क़र्ज क्यों बाकी रहे
फ़र्ज़ क्यों रहे अधूरा
रास्ता आने के लिए है...
तो जाने के लिए भी
सफर बढ़ने का नाम है...
...तो लौटना भी सफर है
कमबख्त ज़िंदगी हर बार
ऐसे नियम क्यों बनाती है
कि सफर मंज़िल-दर-मंज़िल
सिर्फ बढ़ने का नाम है
कि रास्ता कदम-दर-कदम
चलने का नाम है
रास्ता तो तब है
जब चाहा लौटना भी हो
पता नहीं
बहुत कुछ पाने की चाह में
आदमी सब कुछ छोड़
क्यों बढ़ता जाता है
पता नहीं
आदमी किस कारण
ख़ुद का ख़ुदा बनना चाहता है......






