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Friday, December 15, 2006

जब आदमी मरता है


क्या देखा है तुमने कभी
डूबता हुआ सूरज
और
मरता हुआ आदमी,
दोनों
कितने एक से नज़र आते हैं ?
दूर कहीं धरती के छोर पर
दम तोड़ता सुबह का सूरज,
उसके पीले चेहरे पर कितना गर्व छलकता है!
जैसे
कोई कुन्दन दमकता है।
गर्व
सर्वस्य लुटाने का
निःस्वार्थ
बेचाह
बेहिचक
हर डूबती साँस पर मुस्कुराता है
दुनिया को
कुछ-न-कुछ दे ही जाता है,

पर आदमी?
उफ़! ये उसकी बेअन्त जिजीविषा,
पीले पड़ते चेहरे पर,
मौत की दहशत,
एक-एक करके कम होती साँस पर
सौ-सौ बरस जीने की चाह।
आखिर क्यों?
क्यों नहीं आ पापा
आदमी के चेहरे पर
सूरज सा गर्व
सूरज सा संतोष..............................?
..............शायद इसलिए
क्योंकि आदमी,
हमेशा
संसार से लेता है
देता कुछ भी नहीं
ये जानते हुए कि
साथ
कुछ भी न जायेगा
सबकुछ
यहीं रह जायेगा।
........................
मैं भी इंसान हूँ,
मरूँगा एक दिन
ऐ मालिक मेरे! जानता हूँ
पर मैं
इंसान सी नहीं,
सूरज सी मौत चाहता हूँ।


कवि- मनीष वंदेमातरम्

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4 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

मनीष जी, वाह क्‍या सटीक वर्णन किया है, कविता प्रेरक है। हर दिन लाखों लोग कीड़ो की मौत मरते है, पर सूरज की मौत मरने वाले एक दो ही होते है। पर क्‍या कहे मनुष्‍य को कीडो की मौत मरना है भाता है।

Anonymous का कहना है कि -

बहुत अच्छा लिखा है आपने ।
बधाई

रीतेश गुप्ता

jayesh@2wap.org का कहना है कि -

Khed hai ki devnagari me likh nahi pa raha. Humein shuru se yahi shiksha milti rahi hai ki jeevan ka matalab kuch prapta karna hai, lena hai, ekattdha karna hai. Hamari karunantika ki yahi wajah hai. mujhe M.Phil. ke liye PREMCHANDJI ke sahitya sambandhi jankaqi apekshit hai. kripya ho tho preshit karein.
majorjc@gmail.com

caiyan का कहना है कि -

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