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Saturday, March 24, 2007

तसल्ली




उडान भरने पर
गिर गया
मगर इतनी तसल्ली थी
बैठे बैठे गिरा नहीं
उडान मैने भरी थी

तुषार जोशी, नागपुर

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

manya का कहना है कि -

एक आशावादी सोच.. गिरते हैं शह्सवार ही मैदान-ए-ज़ंग में....

miredmirage का कहना है कि -

उड़ते हुए गिरें या मर भी जायें तो कुछ बुरा नहीं
उड़ने की इच्छा लिए मरे तो क्या मरे?
घुघूती बासूती

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

बहुत आशावादी क्षणिका है तुषार जी.

उडान भरने पर
गिर गया
मगर इतनी तसल्ली थी
बैठे बैठे गिरा नहीं
उडान मैने भरी थी..

बस इसी के बाद दुष्यंत की ये पंक्तियाँ आरंभ होती हैं:

वे सहारे भी नहीं, अब जंग लडनी है तुझे,
कट चुके जो हाँथ, उन हाँथों में तलवारें न देख..

*** राजीव रंजन प्रसाद

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

एक खूबसूरत आशावादी लघुकविता.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आप सदैव ही कम शब्दों में बहुत सी बातें कहते आये हैं। इस बार आपने पुनः सिद्ध किया। साधुवाद।

ranju का कहना है कि -

कम शब्दों में बहुत सी बात... खूबसूरत हैं

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

सुन्दर भाव हैं आपकी उडान में.....

गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में
वो तिफल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले

ajay का कहना है कि -

छोटी मगर अच्छी कविता।

Anonymous का कहना है कि -

जोशीजी, छोटी और मनभावन कविता। बहोत भा गयी मनको।

- विनय सिन्हा

पंकज का कहना है कि -

बात बिल्कुल ठीक है।
मेरे गाँव में एक कहावत है;
"बैठे से बेग़ार सही"।

Anupama Chauhan का कहना है कि -

choti kintu gehri baat...

Upasthit का कहना है कि -

बचपन मे हमारे स्कूल के एक शिक्षक कहा करते थे..."असफ़लता यह दिखाती है कि, प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया"...
आशावाद ठीक है..पर इन पांच पंक्तियों मे आशावाद कम, अपनी असफ़लता को छुपाने की कोशिश ज्यादा दिख रही है मुझे.....एक ऎंठ दिख रही है, हार छुपा न सकने की...
हो सकता है पूरी बात का एक विपरीत पहलू हो यह पर, "तसल्ली"..नहीं गर्व होता तो ऎंठ की मात्रा शायद थोडी कम हो जाती....

joglikhisanjaypatelki का कहना है कि -

तुषार भाई...नमस्कार..
उड़ान भरने वाली पंक्तियां बहुत ही आशा भरी हैं.
ज़्यादा बडी़ बात है कर गुज़रना.बैठे-बैठे ही सोचेंगे की मंज़िल पर जा पहुंचें ...नामुमकिन.
मेरे शहर के मक़बूल शायर डा.राहत इंदौरी साहब कहते हैं(माफ़ कीजियेगा शब्द्श: याद नहीं आ रहा है)
ये कैंचियां क्या हमें डराएंगी
हम परों से नहीं हौसलो से उड़ते हैं.

शुभेच्छा माझा कडून.

संजय

sahil का कहना है कि -

बहुत khub जी बहुत acchhe.
alok singh "sahil"

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