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एक चित्र अनेक कवितायें







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

अंक - बीस

माह - नवम्बर २००८






एक चित्रकार चित्र बनाते या एक फोटोग्राफर फोटो खींचते हुए क्या सोचता है? उसी सोच को शब्दों में ढाल कर उसे कविता का रूप देना आसान नहीं होता। इस बार हमने आप सभी को काव्य-पल्लवन के लिये किसी विषय की जगह चित्र के आधार पर कविता लिखने के लिये आमंत्रित किया। ये अपने आप में एक अलग कदम था। हमें आपकी ओर से इस प्रयास के लिये सराहना मिली और २० से ऊपर कवितायें भी प्राप्त हुईं। आपका अपार स्नेह और सहयोग ही है जो हमें नये प्रयोग करने के लिये प्रेरित करता है और हमारा उत्साह दोगुना हो जाता है। हम आगे भी इसी तरह से प्रयोग करते रहेंगे। हमारी पूरी कोशिश रहेगी कि हम कवियों और पाठकों का पूरा ध्यान रखें।
मनु बंसल जी ने हमें इसी चित्र से मेल खाता हुआ चित्र भेजा है, जिसे हम उनकी कविता के साथ ही प्रकाशित कर रहे हैं।

आइये जानते हैं विभिन्न कवियों ने निम्न चित्र को काव्य रूप में किस प्रकार ढाला।



आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
| विनय.के.जोशी | सीमा स्मृति | नीलम मिश्रा | रचना श्रीवास्तव | शिरीन अब्बास | सी आर राजश्री | शीला सिंह | प्रदीप मनोरिया | आशा ढौंडियाल | ए.एम.शर्मा | मनु बंसल | पंखुड़ी कुमारी | दिनेश ’दर्द’ । सविता दत्ता | सुरिन्देर रत्ती | सोमेश्वर पांडेय | शामिख फ़राज़ | अनिरुद्ध सिंह चौहान । महेश कुमार वर्मा | बसंत लाल 'चमन' | सुनील कुमार ’सोनू’ |


~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~




चला गया मुझको ठुकरा कर
कौन रहा सदा अपना
भौर भये जैसे कोई
टूट गया मीठा सपना
.
खोटा सौदा बनी जिन्दगी
बिखर गए सच्चे आने
उखड़ी सांसे थाम खड़ी है
जिंदा मौत सिरहाने
.
तन के तीरथ कब के उजडे
मांस विहीन अस्थि पत्थर
उजड़ी आँखे साए तकती
कपाल बूझे यादो के नश्तर
.
खून के रिश्ते कब के रिस गए
टूट गए कच्चे धागे
एकाकी जीवन का बीहड़
पसरा है इसके आगे

--विनय.के.जोशी



सर्दी का अर्थ
गरम रजाई में
कविता करते शब्‍दों में नहीं ठिठुरता,
ए.सी. कमरों के बंद दरवाजों से नही झांकता ,
शरीरों की गर्मी से नहीं सिमटता,
सर्दी का अर्थ
भूखे पेट,
सूखे बदन,
बिना शाल,
बिना छप्‍पर ,
सुबह
शीत लहर से पांच की मृत्‍यु ,
अखबार के किसी कोने में
और
आईनें सी इन आंखों में,
अपने अर्थ प्रतिबिंबित करता है

--सीमा स्मृति



अहसास है न अहसान कोई ,
जिन्दगी धूप की तरह गुजरती गई ,
और चेहरे पर झुर्रियां साया बनकर उभरती रहीं
उम्र के इस पड़ाव पर अब कोई नही है साथ ,
पर उम्र तो गुजरती है ,गुजरती गई ,
वक्त चलता रहा मेरे पैरों के साथ
या यूँ कहे कि पैर चलते रहे मेरे वक्त के साथ ,
सुबह से शाम तक ,दिन से रात तक ,
जिन्दगी बढती और बढती रही
इन सूनी आँखों में देखा तो पाया ,
न कोई रहबर न साया ,
मगर उम्र तो उम्र है गुजरती गई ,गुजरती रही

--नीलम मिश्रा



बाबा क्यों बैठे हो उदास और हताश
दुनिया से या ज़िन्दगी से हो निराश
किसी से नही मै मौसम से हूँ बेजार
निगोड़े की वजह से ज़िन्दगी हो गई तार तार
जब चाहिए पानी बरसता ही नही
बरसता है तो फ़िर रुकता ही नही
सूखे और बाढ़ के कहर से
टूटी है कमर कुछ इस कदर
रस्सी बेचने निकला हूँ इधर
सुबह से हो गई शाम
बोहनी तक तो हुई नही
नायलोन के आगे
सन की रस्सी कोई खरीदता ही नही
बाबा दर्द तुम्हारा जानती हूँ
पर एक खुशी की बात बताती हूँ
हमने चंद्र यान भिजा है चाँद पे
भारत सब को बता रहा है शान से
चलो बढ़िया है
मुला इस से होगा क्या
क्या समय से पानी बरसेगा
भूख से कोई न तरसेगा
क्या हमरे बिटवा की होसकेगी पढ़ाई
बिटिया हमरी जायेगी ब्याही
बाबू की खासी को मिल सकेगा आराम
सब हाथों को मिल सकेगा काम
हमरी धन्नो की का होसकेगी दवाई
अम्मा को का देने लगेगा दिखाई
चुका पाएंगे क्या हम महाजन का क़र्ज़
कुकुर और हम में नही है कौनो फर्क
मेरे पास इन बातों का न था कोई जवाब
करा के उस की बोहनी
उठ गई वहां से चुप चाप

--रचना श्रीवास्तव



कांच का शीशा,
नाज़ुक दिलकश,
टूटे तो चुभ जाता है...
मेरे सपने भी कुछ ऐसे
---टूट गए
-- अब चुभते हैं!

--शिरीन अब्बास



जिंदगी भर की है मैंने मेहनत मजदूरी
परिवार की भी भरपूर निभाई है जिम्मेदारी
बुदापें में काम न कर सकने की लाचारी
फ़िर भी हिम्मत नही है मैंने हारी

जीवन अब लगता है सूना सूना
पता नही कितने दिन और ऐसे है जीना
पत्नी ने भी मुझसे अपना दामन छुडा लिया है
मेरे एक मात्र कुल दीपक अब तेरा ही तो सहारा है

माना की परदेस में सब कुछ मिलता है
पर मेरे लाल पैसा ही सब कुछ तो नही होता है
अब बहुत अकेला हो गया हूँ में यहाँ
तुम भी आ जावो अब यहाँ
क्यों की तुम भी तो अकेले हों वहां
ऐसा जीवन किस काम का,
माटी से दूर पराये लोगों का क्या भरोसा
बची कुची जिंदगी अब तेरे साथ गुजारना है
मेरे खातिर अब तुझे गाँव लौट कर आना है

--सी आर राजश्री



स्वप्न से जागा नहीं हूं
स्वप्न टूटे हैं मगर
राह से भागा नही हूं
राह छूटी है अगर
है कहां वे दिन सलोने
मै चला हूं किस डगर
आखे मेरी थक चुकी हैं
आस मे विश्वास में
फ़िर नई दुनिया सजेगी
फ़िर नया होगा सवेरा
रात आई है अगर तो
दिन भी आयेगा कभी
टकटकी सी लगी है
आज तेरी राह में
तू बदल देगा ज़माना
है मेरा विश्वास ये
मै हूं भारत देख मुझको
आ ज़रा तू पास में
मैं बुढ़ापा तू युवा है
चल ज़रा तू साथ में

--शीला सिंह



बूढी आशा
आशाओं से भरी निगाहें ,
मन कितना मजबूर है |
तन जर्जर सामर्थ्य नहीं है ,
दुःख ही दुःख का पूर है ||
सर्द रात तन रहे ठिठुरता ,
यह दरिद्र संजोग है |
हाथ में चिंदी असमंजस है ,
क्या इसका उपयोग है ||
चेहरे पर झुर्री का जाला ,
निर्धनता का नूर है .......

आशाओं से भरी निगाहें ,
मन कितना मजबूर है |
तीन पहर तो बीत चुके हैं ,
आई जीवन की सांझ है |
इनके लिए तो सुख की जननी ,
रही सदा ही बाँझ है ||
सुर सरगम मर्सिया हैं गाते ,
सुख खट्टे अंगूर है ........

आशाओं से भरी निगाहें ,
मन कितना मजबूर है |
शिशिर बसंत हेमंत शरद ,
ऋतू सब ही आनी जानी |
अर्ध वस्त्र और भोजन आधा,
जीवन की है यही कहानी ||
फ़िर भी जीवन जीते जाते ,
ईर्ष्या से रह दूर है ...........

आशाओं से भरी निगाहें ,
मन कितना मजबूर है |
दूर ये नज़रें देख रही हैं,
सुख की कुछ परछाईं हो |
भाग्य विधाता को भी
शायद याद हमारी आई हो ||
दुःख भोगें और सपने देखें
इसमे नही कुसूर है ....

आशाओं से भरी निगाहें ,
मन कितना मजबूर है |
तन जर्जर सामर्थ्य नहीं है ,
दुःख ही दुःख का पूर है ||

--प्रदीप मानोरिया



रीती आंखे सब देख रही,देह अबल सी लगती है
धैर्य नहीं छुटा लेकिन,अब मन को थकन सी लगती है
अपनों का साथ नहीं है अब रिश्तों मै तपन सी लगती है.....
मै देख रहा चुप चाप यहाँ ,जो भी विधना ने दिखलाया
अब तक तो हार नहीं मानी, सब सहता और लड़ता आया
देह भले ही चूक रही,नैनों मै तेज अभी भी है
जब तक है सांसो की डोरी, लड़ने की ओज जगी सी है
संघर्षो की कड़ी कसौटी से,कुंदन बन कर मै निकला हूँ
हालातों की इस अंधी में ,मै दीप-स्तम्भ सा दिखता हूँ ...
जीवन का सार है अनुभव है,हार नहीं मै मानुगा
कितने कंटक हो राहों में, मै सब मै रही बना लूँगा

--आशा ढौंडियाल



इस सांझ की बेला मैं क्या भूलू क्या याद करु
कौन पराया है यहाँ किसको मैं अपना कहूं

कुछ यादो के मोती अब मेरी स्म्रति का हिस्सा है
सुंदर खट्टी मीठी यादें अब पुराना किस्सा है

जीवन भर अपना पराया भेद मैं करता आया था
दुनिया मेरी मैं दुनिया का कुछ समझ ना पाया था

जात पात का भेद किया तब सोच बड़ा अभिमान किया
अतीत के पृष्टों को पलटा जब अपना ही अपमान किया

एकला चलो गाता था मैं ऐसा अलबेला हुँ
जीवन के इस मोड़ पर अब क्यूँ रहा अकेला हुँ

हाथ थाम चलना सीखा जो मैंने जिसे पढाया है
कहाँ गया वो हाथ अब जब मैंने हाथ बढाया है

गर बुद्धि तब देता दाता मैं भी कुछ अच्छा कर पाता
ऐक हाथ बढाता जो सैकडो बदले में पाता

तृप्त हुआ तन और मन दुनिया चलाचली का मेला है
शुक्र प्रभु का पूरण हुए कारज ये कैसी अद्भुत बेला है

सांझ को पंछी घर लौटेगा मैं भी प्रभु घर जाऊंगा
प्रातः वो दाना ढुंढेगा धन्य प्रभु मैं चिरनिद्रा को पाउँगा

--ए.एम.शर्मा




सूखी ठांठुर देह,
नयन में लिए अज़ब संताप,
किस सीता का ससुर है ये,
किस सरवन का है बाप .....!
पहन सभी कुछ ब्रांडेड,
बेटा यारों में इठलाता,
बूढा ठूँठ, उघाडा नंगा,
ठण्ड से ठिठरा जाता,
दुनिया दारी छोड़,
कहीं पड़ रहो, करो बस जाप |
किस सीता का ससुर है ये........!!!!
अपनों को कैसे धिक्कारे,
माढे ही हैं भाग हमारे,
ऊँच नीच सारे जीवन का,
पाप पुण्य संग बैठ विचारे,
समय नही है शेष,
जो कर पाऊँ अब पश्चात्ताप |
किस सीता का ससुर है ये........!!!!
सरबस लुटा दिया तब जागा,
किंकर्तव्यविमूढ़ अभागा,
'हाय' भी अपनी घोंट के बैठा,
कैसा निर्मम मोह का धागा,
जिसको हर पल आसीस दिए हों,
कैसे दे दूँ शाप |
किस सीता का ससुर है ये,
किस सरवन का है बाप.......!!!!

--मनु बंसल



मैं इंसान नही एक प्रतीक हूँ
मनुष्य के अनवरत इंतजार का |
मैं परिणाम हूँ मोह जाल में फंसे
झूठे रिश्ते और झूठे प्यार का ||
आँखें पथरा गयी जाने
किस - किस के इंतज़ार का में |
कभी इंसानों की महफ़िल में
कभी सामानों के बाजार में ||
वो इंतज़ार तो एक छलावा था
क्षितिज की तरह
अब जाकर ये भान हुआ |
गिर - गिरकर जब थक गया
जीवन ये
तब जाकर ये ज्ञान हुआ ||
पलभर बैठकर सोचता हूँ
पलटकर पीछे देखता हूँ जरा सा |
सब लगता है धुंधला सा
धुंधली थी सोच मंजिल भी धुंधला - सा||
हाड - मांस की जिस गठरी से
मोह का नाता जोड़ लिया |
आज देखो उसने भी हमसे
अपना मुख आख़िर मोड़ लिया ||
लड़ाई समझ वक्त से अपनी
लड़ता रहा जिंदगी भर |
जाने किस मकाम पाने को
तड़पता रहा जिंदगी भर ||
शायद ये समझ न पाया
किस कारण था ये जन्म हुआ |
ये अहसास भी अब हुआ
जब ये जीवन ख़त्म हुआ ||
अब अफ़सोस के लिए
न बचा है वक्त
बचे को भी न
चाहता नही गंवाना |
ख़ुद को धोखा कब
तक कोई दे
बंद कर दूँ अब
नियती और प्रकृति पे दोष लगाना ||
दिख रही है तो देख तू भी
मेरे माथे की ये लकीर |
गर ताकत होती उसमे तो
क्या ऐसी होती मेरी तक़दीर ||
बहलाने की बातें है
ये तकदीरें और लकीरें |
हमारी डोर है जिसके हाँथ
वो है इन सबसे परे ||
जिसे जानने को चाहिए
एक निश्छल मन |
और निष्काम भाव से
जिया एक जीवन ||
एक तस्वीर समझ भूल मत जाना
प्रतीक समझ मन में बिठाना |
समझ गए तो नैया पार
नही तो मेरी जगह तेरा भी होगा ठिकाना ||

--पंखुडी कुमारी



कौन सा सफर है ये,
किस मंज़र को देख कर हैरान हैं आँखें
ये किस मकाम पर आकर ठहर गए मेरे पैर
ना हासिल है कुछ, ना कोई और तलाश है,
ये तस्वीर देखकर तो लगता है
की बुढ़ापा शायद मुसलसल मौत का इंतज़ार है.

--दिनेश "दर्द"



सोच में निमग्न
हड्डियों के ढाँचे सी वस्त्रहीन देह
पथराई आँखें अभी भी
सपना देख रही हैं।
बाट जोह रही हैं कि शायद कोई....

आशा अभी भी निराश नहीं हुई
उम्र के इस पड़ाव में भी ।

ना जाने कौन मुझपर दया खा जाए
कोई आकर मुझे सँभाल ले
किसकी किस्मत में हैं मेरी दुआएँ
कि मैं कंगाल होते हुए भी
किसी बात का तो धनी हूँ

और कुछ नहीं तो मुझसे
आशीष तो लेते जाओ
मैं खाली हाथ हूँ तो क्या
तुम्हें खाली हाथ ना भेजूँगा।

--सविता दत्ता



इस ढलते जीवन की सांझ की बेला में
इश्वर कृपा के सहारे बैठा, मदन
कभी गगन तो, कभी धरा को तकता
खोपड़ी में धसी लखों चिन्ताओं की गोलियाँ
झरने की भाँती गिरते आंसू
अस्वस्थ जर जर शरीर
साहस की कमी खलती है
ग़रीबी के श्राप से पीड़ित
सुख-सुविधाओं से वंचित
फटी झोली में सुनहरे कल की आशा
और वर्तमान के शीशे पर
धूल ही धूल .....
सब कुछ फीका ..... धुन्धला .....और निराश
ख़ुद से बातें करता बड़बड़ाता मदन
मेरे जो आंसू बहे उनकी गिनती नहीं
हर त्रासदी को झेलता जीवन ख़तरे में
न कम होनेवाली लाइलाज पीड़ा
प्रश्नों के उधेड़बुन में फंसा
किसी अपराधी की भांति
सख्त दंडात्मक करवाई का शिकार
शरीर की दशा बहुत कुछ कहती है
फांके ही फांके, अन्न के दाने मोतियों से भी महंगे लगते,
रूक-रूक के आवागमन करते श्वास
जिव्हा से निकली आवाज़ कर्कश हो चली,
फटी बांसुरी की तरह,
आखों के गड्ढों में सुखी पुतलियाँ,
जैसे दीये में तेल की कमी,
शरीर हड्डीयों का ढांचा,
कंकाल को ढोने में असमर्थ,
चेहरे की अनगिनत झुर्रियों को देखो,
मकड़ी का जाल
क्या मैं बच पाऊंगा ?
भविष्य में होनेवाली घटनाओं का आभास
हो रहा है
मैं जब कभी भूले से
नदिया किनारेवाले मरघट के पास से गुज़रता हूँ
मुझे देख के वो पुकारता है
हंसता है, मुझे चिढ़ाता है,
इशारे से बुलाता है कभी-कभी
मदन आ जाओ, मदन आ जाओ
तुम्हारी सारी चिन्ताओं का समाधान मेरे पास है
आओ मेरी आगोश में समा जाओ
मदन ..... नहीं ..... नहीं .....
मेरे बच्चे ..... मेरी पत्नी ..... मेरा परिवार .....
मेरा घर ..... मेरे खेत ..... नहीं ..... नहीं ..... नहीं .....

--सुरिन्देर रत्ती



शहर में बेटा तू ,
खुश रहे आबाद रहे |
मुझ बूढे का क्या,
‘टाइम ही मनी है’ तो
क्यों कोई तेरा समय बर्बाद करे|
दुआ यही मेरी कि तेरा
अच्छा कारोबार रहे |
चिंता मत करना,
वैसे भी मैं यहाँ खुश हूँ !
सब और खुशहाली है !
चंद दिन और मेहमान बस,
फ़िर मुसीबत ये जाने वाली है |
मुझे पता है आयेगा जरूर,
मेरी राख को सिराने |
गिनेगा जमीन भी इसी बहाने |
वारिस होने का पूरा कर्तव्य निभाएगा,
सब-श्राद्ध आदि कर फ़िर कभी ‘तू’ गाँव नहीं आयेगा. . . . . . . . . नहीं आयेगा ||

--सोमेश्वर पांडेय



यह कैसा ग़म है यह कैसा ग़म है
लब खामोश दिल उदास और आँख नम है
हौंसला बीमार, उम्मीदें अधमरी, मरा जज्बा
मेरा जिस्म में मचा हुआ एक मातम है
बदन की झुर्रियों की गिनती तो
अब भी दिल के ग़मों से कम है
सूखे में सूख गई उम्मीदें सारी
और चटके हुए बदन में बाकी हम हैं.
खुशियाँ तो जैसे अगवा कर लीं किसी ने
अब बाकी, बाकी बचा तो बस ग़म है

--शामिख फ़राज़



जन्मों से मेरे साथ हैं ,सदियों से मेरे पास हैं ,
सभी चराचर ,मेरे सुनसान के सहचर
कोई जागे कोई सोए ,मैं जागूं जग सोए,
मैं सोऊँ जग सोए,पर मेरी किसी को नही चिंता ,
इन्सान तो दूर मेरे पास भटकता नही परिंदा ,
वही शोर वही आवाज,कुछ नहीं मेरे पास ,
(गाड़ियों की ,शहर की आवाजें)
कईयों के बजन से भरा है सर ,ये सब हैं मेरे सुनसान के सहचर,
दूर से आती मशीनों की आवाज है,(घर का माहौल )
मेरे घर पे परिंदों का वास है,
कई जानवर मेरे आँगन में ,करते रोज अपना वास हैं ,
आपकी तरह मुझे भी आती बास है ,
पर आपकी संवेदनाएं,मेरी संवेदनाओं से मिलती नहीं हैं ,
मेरी खुशबु आपकी खुशबुओं से मिलती नहीं है,
मेरी चिंता करने वाले दुनिया के,लाखों, करोड़ों में से कोई भी नहीं है,
मेरी चिंता मैं ख़ुद करता हूँ ,
मेरी तकलीफें मैं ख़ुद सहता हूँ ,
मैं मरूं भी, तो कोई नहीं रोता है ,
मैं अपना वजन ख़ुद ढोता हूँ,
ओ मेरे अकेलेपन ,मेरे हमसफ़र ,
तेरे कारण ही बने ये सब ,मेरे सुनसान के सहचर
ऐसे सुनसान शहरी जीवन से तंग हो गया हूँ ,
मैं ख़ुद मेरे जीवन से तंग हो गया हूँ ,
बदन नंगा हो गया ,कपड़े इतने तंग हो गए हैं,
फुटपाथों पर सोते -सोते ,अकड़े सारे अंग हो गए हैं ,
पेटों की सिलवटें माथे की लकीर दिखती हैं ,
मेरी किस्मत ये ही लिखती हैं, (पेट भरेगा या नहीं.)
दूर से देखने पर मैं प्रेत लगता हूँ,
रोते तड़पते एक ही बात कहता हूँ देना ,
सभी को दो रोटी और माथे पे छप्पर ,
ओ मेरे प्रभु ,
मेरे ईश्वर,
ओ प्रिय,
मेरे सुनसान के सहचर,
मेरे सुनसान के सहचर

--अनिरुद्ध सिंह चौहान



जिस बेटे के उंगली पकड़कर
चलना था सिखलाया
जिसे गोद में रखकर
बोलना था सिखलाया
आज उसी बेटे ने मुझे
धक्का देकर
घर से है निकाला।
घर से है निकाला॥


उसकी पत्नी ने उससे कहा
इस बुढे का रहना मुझे नहीं है भाता
लगाओ इस बुढे को कहीं भी ठिकाना
वरना तोड़ लो मुझसे नाता।
वरना तोड़ लो मुझसे नाता॥


माना उसने प्यारी बीवी की बात
किया मुझपर कटु वचनों की बरसात
बोला उसने,
ऐ बुढा!
तुम्हारा नही है यहाँ कोई काम
चले जाओ यहाँ से
और हमें शान्ति से रहने दो
वरना हाथ-पैर तोड़कर बाहर कर दूंगा
फिर भी नहीं मानोगे तो
जहर देकर मार दूंगा!
जहर देकर मार दूंगा!!
पहले किया मैंने
उसके बात को अनसुना
पर उसने मेरा भोजन बंद किया
व मुझे भूखे ही रखने लगा
फिर एक दिन मुझे
घर से भी निकाल दिया।
घर से भी निकाल दिया॥


तब से भटक रहा हूँ
अकेले रह रहा हूँ
कोई नहीं है अब मेरा
सिर्फ ईश्वर ही है सहारा।
सिर्फ ईश्वर ही है सहारा॥


जिस बेटे के उंगली पकड़कर
चलना था सिखलाया
जिसे गोद में रखकर
बोलना था सिखलाया
आज उसी बेटे ने मुझे
धक्का देकर
घर से है निकाला।
घर से है निकाला॥

--महेश कुमार वर्मा



बुढापे का दामन संभाले हुए!
बाल सारे पके हुए
गाल पिचके हुए
दाँत झड़ गए एक-एक कर
रूखे-रोशन हैं अपनी कुम्हलाये हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!
आँखें धँसी हुई
आवाजें फटी हुई
एक-एक पसली नजर आ रही
जैसे खड़े हों कोई तीर-कमान लिए हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!
पैरों में दम कहाँ
दो डग चल सके
हाथों में हिम्मत कहाँ
लाठी भी संभल सके
जिन्दगी के रंग मंच से ठुकराए हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!
मुमकिन नहीं दिखना सही-सही
दिवा-रोशनी में भी
नैनों का नूर कहाँ गायब हुए
कह नहीं सकता कोई
हालात पे अपनी यूँ रोते हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!
हँसे कोई या कोई रोये
ताल्लुकात नहीं किसी से
दुत्कार दिया जब जिगर के टुकड़े ने
क्या नेह लगाऊं गैर किसी से
आहें निकलती दिल से रोते हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!
दुर्भाग्य बुढापे का
मौत भी रु-ब-रु नहीं होती
बियाबान हुए जग में
छाया भी साथ नहीं देती।
मुझे मेरे हाल पे छोड़ने वालों
तेरी दुनियाँ सदा आबाद रहे
तेरी दुनियाँ सदा आबाद रहे।
जा रहा हूँ जीते जी अलविदा कहते हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!
हालात पे अपनी यूँ रोते हुए।
बुढापे का दामन संभाले हुए!

--बसंत लाल 'चमन'



ये तस्वीर देख रहा हूँ.
कौन हे ये सोच रहा हूँ

सूखी हड्डियों में जान नही
चहरे पे तनिक मुस्कान नही
झुर-झुर जर-जर बदन
बेवफा उमर पथरायी नयन
हाड़ -मांस का ये तन
कब का भुला दिया आदमी को
बुलबुले सी जीवन
क्या खूब सिला दिया आदमी को
जुबां कटी हुई हे इसकी
इसलिए मै बोल रहा हूँ
दुनिया का उजला सच
आज मैं खोल रहा हूँ
ये किसी राह का भिखारी नही
ये धरती का बोझ भारी नही
ये कोई श्राप कोई गारी नही
ये दूजे लोक का संसारी नही
ये आधुनिकता का बूढ़ा बाप है
ये संकीरता का घोर बिलाप है
ये मेरे प्यारे दादा,काका
और उसमे शामिल आप है
ये वर्तमान का सिर्फ़ नमूना है
अभी तो बाकि पूरा होना है
ये दृश्य है आज की बिवशता की
ये दृश्य है बिचारों में फैली दुर्गंधता की

और भी कुछ है ये चेहरा
जिसपे चिंतन करें गहरा
वरना रिस्तो की धज्जियाँ उड़ जायेगी
जिसके प्रभाव से कोई नही बच पायेगी

--सुनील कुमार ’सोनू’