~~ हिंदयुग्म के तमाम दोस्तों को ईद की मुबारकबाद एडवांस में ~~
हमारे बचपन का एक दोस्त दुबई में रहता है। दुबई में ईद हमारे देश से एक दिन पहले ही मना ली जायगी। हम सोच रहे थे कि जिस दिन वहां ईद होगी... यहां रोज़ा होगा। ऐसे में ईद की मुबारकबाद हम उसे कैसे देंगे। बस इसी सोच के मद्देनज़र कुछ अशआर क़लमबंद होते चले गये। वैसे तो ये निजी सोच ने रचा है लेकिन अब ये ख़याल आ रहा है कि न जाने कितने पाठकों के ऐसे दोस्त होंगे जो वक़्त के इस अंतराल के हिस्सेदार होंगे। लीजिये फिर आप भी इसका लुत्फ़ उठाइये...
तुम्हें हो ईद मुबारक, हमारा रोज़ा है
सिवय्यां खाओ छका-छक, हमारा रोज़ा है
तुम अपने हाथों से तोड़ोगे बंदिशें अपनी
हमारी ऐसी कहां लक, हमारा रोज़ा है
तुम्हारे पास हैं आंखें, नहीं है ताक़ते दीद
हमारे पास है ऐनक, हमारा रोज़ा है
महीने भर से बड़ा इंतेज़ार था तुमको
करेंगे हम न कोई शक, हमारा रोज़ा है
दुआ है तुमको इलाही अता करे रोज़ी
और हमको थोड़ी सी ठंडक, हमारा रोज़ा है
ख़याल में ही सही साथ हूं तुम्हारे मगर
चलूंगा साथ कहां तक, हमारा रोज़ा है
ताक़ते-दीद– देखने की शक्ति
कवि- नाज़िम नक़वी






