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Wednesday, January 03, 2007

गया और नया साल


हो कल की जैसे बात,
या कि नींद भरी रात,
किसी अपने की बारात,
बिना लड़े कोई मात।
शायद ऐसे गया, गया साल।।

आये नींद सुनकर गीत,
किसी बेदर्दी की प्रीत,
या कि चुटकी का संगीत,
वर्तमान सा अतीत।
शायद ऐसा ही था वो गया साल।।

चाहे जैसा भी था वो गया साल,
इस बात का किसे है मलाल,
वक़्त आया बनके फिर से द्वारपाल,
आओ सोचें कैसा होगा नया साल?
ज़रा करके देखें खुद से ये सवाल।।

जैसे शादी का हो पत्र,
मिले वर्षों बाद मित्र,
या पुराना कोई इत्र,
कोई ख़बर हो विचित्र।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे ग़ज़ल इक हसीन,
कोई सफ़र बेहतरीन,
जैसे दर्द हो महीन,
जैसे साफ हो ज़मीन।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।

जैसे घुँघेरू वाली पायल,
या हो जाये कोई क़ायल,
जैसे शेरनी हो घायल,
या कि 'मम्मी जी' का आँचल।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे कामगार का पसीना,
बिन श्रृंगार के हसीना,
कोई चुटकुला कमीना,
या फिर मार्च का महीना।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे साफ-स्वच्छ दर्पण,
या धुला हुआ बर्तन,
पतिव्रता का समर्पण,
या व्यक्तित्व का आकर्षण।
शायद ऐसा हो वो नया साल।

ये सब थे मान्यवर, मेरे ही उद्‌गार।
कैसा हो नव वर्ष ये, आप ही करें विचार।।
आप ही करें विचार हमें बस इतना कहना।
नया साल मंगलमय हो, प्रतिदिन और रैना।।


कवि- पंकज कुमार तिवारी

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

SaMaR(lna@rediffmail.com) का कहना है कि -

achchha prayas hai. kintu march k sthan par sawan ka mahina ise sur achchha kar sakta tha. tukbandi par dhayan dene k chakkar me mithas thodi si kam ho gayi hai. kamina jaise shabdon ka prayog madhur sahitya me zahar gholta hai.
Nav Varsh Mangalmay ho.
Shubhkamnayen.

Anonymous का कहना है कि -

Pankaj ji,
Kavita nav varsh par tuut tuut ka bikhar padte ahlaad me likhi gayi lagti hai, vichar gunthe gaye hain, puri mehnat se. sadhuvad.
Par kuch prashn hain...
1)Tukbandi ke prati itna agrah kyun?
2)Kya bhasha ke prati itni udarta ki kahin tatsam hindi("manyavar mere udgar"), kahin("gajal ek haseen") aur kahin kahin to("bina shrangaar ke haseena"). Itna vaividhya kyun, bhayavah lag raha hai mujhe to kahin kahin.("jaise ghungharu vali payal, ya ho jaye koi kayal").
3) Bhatakte bhaav achche hain, achche hote hain, aur vo bhav hi kya jo bhatakna na jaane. Par "jaise dard ho maheen, jaise saaf ho jameen". Do kamagat panktiyan ek dusare se kisi bhi bhanti na judi hon, par kahin to pathak laggi laga sake? main to kayi jagah thaga sa mahsuus kar riya hun.
4) Tuk ke saath gati bhi avashyak hi mani jati hogi kavita ke liye, mukhyatah tab ki jab vah, tukant tukant har pal tukant hi bani rahna chhti ho. Apko nahi lagta?
......... baki kavita ka falak vistrat hai akarshit karta hai, aap mehnati kavi lagte hain. par "nikal kar ankhon se chupchap" bah jaane vali kavita me mehnat??

prem का कहना है कि -

bahut hi jakkas kavita he sir

Pramendra Pratap Singh का कहना है कि -

जब पंकज जी प्रयाग आये थे तो उनसे यह उनकी ही जुवानी सुनी थी बडे ही सुन्‍दर ढ़ग से प्रस्‍तुत किया था।
शैलेश जी आपने इस कविता को आज फिर से पढ़ाकर मुझे पंकज जी के जुवानी इसको सुनने आनन्‍द मिला है। बधाई दोनो मित्रो को।

vibha rani Shrivastava का कहना है कि -


आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 02 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Kavita Rawat का कहना है कि -

.बीती जाहि बिसार दे आगे के सुध ले की सीख देती सुन्दर रचना

Unknown का कहना है कि -

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