दोहा की छवियाँ अमित, सभी एक से एक.
निरख-परख रचिए इन्हें, दोहद सहित विवेक..
दोहा के तेईस हैं, ललित-ललाम प्रकार.
व्यक्त कर सकें भाव हर, कवी विधि के अनुसार..
भ्रमर-सुभ्रामर में रहें, गुरु बाइस-इक्कीस.
शरभ-श्येन में गुरु रहें, बीस और उन्नीस..
रखें चार-छ: लघु सदा, भ्रमर सुभ्रामर छाँट.
आठ और दस लघु सहित, शरभ-श्येन के ठाठ..
भ्रमर- २२ गुरु, ४ लघु=४८
बाइस गुरु, लघु चार ले, रचिए दोहा मीत.
भ्रमर सद्रश गुनगुन करे, बना प्रीत की रीत.
सांसें सांसों में समा, दो हो पूरा काज,
मेरी ही तो हो सखे, क्यों आती है लाज?
सुभ्रामर - २१ गुरु, ६ लघु=४८
इक्किस गुरु छ: लघु सहित, दोहा ले मन मोह.
कहें सुभ्रामर कवि इसे, सह ना सकें विछोह..
पाना-खोना दें भुला, देख रहा अज्ञेय.
हा-हा,ही-ही ही नहीं, है सांसों का ध्येय..
शरभ- २० गुरु, ८ लघु=४८
रहे बीस गुरु आठ लघु का उत्तम संयोग.
कहलाता दोहा शरभ, हरता है भव-रोग..
हँसे अंगिका-बज्जिका, बुन्देली के साथ.
मिले मराठी-मालवी, उर्दू दोहा-हाथ..
श्येन- १९ गुरु, १० लघु=४८
उन्निस गुरु दस लघु रहें, श्येन मिले शुभ नाम.
कभी भोर का गीत हो, कभी भजन की शाम..
ठोंका-पीटा-बजाया, साधा सधा न वाद्य.
बिना चबाये खा लिया, नहीं पचेगा खाद्य..
दोहा के २३ प्रकारों में से चार से परिचय प्राप्त करें और उन्हें मित्र बनाने का प्रयास करें.
मनु जी! आपने अंग्रेज दोहाकार स्व. श्री फ्रेडरिक पिंकोट द्वारा रचे गए दोहों का अर्थ जानना चाहा है. यह स्वागतेय है. आपने यह भी अनुभव किया कि अंग्रेज के लिए हिन्दी सीखना और उसमें दोहा को जानकार दोहा रचना कितना कठिन रहा होगा. श्री पिंकोट का निम्न सोरठा एवं दोहा यह भी तो कहता है कि जब एक विदेशी और हिन्दी न जाननेवाला इन छंदों को अपना सकता है तो हम भारतीय इन्हें सिद्ध क्यों नहीं कर सकते? पाशं केवा इच्छाशक्ति का है, छंद तो सभी को गले लगाने के लिए उत्सुक है.
बैस वंस अवतंस, श्री बाबू हरिचंद जू.
छीर-नीर कलहंस, टुक उत्तर लिख दे मोहि.
शब्दार्थ: बैस=वैश्य, वंस= वंश, अवतंस=अवतंश, जू=जी, छीर=क्षीर=दूध, नीर=पानी, कलहंस=राजहंस, तुक=तनिक, मोहि=मुझे.
भावार्थ: हे वैश्य कुल में अवतरित बाबू हरिश्चंद्र जी! आप राजहंस की तरह दूध-पानी के मिश्रण में से दूध को अलग कर पीने में समर्थ हैं. मुझे उत्तर देने की कृपा कीजिये.
श्रीयुत सकल कविंद, कुलनुत बाबू हरिचंद.
भारत हृदय सतार नभ, उदय रहो जनु चंद.
भावार्थ: हे सभी कवियों में सर्वाधिक श्री संपन्न, कवियों के कुल भूषण! आप भारत के हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की तरह उदित हुए हैं.
सुविख्यात सूफी संत अमीर खुसरो (संवत १३१२-१३८२) ने दोहा का दामन थामा तो दोहा ने उनकी प्यास मिटाने के साथ-साथ उन्हें जन-मन में प्रतिष्ठित कर अमर कर दिया-
गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस..
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग..
सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय..
आज का गृहकार्य : जनाब खुसरो के कुछ दोहे लाइए ताकि उनका आनंद सभी ले सकें. उक्त दोहों की गुरु-लघु मात्रा दे आधार पर उनका प्रकार बताइए और ईनाम में दोहा पाइए.
दो जानकारियाँ :
मेकलसुता त्रैमासिक दोहा-पत्रिका है. जिसमें दोहा तथा दोहा-कुल के छंद ही प्रकाशित होते हैं. संपादक हैं श्री कृष्ण स्वरुप शर्मा 'मैथिलेन्द्र'. संपर्क: गीतांजलि भवन, ८ शिवाजी नगर उपनिवेश, नर्मदापुरम, होशंगाबाद ४६१००१, दूरभाष: ०७५७४ २५७७२९, चल्भ्श: ०९४२४४७१२४९, शुल्क: वार्षिक ६०/-. अब तक १८ अंक प्रकाशित हो चुके हैं.
श्री मैथिलेन्द्र शीघ्र ही दोहा सन्दर्भ-२, दोहा पर शोधपरक ग्रन्थ प्रकाशित करने जा रहे हैं. जिन दोहकारों का कम से कम एक दोहा संग्रह प्रकाशित हो चका है उनसे परिचय (नाम, माता-पिता-जीवनसाथी का नाम, जन्म स्थान, जन्म तिथि, शिक्षा, आजीविका, साहित्यिक योगदान, प्रकाशित कृतियाँ, पता, दूरभाष, चलभाष, श्वेत-श्याम छाया चित्र, पता लिखा पोस्ट कार्ड, तथा सहयोग निधि १५०/- ३१-१२-२००९ तक आमंत्रित है.






