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कौन सही? कौन गलत?


लावारिस हवाओं की थपेड़े खाती गर्द में
लोटपोट होता
बेशर्म मौसम का सरकता पल्लु
अब विलुप्त हुआ लजाती दुल्हन का रूप
और लहलहाती फसल का समां
गया वो भीनी भीनी हवाओं का
संगीत - सुरमय ।

अब अंगूरी खेतों की रखवाली करते
लपलपाते कुत्तों की बेताब आत्मा
हड्डी से भूख बढ़ा कर
खेल रही
मांस नोचने का खेल
दातों से चबा कर
मासूमियत को
उदर के हवाले करती ।

इधर सूअर के बच्चों से सीखते
हलाहल में अमृत तलाशते जीव
बदबू के साथ साथ
बदबू फैलाने का इल्जाम भी
ढो रहे हैं
इधर देख लो
खुद ही गवाही देकर
अपना निर्णय सुनाने को
एकत्र हुये असंख्य गजराज
जिनकी पवित्र वाणी पर
कीचड़ उछालते
दलदल में से उभरते
कीड़ों का उफान !
जो कुलबुला कर
महज गन्दगी फैंकते हैं
साफ सुथरी नाक में एकत्र हुई
घ्राण शक्ति पर !

इसमें कौन सही? कौन गलत?
खुद देख लो
चांदी की डंडी वाले तराजू में
जहां मुर्दा लाश पड़ी
शब्दों की हर पंक्ति का पलड़ा
जीवन्त शिशु से भारी ।

-हरिहर झा