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Sunday, May 15, 2011

महंगाई का दानव



मार्च प्रतियोगिता की नवीं कविता के रचनाकार मनोज गुप्ता ’मनु’ हैं। हिंद-युग्म पर यह उनकी पहली कविता है। 1977 मे गुना (म.प्र.) मे जन्मे मनोज ने कम्प्यूटर से स्नातक किया है और वर्तमान मे शेयर-ब्रोकिंग व्यवसाय से संबद्ध हैं। लेखन के अलावा पेंटिंग मे भी रुचि रखने वाले मनोज की रचनाएँ दैनिक पत्रों मे प्रकाशित हो चुकी हैं और वो ब्लॉग पर भी लिखते हैं। अपने साहित्यिक रुझान के बारे मे खुद उनका कहना है कि  "मेरे परिवार का कोई भी सदस्य साहित्य में रूचि नहीं रखता है। मैंने अपने जीवन की पहली कविता मेरे एक दोस्त के जोर देने पर उसकी प्रेमिका के लिए लिखी थी, उसके बाद लेखन के प्रति मेरी गहरी रूचि हुई !"
सम्पर्क: 'वात्सल्य" 7 ए, शारदाकुंज,
नरेला शंकरी, भेल
भोपाल (म.प्र.) 46202
दूरभाष: 9329783197

पुरस्कृत रचना: महंगाई का दानव

चहकते हुए पड़ोस में
मातम सा छा गया है
महंगाई का ये दानव
एक दम से आ गया है!

मांगी थी फीस उसने
चांटा दिया पिता ने,
स्कूल आज बच्चा
रोता हुआ गया है!

वो भूख से तड़पकर
मजदूर मर रहा है,
सारे जहाँ की रोटी
ये कमबख्त खा गया है!

इस बार मेरी बहना
राखी न भेजना तू ,
ससुराल में बहन को
ये ख़त रुला गया है !!
_____________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

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15 कविताप्रेमियों का कहना है :

Disha का कहना है कि -

मंहगाई का तो हल मत पूछिए। सभी लोग बेहाल हैं।

देखिये आजकल का जमाना
मुश्किल है घर का खर्च चलाना
बाहर जब भी जाते हैं
दाम बड़े हुए पाते हैं
मंहगाई ने निकाला हमारा दिवाला
जो हाल मेरा वही हाल तुम्हारा
ये तो है घर-घर की कहानी
दाम बदना है इसकी निशानी

punita singh का कहना है कि -

अच्छी कविता है |महगाई की मार से सभी परेशांन है | इसका असर रिश्तों पर भी पड़ता है | परेशांन है ||

atul का कहना है कि -

वो भूख से तड़पकर
मजदूर मर रहा है,
सारे जहाँ की रोटी
ये कमबख्त खा गया है!

इस बार मेरी बहना
राखी न भेजना तू ,
ससुराल में बहन को
ये ख़त रुला गया है !! kavita ki yah panktiya samsamik aur vartman vyavstha par chot karti hai.aam aadmi ke man ki peda kavita di laino me chalakti hai. aam aadmi ke bhavnao ko sabd dene ke liye dhanybad

Disha का कहना है कि -

mahgai ne sbhi ki halat patli kar di hai
good poetry.........

RITESH का कहना है कि -

बड़ी ही सामायिक चर्चा इस कविता के मद्धम से छेड़ी हैं आप ने....
क्या कह सकते है ....
....महगाई डायन खाए जात है
जनवादी अभिव्यकि के लिए साधुवाद

amar का कहना है कि -

aaj ke time me garib apni mehnat ki kamai me se ek kg. dudh bhi nahi pee sakta aur jinke pass paisa h unka ye pata nahi k kanha se aata h ye paissa.kavita k davara bharsht logo par gahri chot ki h.good

DHARMENDRA MANNU का कहना है कि -

वो भूख से तड़पकर
मजदूर मर रहा है,
सारे जहाँ की रोटी
ये कमबख्त खा गया है

अच्छी कविता महंगाई पर... बधाई...

SUNIL PANDEY का कहना है कि -

महंगाई के कारन गरीब बच्चे खुद काम-धंधा करके अपना पेट पाल रहे हैं |उन्हें पढने -लिखने की फुर्सत कहा हैं |

gulsher ali का कहना है कि -

apki kavita bahut achchi hai

Aditya Tripathi का कहना है कि -

bhookh se mara tha footpath par pada tha, kapade utha k dekha to pet par likha tha,'sare janha se achha hindosta hamara''

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