Saturday, February 10, 2007

गुरू

नयी कम्पनी डूब गयी जब
टपरी पर मै खडा था बेकल
उदास था मैं हार गया था
दर्द भरा था घायल घायल

बल्ली खंबे जो भी मिल गया
लेकर वो घर बांध रहा था
पसिने से लथपथ कोई
मजूर अकेला जुझ रहा था

चाय की चुस्की लेकर पूछा
मैने, कैसे घर गीर गया?
सुन कर फूट पडा वो भाई
और कहानी बताता गया

रात को तुफाँ यूँ आया था
आ गया था छत जमीन पर
दुख उसका अनुभव करने से
कम्पीत हो गया मेरा भी स्वर

सहानुभूत स्वर से पुछा जब
दुख तो बहुत हुआ होगा?
कहने लगा आप लोगों को
दुखी होना पुराता होगा

औरत बच्चे छत हीन हो
तब दुखी होना पुराता नही
रात तक छत बन जानी है
तब तक मुझको बैठना नहीं

सुन कर मै सकते में आ गया
क्या हो गया है ये मुझको?
क्या मुझको पुराता है क्या?
पुराता नही है जो इसको?

झट खडा हुआ मैं लेकर
आशा फिरसे जीतने की
इस गुरु ने ताकत दे दी
गिरकर फिरसे दौडने की

तुषार जोशी, नागपूर

11 टिप्पणी:

शैलेश भारतवासी said...

तुषार जी,

आपकी कविता हर बार मुझे जीने की राह दिखा देती है।

तूफ़ाँ से लड़ने की हिम्मत।

उस लाचार व्यक्ति के छप्पर गिरने और उसके उसे रात तक खड़ा कर देने की मजबूत इच्छा सचमें आपकी कविता के अनूठे अलंकार हैं।

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

सुन कर मै सकते में आ गया
क्या हो गया है ये मुझको?
क्या मुझको पुराता है क्या?
पुराता नही है जो इसको?

झट खडा हुआ मैं लेकर
आशा फिरसे जीतने की
इस गुरु ने ताकत दे दी
गिरकर फिरसे दौडने की


आपकी प्रत्येक कविता में आशावादी भावों के साथ-साथ एक संदेश भी होता है, आपकी कविता दिल को छूति है।

ajay said...

तुषार जी की कविता गिरकर फिर खडे होने की मानवीय जिजीविषा का प्रमाण है। उस सुविधाहीन मजदूर की शाम से पहले अपने परिवार के लिये एक छत बनाने की अदम्य इच्छा सामने मौजूद व्यक्ति को भी फिर से संघर्ष करने की प्रेरणा दे जाती है। प्रादेशिक भाषा का प्रयोग मन को आकर्षित करता है। भाषा प्रयोग में कुछ विषंगतियाँ अवश्य हैं, पर कुल मिलाकर एक अच्छी कविता है।

Divine India said...

कविता का आशावादी भाव प्रशंसनीय है…जबतक व्यक्ति में आशा की कसौटी नहीं होगी वह जड़त्व की स्थिती में ही होगा…सुंदर कविता…धन्यवाद!

Anonymous said...

गुरू देव,

आप की कविता भी कुछ प्रेरणा से कम नहीं। बहुत सुंदर।

रिपुदमन पचौरी

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुन्दर रचना ।

Upasthit said...

किसी घटना को कविता मे लिखना और सफ़लता से लिख पाना थोड़ा मुश्किल है ।
आप आशा जगा सके हैं, और आशा का पाठ निचले तबके से....अच्छा प्रयास ही कहूंगा इसे बस । लिखने को आप ही की लेखनी इतनी समर्थ है कि इस कविता से कहीं अच्छा आप लिख सकते थे ।

Tushar Joshi said...

सभी पाठकों को मेरा प्रणाम। आपने मेरी रचना पढ़ी और अपनी राय लिखी, इसलिये आप सब का मैं आभारी हूँ। इसी तरह प्यार बनाए रखीये। मुझे हौसला मिलता रहेगा।

शैलेश, कविराज, अजय, डिवाइन, रिपुदमन सबको पुनश्च नमस्ते।

उपस्थित जी आप कहते हैं मैं और अच्छी कविता लिख सकता हूँ। जरूर मेरा यही प्रयास रहेगा।

आपका
तुषार जोशी, नागपुर

राजीव रंजन प्रसाद said...

अनुपम आशावादी रचना..

"झट खडा हुआ मैं लेकर
आशा फिरसे जीतने की
इस गुरु ने ताकत दे दी
गिरकर फिरसे दौडने की"

आलोक शंकर said...

आशावाद कभी भी स्वागत योग्य है

sahil said...

ekbar फ़िर aasha और urja से भरी एक behatarin कविता.
alok singh "sahil'