आज रात भर सो नहीं पाया हूँ मैं,
सारी रात,
एक सपना,
आँखों में चुभता रहा।
ख़यालों के दरवाजे तो बंद थे
पर खिड़की से,
पूरी रात
आधा चाँद झाँकता रहा।
मुझे मालूम था, मेरे अख़्तियार में नहीं है
मुहब्बत तेरी,
फिर भी
उम्मीदों के गुलाबी बुटे
स्याह फ़लक पे टाँकता रहा।
लगता था कि तुम्हारी यादों
की सर्द हवाएँ
जान ले लेंगी मेरी,
क्या करता?
सारी रात दिल जला के तापता रहा।
दिन के उजाले नींदों का बोझ
लेकर आयेंगे,
यही उम्मीद लेकर मैं
निकल-निकल पूरब को झाँकता रहा।
आज रात भर॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
कवि- मनीष वंदेमातरम्
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6 कविताप्रेमियों का कहना है :
आपका ब्लाग अच्छा है... चाहें तो मेरा ब्लाग देख सकते हैं : http://mohalla.blogspot.com/
मनीष जी मन के भावों को बड़ी सुन्दरता के साथ पिरोया है आपने.
@ अविनाश जी,
बहुत-बहुत शुक्रिया.
मनीष जी मन के भावों को बड़ी सुन्दरता के साथ पिरोया है आपने.
@ अविनाश जी,
बहुत-बहुत शुक्रिया.
कविता एक स्वांस मे पढने योग्य है.
वाह वाह सुंदर और सरल कविता।
बहुत ही मंजे हुए कवि की बहुत ही मंजी हुई कविता है यह। बहुत ही खुबसूरत ।
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