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Tuesday, February 13, 2007

संक्षिप्त भाव -- निठारी पर


पाठकों को हुई असुविधा के कारण मैं अपनी कविता 'निठारी पर ' का संक्षेप मे भाव लिख रहा हूँ आशा है यह कुछ सहायक होगा ।

"शिशु- दधीचि- ………कोलाहल ?"

यहाँ कवि ने हत बच्चों को दधीचि कहा है, जिन्होंने अपनी अस्थियाँ देवों को दान कर दीं थीं जिनसे वज्र बना और आसुरी शक्तियों की हार का प्रमुख कारण बना । यहाँ कवि का प्रश्न है कि क्या यह जबरन ली हुई कुर्बानी है , जिससे शून्य , प्रताड़ित, सोई हुई मानवता के पुनरुद्धार की आशा जगेगी ?

"अहे !अस्थि………… ………स्वप्नों का ।"
क्या इन बच्चों की टुकड़े टुकडे हुई अस्थियों से कोई ऐसा वज्र बनता है जो कलियुगी पाप का मर्दन कर सके ?यदि ऐसा है तो उनका , उनके बचपन, धर्म की अहिंसावादी धारणाओं ,उनके माता - पिता द्वारा बुने गये उन सपनों (जिनमे उनके द्वारा परिवार की प्रगति होती) के मिट्टी के सूखे घड़े के समान तोड़ दिये जाने में कोई अनर्थ नहीं है ।

"क्षम्य है , कारक ………… ……………गुरु प्रयोजन !"
तब उस दर्दनाक घटना को अंजाम देने वाला भी क्षम्य है , जिसने दर्द के आँसुओं से नहाये हुए नयनों मे "क्यों" का प्रश्न उत्पन्न किया ,जिसने जबरन उनकी अस्मिता भंग की । वे बालक उस समय नियति पर क्षुब्ध हो रहे होंगे कि नियति इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है ? पर वे उनके इस जबरन लिये गये त्याग का प्रयोजन नहीं समझे , नही समझे कि यह शायद पूरी मानव जाति के हित के लिये हुआ है जो कि बहुत महान प्रयोजन है

"दैव- देवज ही नियम …………भी हो यथोचित् ।"
यह हमारी संस्कृति के अनुसार देवों का ही बनाया हुआ नियम है, या यों कहें कि नियम बन गया है , जब भी कोई भीषण विपदा पड़ी, किसी दधीचि के त्याग की जरूरत पड़ी ।अर्थात मानव जाति कए त्याग देवों का सहारा बनते आये हैं ।
तो यदि मानव जाति का यह त्याग यदि देवों का अजस्र (कभी न खत्म होने वाला) तेज स्रोत बने तो यह आसुरी कृत्य भी उचित है, देवों का कोई भी मानव जाति के किसी भी हद तक गिरने जैसे त्याग से बड़ा ही होगा !!

"दीखता , पर कृत्य … … पुष्प कोई । "
लेकिन कवि को यह कुछ और ही कारण से हुई घटना लगती है । कवि को ऐसा लगता है कि देव-कृत्य ऐसा दुर्नियंत्रित नहीं होता , इतना भी नहीं कि किसी कोमल पुष्प को बेदर्द रेत की आँधी में रेत के पहाड़ तले कुचल दे , सिर्फ़ इसलिये कि पुष्प रेगिस्तान में आ टपका ।

"बुद्धि या नवजात तार्किक …… अवसर)"
यह बुद्धिजीवी मानव जाति द्वारा उत्पन्न कोई नयी तर्क नीति है, जो इतना वीभत्स क्रित्य होने की कल्पना भी करने की क्षमता रखती है , और कल्पना तो अलग ,कोई मानव उसे कर भी डालता है। और कुछ अन्य मानव बस आलोचना करके अपना पल्लू झाड़ आगे बढ़ जाते हैं जैसे इनकी आलोचना पाने से किसी की जान वापस आ जाती है । और आलोचना भी निः स्वार्थ नहीं , राजनीतिक दल अपना अपना स्वार्थ का घड़ा भी भरपूर भरते हैं जहाँ भी अवसर मिले ।

" फिर बना दुविधा ………… अनर्थ कर्ता !!"
फ़िर अपने राजनैतिक खेल में एक दूसरे को दोषी बताने का कार्यक्रम आरंभ होता है ।दो वर्ग बाँटे जाते हैं , एक रक्षक और दूसरा भक्षक , और कौन क्या है , यह तय करने के लिये जो कीचड़ उछाला जाता है वह सब जानते हैं । इस नयी मानवी तर्कशक्ति से रक्त बीज की तरह अनैतिक तर्क उत्पन्न होते हैं । और इस अनैतिक तर्क से कोई न कोई दोषी तो मिल ही जाता है (जिसकी भी बलि से सबसे ज्यादा फ़ायदा हो)

"दीखता हैमध्य ……… जल मेंदेख अवसर "
विश्व रूपी सागर में खारे जल में , एक नये जल का निर्माण हो रहा है (एक नयी आसुरी शक्ति जो कि मानव कि भीतर ही रहती है , किसी अन्य रूप में नहीं) जो कि मृत सागर के जल की तरह है जिसमें कुछ भी नहीं डूबता है, सद्भावना को उपर उपर ही रखता है, मुखौटे की तरह । सीधे अर्थ में आज के मानव , कुछ इस तरह हैं कि अवसर पड़ने पर कभी भी मानवता के कर्तव्य से विमुख हो कितना भी घृणित कार्य कर सकते हैं , यह निठारी का दुष्कृत्य इसी का उदाहरण है ।

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

आलोक शंकर का कहना है कि -

भूल सुधार

"देवों का कोई भी मानव जाति के किसी भी हद तक गिरने जैसे त्याग से बड़ा ही होगा !!"--
"देवों का कोई भी प्रयोजन मानव जाति के किसी भी हद तक गिरने जैसे त्याग से बड़ा ही होगा !!"

mahashakti का कहना है कि -

सरता से समझाने के लिये धन्‍यवाद

Gaurav का कहना है कि -

किन्तु आलोक जी फिर भी कहूँगा कि हिन्दी के प्रयोग मे इतनी सावधानी अवश्य बरतें
कि उसका सौन्दर्य प्रभावित न हो और मूल विषय से भटकाव न हो|
अन्यथा न लें,किन्तु मैं बस यही कहना चाह रहा हँ कि "मृत्तिका - घट - से टूट चले स्वप्नों का " के
स्थान पर "मिट्टी के घडे से टूट चले सपनों का" कह कर यदि पाठक के हृदय मे आसानी से पहुँचा जा सकता है
तो भाषा को अनावश्यक क्लिष्ट बनाने का कोई औचित्य नहीं है|

आपका शब्द्कोश निश्चित ही अत्यन्त समृद्ध है|बधाई आपको

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

आलोक शंकरजी,

प्रत्येक कवि का काव्य रचने का अपना अंदाज होता है और उसी के अनुरूप उनका शब्द चयन।

आपकी कविता में निश्चित तौर पर क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग हुआ है और यही वजह रही की आपकी कविता को बार-बार पढ़ने के बावजूद मैं टिप्पणी करने में खुद को असमर्थ ही महसूस करता रहा।

जैसा की पाठकों की प्रतिक्रिया में देखने को मिल रहा है कि ज्यादातर पाठक आपको क्लिष्ट शब्दों से बचने की सलाह दे रहे हैं मगर इस मामले में मैं आपका समर्थन करता हूँ।

कवि को कभी भी अपना अंदाज नहीं बदलना चाहिए, आपने जिस प्रकार यह पोस्ट लिखी है वैसे ही अपनी कविता के साथ में क्लिष्ट शब्दों का भावार्थ व्यक्त कर देना चाहिए ताकि प्रत्येक पाठक आपके मनोभावों को समझ सके।

आपका समृद्ध शब्द्कोश आपकी रचनाओं में झलकता है। भाषा पर आपकी पकड़ बहुत उम्दा है। बधाई स्वीकार करें।

-गिरिराज जोशी "कविराज"

ranju का कहना है कि -

accha laga in vichaaro ko yahan padana aur samjhana !!

Anonymous का कहना है कि -

Aalok ji,

klisth bhaashaa ko prog naa karne ko main nahin kahtaa... par...tasveeron mein itne rang naa bhar diye jaayein kee mool chitrr hee ujaagar naa ho sake. ( aisaa meraa vichaar hai ).

aap kee kavitaa kee vyaakhyaa sundar hai aur aap kaa saanskritik aur bhaashaa gyaan bhi paathakon se chipaa nahin hai.

kripyaa likhate rahein.
Ripudaman Pachauri

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