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Thursday, January 04, 2007

नेताओं के धन्‍धे


(आज बहुत दिनों के बाद इस कविता ब्‍लाग पर कवि रूप में वापसी कर रहा हूँ। आशा है कि आपको यह रचना अच्‍छी लगेगी, यह कविता मैंने सन् 2004 में लोक सभा के आम चुनाव के दौरान लिखा था।)

आज के युग में है केवल चोरी और चमारी,
और है इन भ्रष्‍टाचारियों की मक्‍कारी।


खाते-खाते और कितना हैं खाते,
खाते हैं इतना कि‍ कभी न अघाते।
काम तो केवल नाम मात्र की सेवा है,
करके लूट खसोट भरना बगल की जेब में मेवा है।

जनता से सेवा और सत्‍कार कराना,
विरोध करे तो लाठी चार्ज करना।
इन एहसान फरोशियों का धन्‍धा है,
और कर रहे ये देश को आज नंगा हैं।

इनकी महिमा गज़ब निराली,
खाते हैं ये सब से गाली।
आते हैं कंगाल बन कर
जाते हैं माला माल होकर।


इनके चमचे, चमचे रह जाते,
इनकी संताने मंत्री बन जाती।
इनकी महिमा अपरम्‍पार,
करते हैं जनता का जीवन बेकार।


वर्ष भर में कई सत्र चलाते (संसद के)
इसमे बैठ के मौज मनाते
साथ में गम्‍मज और ठहाके लगाते,
वक्‍त मिले तो गाली-गलौज भी करते।

लेते हैं ये एशोराम की सारी सुविधाऐं
चाहे जनता बेचारी भूखी मर जाये।
इनको एक दमड़ी का करना काम नहीं,
अपनी जाति को कर रहे बदनाम यही।

देश में कही सूखा है तो भूखमरी,
इनके घर में सदा पूड़ी सब्‍जी छन रही।
बहुत बड़ा देश है भारत,
पर सुव्‍यवस्‍था यहाँ से है नदारत।

जनता भी यहाँ कि मूर्ख है,
चुनते हैं उनको जो धूर्त है।


नेतागीरी की कहानी तब तक चलती रहेगी,
जब तक जनता अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी चलाती रहेगी।
वे इसी नर्क में रह कर स्‍वर्ग के सुख का भोगते हैं,
हम सबकी ऑंखों मे धूल झोक कर हमें स्‍वर्ग मे नर्क भुगाते हैं।

कवि- प्रमेन्द्र प्रताप सिंह


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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

प्रमेन्द्र जी,

नेताओं के ये गुणधर्म चुनाव-पूर्व के लिए ही नहीं, हमेशा के लिए सत्य हैं।

अच्छा लिखा है।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

यथार्थ को सरल किन्तु सटीक शब्दों में आपने चित्रित किया है.

Anonymous का कहना है कि -

कवि प्रमेंद्र प्रताप सिंग की वापिसी पर स्वागत.

श्रीश । ई-पंडित का कहना है कि -

नेतागिरी की ये कहानी एकदम सच्ची है,
लेकिन भईया(बुरा मत मानना) लिखने वाले की स्पैलिंग जरा कच्ची है।

Pramendra Pratap Singh का कहना है कि -

श्रीश मात्राओं की गलतियॉं पर टिप्‍पणी करने के लिये धन्‍यवाद। चूकिं एक मित्र से गलतियों के सम्‍बन्‍ध मैने पूछा था कि जो गलतियॉं हो मुझे बता दे मै इसे ठीक कर दूँ। उनकी तरु से अत्‍तर न मिलने पर मुझे लगा कि मात्रा ठीक ही होगी।

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

प्रमेन्दजी,

आपकी कविता भारतीय प्रजातंत्र में नेताओं की स्थिती का सटीक चित्रण कर रही है. बधाई.

अब आपसे क्षमा चाहूँगा, आपसे वार्तालाप खत्म करने के तुरंत पश्चात में किसी आवश्यक कार्य में व्यस्त हो गया था. आगे से आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगा, वादा रहा.

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