"कविता मेरे पल्ले नहीं पडती
पढ़ रहा हूँ क्योंकि तुमने लिखी है",
ऐसा कहने वाली तुम्हारी आखों में
मैने बच्चों की सी चमक देखी है।
"कविता मेरे पल्ले क्यों नही पडती है?"
हमेशा ही सवाल तुम्हारा
मगर पुछते समय झूठ मूठ मुरझाया हुआ चेहरा
लगता है बड़ा ही प्यारा
तुम्हे कविता पल्ले नहीं पडती
ये फिर मेरा भूल जाना
और फिर तुमको अपनी एक
नयी लिखी कविता सुनाना
तुमने मन लगाकर पूरा समय
उसे सुनना
"वा वा क्या बात है,"
तुम्हारे कहने पर, मेरा सवाल
"पसंद आयी? समझ में आ रही है?"
तुम्हारा उसपर कहना;
धत! ये तारीफ है
तुम्हारे चेहरे की,
मासूमियत की,
तुम्हारी बंद आँखों की।
तुम्हारे जैसी कविता आँखों के सामने हो,
तो क्या जरुरत है, दूसरा कुछ समझने की?
तुषार जोशी, नागपुर



























4 टिप्पणी:
खुब कहा!!कवियों की समस्या ही यही है वो अपनी कविताओं को पकड़-पकड़ के सुनाते हैं बिना यह जाने की कोई सुनना चाहता भी है या नहीं…
कवियों की सामाजिक दशा और एक प्रेमी की मनोदशा का आपने सही वर्णन किया है। उस प्रेमिका के क्या कहने जो एक कवि की प्रेमिका है और उस नाते उसे कविताओं को सहना पड़ता ह। इसके साथ-साथ उस कवि के भाग्य में तो चार चाँद लग गए , जिसे ऎसी प्रेमिका मिली हो।
आपकी निम्न पंक्तियाँ मुझे बड़ी हीं प्यारी लगीं--
तुम्हारे जैसी कविता आँखों के सामने हो,
तो क्या जरुरत है, दूसरा कुछ समझने की?
बधाई स्वीकारें।
प्रोत्साहन के लिये शुक्रिया।
हम nachijon को ऐसे ही protsahan की जरुरत है tushar जी.
dhanywaad
alok singh "sahil"
Post a Comment