गुनगुनी धूप के छाले हैं,
ज़ख्म जो हमने पाले हैं
मातम हर गली में क्यों,
चीखो पुकार वाले हैं
फारिग होकर दुनिया से,
ढूँढेंगें कहाँ उजाले हैं
बदन तुडाकर पूरे दिन,
मिलते दो ही निवाले हैं
तुमने दिलकश आँखों में,
हर्ब कितने संभाले हैं
सुर्ख धुओं के गुच्छों में
रंजो अल्म उछाले हैं
दिन के स्याह उजाले तो
रातों से भी काले हैं






