मिली मुझे दुनिया सारी जब मिला मौला
भुला दूँ मै खुद को नाम की पिला मौला
गमों से टूट रहा शख्स हर यहां रोता,
भरा दुखों से जहां तुमसे है गिला मौला
चमन बना सहरा गुल यहां रहे मुर्झा,
बहार यूँ निखरे हर कली खिला मौला
दिखा चुका अपने खेल खूब वह शैतां,
सदा सदा के लिए अब उसे सुला मौला
बदी को भूल के इंसा करे मोहब्बत बस,
दिलों में प्रीत की ऐसी अलख जला मौला
करें सभी हर पल बंदगी खुदा तेरी,
तुझे पा जाने का मौका तो इक दिला मौला
कवि कुलवंत सिंह






