Saturday, February 24, 2007

चाहता हूँ मैं

नहीं चाहता मै
संकेन्द्रित हो जाओ तुम

मैं तो चाहता हूँ
टूट-टूट के बिखर जाओ
हर प्राण में

जलो
ताकि प्रकाशित हो अंतस
मिटे तमस

बन के सुवास
घुल जाओ वायु में
कि सुवासित हो
घर का कोना-कोना

मैं चाहता हूँ
कि तुम दब जाओ
नींव की तरह
जिससे बुनियाद बन सको
एक अकलुषित समाज की

मैं चाहता हूँ
कि तुम मर जाओ
ताकि फिर जनम ले सको
और कर सको समर्पित पुनः
सर्वस्व
ताकि
दुनिया कुछ और दिन साँस ले सके।।


कवि- मनीष वंदेमातरम्

8 टिप्पणी:

राजीव रंजन प्रसाद said...

मनीष जी, सुन्दर कविता का धन्यवाद।

कविता का पूरा सम्मान करते हुए मैं कुछ अपनी बात भी कहना चाहता हूँ..आप नही चाहते कि "संकेन्द्रित हो जाओ" जिससे कि ..."टूट-टूट के बिखर जाओ, हर प्राण में" ।..आप चाहते हैं कि "जलो" "ताकि प्रकाशित हो अंतस, मिटे तमस"। आप चाहते हैं कि वे "बन के सुवास" घुल जायें कि "सुवासित हो, घर का कोना-कोना" आप नीव बनाना चाहने हैं कि वह एक अकलुषित समाज की बुनियाद बनें,.. लेकिन जब सारे प्रयास होंगे तो मौत क्यो?.."कोशिश" की तो मौत नहीं होनी चाहिये। कोशिश की हार हो सकती है जिससे वह और उर्जावत हो कर उठ खडा हो..आपके सपनों के सच के लिये..।..ताकि दुनिया कुछ और दिन साँस ले सके।


यह केवल मेरा विचार है, आप असहमत भी हो सकते हैं..

*** राजीव रंजन प्रसाद

ग़रिमा said...

मनीष जी गहरी बात बोल गये। सच है वास्तविक सृजन के लिये सम्पुर्ण अंत का होना नितांत आवश्यक है। एक अकाट्य सत्य को सहज रुप से दर्शाने के लिये बधाई । :)

मोहिन्दर कुमार said...

आपकी कविता जिवन्त है कोई दो राय नही परन्तु यह "तुम" कौन है जिसको आप सम्बोधित कर रहे है काफ़ी कोशिश के बाद भी मै‍ समझ्ने मे असमर्थ रहा... शायद मूढमति काम नही कर रही आप ही समझा दे‍

Reetesh Gupta said...

बढ़िया कविता ...बधाई

Tushar Joshi said...

मनीष वंदेमातरम जी की कविताओं से मै हमेशा प्रभावित हुआ हूँ। चाहता हूँ मैं ये कविता मन को छू गई।

आप हमेशा कविता में कुछ नया करते हैं। नये प्रतिक अपनाते है।

टूट के बिखर जाना, जलना, दब जाना, मर जाना ये प्रतिमाएँ आम तौर पर नकारात्मक होती हैं। मनीष जी की कविता में वें सारी प्रतिमाएँ सकारात्मक रूप लेकर आतीं हैं। कदाचित तुम वे खुदको कह रहे हैं। चेतना मन से कह रही है।

गौर से देखा जाए तो ये वास्तविकता है माँ की। अपने बच्चों के लिये माँ टूटती है, जलती है, दबती है मरती है। और आगे बढकर ये तो सभी प्यार करने वालों की कहानी है। जितना ज्यादा आप किसी से प्यार करेंगे उसके लिये समर्पित होने के लिये तैयार रहेंगे।

मनीष जी को प्रणाम। उनकी कविता का आनंद आप मेरी आवाज़ में लेना चाहें तो http://tusharvjoshi.mypodcast.com पर जाएँ

तुषार जोशी नागपुर

ajay said...

मनीष जी इतनी सुंदर कविता के लिये साधुवाद। जितने सुंदर भाव हैं, उतने ही सुंदर शब्द। निश्चय ही नवसृजन के लिये कुछ बलिदान तो देना ही होता है और ये बलिदान इस सृजन के कारक का भी हो सकता है। परंतु निश्चय ही मैं राजीव जी की इस बात से पूर्णतया सहमत हूँ कि कोशिश का अंत नहीं होना चाहिये।

alok shankar said...

ek baaar jesus se kisi bachche ne puucha ki aap mujhse kitna pyar karte hai... unhone haath failaye aur kaha itana aur svarg sidhar gaye .. jaroorat hai aise logo ki jo dusre ka kalush apane upar le sake ..jo doosro ke liye kuch kar sake ...

Rakesh said...

Hello Manishji!
Most of the poem , which were flashing here read by me .And i found that, you expressed not ur view ur experience . That should be not by the poet , the poem should be GENERIC.The view u presented here is really not appreciable, ye kisi tute hue dil ki aawaz hai zise kavita ke naam per bhanzane ka kam kiya za raha hai............