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Sunday, February 06, 2011

नींद


जैसे ही जागता हूँ
सो जाता हूँ !
सोते हुए देखता हूँ
अपनी नींद टूटने का ख्वाब !
ख्वाब टूटता है हर रोज़
और नींद में बिखर जाता है
टूटे ख्वाब के चुभने से
नहीं टूटती नींद..
क्यों नहीं होता कुछ ऐसा
कि कभी सोते हुए
नींद भूल जाये
आंखें बन्द करना..
फिर कोई ख्वाब
मशाल लेकर
घुस जाये आंखों में
और लगा डाले आग
कम्बख्त नींद को !

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

राहुल पाठक का कहना है कि -

Bahut badiya vipul bhai.....

tumhari lekhani k to hum purane prasansk hai....

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

एकदम नयी कल्पना, सुन्दर रचना।

ana का कहना है कि -

bahut sundar

Kajal Kumar का कहना है कि -

कुछ ऐसा ही एक बार, कई साल पहले, ओशो के एक प्रवचन में सुनने को मिला था

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

मैं तो सिर्फ़ एक ही शब्द कहना चाहूँगा:- "बेहतरीन"

rachana का कहना है कि -

sunder soch
badhai
rachana

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

सुंदर रचना, बधाई

yamini का कहना है कि -

behad khubsaurat kaviraj


aapka perfect signature he isme aur antim panktiyaan bahhutttttttttttttttt khubsurat hain--

yamini

Ruchita का कहना है कि -

फिर कोई ख्वाब
मशाल लेकर
घुस जाये आंखों में
और लगा डाले आग
कम्बख्त नींद को !

Kya baat hai Vipul ji.. Bahut hi umda rachna. Aapki kavitao ki mashal jalate raha kijiye. Kuch roshni hme b mil jaya karegi.. Badhai...

Ruchita

vibhore का कहना है कि -

बहुत सुन्दर...

हालांकि कहीं कुछ कमी जरूर मह्सूस हुई, मगर फिर भी आपकी रचना अपने आप में एक अलग पहचान रखती है...

सदा का कहना है कि -

ख्वाब टूटता है हर रोज़
और नींद में बिखर जाता है
टूटे ख्वाब के चुभने से
नहीं टूटती नींद..

सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

Anita का कहना है कि -

सचमुच यदि ऐसा हो तो उसी दिन होगा जागरण!

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