फटाफट (25 नई पोस्ट):

Wednesday, March 21, 2007

पानी की आत्मकथा


मेरा कोई आकार नहीं
कोई रूप साकार नहीं ...

शिव की जटाओं से जन्मा
तपस्या का मोल,गंगा नाम मिला
पावन हूँ ये कहते हैं
पाप मुझी में धुलते हैं
पुष्प,बेल-पत्ते,दिये जलाते
सुबह साँझ आरती उतारते
मुहल्ले में मृत्यु किसी कि होये
अस्थियाँ मुझी मे बहाते हैं
आस्था! मरण पश्चात स्वर्ग मिलेगा
फिर शिव ने जटा में क्यूँ न धरा मुझे?
सब ग्रहण कर मैं चलता चला
श्रद्धा के घूँट निगलता चला
मैं चलता चला....

ऊँची-ऊँची पर्वतों की श्रृंखलायें
मेरा पथ निर्धारित करतीं
इतनी ऊँचाई से गिरा
फिर झरना बनना कठिन कहाँ!
कुदरत प्रफुल्लित होती मेरा यह रूप देख कर
भूल जाता हूँ उस चोट को
जो लगती पत्थरों पर गिर कर
विश्व भ्रमण करने चलता चला
बर्फ की मूँठ से पिघलता चला
मैं चलता चला....

बहता-बहता रंगत मे हुआ काला
अब पहचान मेरी गन्दा नाला
सुन लो बात रहस्य की कहता हूँ
भले काले में मिल सब होता काला
किन्तु समा लेता हर रंग को,सिर्फ रंग काला
न जाने क्यूँ नाक मूँद कर गुज़रते
लोग मुँह से पिचकारी मारते
चलो इसी बहाने मेरी शरण में आयी
डेरा डाले बूढी को धुत्कारता नहीं कोई
समतल शान्त मैं सङता चलता चला
लाचारी के ठूँठ सा ढलता चला
मैं चलता चला.....

खाडी से गुज़रा सागर से जा मिला
न उसने रूप देखा न देस पूछा
समेट लिया मुझमें मुझे ही
लहर लहर कर लहरता हूं
साहिल से टकराता हूँ
कण-कण मुझमें भीगकर
जब वो बाहें फैलाये
तो सागर में लौट जाता हूँ
अजीब अनोखी है न माया?
साहिल है वो सदा से मेरा
फिर भी नियति,मैं सागर में रहता
तृष्णा दबोचे लहराता चलता चला
संवेदनओं को कूट मैं मचलता चला
मैं चलता चला....

कभी बादलों मे रहता हूँ
और तलाब में गिरता हूँ
कुयें मे घुटता,गगरी से छलकता हूँ
किसी का पसीना ,या मरते का आखिरी निवाला हूँ
कभी बरखा बहार तो कभी
चातक का इन्तज़ार हूँ
उसकी आँखों से टपक कर आशा बन जाता हूँ
मय के प्याले में मिल,मय की भाषा बन जाता हूँ
सर्व न्योछावर कर मै रिस्ता चलता चला
दर्द के फव्वारे सा फूट थिरकता चला
मैं चलता चला....

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

12 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

कविता अच्छी है। कुछ पंक्तियाँ विशेष रूप से प्रभावी हैं....
"श्रद्धा के घूँट निगलता चला
मैं चलता चला...."

"भूल जाता हूँ उस चोट को
जो लगती पत्थरों पर गिर कर
विश्व भ्रमण करने चलता चला.."

"तृष्णा दबोचे लहराता चलता चला
संवेदनओं को कूट मैं मचलता चला"

और अंत भी अच्छा किया है आपनें

"चातक का इन्तज़ार हूँ
उसकी आँखों से टपक कर आशा बन जाता हूँ
मय के प्याले में मिल,मय की भाषा बन जाता हूँ
सर्व न्योछावर कर मै रिस्ता चलता चला
दर्द के फव्वारे सा फूट थिरकता चला
मैं चलता चला...."

*** राजीव रंजन प्रसाद

ranju का कहना है कि -

साहिल है वो सदा से मेरा
फिर भी नियति,मैं सागर में रहता
तृष्णा दबोचे लहराता चलता चला
संवेदनओं को कूट मैं मचलता चला

बहुत ख़ूब ....बहुत ही अच्छे हैं भाव .पढ़ना अच्छा लगा

mahashakti का कहना है कि -

प्रत्‍येक पंक्ति मे बांधे रखा है आपने, पढ़कर अच्‍छा
लगा।

पर शिकायत है कि आपने शीर्षक का चुनाव ठीक नही किया, अगर यह गंगा कि व्‍यथा शीर्षक होता तो बात कुछ और होती।

पर अन्तिम पंक्तियॉं इसे किसी नदी के नाम पर रहने नही दे रही है।

अच्‍दी कविता

ajay का कहना है कि -

अच्छी कविता है। नदी के उद्गम से लेकर, उसके सागर में मिलने तक का प्रभावी चित्रण है।

Gaurav Shukla का कहना है कि -

बहुत सुन्दर विषय है कविता का
और भाव भी अच्छे हैं

"सब ग्रहण कर मैं चलता चला
श्रद्धा के घूँट निगलता चला"
.
.

यद्यपि कविता का विषय बहुत गम्भीर है और कदाचित इस विषय पर लिखना आसान भी नहीं है तथापि कवियित्री की क्षमता और विलक्षण लेखन से परिचित हूँ इसलिये कह सकता हूँ कि कविता और भी सुन्दर हो सकती थी|प्रवाह की कमी भी खटकती है कहीं-कहीं


सस्नेह
गौरव शुक्ल

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

सुन्दर व सार्थक रचना

जल धारा जब अपने उदग्म से निकलती है, उस समय वह अत्यन्त निर्मल व प्रवाह शाली होती है.. परन्तु हम जैसे संवेदना हीन लोगों की बस्ती में पहुंच कर यह निर्मल धारा भी मलीन व प्रवाहहीन हो जाती है...

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

एक तो इतनी लम्बी कविता और प्रवाह का नाम नहीं।

पाठक बोर हो सकता है। अनुपमा जी! कविता चाहे लयबद्घ हो या अलयबद्घ, दोनों में प्रवाह होना चाहिए और सम्भवतः आपकी इस कविता में प्रवाह का सर्वथा अभाव है।

Upasthit का कहना है कि -

कविता इतना कुछ कह रही है कि कहीं कहीं बोझिल भी हो जाना उतना अखरता नहीं जितना कि कहीं कहीं तुक, तत्सम और उपदेश के लिये इतना आग्रह कि आत्मकथा उबाऊ बन जाती है । (वैसे अधिकतर आतमकथायों लेखक के अतिरिक्त पाठकों के लिये सरस, बहुत कम ही हो पायी है....विधा का ही दोष है, लेखिका अन्यथा न लें)
जीवन के हर छोटे से छोटे भाग विभाग अनुभाग में जीवन रस बन जल ही थिरकता चल रहा है । जल उदभव है, जल जीवन , जल तांडव भी...
भाव विचार बोझिल होने पर भी इतना विस्तार ...बधाई लेखक(कवि नहीं कह रहा क्योकि कवि ऐसी रचनायें नहीं करते, हां लेखक लिख सकते हैं)

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

कम शब्दों में मात्र इतना ही कहना चाहूँगा कि आपने पानी के जीवन का संजीव चित्रण किया है।

श्रद्धा के घूँट निगलता चला...

सुन्दर भाव!!!

raybanoutlet001 का कहना है कि -

tiffany and co outlet online
tiffany and co jewellery
nfl jerseys from china
links of london
michael kors factory outlet
ray ban sunglasses outlet
air jordans,cheap air jordans,air jordan shoes,air jordan 11,air jordan 13,air jordan 6,air jordan 4
ray ban sunglasses
jordan retro
huarache shoes
yeezy boost 350
jordan retro
nike roshe run one
yeezy boost
ralph lauren online,cheap ralph lauren
ray ban sunglasses
adidas tubular x
cheap nfl jerseys
discount sunglasses
tiffany and co outlet
ralph lauren polo shirts
tiffany and co uk
michael kors handbags sale
adidas nmd
cheap real jordans
http://www.chromehearts.com.co
louis vuitton handbags
nike zoom kobe
michael kors outlet store
yeezy shoes
yeezy
nike huarache
oakley store online

raybanoutlet001 का कहना है कि -

longchamp outlet
adidas yeezy uk
true religion jeans wholesale
ralph lauren uk
true religion jeans
nike roshe run
chrome hearts
kobe bryant shoes
skechers shoes
michael kors factory outlet
yeezy boost 350
longchamp bags
adidas neo

Unknown का कहना है कि -

new york knicks jersey sub
philadelphia eagles jerseys blog
omega watches weekly
michael kors outlet your
mont blanc pens your
eagles jerseys could
new orleans saints jerseys and
ray ban sunglasses these
miami heat on
nike blazer pas cher So,

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)