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Sunday, February 11, 2007

मैंने देखा है


मैंने देखा है-
उसकी लचकती ऊँगलियों को
तावे पर लहकते हुए,
पसीने से तर-बतर रोटी-से चेहरे पर
उबलती एक कशिश,
झुके हुए कंधों की सिकुड़न,
ताकि
खुरदरे चेहरे की परछाईं गर्म लोहे पर
उतर सके।

मैंने देखा है-
उसके पाँव की मुलायम तलवों को
जलते सड़क पर झुलसते हुए,
पेट की आग को कड़कती धूप से
लड़ते हुए,
आँखों में आधे-अधूरे ख्वाब
पालने की गुस्ताखी
ताकि
दो जीव दो दिवस और जी सकें।

मैंने देखा है-
उसकी माँ को चरमराते खटिये पर
कराहते हुए,
सूखे होंठों से बेटे को पुकारने की ज़द,
पथराई निगाहों में एक अनकहा दर्द,
डगमगाते कदमों से माँ को सहारा देना,
ताकि
उसके जीने का एक बहाना तो रह सके।

इस तरह
मैंने देखा है-
बचपन को बुढापे में ढलते हुए।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

ताकि
दो जीव दो दिवस और जी सके।


बहुत ही मार्मिक कविता लिखी है आपने तन्हा जी, प्रत्येक पंक्ति में दर्द के साथ-साथ प्रेम और संघर्ष भी छूपा हुआ है।

आपका प्रयास अच्छा लगा।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

सच कहा आपने,

एक गरीब व्यक्ति का बचपन ऐसे ही बुढ़ापे तक पहुँच जाता है। मैंने भी इस सच को बहुत करीब से महसूस किया है।

manya का कहना है कि -

बहुत मर्मस्पर्शी कविता है.. सत्य, संघर्ष, वेदना और जीने कि कोशिश.. और उसपर परस्पर प्रेम..यही जीवन का सत्य है शायद है।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

विश्वदीपक जी..

पूरी कविता एसी है कि कोई चलचित्र देख रहा हो..

"उसकी लचकती ऊँगलियों को
तावे पर लहकते हुए"

"रोटी-से चेहरे पर"

"खुरदरे चेहरे की परछाईं गर्म लोहे पर उतर सके"

"आँखों में आधे-अधूरे ख्वाब
पालने की गुस्ताखी
ताकि
दो जीव दो दिवस और जी सकें"

"पथराई निगाहों में एक अनकहा दर्द"

"बचपन को बुढापे में ढलते हुए"

आपने यह अमर कविता लिखी है|

आलोक शंकर का कहना है कि -

"ऊँगलियों- उँगलियॉ "
"उसके पाँव की मुलायम तलवों - उसके पाँवों के मुलायम तलवों को (पाँव का एक ही तलवा होता है कविता में पाँव एकवचन है और तलवे बहुवचन)"
"जलते सड़क -जलती सड़क"
"तावे- तवे"

कविता और उसका व उसका भाव दोनों अच्छे हैं सराहनीय प्रयास है ।

ajay का कहना है कि -

आलोक शंकर जी द्वारा इंगित कुछ भाषाई गलतियों के बावज़ूद एक बहुत अच्छी कविता है जो कवि की तिल तिल कर जीते गरीब लोगों के साथ सहानुभूति को अपने पाठक तक भी पूरी सक्षमता से प्रेषित करती है। कविता में प्रयुक्त 'मैं' पाठक को कविता के साथ एकाकार होने को मानो मजबूर कर देता है। कविता की चित्रात्मकता इस कविता का एक और सुदृढ़ पक्ष है जोकि इसके सौन्दर्य में चार चाँद लगा देता है।

Pramod का कहना है कि -

koshish achhia thi, but not impressive, inhe kahan itne dukhi log mil jaate hain, ye sab likh kar kya dikhana chahte hain ye samajh se pare hai, kuch positive sonche to sab ke liye achha hoga...

raybanoutlet001 का कहना है कि -

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