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दोहा गाथा सनातन: 37 सरसी में है सरसता


सरसी में है सरसता, लिखकर देखें आप.
कवि मन की अनुभूतियाँ, जातीं जग में व्याप..

इस लेखमाला में हम दोहे के सभी प्रकारों से परिचित होने के साथ-साथ दोहा परिवार के अन्य छंदों (रोला, सोरठा, कुंडली, दोही, उल्लाला, तथा बरवै) से भी मिल चुके हैं. दो पदों तथा चार चरणों वाले छंदों की इस कड़ी में अगला छंद है सरसी. इस मात्रिक छंद को कबीर या समुन्दर भी कहा गया है. 'छंद क्षीरधि' के अनुसार सरसी के दो प्रकार मात्रिक तथा वर्णिक हैं.

क. सरसी छंद (मात्रिक)

सोलह-ग्यारह यति रखें, गुरु-लघु से पद अंत.
घुल-मिल रहए भाव-लय, जैसे कांता- कंत..

मात्रिक सरसी छंद के दो पदों में सोलह-ग्यारह पर यति, विषम चरणों में सोलह तथा सम चरणों में ग्यारह मात्राएँ होती हैं. पदांत सम तुकांत तथा गुरु लघु मात्राओं से युक्त होता है.

उदाहरण:

१.
काली है यह रात रो रही, विकल वियोगिनि आज.
मैं भी पिय से दूर रो रही, आज सुहाय न साज..
-ॐप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'

२.
आप चले रोती मैं, ये भी, विवश रात पछतात.
लेते जाओ संग सौत है, ये पावस की रात..
-ॐप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'

३.
पिता गए सुरलोक विकल हम, नित्य कर रहे याद.
सकें विरासत को सम्हाल हम, तात! यही फरियाद..
-सलिल

४.
नव स्वप्नों के बीज बो रही, युव पीढी रह मौन.
नेह नर्मदा का बतलाओ, रोक सका पथ कौन?
--सलिल

५.
छंद ललित रमणीय मधुर हैं, करो न इनका त्याग.
जान सीख रच आनंदित हों, हो नित नव अनुराग..
-सलिल

दोहा की तरह मात्रिक सरसी छंद के भी लघु-गुरु मात्राओं की विविधता के आधार पर विविध प्रकार हो सकते हैं किन्तु मुझे किसी ग्रन्थ में सरसी छंद के प्रकार नहीं मिले. यह लेखमाला समाप्त होने पर सरसी के प्रकारों पर शोध का प्रयास होगा.

ख. वर्णिक सरसी छंद:

सरसी वर्णिक छंद के दो पदों में ११ तथा १० वर्णों के विषम तथा सम चरण होते हैं. वर्णिक छंदों में हर वर्ण को एक गिना जाता है. लघु-गुरु मात्राओं की गणना वर्णिक छंद में नहीं की जाती.

उदाहरण:

१.
धनु दृग-भौंह खिंच रही, प्रिय देख बना उतावला.
अब मत रूठ के शर चला,अब होश उड़ा न ताव ला.
-ॐप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'

२.
प्रिय! मदहोश है प्रियतमा, अब और बना न बावला.
हँस प्रिय, साँवला नत हुआ, मन हो न तना, सुचाव ला.
-ॐप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'

३.
अफसर भरते जेब निज, जनप्रतिनिधि सब चोर.
जनता बेबस सिसक रही, दस दिश तम घनघोर..
-सलिल

४.
'सलिल' न तेरा कोई सगा है, और न कोई गैर यहाँ है.
मुड़कर देख न संकट में तू, तम में साया बोल कहाँ है?
-सलिल

५.
चलता चल मत थकना रे, पथ हरदम पग चूमे.
गिरि से लड़ मत झुकना रे, 'सलिल' लहर संग झूमे.
-सलिल

ध्यान दें कि सरसी में लघु-गुरु की संख्या या क्रम बदलने के साथ लय भी बदल जाती है.

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