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Sunday, November 12, 2006

"सुमन" का महकना क्या जानो


तोड़ी है तुमने कच्ची कलियाँ
"सुमन" का महकना क्या जानो


प्यार करना फ़ितरत नहीं तेरी
दिलों की बातें क्या जानो


नफ़रत भी तुम कर ना सके
दुश्मन का दर्द क्या जानो


राह में अटके मुसाफ़िर हो
मंजील है कहाँ, क्या जानो


खुद ही को समझ सके हो ना
"गिरि" की चाहत क्या जानो

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

खुद ही को समझ सके हो ना
"गिरि" की चाहत क्या जानों,

झकास ! विचारप्रधान ।

Anonymous का कहना है कि -

किसी ना किसी पे किसी को ऐतबार हो जाता है
अजनबी कोई शक्स यार हो जाता है
ख़ूबियो से नही होती मोहब्बत भी सदा,
ख़ामियो से भी अक्सर प्यार हो जाता है

- राजीव तनेजा

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

गिरि जब भी कुछ लिखते हैं मेरे दिल से एक आवाज़ आती है, यह आगे चलकर बहुत बड़ा कवि बनेगा।
सुन्दर शब्द-संयोजन!

Anonymous का कहना है कि -

कविराज,
बहुत ही अच्‍छा लिख रहे है, शैलेश जी से मै भी सहमत हूं। सारी की सारी पक्तिंयां आपने आप मे मोतियों के समान है। आप की यह रचना आज ही देख पाया, किन्‍ही कारणो से व्‍यस्‍त था।

jeje का कहना है कि -

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