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Tuesday, January 23, 2007

बडा स्कूल…


स्कूल बहुत बडा है
डिजाईनर दीवारें हैं
हर कमरे में ए.सी है
एयरकंडीश्नर बसें आपके बच्चों को घर से उठायेंगी
यंग मिस्ट्रेस नयी टेकनीक से उन्हे पढायेंगी
सूरज की तेज गर्मी से दूर
नश्तर सी ठंडी हवाओं से दूर
मिट्टी की सोंधी खुश्बू से दूर
जमीन से उपर उठ चुके माहौल में बच्चे आपके
केवल आकाश का सपना बुनेंगे
नाम स्कूल का एसा है साहब
मोटी तनख्वाहें देने वाले
स्वतः ही आपके बच्चों को चुनेंगे
बच्चे गीली मिट्टी होते हैं
हम उन्हें कुन्दन बनाते हैं
आदमी नहीं रहने देते..

मोटी जेबें हों तो आईये एडमिशन जारी है
पैसे न भी हों तो आईये, अगर प्यारा है बच्चा आपको
और अपनी आधी कमाई फीस में होम कर
आधे पेट सोने का माद्दा है आपमें
जमाने की होड में चलने का सपना है
और बिक सकते हैं आप,तो आईये
बेच सकते हैं किडनी अपनी, मोस्ट वेलकम
जमीर बेच सकते हैं...सुस्वागतम|

कालाबाजारियों से ले कर मोटे व्यापारियों तक
नेताओं से ले कर बडे अधिकारियों तक
सबके बच्चे पढते हैं इस स्कूल में
और उनके बच्चे भी जो अपने खून निचोड कर
अपने बच्चों की कलम में स्याही भरते हैं..

हम कोई मिडिलक्लास पब्लिक स्कूल की तरह नहीं
कि बच्चों को बेंच पर खडा रखें
मुर्गा बनानें जैसे आऊट ऑफ फैशन पनिशमेंट
हमारे यहाँ नहीं होते..
हम बच्चों में एसे जज्बे, एसे बीज नहीं बोते
कि वो "देश्" "समाज" "इंसानियत" जैसे आऊट ऑफ सिलेबस थॉट्स रखे..

यह बडा स्कूल है साहब..
और आप पूछते हैं कि
ए से "एप्पल", "अ" से "अनार" से अलग
एसा क्या पढायेंगे कि मेरे बच्चे अगर कहीं बनेंगे,
तो यहीं बन पायेंगे?
सो सुनिये..हर बिजनेस की अपनी गारंटी है
हम सांचा तैयार रखते हैं
बच्चों को ढालते हैं
फ्यूचर के लिये तैयार निकालते हैं
हमारे प्राडक्ट एम.बी.ए करते हैं
डाक्टर ईन्जीनियर सब बन सकते हैं
कुछ न बने तो एम.एम.एस बनाते हैं..

हम बुनियाद रख रहे हैं
नस्ल बदल देंगे
जितनी मोटी फीस
वैसी ही अकल देंगे
कि आपके बच्चे राह न भटक पायें
पैसे से खेलें, पैसे को ओढें, पैसे बिछायें
आपका इंवेस्टमेंट वेस्ट न जानें दें
पैसा पहचानें, पैसा उगायें
सीट लिमिटेड है, डोनेशन लाईये
बच्चे का भविष्य बनाईये
होम कर दीजिये वर्तमान अपना
कि शक्ल से ही मिडिल क्लास लगते हैं आप..

और कल आप देखेंगे आपका लाडला
पहचाने न पहचाने आपको,
मिट्टी को, सूरज को, पंछी को, खुश्बू को
पहचाने न पहचाने देश, परिवेश
इतना तो जानेगा
कौन सा रिश्ता मुनाफे का है
हो सकता है आपसे पीठ कर ले
कि बरगद के पेड में फल कहाँ लगते हैं
घाटे की शिक्षा वह यहाँ नहीं पायेगा
यह बडा स्कूल है...

*** राजीव रंजन प्रसाद
१५.०१.२००७

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anupama Chauhan का कहना है कि -

आपकी तारीफ करना तो सूरज को दिया दिखाने जैसा है.आप हर विशय को भली-भाँती शब्दों को ढालना जानते हैं.आजकल स्कूलों का यही हाल है...स्कूलों कि दशा इस कविता मे बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत की गयी है.आप मेरी तरफ से बधाई स्वीकार करें.

Medha Purandare का कहना है कि -

इतना तो जानेगा
कौन सा रिश्ता मुनाफे का है !
Rajeevji aapne rat-race ke vishay mein bahot hi achha nirikshan kiya hai. Aapke shabd kahin nukile lagate hain,kyon ki vastavwadi hote hain.

Kavita lambi hokar bhi acche prastutikaran ke karan oghawati hui hai.

Anonymous का कहना है कि -

क्या बात है !! बहुत खूब !!

आज जब हर तरफ़ हमें वैसी कहाँनियाँ सुननी पड़ती हैं जिनका हमारे जीवन से कोई लेना-देना नहीं..

ऎसे मैं अपने परिवेष की सच्चाई सुनकर बहुत अच्छा लगा ।
बधाई !!

रीतेश गुप्ता

आलोक शंकर का कहना है कि -

गहरा व्यंग्य, तीखा प्रहार और सही स्वरूप की कविता । आधुनिक कविता में थोड़ी आधुनिक शब्दावली और बाकी आधुनिक शिक्षा पद्धति का सत्य ।यह कविता एक सदेश है उन लोगों के लिए जो अपनी शिक्षा प्रणाली की अनदेखी कर दिखावे के गुलाम हैं और हाइ स्टेटस स्कूलों में कितना भी धन फेंकने को तैयार हैं।
"सूरज की तेज गर्मी से दूर
नश्तर सी ठंडी हवाओं से दूर
मिट्टी की सोंधी खुश्बू से दूर
जमीन से उपर उठ चुके माहौल में बच्चे आपके
केवल आकाश का सपना बुनेंगे"


"हम उन्हें कुन्दन बनाते हैं
आदमी नहीं रहने देते.।" -गहरा प्रहार्।

"जमीर बेच सकते हैं.."- अच्छी दूर दृष्टि।
"हम बुनियाद रख रहे हैं
नस्ल बदल देंगे"

"पहचाने न पहचाने आपको,
मिट्टी को, सूरज को, पंछी को, खुश्बू को
पहचाने न पहचाने देश, परिवेश
इतना तो जानेगा
कौन सा रिश्ता मुनाफे का है"
गहरा संदेश , सरल प्रस्तुति और सही प्रवाह,अच्छा है ।

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

आधुनिक काव्य से अति सुन्दर व्यंग्यात्मक प्रहार किया है आधुनिक शिक्षा पर। सही मायने में सम्पूर्ण कविता, आपकी यह पंक्तिया दिल को छूती है -

बच्चे गीली मिट्टी होते हैं
हम उन्हें कुन्दन बनाते हैं
आदमी नहीं रहने देते..

Anonymous का कहना है कि -

"बडा स्कूल" हृदय को भीतर तक संवेदित करती है
एक संवेदनहीन पीढी तैयार करने को आतुर इन तथाकथित "बडे" स्कूलों पर आपने सटीक कटाक्ष किया है|
कविता में "आऊट ऑफ फैशन पनिशमेंट ","आऊट ऑफ सिलेबस थॉट्स " जैसे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अद्भुत है जो
कविता को और भी प्रभावी एवं सुग्राह्य बना देता है|
सुन्दर व्यंज्ञ
हार्दिक बधाई राजीव जी |

सस्नेह
गौरव्

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