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Wednesday, January 24, 2007

मकबरा


अर्श बिजलियों का हो
या हो धुँआधार वर्षा का समारोह
सर्द रातों की ठिठुरन हो
या हो चिलचिलाती धूप का तेज़
मकबरा हूँ मैं संगमरमर का
मुझपर कुछ भी असर नहीं करता...

एक फकीर भटकता हुआ दर बरस आता है
घुटनें टेककर नीर बहाता है
जाते हुए लाल गुलाब छोड जाता है
पडे-पडे मुझपर दोनों ही सूख जाता है
मकबरा हूँ मैं...

मेरे भीतर जो अटूट नींद मे सोया है
उस फकीर की फकीरी में खोया है
जीवन के रहस्य को उसने तमाम उम्र ढोया है
असल मे अपना म्रत्युबीज खुद उसी ने बोया है
मकबरा हूँ मैं...

ना मौसम के भिन्न रूपों की दहशत
ना बेबसी के सीमाहीन चक्रव्यूह
सशक्त हूँ मै इतना,मगर मेरे भीतर है
मरे हुए कोमल भावों का समूह
मकबरा हूँ मैं...

बिदाई देकर किसी के आँगन से मरुस्थल तक
लाया गया था इसे बडे इंतज़ाम से
कीमती पोशाक,आभूषण,लाली सब है
सुना है आहूती दी थी इसने बडी शान से
मकबरा हूँ मैं...

कुछ यूँ शांत हुई थी भीतर कि दहकती ज्वाला
निगलकर पूर्ण विष का प्यला
यात्रा से पूर्व,अधरों से उसके
अंतिम क्षण,अंतिम शब्द "प्रियवर" ही निकला
मकबरा हूँ मैं...

---अनुपमा चौहान

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

मकबरा एक संवेदनशील रचना है| कुछ पंक्तिया जो एकाएक झकझोरती है और मुझे प्रभावित कर गयीं वे हैं:

"एक फकीर भटकता हुआ दर बरस आता है
घुटनें टेककर नीर बहाता है
जाते हुए लाल गुलाब छोड जाता है
पडे-पडे मुझपर दोनों ही सूख जाता है
मकबरा हूँ मैं..."

"यात्रा से पूर्व,अधरों से उसके
अंतिम क्षण,अंतिम शब्द "प्रियवर" ही निकला
मकबरा हूँ मैं..."

इतनी सुन्दर रचना के लिये बधाई|

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

अनुपमाजी,

संदेशयुक्त संवेदनशील रचना के लिए बधाई स्वीकार करें. आपकी यह पंक्तिया बहुत पसंद आई -

कुछ यूँ शांत हुई थी भीतर कि दहकती ज्वाला
निगलकर पूर्ण विष का प्यला
यात्रा से पूर्व,अधरों से उसके
अंतिम क्षण,अंतिम शब्द "प्रियवर" ही निकला
मकबरा हूँ मैं...

Anonymous का कहना है कि -

मकबरे की गीता को बड़ी हीं भावुकता से पेश किया है,शायद कुछ और न कहा जा सकता है…उत्तम रचना॥

प्रमेन्द्र प्रताप सिंह का कहना है कि -

achchhi kavita, swagat hai aapka.

Anonymous का कहना है कि -

बहुत सुन्दर
अनुपमा जी आपकी यह रचना अद्भुत है,अनुपमेय है|
बधाई

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

बहुत मुश्किल है इस कविता से यह निकाल पाना कि कौन सी पंक्तियाँ अधिक सुंदर हैं। फिर मुझे आपकी यह पंक्ति बहुत प्रभावित करती है-

पडे-पडे मुझपर दोनों ही सूख जाता है

tanha का कहना है कि -

सर्वप्रथम आपके हीं समुह मे आपका स्वागत है।
दर्द का आपने बड़ा हीं सजीव वर्णन किया है ।
कृप्या बधाई स्वीकारें ।

Unknown का कहना है कि -

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