बरसाती नदी हो गये गीत मेरे
कहीं खो गये अर्थ हैं मीत मेरे..
बहुत सोचता हूँ कि लय ही में लिक्खूँ
तय हैं जो मीटर तो तय ही में लिक्खूँ
हरेक शब्द नापूँ , हरेक भाव तोलूँ
कठिन लिक्खूँ भाषा, मैं विद्वान हो लूँ
मगर माफ करना यही लिख सकूंगा
बहुत बेसुरे से हैं, संगीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
माँ शारदा से, लड़ा भी बहुत मैं
ये क्या लिख रहा हूँ अड़ा भी बहुत मैं
मुझे भी तो जुल्फ़ों में बादल दिखा है
मेरे भी तो खाबों में संदल दिखा है
तो ये दर्द क्यों, क्यों मुझे आह लिखना
तेरे आँख के अश्क क्यों रीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
मेरा शब्द बन कर मचलती हैं चीखें
तेरी ही घुटन है तू देखे न दीखें
कलम एक चिनगी, कलम जिम्मेदारी
कलम शंख है, फूँकता मैं पुजारी
मेरे शब्द गर तुझमें उम्मीद भर दें
तू फिर उठ खड़ा हो तो है जीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
मैं लिक्खूँ मजूरा, मैं हल्ला ही बोलूँ
न सहमत हुआ तो मैं झल्ला ही बोलूँ
मैं अपशब्द लिक्खूँ, मेरे शब्द पत्थर
मेरे शब्द में नीम, आँगन का गोबर
तू फिर उठ खड़ा हो तो है जीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
मैं लिक्खूँ मजूरा, मैं हल्ला ही बोलूँ
न सहमत हुआ तो मैं झल्ला ही बोलूँ
मैं अपशब्द लिक्खूँ, मेरे शब्द पत्थर
मेरे शब्द में नीम, आँगन का गोबर
मेरे शब्द रौशन, अगर है अंधेरा
निराशा में ये शब्द उम्मीद मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
कहीं एक रोड़ा, कोई ईंट जोड़ा
सच है री कविता कहीं का न छोड़ा
मेरी लेखनी में नहीं बात कोई
मगर साफ कहता हूँ है साफगोई
कहीं से शुरू फिर कहीं बेतुके
बहुत सिरचढे शब्द मनमीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
*** राजीव रंजन प्रसाद
15.04.2007
निराशा में ये शब्द उम्मीद मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
कहीं एक रोड़ा, कोई ईंट जोड़ा
सच है री कविता कहीं का न छोड़ा
मेरी लेखनी में नहीं बात कोई
मगर साफ कहता हूँ है साफगोई
कहीं से शुरू फिर कहीं बेतुके
बहुत सिरचढे शब्द मनमीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
*** राजीव रंजन प्रसाद
15.04.2007
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20 कविताप्रेमियों का कहना है :
शब्द सब उच्चारण अपना भूल चुके हो
छंद भी निशप्राण धरा पर मूक खड़े हो
भाव जो लगते विराट सिन्धु से…..(मृग-त्रिशणा है किन्तु)
काव्य प्रयास भी तुम्हारे विफल हुये हो
तो फ़िर एक प्रयास तुम पुन: करो
अभिव्यक्ति की पग-डंडीयों पर चरण धरो….
शुभकामनायेँ
- रिपुदमन पचौरी
Rajiv U never told that U only required words of appreciation and not sincere criticism!
Anyhow I am happy that U were hurt so much that U were able to write another poem and at least for the first time in the entire poem U were not away from what U wanted to convey!
This is what I call basics of poetry, sticking to what U want to say! Those moments helped U realize the poetry zone. I am happy for U!
कवि के मन मे सदा रहने वाले द्वन्द को सामने लाना ऍक अच्छी कविता भर नही रह जाता, अपितु उस Dilemma का समाधान सा भी प्रतीत होता है।
अति उत्तम रचना।
सुन्दर लिखा है राजीव जी...
कवि के विचार भी बरसाती नदी के उफ़ान से किसी तरह कम नही होते... कभी कभी किनारो को थोडा बहुत नुक्सान भी पहुंचा सकते है परन्तु, नदी और बिचारो का काम है बहना.. ठहराव अन्त की निशानी है... इसी उफ़ान के साथ बहते रहिये और सुन्दर रचनाये लिखते रहिये
बहुत खूब राजीव जी। आलोचनाओं का जवाब देने का ये अन्दाज पसंद आया। और हाँ सचमुच इस बार आपके विचार मूल भाव से भटके नहीं। रही बात भावात्मक ऊँचाई की तो शायद आपकी किसी भी कविता के भाव पर कोई भी उँगली नहीं उठा सकता।
कलम एक चिनगी, कलम जिम्मेदारी
कलम शंख है, फूँकता मैं पुजारी
निश्चय ही आपकी काव्य-साधना सराहनीय है।
राजीव जी आप की पिडा को मैं अनुभव कर सकता हूं , किसी तयशुदा नियम से बहुधा काव्य का प्रवाह बाधित होता है और हमारी भावनाये शब्दों का आवरण नही पा पाती , एक बार ग़ालीब ने भी लिखा था की ग़ज़ल विधा उनकी भावनाओ की अभीव्यक्ति के लिये सीमित है.
अत: आपकी कविता आपकी दुविधा को बखुबी बयां करती है और कोई भी इसे समझ सकता है.
किंतु इस दुविधा के मध्य मार्ग निकालने का प्रयास भी करें के अच्छा होगा क्योकी नियमो मे बंधा काव्य विशेषकर गीत/दोहे/गज़ल इत्यादी का प्रवाह गेय होता है और यही कारण है की आज भी कबिर के दोहे या गालिब की ग़ज़लें आज भी जिवंत है |
राजीव जी कविता एक दम उम्दा है
बधाई
बहुत सोचता हूँ कि लय ही में लिक्खूँ
तय हैं जो मीटर तो तय ही में लिक्खूँ
हरेक शब्द नापूँ , हरेक भाव तोलूँ
कठिन लिक्खूँ भाषा, मैं विद्वान हो लूँ
मगर माफ करना यही लिख सकूंगा
बहुत बेसुरे से हैं, संगीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
ek ek lafaz aapka likha hua bahut sudnar laga .....bahut hi badhaai itni sundar rachna ke liye [:)]
बहुत अच्छा
राजीव जी, मेरे मन की बात कही आपने
यह मीटर और सेंटीमीटर में कवितायें लिखने का द्वन्द्व कम से कम मेरी समझ से तो बाहर है...
मेरी समझ मे कविता का इससे अधिक मतलब और कुछ नहीं है कि कविता में दिया गया संदेश पाठकों तक पँहुचे और सबसे महत्वपूर्ण कि आसानी से पँहुचे|
"बहुत सोचता हूँ कि लय ही में लिक्खूँ
तय हैं जो मीटर तो तय ही में लिक्खूँ
हरेक शब्द नापूँ , हरेक भाव तोलूँ
कठिन लिक्खूँ भाषा, मैं विद्वान हो लूँ"
क्षमा करियेगा राजीव जी, आगे की दो पंक्तियाँ पढे बिना ही कह रहा हूँ :)
कि इतनी मेहनत अगर आप करेंगे तो अपनी मौलिकता खो देंगे आप..
सम्भव है कि मैं पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ , मैं लिखता भी नहीं किन्तु आजतक नहीं समझ सका कि किसी तथाकथित नियम से बँध कर कविता कैसे लिकी जा सकती है, कुछ भी कैसे लिखा जा सकता है, बँध कर तो सिर्फ अनुसरण किया जा सकता है| लेकिन सब लोग प्रसाद , निराला या दिनकर नहीं हो सकते हैं न होने का प्रयत्न करके स्वयं की मौलिकता की हत्या कर देनी चहिये|दिनकर जी के शब्दों में
"बँधी है लेखनी
लाचार हूँ मैं"....सो लाचार न बनिये..पूरी ऊर्जा से अपनी बात कहिये..
कविता पुनः बहुत सुन्दर है..और अपनी बात प्रभावी तरीके से कहती है|
कविता लिखने का कोई नियम नहीं होता... लोग बना लेते हैं
बहुत बधाई और शुभ कामनायें
सस्नेह
गौरव शुक्ल
नोट:- कुछ मित्र बहुत व्यथित दिख रहे हैं,बहुत सोचने के बाद भी कारण समझ नहीं सका|मेरा आग्रह है सभी पाठकों से,बन्धुओं से कि आलोचना करिये, प्रशंसा करिये, अपना असंतोष पूरी दृढता से व्यक्त करिये किन्तु आरोप-प्रत्यारोप जैसे निंदनीय व्यवहार से बचिये|यह युग्म की प्रतिष्ठा के न तो अनुकूल है न शोभनीयआशा है युग्म अन्यथा नहीं लेगा एरी किसी बात का..मेरा स्नेह है युग्म से
धन्यवाद
Just remember watever you write is good and best as it comes directly from heart so there is no question of defining or explaining anything to yourself or anybody else just keep writing as u do.Coz masterji u r the BEST
Regards
Anu
आप की रचना अभिव्यक्ती बहुत अच्छी है,..निराश मत होइये आप बहुत सुन्दर लिखते है,..हम यूँ ही नही वाह-वाह करते है फ़िर भी ओर अच्छा प्रयास किजिये,..एक शेर लिखती हूँ
"वक्त पर ना जा,वक्त एक जैसा है,
कर मेहनत फ़िर देख,
वक्त अपने जैसा है"....
मन्जिल तो पा ही लेगें बस चलते रहिये,..ओर फ़िर दोस्तों कि दुआएं तो आपके साथ ही हैं।
सुनीता(शानू)
राजीव जी, सर्वप्रथम एक अच्छी रचना के लिये साधुवाद।
हाँ,मैं आप को सूचित करना चाहूँगा कि मैं समयाभाव के कारण आप की शंकाओं का निवारण नहीं कर पाया था।
लेकिन आज जब मैं आप के प्रश्नों के उत्तर लिखने की सोच कर बैठा, तो संयोग से आप की रचना पहले पहले पढ़ लिया। और तब मुझे लगा कि अब मुझे आप को स्पष्टीकरण देने की ज़रूरत ही नहीं है; क्योंकि जो चूक आप से पिछली रचना में हुयी थी, आप ने उन्हें बिल्कुल भी नहीं दुहराया है,अपितु एक बेहतरीन किस्म का नमूना पेश किया है।साधुवाद फिर से।
और लगे हाथ मैं यह भी कहता चलूँ; देखिये लय या तुकान्त में लिखना उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं;महत्वपूर्ण यह है कि आप जो कहना चाह रहे हैं उसे प्रभावी और थोड़ा मज़ेदार तरीक़े से कह पायें ;बस। मज़ेदार तरीके से कहना इस लिये ज़रूरी है क्योंकि तभी कोई व्यक्ति या पाठक हमारी रचना को पढ़ेगा और यह उसका हक़ भी बनता है।
अब यह रचनाकार के पसंद की बात है कि वो कमल से आग उगलता है या कि हुस्न की तारीफ करता है;इतना ज़रूर है कि इंसानियत को ज़रूरत दोनों की ही है।
राजीवजी,
बंधनों में बंधकर लिखना और बंधनमुक्त यानि स्वछंद लिखना, दोनो का ही अपना मजा है। बंधकर लिखना तथापि मुश्किल कार्य है मगर जो इसमें निपूर्ण हो जाते है, वे शायद सर्वोच्च अनुभूति प्राप्त करते है। 'काका हथरसी" के लेखन के सभी कायल है, उन्होने भी बंधन मुक्त होकर ही लिखा है।
मेरे ख्याल से अंतर्मन की बाद को सम्पूर्णता से रखना ही प्रथम लक्ष्य होना चाहिये। निपूणता लगातार प्रयत्न करने पर आती है, इसलिये शुरूआत में ही भावों को बंधनों में उलझाने का कोई औचित्य नहीं है।
आपने शुरूआती दौर में कवि मन की पीड़ा का बखूबी चित्रण किया है। बधाई!!!
गौरव भाई,
आपकी बातेँ सही हो सकती है कुछ माईनो मेँ, लेकिन मै फिर भी वही कहूँगा कि कविता/गज़ल, विधान के अनुसार ही लिखी जानी चाहिये| उर्दू मेँ कविता की गज़ल ही केवल एक विधा नहीँ है, जिनको तकलीफ होती हो, वे लोग नज़म, अज़ाद शायरी, नगमेँ, रुबाईयाँ आदी मेँ अपने हाथ अज़माकर अपने आप को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर सकते हैँ| मतलब अपनी रुचि के अनुसार विधा अपनायेँ| जिन्हेँ छँद भेद नहीँ पता वे मुक्त छँद लिखेँ| पर यह कहना ऐसा नहीँ होना चाहिये या वैसा नहीँ होना चाहिये यह बात मुझे हमेशा से ही खलती है| जीवन सदा सरल नहीँ होता उस को जीने की कला सीखनी पडती है|
शुभकामनायेँ
- रिपुदमन पचौरी
कवि नहीं हूँ
कविता लिखती हूँ
साहित्यकार नहीं हूँ
साहित्य पढ़ती हूँ
आलोचक नहीं हूँ
कविता दिल से पढ़ती हूँ
जो दिल को छू ले
बस वही कविता लगती है ।
आपकी कविता दिल से लिखी व दिल से पढ़ी गई है । अतः बहुत अच्छी लगी । लिखते रहिये, तब तक, जब तक दिल लिखवाए ।
घुघूती बासूती
Lagta hai chot khayi hai,isliye aaise shabdonki rachana barsati nadike rupmein umad pade hain.
कलम एक चिनगी, कलम जिम्मेदारी
कलम शंख है, फूँकता मैं पुजारी
Bahot hi appropriate aur acchi lines likhi hain.
गति के प्रति इतना आग्रह दिखाते हैं राजीव कि अर्थ कहीं पीछे छूट सा जाता है । कविता लिखते लिखते मन मे उमडते भावों को विस्तार देना, जो सोंचा जैसा सोंचा, उसे गति देकर कविता पकाना राजीव खूब जानते हैं ।
राजीव आज रचना प्रक्रिया की पड़्ताल कर रहे हैं, अपनी कविता अपने कवि कर्म को तौलने का, हठ्पूर्ण प्रयास । एक प्रयास जिसमे बच्चों सा अपनी बात मनवाने का मीठा आग्रह है, पर साथ ही बड़ों सा बात पूरी, सविस्तार कह देने, कह सकने का विश्वास भी ।
गति के साथ इतना आग्रह तुक का हठ भी लाता है, जो अखरता है...पर गीतकार के लिये भाव पिरोना भी इसी हठ पर ही निर्भर है ।
बरसाती नदी सा अख्ख्ड़पन, जिधर मन किया उधर बह निकलने के मतवाले तेवर, कवि की रचना में,
"कहीं से शुरू फिर कहीं बेतुके
बहुत सिरचढे शब्द मनमीत मेरे"...पर कवि! 'शब्द' कह्कर 'भावों की बाढ़' को दूसरा नाम देना मानसिक स्तर पर एक और विद्रोह है। कितना कुछ है जो बस इस शब्दों के ढेर से बारूदी गंध नहीं ले पाया...शायद हिन्दी कविता इन्ही सिरचढे शब्दों से अभिशापित है ।
कविता मुख्यतः बनी बनायी रीतियों, मात्र कविता में ही नहीं ,अर्थ व्यापक और करें तो जीवन में कहीं भी,बंध कर चलने के खिलाफ़ एक मुखर विद्रोह का स्वर है । विद्रोह का समाज के उस क्षेत्र से आना जहां स्वर नहीं है, बस सदियों से दबा हुआ है...रोटी का असली स्वाद तो भूखे ही जानेंगे..
"मैं अपशब्द लिक्खूँ, मेरे शब्द पत्थर
मेरे शब्द में नीम, आँगन का गोबर
मेरे शब्द रौशन, अगर है अंधेरा
निराशा में ये शब्द उम्मीद मेरे"....
कविता सरपट भागती है और भागने मे एक बार में उतना प्रभाव नहीं डाल पाती जितना इसके शब्दों में समाहित है....(सुधी?)पाठक से कुछ उम्मीद रखने वाले गीत भले तो हैं पर जन तक अभी भी नहीं पहुंच रहे...
कहीं एक रोड़ा, कोई ईंट जोड़ा
सच है री कविता कहीं का न छोड़ा
मेरी लेखनी में नहीं बात कोई
मगर साफ कहता हूँ है साफगोई
कहीं से शुरू फिर कहीं बेतुके
बहुत सिरचढे शब्द मनमीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
वाह राजीवजी,
बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है आपने..
राजीवजी,कविताओ के बारे मे ज्यादा तो नहि जानती मगर बस इतना जानती हू कि जो मन को भाये वही सराहनीय रचना होती है...
और आपकी रचना मे वाकयी वो बात है...:)
बस इतना कहना चाहूगी कि, लिखते रहिये...
शुभकामनाये,
विभा
बहुत साफ़गोई से कवि का धर्म बताया गया है। यह कविता नहीं आलोचना है। या यह कहें कि आपके पिछले गीत हवा का डाकिया इस वक़्त, तेरी याद लाया है पर तमाम पाठकों द्वारा उठाये गये प्रश्नों के उत्तर। परंतु इससे यह भी आभास होता है कि कवि पाठक की मानकर नहीं वरन अपनी मानकर साहित्य-सृजन करना चाहता है। बहुत सामान्य सी बात है कि एक पाठक बहुत ही बचकाने तरीके से भी साहित्यकार की बिना किसी बात शिकायत कर सकता है (सम्भव है कवि ठीक जगह पर हो तब भी), फ़िर भी यदि उसके मन में जल्दी में इस तरह के भाव आये हैं तो मेरे विचार से श्रेयस्कर नहीं।
कुछ पंक्तियाँ जो ख़ासा पसंद आईं-
मैं लिखूँ मजूरा, मैं हल्ला ही बोलूँ
न सहमत हुआ तो मैं झल्ला ही बोलूँ
मैं अपशब्द लिखूँ, मेरे शब्द पत्थर
मेरे शब्द में नीम, आँगन का गोबर
मेरे शब्द रौशन, अगर है अंधेरा
निराशा में ये शब्द उम्मीद मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..
इस बार आपके इस गीत में कुछ ऐसे शब्द देखने को मिले जो व्याकरण सम्मत् नहीं हैं। जैसे 'लिक्खूँ' ( 'लिक्खना' से व्युत्पन्न) कई जगहों पर बोला तो जाता है परंतु लिखने में 'लिखें' ( 'लिखना' से व्युत्पन्न) ही लिखा जायेगा।
आपकी एक पंक्ति 'तेरी ही घुटन है तू देखे न दीखें' में 'दीखें' क्रिया आई है जो शब्दकोश में भी नहीं मिलेगी। 'दिखना', 'दिखवाना' आदि क्रियाएँ हैं। शायद आपने लयबद्धता को बनाये रखने हेतु 'दिखें' या 'दिखायें' की जगह 'दीखें' लिख दिया है।
मैंने भी आपकी कविता की मौलिकता को सम्मान देते हुए मात्र अनुस्वारों को चंद्रबिन्दुओं में, 'ड' को 'ड़' में बदला है। शेष आप निर्णय करें।
यह कविता पूर्वाग्रह से रहित हो कर पढी जाये इस लिये मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि टिप्पणियाँ पढते हुए "बरसाती नदी" शब्द ने मेरे लिये प्रेरणा का कार्य किया था जिसके लिये मैं पंकज जी और अजय जी को धन्यवाद भी देना चाहूंगा, लेकिन यह आलोचना नहीं है बिम्ब मात्र है। मेरे मन मे जल्दबाजी के कोई भाव नहीं...मैं पाठको से निवेदन ही कर सकता हूँ कि कृपया कविता को इसी दृश्टिकोण से पढें....
आलोचनाओं के लिये मैं सर्वदा प्रस्तुत हूँ, मुझमे सुधार लाने का दायित्व भी तो सुधी पाठकों का ही है।
*** राजीव रंजन प्रसाद
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