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Friday, July 27, 2007

साप्ताहिक समीक्षा--1


साप्ताहिक समीक्षा (1) : 27 जुलाई 2007 (शुक्रवार)।
(16 जुलाई, 2007 से 22 जुलाई, 2007 के मध्य प्रकाशित कविताओं की समीक्षा)

'हिंद-युग्म' के सभी मित्रों का अभिवादन करते हुए "साप्ताहिक समीक्षा' का यह नया स्तंभ आज से आरंभ किया जा रहा है। स्तंभकार विनम्रतापूर्वक इस अवसर पर यह निवेदन करना चाहता है कि उसे ऐसा कोई भ्रम नहीं है कि वह रचनाकारों को किसी प्रकार की सीख दे सकता है। उसके निकट तो समीक्षा रचना को समझने की, आत्मसात करने की और उसके सौंदर्य को उद्घाटित करने की प्रक्रिया का नाम है। कविता के आस्वादन के साधक और बाधक तत्वों पर चर्चा इसके साथ प्रासंगिक रूप से होती रहेगी, परंतु इसका उद्देश्य रचनाकारों को बड़ा-छोटा या ऊँचा-नीचा सिद्ध करना नहीं है। समीक्षक यह भी मानकर चलेगा कि विवेच्य रचनाकार इतने ईमानदार हैं कि अपनी रचना की मौलिकता की जिम्मेदारी ले सकें। अस्तु ........

हाँ, आरंभ में ही अपने उस शुभचिंतक के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मेरा कर्तव्य है, जिनके स्नेह, आग्रह और आदेश के कारण मैंने स्वयं का "यूनिसमीक्षा' के इस मायाजाल में फँसना स्वीकार किया है। साथ ही, 'हिंद-युग्म' के नियंत्रक और सहयोगियों के प्रति भी आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे प्रेमपूर्वक बुलाया है, स्वीकार किया है। ......

इस बार पहली रचना के रूप में हमारे सामने है एक ग़ज़ल 'वो गुमनाम नहीं होगा ......'। रदीफ, काफिया और बहर के निर्वाह की दृष्टि से रचना अच्छी है, इसमें संदेह नहीं। पहले शेर में "हँसी' और "आँसू' का द्वंद्व सुंदर है, लेकिन आँसू का वजन ज्यादा हो गया है। इसके स्थान पर "अश्रु' या "अश्क' उपयुक्त रहता। इसी तरह आखिरी शेर में "कई' का वजन बढ़ रहा है। इस ग़ज़ल की विषयवस्तु काफी परिचित है लेकिन कवि ने द्वंद्वों का प्रयोग करके उसकी अभिव्यक्ति को धार देने का प्रयास किया है। इस दृष्टि से "अकेले कदमों से भी धूल उडाने' और "दूर जाने' तथा "वापस आने' का अच्छा निर्वाह हुआ है। पढ़ने-सुनने में सूरज संबंधी यह शेर खासा अच्छा लग सकता है - कह दो लेकर अपना उजाला, कभी न फिर सूरज निकले/जंगल में रहने वालों को नगर बसाते देखा है। परंतु सटीक भावाभिव्यक्ति में यह शेर समर्थ नहीं हो सका है। पाठक के मन में सवाल उठ सकता है - जंगल में रहनेवालों (आदिवासियों) के नगर बसाने (सभ्य होने) पर इतनी आपत्ति किसलिए कि कवि सूरज को उजाला (ज्ञान, सत्य, यथार्थबोध) लेकर आने से रोक दे! प्रतीक के प्रयोग में यह सावधानी बेहद जरूरी है, तभी कवि की बात साधारणीकृत होकर जनता की बात बनती है।


दूसरी कविता है "आशावादिता' प्रथम अंश "वीराने में ...... फैल जाता है' में संघर्ष और हताशा का द्वंद्व आकर्षक है। बाह्य प्रेरणा (लहरें) और अंतर्मन पर उसकी प्रतिक्रिया से यह अंश संश्लिष्ट बन गया है और बिंब (दीपक की बाती का धुआँ-धुआँ होना, फूंक से लाल होना, लाल होकर सहमना तथा धुएँ का कसैला सा होकर फैलना) अर्थग्रहण में सहायक है। दूसरा अंश "मैंने देखा है ...... आत्मबल' पहले अंश का विस्तार है। यहाँ पाषाण और लहर का मानवीकरण पूरा होता है। लेकिन "आत्मसात' शब्द इस पूरे संदर्भ को गड्ड-मड्ड कर देता है। यहाँ न्योछावर होने, तदाकार होने, एक होने आदि को व्यक्त करनेवाले शब्द की आवश्यकता है। तीसरा अंश "ये कैसी ....... क्षुधा है' रचना को आरंभिक दो अंशों से अलग दिशा में ले जाता दिखाई देता है। मनुष्य के मन में छिपी हुई आशाओं-आकांक्षाओं और जिजीविषा का यही विस्तार अगले अंश में "मेरे मन ....... जाग रे' में भी दिखाई देता है। मरुस्थल का राग और हवाओं का मृदंग तथा अंतत: मुरदे के जागने का आह्वान - जैसे प्रयोग रचना को ओज गुण संपन्न बनाते हैं। परंतु अंतिम अंश में सारी प्रेरणा निरर्थक होती दिखाई गई है जो अवसादग्रस्त मन:स्थिति का द्योतक है तथा कविता के सारे ओज पर पानी फेर देता है। शब्द चयन और लय की दृष्टि से इस कविता पर "उर्वशी' (दिनकर) के कुछ अंशों का प्रभाव साफ दिखाई देता है। यही नहीं, जिजीविषा और हताशा का द्वंद्व भी पुरुरवा की याद दिलाता है।

तीसरी रचना 'गठबंधन आशाओं से' में अभिव्यक्ति काव्यात्मक नहीं है, निबंध जैसी है। काव्यात्मक अभिव्यक्ति के लिए तुकों की आवश्यकता उतनी नहीं होती, जितनी सौंदर्य विधान की। रचनाकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि विचार को कविता में कैसे ढाला जाए। इसी के लिए अप्रस्तुत, प्रतीक, बिंब आदि का प्रयोग किया जाता है। इस कविता में जहाँ ऐसे किसी तत्वों का प्रयोग हुआ है वहाँ कवित्व आ गया है जैसे - विषधर रिक्त चंदन वन करने होंगे।

चौथी रचना है 'पराग और पंखुडियाँ'। अरहुल (गुड़हल) के सहारे जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया गया है। कथात्मकता का प्रयोग करके रचना को अनावश्यक रूप से फैला दिया गया है। कविता कम शब्दों में अधिक कहने की कला है, रचनाकार को इसे नहीं भूलना चाहिए वरना अच्छा भाव भी सपाट वक्तव्य बनकर रह जाता है। इसी प्रकार प्रतीक की व्याख्या करने से उत्पन्न काव्व्याभास के प्रति भी रचनाकार को सतर्क रहना चाहिए। प्रथम पंक्ति में "मेरे' के स्थान पर "मेरी' होना चाहिए, क्योंकि "बगिया' स्त्रीलिंग है।


पाँचवीं रचना 'आना तुम मेरे घर' पारंपरिक गीत है। शब्द चयन और उपमानों का प्रयोग आकर्षक है। आकुल आकाश, भीगा उल्लास, गुंजित मधुमास - सार्थक सह संबंध हैं। रचनाकार का लोक के प्रति आकर्षण इस गीत की नाभि है। लेकिन आधुनिक गीत की दृष्टि से इसमें नए क्षेत्रों का संधान भी जरूरी है।


छठी रचना 'ऐ मेरे हुजूर' परंपरागत भावभूमि पर ग़ज़ल के शिल्प में है। छठी पंक्ति में छंद दोष है। इसमें कहीं "सनम' जोड लें जैसे "पर भूल कर न करना सनम हुस्न पर गुरूर'। स्मरण रहे कि ग़ज़ल आज इन घिसे पिटे विषयों से बहुत आगे निकल गई हैं।


सातवीं रचना 'दाग' विद्रूप सामाजिक यथार्थ का दर्शन कराती है। प्रतीक का अच्छा निर्वाह है। भूख के बिछौने और अभाव की चादर जैसे प्रयोग सिद्ध करते हैं कि रचनाकार के भीतर कवित्व की संभावनाएँ प्रबल है। भाषा प्रयोग के प्रति सावधानी अपेक्षित है। "चंद्रमा के चमक' नहीं, "की चमक', "शहर की फुटपाथ' नहीं, "शहर के फुटपाथ'। इसी प्रकार "कूड़े के मलबे के पास' प्रयोग भी चिंत्य है।

आठवीं रचना 'तुमसे होना दूर कि जैसे' भी गीत है और इसमें भी लोक पक्ष अपने पूरे माधुर्य के साथ उभरकर सामने आया है। गीत की शीर्ष पंक्ति "तुमसे होना दूर कि जैसे टूटे कोई सम्मोहन' तनिक पुनर्विचार की अपेक्षा रखती है। यहाँ कथ्य संभवत: यह है कि 'तुम' से दूर होना असंभव है क्योंकि तुम्हारा आकर्षण किसी सम्मोहन के समान है, जिससे छूटा नहीं जा सकता, जो टूटे नहीं टूटता, जो दूरी बढ़ने पर बढ़ता जाता है, पीछा नहीं छोड़ता, लगातार 'हांट' करता है। यह अर्थ काफी चमत्कारपूर्ण है परंतु "टूटे' से यह अभिव्यक्त नहीं हो पा रहा है, क्योंकि इससे लगता ऐसा है जैसे कहा जा रहा हो कि तुम से दूर होना किसी सम्मोहन के टूट जाने के समान है, जबकि लगना ऐसा चाहिए था कि तुम से दूर होने पर तुम्हारे सम्मोहन के पाश, आकर्षण और बंधन का अहसास और अधिक सघन हो जाता है। वैसे यह अर्थ भी किया जा सकता है कि तुम से दूर होना वैसे ही असंभव है जैसे किसी सम्मोहन का टूटना लेकिन इस अर्थ में वह चमत्कार नहीं। यह भी ध्यान देने की बात है कि दूर होने पर यदि सम्मोहन टूटता लगता है तो इसमें कोई विरोधाभास नहीं है, विरोधाभास का सौंदर्य तब उभर सकता है जब यह कहा जाय कि तुम से दूर होने पर भी सम्मोहन टूटता नहीं। सच तो यह है कि निकट रहने पर सम्मोहन की उपस्थिति का आभास नहीं होता जबकि दूर रहने पर वह निरंतर अपनी उपस्थिति का आभास कराता है। (तुम्हारी देह मुझको कनक चंपे की कली है, दूर से ही स्मरण में भी गंध देती है - अज्ञेय)। शब्द संयोजन, प्रतीक विधान, उपमान योजना और लय प्रभावशाली है। पहले तीन बंधों में तीसरी पंक्ति में महके, दमके और खनके में जो ध्वनिस्तरीय समानांतरता है, चौथे बंध में "मोहे' में उसका निर्वाह नहीं किया गया है। इसी प्रकार इन्हीं पंक्तियों में चंदन, कुंदन और कंगन के क्रम में "संगम' रखा गया है। लेकिन ये दोनों ही बातें गीत को किसी भी प्रकार कमजोर नहीं करतीं।

नवीं कविता 'खुदा के जी में जाने क्या है' ग़ज़ल है । साधारण है । उड़ने वाले......समझौता है - उक्ति आकर्षक है । लेकिन - एक परिन्दे......होता है- का अर्थ अस्पष्ट है क्योंकि इसकी प्रथम और द्वितीय पंक्ति में सामंजस्य नहीं है, शाब्दिक चमत्कार भर है । वैसे सामाजिक यथार्थ के प्रति कवि का रुझान सराहनीय है ।

दसवीं कविता ग़ज़ल है - "आये बिना बहार की रवानी चली गयी'। रवानी, जवानी, कहानी के साथ दीवानी, हैरानी, वीरानी का प्रास (काफिया) पूरी तरह जमा नहीं। ग़ज़ल का कथ्य सामाजिक चेतना से युक्त है। कुछ अति प्रचलित शेरों का प्रभाव भी दिखाई देता है। "पूजा था ...... चली गई' का प्रतिपाद्य तो अपनी जगह ठीक है लेकिन क्या कवि को इस बात का ध्यान नहीं रखना चाहिए कि उसका कोई कथन अकारण किसी को चोट न पहुँचा दे। कृष्ण से मिलन न होने पर दीवानी मीरा के राणा के साथ चले जाने जैसा प्रयोग हिंदी की एक महान विद्रोही कवयित्री की अवहेलना और अवज्ञा जैसा प्रतीत हो सकता है। अपने मिथकों और इतिहास के नायक-नायिकाओं को विकृत करके पाठक का ध्यान आकर्षित करना अभिव्यक्ति का एक सरल मार्ग है, जिसका अच्छे रचनाकार को मोह नहीं होना चाहिए।


ग्यारहवीं रचना 'जीवन ' एक गीत है। कवि ने एकाकीपन, निराशा और दु:खों के बीच मन के हर्ष और चंचलतापूर्वक सक्रिय रहने का चित्रण किया है। रूपक का प्रयोग और चित्रात्मकता इस कविता की विशेषता कही जा सकती है। "पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी' तथा "तू बावरा मेरा मन' में गतिभंग अखरता है। "पंकित' शब्द का प्रयोग भी चिंत्य है।


बारहवीं कविता 'श्रीराम और केवट' बालोपयोगी है। इसमें केवट के जन्म की पौराणिक पृष्ठभूमि की कथा सीधे विवरण के रूप में प्रस्तुत की गई है। छंद का निर्वाह अच्छा है।

तेरहवीं कविता 'कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा' एक प्रेमगीत है जिसमें "मैं' और "तुम' के भेद को विविध उदाहरणों द्वारा समझाया गया है। छायावादी कवियों ने इस विषय पर उच्चकोटि की कविताएँ लिखी हैं। इस कविता में तुम को झरना और मैं को नदी का किनारा बताना कुछ समझ में नहीं आता। नदी तट भला झरने से संवाद करने क्यों जाएगा! अन्य युग्म भी कुछ खास असर नहीं पैदा कर सके।


चौदहवीं अर्थात इस सप्ताह की अंतिम कविता 'वाचाल मौन' में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ को उकेरा गया है। अहं की अभेद्य दीवार किस प्रकार भाई-भाई के बीच संवादहीनता पैदा कर देती है, यह किसी से छिपा नहीं है। विषय वस्तु और प्रतीक दोनों ही सटीक हैं परंतु कविता के पाठ को कहीं-कहीं थोड़ा कसने की आवश्यकता है। वाचाल मौन, बड़बोला अहंकार, अशांत चुप्पी - आकर्षक प्रयोग हैं। "धाराशायी' को "धराशायी' करना होगा!


अंतत: यह बात ध्यान खींचती है कि इस सप्ताह की अधिकतर रचनाओं में लोक और संबंधों को किसी ने किसी रूप में कथ्य बनाया गया है। जीवन संघर्ष से जुड़ी रचनाओं में जिजीविषा की अपेक्षा हताशा का अधिक मुखर होना, सामाजिक दृष्टि से चिंताजनक प्रतीत होता है। गेय काव्यविधाओं के प्रति रचनाकारों का आकर्षण ध्यान खींचता है, तथापि मुक्तछंद की रचनाओं की धार की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।


- डॉ . ऋषभदेव शर्मा
rishabhadeosharma@yahoo.com

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

अनूप शुक्ला का कहना है कि -

बहुत अच्छा प्रयास है। बधाई। इसे जारी रखें।

sunita (shanoo) का कहना है कि -

बिल्कुल सही समिक्षा कि गई है बहुत अच्छा लगा पढ़कर...

सुनीता(शानू)

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी,
आपके हिन्द-युग्म के प्रति स्नेह और समीक्षा के लिये अपना अमुल्य समय देने के लिये, हिन्द युग्म के सभी सदस्य आपके आभारी हैं. आपकी विवेचना बहुत ही अर्थ-पूर्ण व दिशा देने में सक्षम है. आशा है आप के मार्ग-दर्शन से सभी के लेखन में आशातीत प्रगति देकने को मिलेगी..

अजय यादव का कहना है कि -

डॉ. ऋषभदेव जी,
हिन्द-युग्म की रचनाओं की समीक्षा के लिये अपना अमूल्य समय देने के लिये हम सब आपके आभारी हैं.
आपने मेरे एक शेर "पूजा था...चली गई" का ज़िक्र किया है, तो मैं यहाँ सभी को यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इस शेर के द्वारा मीरा जैसे व्यक्तित्व की अवज्ञा या अवहेलना का न तो मेरा कोई उद्देश्य था और न ही मैं ऐसी कोई धृष्टता कर सकता हूँ. मैं स्वयं मीरा के भजनों को बचपन से आज तक लगातार सुनता रहा हूँ और हमेशा उन्हें सुनकर एक स्वर्गीय आनंद की अनुभूति होती है. तो मैं अपने ही आदर्श की अवज्ञा कैसे कर सकता हूँ. इस शेर के द्वारा मैं सिर्फ उस परिस्थिति का ज़िक्र करना चाहता था जो व्यक्ति को उसके आदर्शों और इच्छाओं की राह पर चलने में अवरोध पैदा करती रहती है. फिर भी यदि किसी को भी यदि इससे ठेस पहुँची हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ.
इस गलती की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिये मैं आपका बहुत आभारी हूँ.

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

बहुत सार्थक रही यह समीक्षा। आदरणीय डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी की साप्ताहिक समीक्षा कसौटी होगी कवियों के लिये। आपका हिन्द-युग्म में हार्दिक अभिनंदन।

*** राजीव रंजन प्रसाद

कुमार आशीष का कहना है कि -

ऋषभ जी, आपने अत्‍यन्‍त परिश्रम, धैर्य एवं सूक्ष्‍मता के साथ कविताओं का विवेचन किया है। आप सच्‍चे अर्थों में कविता के भावक हैं। निश्चित रूप से आपमें कवि के प्रति अगाध आस्‍था है। मेरी हार्दिक बधाई स्‍वीकारें।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

ऋषभ जी,

साधारण पाठक या वो पाठक जिसमें साहित्य की परम्परा को पढ़ने की आदत नहीं विकसित हुई है, उसके लिए आप जैसे गहन दृष्टि रखने वाले व्यक्तियों के विचार प्रेरणा पाने के कारण बन सकते हैं।

हर एक कविता पर आपकी समीक्षा अत्यंत गंभीर और नये आयाम देने वाली है।
युग्म के लिए यह शुभ लक्षण है।

आपका पुनः धन्यवाद।

anuradha srivastav का कहना है कि -

समीक्षा प्रभावी और लाभप्रद है ।भविष्य में बहुत कुछ सीखने को मिलेगा ।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

माननीय ॠषभ जी
नमस्कार
हिन्द युग्म पर आप जैसे मनीषी का साप्ताहिक समीक्षा के लिये उपलब्ध होना प्रसन्नता का विषय है.जहां तक मेरे गीत जीवन की समीक्षा की बात है तो पंकित शब्द का प्रयोग मैंने कीचडयुक्त के स्थान पर पंक से युक्त यानी पंकित के रूप में किया. इसमें चिंत्य ? मेरे जैसे अल्पज्ञ को यदि संभव हो तो समझाने की कृपा करें.आपकी सम्यक टिप्पणी जिजीविषा का आभाव अत्यंत ही महत्वपूर्ण है.
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

RDS का कहना है कि -

@ Shrikant Mishra 'Kant'
1.'It' ke prayog se prayah 'hua/kiya hua' ka arth milta hai. Jaise--'Samekit' ,'ekatrit', 'sangathit' etc.
2.'Pank se yukt' ke arth mein 'pankil' ka prayog roodh hai.
Aasha hai santusht honge.
@Ajay Yadav
Aapki vinamrata sarahniya hai.

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

ऋषभदेव जी,
आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने युग्म पर इस नई परम्परा को शुरु किया और आपकी समीक्षा पढ़कर यह लगता है कि यह बहुत गम्भीर चिंतन के बाद दी गई है, न कि बहुत से अन्य समीक्षकों की तरह आपने किसी भी कविता को कुछ भी कह दिया है।
हृदय से धन्यवाद स्वीकारें।
मैं अपनी रचना 'खुदा के जी में जाने क्या है' की समीक्षा के सन्दर्भ में अपना स्पष्टीकरण देना चाहूँगा। आपने कहा है-
एक परिन्दे......होता है- का अर्थ अस्पष्ट है क्योंकि इसकी प्रथम और द्वितीय पंक्ति में सामंजस्य नहीं है, शाब्दिक चमत्कार भर है ।
इसमें यह कहने का प्रयास था कि एक पक्षी ने कुछ आदमियों की बात सुनी और उसका प्रभाव यह हुआ कि उनसे सीख लेकर अब परिन्दे भी भीतर से कुछ और तथा बाहर से कुछ और होने लगे हैं। मेरे विचार से तो प्रथम और द्वितीय पंक्ति में कोई सामंजस्यहीनता नहीं है। फिर भी यदि मेरी ओर से कुछ कमी रही है तो मैं भविष्य में उसे दूर करने का प्रयास करूंगा।
आप यूँ ही राह दिखाते रहें।

RDS का कहना है कि -

@ Gaurav Solanki
Aapne mere kathan mein nihit sadbhaavna ka sammaan kiya, aabhaari hoon.

रंजू का कहना है कि -

हिन्द-युग्म की रचनाओं की समीक्षा के लिये बहुत अच्छा प्रयास है डॉ. ऋषभदेव शर्मा जी...धन्यवाद।

Anonymous का कहना है कि -

Shreemaan Dr. Rishabhdev Sharma

Bahut he sarahniya prayas hai.
Badhai..

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