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Wednesday, December 13, 2006

तुमने कहा कि मुझे भूल जाओ


तुमने कहा कि मुझे भूल जाओ।
पर तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?
नहीं, तुम ऐसा कह ही नहीं सकती।
मुझे लगता है, तुमने यूँ ही मज़ाक किया होगा,
या हो सकता है, तुमने गुस्से में कहा हो।
लेकिन ऐसा मज़ाक.............।
नहीं, ऐसा मज़ाक तो तुम मज़ाक में नहीं कर सकती हो।
तो क्या तुम सचमुच मुझसे नाराज़ हो?
लेकिन क्यों ?
तुमने कुछ बताया भी नहीं,
कुछ कहा भी तो नहीं कि बात क्या है?
तुम्हें बहुत से सवालों के ज़बाब देने होंगे।
मैं भले ही कुछ न पूछूँ,
पर क्या मेरी यादें भी जाने देंगी तुम्हें बचकर?
क्या ज़बाब दोगी तुम अपने ही बेकरार दिल को?
जो पूछेंगे वे सपने जो हमने साथ में देखे थे,
तो क्या बोलोगी?
कैसे समझाओगी उन हवाओं को,
जो तुम्हें छूकर मेरे पास तुम्हारे होने का ऐहसास लाती थीं?
कैसे बहलाओगी उन लम्हों को जो हमारे साथ गुजर कर
हसीन हुए थे?
क्या कहोगी?
उन रातों को जिन्हें तुमने मेरी याद में काटी हैं,
क्या कहोगी?
उन ख़्वाबों से जिनमें तुम मुझे देखा करती थी,
नहीं समझा पाओगी तुम चाँद-तारों को,
नहीं समझा पाओगी बहारों को,
सभी तो हमारे एक होने के गवाह हैं।


बेशक़, तुम मुझे समझा सकती हो,
क्योंकि मैं जानता हूँ,
तुम्हारे समझाने पर, मैं ज़रूर समझ जाऊँगा।
पता नहीं कब से मैं सिर्फ तुम्हें समझने में लगा हूँ?
और शायद समझने भी लगा हूँ,
लेकिन पता नहीं क्यों,
कभी-कभी लगता है,
या तो मैं तुम्हें पूरी तरह समझ गया हूँ,
या बिल्कुल ही नहीं समझ पाया हूँ।
क्योंकि मैंने तुम्हें जब "कुछ" समझा,
तो हर बार तुम उससे बेहतर साबित हुई।

मैंने तुम्हें हसीन समझा,
लेकिन तुम हसीन और ज़हीन निकली।
मैंने तुम्हें मासूम समझा,
तो तुम मासूम और हिक़मती साबित हुई।
ऐसे ही कई बार,
मैं ग़लत साबित हुआ,
तुम्हें समझने में।
लेकिन अब जबकि मुझे लगता है,
कि शायद मैं तुम्हें समझने लगा हूँ,
तो तुम एक पहेली की तरह नज़र आ रही हो।
शायद अब मैं इससे ज़्यादा तुम्हें नहीं समझ सकता।
अब तो तुम भी कुछ समझो,
कुछ तुम भी सोचो।


मैं तुम्हें हसीन और ज़हीन समझता हूँ,
मेरी इल्तज़ा है कि तुम
मेरी जानशीन बन जाओ,
और मुझे एक बार फिर
ग़लत साबित कर जाओ।


"जाने कितने ही दरिया-औ-समन्दर बनते।
वो तो हम हैं कि आँसू पीते हैं, रोते ही नहीं।।"


कवि- पंकज कुमार तिवारी

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

कैसे बहलाओगी उन लम्हों को जो हमारे साथ गुजर कर हसीन हुए थे? :)

अतिसुन्दर.

कृपया कोई गुणीजन इन शब्दों का अर्थ बतावें -
1. ज़हीन
2. हिक़मती

भुवनेश शर्मा का कहना है कि -

बहुत सुंदर

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

good poem..congrats

Anonymous का कहना है कि -

पंकज जी, आपकी कविता और गजलो को आपके वाणी मे सुनने के बाद से आपकी प्रत्‍येक कविता जब मै पढता हूँ तो आपकी आवाज मे ही सुनाई देती है। यह कविता भी काफी अच्‍छी है।

Pradeep Gawande का कहना है कि -

Beautiful love poem. Enchanting monologue. Dramatic effect. It takes a instant grip and gradually grows over you.
Commendably composed poetic undercurrent that trickles down through the poem and down the readers conscious too. The enigmatic feminine
temperament captured so subtly with thoroughly romantic spirit. Reasonable amount of poetic masterstrokes interspersed. Cool and wining argument!

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