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Friday, March 30, 2007

मेरे बगल वाली नदी


लोहे के पुल से

कोई ट्रेन

धड़धड़ाती हुई गुजरती है

बूढ़ी नदी

चौक कर जाग जाती है।

पानी के मोटे चश्मे से

झाँकती हैं

दो लिजलिजी आखें

बुदबुदाती है नींद में

जैसे ही आँख लगती है

कोई मल्लाह मारता है चप्पू

पकी छाती में

बेचारी ऐंठ कर रह जाती है

दिन भर घिसटती रहती है अपने आपको

थकी-थकी नींद से बोझिल..................

....मेरे बगल वाली नदी

कभी चैन की नींद सो नहीं पाती है।


कवि-मनीष वंदेमातरम्

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

ajay का कहना है कि -

सचमुच आजकल ज्यादातर नदियों की हालत देखकर यही लगता है कि जैसे वो बस खुद को घसीट रहीं हों। बहुत अच्छा लिखा है आपने। ऐसे ही लिखते रहें। आपकी अगली कविता की प्रतीक्षा रहेगी।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

जो ऊपर से शांत नजर आते हैं उनके भीतरी तुफ़ान से सावधान रहना चाहिये... चाहे तो मल्लाह या मछुआरे से पूछ कर देख लीजिये...

ranju का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर तरीक़े से लिखा है ...एक सच को कविता के रूप में पढ़ना अच्छा लगा !!

princcess का कहना है कि -

nice personification.
congrates manishjee

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

वाह मनीष जी यह आपकी बेहतरीन कविता है। दृष्य खींचते से बिम्ब हैं और छू कर गुजरती हुई संवेदनायें..आपको बधाई।

*** राजीव रंजन प्रसाद

आलोक शंकर का कहना है कि -

यह आपकी अबतक की सबसे अच्छी कविता है … अच्छा है … लिखते रहिये

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

संवेदनाओं को अच्छा स्वरूप दिया है आपने.

कोई मल्लाह मारता है चप्पू
पकी छाती में
बेचारी ऐंठ कर रह जाती है


घटना विशेष का संजीव चित्रण करती आपकी ये पंक्तियाँ शानदार है. बधाई!

पंकज का कहना है कि -

सोचने की बात है कि जो व्यक्ति निर्जीवों को इतने करीब से देख सकता है;
वो जीवधारियोंसे कितना लगाव रखता होगा।
बेहतरीन, मनीष जी।

tanha kavi का कहना है कि -

नदी का मानवीकरण कहूँ या फिर मानव का नदीकरण , हर रूप में यह कविता जीवन के कटु सत्यों को हीं दर्शाती है।
मनीष जी की अब तक की सबसे अच्छी कविता यहाँ प्रस्तुत हुई है, ऎसा मेरा मानना है। इसके लिए मैं शैलेश जी का शुक्रगुजार हूँ।

Unknown का कहना है कि -

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