sundar hai aap ki abhivyaki

sunita (shanoo) said...

एक तो भोर का तारा खूबसूरत और उस पर आपका उसे कविता में पिरो देना अतिसुंदर...!

सुनीता(शानू)