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दोहा गोष्ठी- 11 -जो मनु वह दोहा लिखे


जो मनु वह दोहा लिखे, पढ़े-गुने हो धन्य.
सत-शिव-सुन्दर छंद यह, इस सा छंद न अन्य.

मन आल्हादित देखकर, प्रतिभा का रजनीश..
शन्नो पूजा अजित मनु, तपन मुदित अवनीश.

''कब मनु जी दोहा लिखें, थके राह तक नैन.
जब तक दोहा न रचें, मिले न मन को चैन.''

दोहा कक्षा नायिका, शन्नो जी इस बार.
बहुत तेज हैं धाविका, सबको दिया पछार.

शन्नो जी से ही करें, चर्चा का आरम्भ.
सर्वाधिक दोहे रचे, बनीं सुदृढ़ स्तम्भ.

शब्द-चयन की सुगढ़ता, अर्थ दे मन को चैन
चतुर्थ चरण में ११ के स्थान पर १२ मात्राएँ...,

'शब्द-चयन सुगढ़ बनाये, अर्थ से मिलता चैन.'
मात्राएँ १३-११ के स्थान पर १४-१२ हैं...



अवनीश एस तिवारी

कहती प्रियसी अब लिखो ,
११२ ११२ ११ १ २
बीती जाती रैन ||
२२ २२ २१
-- 'प्रियसी' गलत, सही शब्द है 'प्रेयसी', सही शब्द का प्रयोग करने पर मात्राएँ १४, संतुलन के लिए 'कहती' को 'कहे' करें तो भाव या अर्थ को क्षति हुए बिना त्रुटी-सुधर संभव है. यूं कहें:
कहे प्रेयसी अब लिखो, बीती जाती रैन. / कहे प्रियतमा अब लिखो, बीती जाती रैन.

मनु जी सही दिशा में सोच रहे हैं. उनके सुझाव भी विचारणीय हैं.
"बोली सजनी अब लिखो, निकली आधी रैन"

तपन शर्मा-
शायरी के कायल मनु, दोहा करे बेचैन
अंतिम चरण में १२ मात्रा..., 'दोहा हरता चैन' करने से भाव वही, त्रुटि दूर...

शन्नो...
१. पकड़ लेखनी हाथ में,
१+१+१ २+१+२ २+१ २ =१३
मनु मन को दे चैन
१+१ १+१ २ २ २+१ = ११
शाबाश... बिलकुल सही.
२ अब लिखि भी ले मनु कछू
१+१ १+१ २ २ १+१ १+२ = १३
गुरु होंय बेचैन
१+२ २+१ २+२+१ = ११
लिखी, कछू व होंय...अशुद्ध प्रयोग...इनसे बचिए...
अब लिख भी ले मनु तनिक, गुरुवर हैं बेचैन...एक विकल्प है.

३.'सलिल'-वारि की बूँद पी
१+१+१ २+१ २ २+1 २ = १३
पा ले अतुलित चैन
२ २ १+१+१+१ २+१ =११
-- सही है. वाह!

४. मीठे बोल मिश्री घुले
२+२ २+१ १+२ १+२ = १३
कड़वे बोल कुनैन
१+१+२ २+१ १+२+१ = ११
'श्र' में दो ध्वनियाँ 'श' तथा 'र' मिश्रित हैं.. उच्चारण में संयुक्त अक्षर की अर्ध ध्वनि आधा श 'मि' के साथ जुड़ कर उसे दीर्घ कर देगा. 'मिश्' + री = मिश्री, मात्रा ४, ३ नहीं, 'मीठे' के स्थान पर 'मधुर' करने से भाव व अर्थ बदले बिना मात्र संतुलन ठीक हो सकता है. 'मधुर बोल मिश्री घुले, कड़वे बोल कुनैन' -सही प्रतीक chayan के लिए badhayee.

शन्नो
शुभ-शुभ बोलो मनु जी, कहीं ऐसा न होय १३+११
१ १ १ १ २ २ १ १ २ = १२ आपने १३ कैसे गिनीं?
हम हों कक्षा से बाहर, मिले ठौर ना कोय. १३+११
१ १ २ २ २ २ २ १ १ = १४ ( क + आधा क + शा = कक्षा, क+आधा क + श = क्ष)

shanno said...
सॉरी!
तीसरे चरण में एक मात्रा की कमी रह गयी थी. शायद मनु जी को ऐसी गलतियाँ महसूस न हो पायें पर मुझे उस मात्रा की कमी पूरी किये बिना बेचैनी हो रही थी इसलिए सुधार करना आवश्यक हो गया. और जल्दी से मनु जी के नाम में ज़रा सी तबदीली लानी पडी, क्योंकि जल्दी में कुछ और न सूझा. इसके लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ. आशा है कि मनु जी कोई समस्या नहीं खड़ी करेंगे.

शुभ-शुभ बोलो मनू जी, कहीं ऐसा न होय
हों हम कक्षा के बाहर, मिले ठौर ना कोय.

'मनु' को 'मनू करने के स्थान पर बोलो' को 'बोलिए' करें तो कैसा हो? देखिये
मनु जी! शुभ-शुभ बोलिए...होय-कोय से बचिए...कक्षा के कारण मात्रा १३ के स्थान पर १४ हैं.
मनु जी! शुभ-शुभ बोलिए, अशुभ न कहिये और.
हम कक्षा से दूर हों, मिले न भीतर ठौर.

-. अजित जी
जब श्रद्धा औ इडा मिले
11 12 2 12 12= 13
जगते मनु के बैन।
112 11 2 21 = 11
जब श्रद्धा औ इडा मिले
१ १ २ २ २ १ २ १ २ = १४ ( श्रृद्धा = श्र + आधा द + धा = २ +२ = ४, द्ध में दो ध्वनियाँ 'द' आधा तथा 'ध' हैं, 'आधा द' का आघात 'श्र' पर होता है,) इडा और श्रृद्धा मिलें = १३
बैन = बात, वचन, बोल, जगते मनु के बैन...वचन कैसे जगेंगे?...नैन जग सकते हैं... इडा-श्रद्धा के युग्म का अच्छा प्रयोग...साधुवाद, 'इडा और श्रद्धा मिलें, चाहें मनु के बैन...कैसा रहेगा?
तपन शर्मा
शेरों को करते पसंद,
२ २ २ १ १ २ १ २ १ = १४?
शे'र सुहाते हैं उन्हें, दोहा छीने हैं.
२ १ १ २ १ १ १ २ = १३
शन्नो जी
मृग-तृष्णा में भटक के, ना खोवे सुख चैन'' - सही है,
मृग-तृष्णा में भटककर, मत खोये सुख-चैन. में प्रवाह?
आतुर बोली लेखनी, ना हो अब बेचैन'' -सही, उचित लगे तो 'ना' को 'मत' कर ले
आज पढाया आपने कैसा अदभुत पाठ
सभी लगें गंभीर से करते थे जो ठाठ - वाह!...बिलकुल सही, मनु जी! दोहाकारों की संसद में दमदार प्रवेश के लिए बधाई...
शन्नो जी -
हल्दी-गाँठ पाय चूहा, ना पंसारी होय.
२ २ २ १ २ १ २ २ = १४?
बिल्ली समझे आँख मूँद,देख सके ना कोय.
२ २ १ १ २ २ १ २ १ = १४?
जल बिन सींचे बीज, न पेड़ कभी बन पायें
बौर बिन वृक्षों पर, कोयल गीत ना गायें.
दूध नहाया काग, न हंस कभी हो पाये.
पढ़कर बस दो अक्षर, न ही पंडित कहलाये.
अक्षर = अ + आधा क + श + र = २ + १ + १ = ४ मात्रा), होय, कोय से बचें...यह शब्द रूप सदियों पहले व्यव्हार में थे, अब खडी हिन्दी में दोष माने जाते हैं... , कुण्डली को बार-बार पढें तो लय मन में बैठ जायेगी, फिर मात्रा गिनना नहीं होंगी...अपने आप सही मात्रा आ जायेंगी...उदाहरण मनुजी.
मनु जी
शन्नो जी मत सोचिये तुच्छ स्वयं को आप
गिनती मात्रा छंद का जारी रखिये जाप -- शाबाश!, बिलकुल सही.

गप्प गोष्ठी के समापन से पूर्व एक और सच्ची घटना- कबीर को अपने युग में समाज से लगातार संघर्ष करना पड़ा. जब उन्हें महात्मा के रूप में पहचाना जाने लगा तो बहुत से मौकापरस्त उनसे नाता जोड़ कर अपना उल्लू सीधा करने की जुगत में भीड़ गए. ऐसे ही दो व्यक्ति थे उजी के पीर तथा झूँसी के शेख.तकी साधना के प्रारंभिक दिनों में कबीर ने इनसे संपर्क किया तथा उन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से शून्य पाकर स्वामी रामानंद के शिष्यत्व ग्रहण किया. गुरु वंदना करते हुए कबीर ने लिखा-

राम नाम का पटंतरै, देबी को कछु नाहिं.
क्या लै गुरु संतोशिए, हौंस रही मन माहिं.


उजी के पीर तथा झूँसी के शेख ने यह मिथ्या प्रचार कराया की कबीर उनका चेला है. कबीर को यह झूठ सहन नहीं हुआ. वे न तो झगड़ना चाहते थे की उनकी शांति तथा साधना भंग होती, न ही अपने नाम पर ठगी देखना चाहते थे. सांप मरे..लाठी न टूटे... पर यह कैसे हो? अंततः, दोहा ही ऐसे आदे समय में कबीर के काम आया. उन्होंने दोनों ठगों को ललकारते हुए दोहे कहे-

शेख अकरदी-सकरदी, मानहुं वचन हमार.
आदि-अंत और जुग-जग, देखहु दीठ पसार.
नाना नाच नाचे के, नाचे नट के मेख.
घट-घट अविनासी अहै, सुनहु तकी तुम सेख.
कबीर की साफगोई से घबराकर दोनों फिर कभी उनकी राह का रोड़ा नहीं बने.
कर उद्घाटन सत्य का, दोहा हुआ प्रसन्न.
सत्य न जो पहचानता, होता 'सलिल' विपन्न.